विधानसभा चुनाव के मतदान के बाद अब सबको सिर्फ नतीजों का इंतजार था। लोगों का ये इंतजार आज खत्म हो जाएगा। रविवार सुबह 8 बजे से वोटों की गिनता शुरू हो गई है। जिसके बाद पार्टियों में हलचल पैदा हो गई है। तमिलनाडु (Tamil Nadu) में विधानसभा चुनावों (Assembly Elections 2021) के रुझानों के मुताबिक एमके स्टालिन की डीएमके राज्य में बहुमत से आगे चल रही है। वहीं एआईएडीएमके लक्ष्य का पीछा करते हुए डीएमके को कड़ी टक्कर दे रही हैं। जानकारी के मुताबिक डीएमके को 136 और एआईएडीएमके को 97 सीटों पर बढ़त हासिल है।
कड़ी मेहनतों के बाद भी भाजपा रही पीछे, एक बार फिर बंगाल पर होगा ममता बनर्जी का राज…
बंगाल विधानसभा चुनाव में अब लोगों का इंतजार खत्म हो गया है। आज यानी 2 मई को चुनाव के नतीजे आना शुरू हो गए हैं। चुनाव के नतीजों से भाजपा के पैरों तले जमीन खिसक गई है। हर बार की तरह इस बार भी ममता बनर्जी बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत करती दिख रही हैं। रुझानों के हिसाब से अब तक टीएमसी ने 190 से ज्यादा सीटों पर बढ़त बना ली है। वहीं दूसरी ओर अपनी जीत का दावा करने वाली भाजपा केवल 97 सीटों पर ही बढ़त बना पाई है। ऐसे में लोगों का कहना है कि ‘बंगाल की बेटी’ ममता बनर्जी की बंगाल में अलग ही छवि है जिसके कारण बंगाल के लोग उन्हें ही चुनना पसंद करेंगे।
वेकेशन मनाने के बाद लोगों की मदद करने में जुटीं आलिया भट्ट, शुरू किया ये काम…
कोरोना वायरस की दूसरी लहर से बेकाबू हुए हालात के बीच अब हर कोई मदद के लिए सामने आ रहा है। बॉलीवुड के कई सितारे तो ऐसे हैं जो पहली लहर से ही लोगों की मदद करने में जुटे हुए हैं। लेकिन अब उनके साथ साथ और भी सितारे जुड़ गए हैं। हाल ही में बॉलीवुड की एक्ट्रेस आलिया भट्ट (Alia Bhatt) वेकेशन मनाने के लिए मालदीव्स गई थीं। मालदीव्स से आने के बाद उन्होंने भी सोशल वर्क शुरू कर दिया है। वह घर बैठे ही लोगों से ऐसी जानकारी शेयर कर रही हैं। जिसकी लोगों को काफी ज्यादा जरूरत है।
यूपी पंचायत चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, इन शर्तों के साथ मतगणना के लिए दी इजाज़त..
कोरोना के बिगड़ते हालातों के बीच उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव संपन्न हो चुके हैं। ऐसे में अब वोटों की काउंटिंग को लेकर बड़ा मसला खड़ा हो गया है। कोर्ट का कहना है कि वोटों की काउंटिंग के समय कोरोना प्रोटोकॉल का पूरी तरह से पालन होना चाहिए। जानकारी के मुताबिक रविवार को कुछ शर्तों के साथ वोटों की काउंटिंग शुरू हो जाएगी। जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “राज्य चुनाव आयोग की तरफ से बनाए गए कोविड प्रोटोकॉल का पूरी तरह पालन करना होगा।” देश में कोरोना का संकट तेज़ी से बढ़ रहा है ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की चिंताएं जाहिर हैं।
मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत का बड़ा फैसला, राज्य में नहीं होगी चारधाम यात्रा, कहा “ऐसा संभव नहीं…”
कोरोना वायरस ने देश में पूरी तरह से अपनी पकड़ बना ली है। जिसके कारण अब लाखों की तादाद में हर रोज कोरोना के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे में अब कई राज्य सरकारों ने कड़े फैसले लेना शुरू कर दिए हैं। खबर है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने भी राज्य में बढ़ते संकट को देख एक बड़ा फैसला लिया है। इस फैसले के चलते अब राज्य में चारधाम यात्रा को स्थगित कर दिया गया है। उन्होंने कहा है कि बढ़ते संकट के बीच चारधाम यात्रा संभव नहीं है। सिर्फ कपाट खुलेंगे और सिर्फ पूजा अर्चना होगी।
बढ़ते संकट के बीच मुख्यमंत्री योगी ने भी बढ़ाई सख्ती, अब राज्य में 3 दिन रहेगा लॉकडाउन…
देश में लगातार बढ़ रहे कोरोना संकट से सब लोग परेशान हो गए हैं। देश के हर राज्य में कोरोना से लोगों की मौत हो रही हैं। जिसको देखते हुए राज्य सरकारों ने सख्ती बरतना शुरू करदी है। कई राज्यों में लॉक डाउन लगाया जा चुका है। जिसमें से एक उत्तर प्रदेश भी है। हालांकि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने राज्य में संपूर्ण लॉकडाउन से इंकार किया है। लेकिन फिलहाल राज्य में वीकेंड लॉकडाउन जारी है। हाल ही में योगी सरकार ने पूरे उत्तर प्रदेश में शुक्रवार की शाम से लेकर सोमवार की सुबह तक लॉकडाउन का ऐलान किया था। जिससे कोरोना से संक्रमित मरीजों की संख्या में गिरावट देखने को मिली थी।
देश में लगातार बढ़ रहा है कोरोना संकट, लुधियाना और अहमदाबाद में बिगड़े हालात, मृत्युदर बढ़कर हुआ…
धीरे धीरे देश में अपनी पकड़ बनाते बनाते कोरोना वायरस ने अब घातक रूप ले लिया है। देश में हर रोज लाखों की तादाद में कोरोना से संक्रमित लोगों की पुष्टि हो रही है। ऐसे में अब देश में मृत्युदर में भी इजाफा होने लगा है। कई राज्य हैं जहां मृत्युदर 2 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गया है। यानी कई राज्य में हर 100 मरीजों में से 2 मरीजों की इस वायरस के कारण मौत हो रही है। बता दें कि इन राज्यों में पंजाब (Punjab), गुजरात (Gujarat)और पश्चिम बंगाल (West Bengal) जैसे राज्य शामिल हैं।
यूपी नहीं तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश में सबसे अधिक बूचड़खाने
उत्तर प्रदेश, झारखंड समेत भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) शासित राज्यों में अवैध बूचड़खानों के खिलाफ कार्रवार्इ जारी है। इस बीच सूचना का अधिकार (आरटीआर्इ) के जरिये पता चला है कि देश में मात्र 1,707 बूचड़खाने ही पंजीकृत हैं. उत्तर प्रदेश समेत देश के अलग-अलग राज्यों में अवैध बूचड़खानों के खिलाफ जारी मुहिम को लेकर भले ही हो-हल्ला कम हो गया हो, लेकिन पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA) इंडिया के आंकलन पर गौर करें तो देश में अवैध बूचड़खानों की संख्या अभी भी 30,000 से ज्यादा होने का अनुमान है।
सबसे अधिक पंजीकृत बूचड़खाने वाले सूबों की फेहरिस्त में क्रमशः तमिलनाडु, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र शीर्ष तीन स्थानों पर हैं, जबकि अरुणाचल प्रदेश और चंडीगढ समेत आठ राज्यों में एक भी बूचड़खाना पंजीकृत नहीं है। मध्यप्रदेश के नीमच निवासी आरटीआर्इ कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ को भारतीय खाद्य संरक्षा एंव मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआर्इ) ने ये आंकड़े फूड लायसेंसिंग एंड रजिस्ट्रेशन सिस्टम के जरिये उपलब्ध जानकारी के आधार पर प्रदान किए हैं। आरटीआर्इ के तहत मुहैया कराये गये इन आंकड़ों की रोशनी में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में कितनी बड़ी तादाद में अवैध बूचड़खाने चल रहे हैं।
आरटीआर्इ अर्जी पर भेजे जवाब में एफएसएसएआर्इ के एक अफसर ने बताया कि अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, दादरा व नगर हवेली, दमन व दीव, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा में एक भी बूचड़खाना खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के तहत पंजीकृत नहीं है। आरटीआर्इ से मिली जानकारी यह चौंकाने वाला खुलासा भी करती है कि आठों राज्यों में ऐसा एक भी बूचड़खाना नहीं है जिसने केंद्रीय या राज्यस्तरीय लायसेंस ले रखा हो। एफएसएसएआर्इ ने आरटीआर्इ के तहत बताया कि तमिलनाडु में 425, मध्यप्रदेश में 262, और महाराष्ट्र में 249 बूचड़खाने खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के तहत पंजीकृत हैं। यानी देश के कुल 55 फीसदी बूचड़खाने इन्हीं तीन सूबों में चल रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में अवैध पशुवधशालाओं के खिलाफ योगी आदित्यनाथ सरकार की कार्रवार्इ चर्चा में है जबकि प्रदेश में महज 58 बूचड़खाने ही पंजीकृत हैं। आंध्रप्रदेश में 1, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 9, असम में 51, बिहार में 5, छत्तीसगढ में 111, दिल्ली में 14, गोवा में 4, गुजरात में 4, हरियाणा में 18, हिमाचल प्रदेश में 82, जम्मू कश्मीर में 23, झारखंड में 11, कर्नाटक में 30, केरल में 50, लक्षदीप में 65, मणिपुर में 4, और मेघालय में एक बूचड़खाने को खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के तहत पंजीकृत किया गया है।
ओडिसा में 5, पुडुचेरी में 2, पंजाब में 112, राजस्थान में 84, और उत्तराखंडृ में 22 और पश्चिम बंगाल में 5 बूचड़खाने खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के तहत पंजीकृत हैं। एफएसएसएआर्इ ने आरटीआर्इ के तहत यह भी बताया कि देशभर में 162 बूचड़खानों को प्रदेश स्तरीय लायसेंस मिले हैं, जबकि 117 पशुवधशालाओं को केंद्रीय लायसेंस हासिल है। इस बीच पशुहितैषी संगठन पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) इंडिया की विज्ञप्ति में मोटे आंकलन के हवाले से कहा गया है कि देश में अवैध या गैरलाइसेंसी बूचड़खानों की संख्या 30,000 से ज्यादा है।
हालांकि, कर्इ लायसेंसशुदा बूचड़खानों में भी पशुओं को बेहद क्रूरतापूर्वक जान से मारा जाता है। पेटा इंडिया ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से अनुरोध किया है कि वे ऐसी पशुवधशालाओं को बंद कराएं जिनके पास उपयुक्त प्राधिकारणों के लायसेंस नहीं है और जो कानून द्वारा निषिद्ध तरीकों का इस्तेमाल करते हैं।
राजनीति की भेंट चढ़ते रहे गौरक्षा आंदोलन
भारत तथा कुछ अन्य देशों के हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी आदि सैकड़ों वर्षों से गौहत्या का विरोध करते आये हैं। भारतीय धर्मों में प्राचीन काल से ही गाय सहित अन्य पशुओं की हत्या का व्यापक रूप से निषेध किया जाता रहा है। विशेषरूप से अंग्रेजी शासनकाल में कर्इ ऐसे आंदोलन हुए जो गाय की हत्या रोकने या रुकवाने के उद्देश्य से किये गये थे। 1860 के दशक में पंजाब में सिखों द्वारा किया गया गौरक्षा आंदोलन सुविदित है। 1880 के दशक में स्वामी दयानंद सरस्वती और उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज का समर्थन पाकर गौरक्षा आंदोलन और अधिक विस्तृत हुआ। भारतीय मूल के सभी धर्म गौरक्षा का समर्थन करते हैं। गौरक्षा का समर्थन केवल भारत में ही नहीं, श्रीलंका और म्यांमार में भी इसे भारी समर्थन प्राप्त है।
श्रीलंका पहला देश है जिसने पूरे द्वीप पर पशुओं को किसी भी प्रकार की हानि पहुंचाने से रोकने वाला कानून पारित किया है। स्वाधीन भारत में विनोबाजी ने गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग रखी थी। उसके लिए उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से कानून बनाने का आग्रह किया था। वे अपनी पदयात्रा में यह सवाल उठाते रहे। कुछ राज्यों ने गौवधबंदी के कानून बनाये।
सन 1955 में हिंदू महासभा के अध्यक्ष निर्मलचंद्र चटर्जी (लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के पिता) ने गौवध पर रोक के लिए एक विधेयक प्रस्तुत किया था। उस पर जवाहरलाल नेहरू ने लोकसभा में घोषणा की कि ‘मैं गौवधबंदी के विरुद्ध हूं। सदन इस विधेयक को रद्द कर दे। राज्य सरकारों से मेरा अनुरोध है कि ऐसे विधेयक पर न तो विचार करें और न कोर्इ कार्यवाही।’ धीरे-धीरे समय निकलता जा रहा था। लोगों को लगा कि अपनी सरकार अंग्रेजों की राह पर है। वह आश्वासन देती रही और गौवंश का नाश होता गया।
इसके बाद 1965-66 में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी करपात्री और देश के तमाम संतों ने इसे आंदोलन का रूप दे दिया। गौरक्षा का अभियान शुरू हुआ। देशभर के संत एकजुट होने लगे, लाखों लोग और संत सड़कों पर आने लगे। इस आंदोलन को देखकर राजनीतिज्ञ लोगों के मन में भय व्याप्त होने लगा। इसकी गंभीरता को समझते हुए सबसे पहले लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 21 सिंतबर 1966 को पत्र लिखा। उन्होंने लिखा ‘‘गौवधबंदी के लिए लंबे समय से चल रहे आंदोलन के बारे में आप जानती ही हैं। संसद के पिछले सत्र में भी यह मुद्दा सामने आया था और जहां तक मेरा सवाल है मैं यह समझ नहीं पाता कि भारत जैसे एक हिंदू बहुल देश में, जहां गलत हो या सही, गौवध के विरुद्ध ऐसा तीव्र जन-संवेग है गौवध पर कानूनन प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जा सकता?’’ इंदिरा गांधी ने जय प्रकाश नारायण की यह सलाह नहीं मानी। परिणाम यह हुआ कि सर्वदलीय गौरक्षा महाभियान ने 7 नंबवर 1966 को दिल्ली में विराट आंदोलन किया। दिल्ली के इतिहास का वह सबसे बड़ा प्रदर्शन था। जिसमें संसद का घेराव करते कर्इ संत गौरक्षक पुलिस की गोलियों से मारे गये।
12 अप्रैल 1978 को डॉ. रामजी सिंह ने एक निजी विधेयक रखा, जिसमें संविधान की धारा 48 के निर्देश पर अमल के लिए कानून बनाने की मांग थी। संविधान की धारा 48 में यह व्यवस्था है कि राज्य पशुधन विशेषकर गौवध तथा अन्य दुधारू और भार वाहक पशुओं की तस्करी रुकवाने के लिए उनकी हत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए कदम उठाएगी। यह राज्यों पर छोड़ा है कि वे लोगों की भावनाओं और रीति-रिवाजों के अनुरूप गौरक्षा के लिए कानून बनाएंगे।
21 अप्रैल 1979 को विनोबा भावे ने अनशन शुरू कर दिया। 5 दिन बाद प्रधानमंत्री मोरारजी देसार्इ ने कानून बनाने का आश्वासन दिया और विनोबा ने उपवास तोड़ा। 10 मर्इ 1979 को एक संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया, जो लोकसभा के विघटित होने के कारण अपने आप समाप्त हो गया। इंदिरा जी के दोबारा शासन में आने के बाद 1981 में पवनार में गौसेवा सम्मेलन हुआ। उसके निर्णयानुसार 30 जनवरी 1982 की सुबह विनोबा ने उपवास रखकर गौरक्षा के लिए सौम्य सत्याग्रह की शुरुआत की। वह सत्याग्रह 18 साल तक चलता रहा। लेकिन सरकार के कानों पर जूँ नहीं रेंगी। अन्ततः आज तक गौवध पर केंद्र सरकार किसी भी तरह का कानून नहीं ला पायी है।
सन 1966 के अक्टूबर-नवंबर में अखिल भारतीय स्तर पर गौरक्षा आंदोलन चला। भारत साधु समाज, सनातन धर्म, जैन धर्म आदि सभी भारतीय धार्मिक समुदायों ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया। 7 नवंबर 1966 को संसद पर हुये ऐतिहासिक प्रदर्शन में देशभर के लाखों लोगों ने भाग लिया। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने निहत्थे हिंदुओं पर गोलियां चलवा दी थी जिसमें अनेक गौ-भक्तों का बलिदान हुआ था। इस गौरक्षा आंदोलन में स्वामी ब्रह्मानंद का विशेष योगदान रहा, इन्होंने प्रयागराज से दिल्ली तक सैकड़ों समर्थकों के साथ पैदल यात्रा की तथा गुलजारी लाल नंदा के आवास को घेरकर अनशन किया। संसद भवन में घुसने के प्रयास पर भयानक लाठी चार्ज का सामना किया। इसके बाद स्वामी ब्रह्मानंद ने ठाना कि गौरक्षा के लिए कानून बनाने को संसद में निर्वाचित होकर आना पडेगा, 1967 में हामीरपुर लोकसभा यूपी से भारतीय संसद में संत सांसद के रूप में निर्वाचित होकर पहुंचे तथा सदन में गौरक्षा के लिए बेबाक राय रखी।
प्रशासनिक लापरवाही के नतीजे हैं अवैध बूचड़खाने
मांस व्यापार के लिए मवेशियों और बूचड़खाने को लेकर बहुत सारे नियम हैं। मवेशियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना कहां और कैसे काटा जाए, निर्यात किए जाने वाले मांस के प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) इन सबके लिए ढेरों कानून हैं। इन सभी कानूनों का पालन सरकार के हर स्तर-केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर होना है लेकिन ऐसा होता नहीं है। हालांकि कर्इ सारे दिशा-निर्देश एक दूसरे से मिलते-जुलते हैं, पशुओं से संबंधित मामलों के लिए दो नियम हैं। पहला, पशु क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम 2001, जिसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी स्थानीय सरकारी तंत्र की है जैसे नगर निगम, नगर पालिका और पंचायत। दूसरा खाद्य सुरक्षा और उसके मानक (खाद्य व्यवसाय और पंजीकरण) अधिनियम, जिसके कार्यान्वयन की जिम्मेदारी भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण या (एफएसएसएआर्इ) की है। पर्यावरण संबंधित मानकों के लिए पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, 1986 है जिसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की है।
बूचड़खाना को एफएसएसएआर्इ के नियम के अनुसार खाद्य व्यवसाय संचालक के तौर पर पारिभाषित किया गया है जिसके अंतर्गत एक खास क्षेत्र में बड़े और छोटे पशुओं को काटा जाता है। इनमें भेड़, बकरी और विभिन्न प्रकार के पक्षी भी शामिल हैं। इसके अनुसार इस जगह पर मांस का उत्पादन, विक्रय इत्यादि सब होता है। इस परिभाषा के अनुसार गली-मोहल्लों के मुर्गे की दुकान भी बूचड़खाना कहलाएगी। पशु क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम के अनुसार ‘वह स्थान जहां 10 या अधिक जानवर रोज कटते हों’, को बूचड़खाने के तौर पर परिभाषित किया जा सकता है। जैसे ही जानवर खरीदे जाते हैं, पशु क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम की भूमिका शुरू होती है। इस नियम में कर्इ तरह के जानवर के काटे जाने पर प्रतिबंध है जैसे अगर पशु गर्भ से है, तीन महीने से छोटे जानवर, जिसका तीन महीने से छोटा बछड़ा हो या पशुओं के डॉक्टर द्वारा काटे जाने के लिए पूर्ण रूप से फिट होने का सर्टिफिकेट न दिया गया हो।
जानवर के काटे जाने के इन नियमों के सुनिश्चित हो जाने के बाद बूचड़खाने से संबंधित नियम की भूमिका शुरू होती है। जैसे बूचड़खाने में आने वाले पशुओं के लिए रिसेप्शन क्षेत्र होना चाहिए। पशुओं के आराम करने के लिए जगह होनी चाहिए। इसके तहत एक बड़े जानवर को कम से कम 2.8 वर्ग मीटर और छोटे जानवर को 1.6 वर्ग मीटर की जगह दी जानी चाहिए। इसका स्पष्ट उल्लेख सेक्शन 5 (3) में है। इसके अतिरिक्त सेक्शन 5 (4) के अनुसार यह विश्रामगृह ऐसे बना होना चाहिए जहां जानवर गर्मी, सर्दी और बरसात में सुरक्षित रहें। इस कानून में बूचड़खाने में रोशनी से लेकर हवा के आने-जाने तक, सबके लिए प्रावधान है।
‘आंतरिक दीवार चिकनी और सपाट होनी चाहिए। ये दीवार मजबूत चीजों से बनी होनी चाहिए जैसे र्इंट, टार्इल्स, सीमेंट या प्लास्टर इत्यादि।’ इसमें आगे यहां तक कहा गया है ‘कोर्इ व्यक्ति जो संक्रामक या अन्य फैलने वाले रोग से ग्रसित है तो उसे जानवर काटने की इजाजत नहीं दी जा सकती है।’ अगर इसको सामान्य भाषा में समझा जाए तो जिसको सर्दी हुर्इ होगी उसे नुक्कड़ की दुकानों में मुर्गा काटने की इजाजत नहीं होगी।
जब पंचायत, जिला परिषद या नगर निगम पशु क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम संबंधी अनापत्ति प्रमाणमत्र (एनओसी) जारी कर दे, तब एफएसएसएआर्इ की जिम्मेदारी शुरू होती है। इसके अनुसार बूचड़खाने तीन श्रेणी में बंटे हैं। पहला वह मांस उत्पादक जो दो बड़े और करीब 10 छोटे जानवर या 50 चिड़िया (मुर्गे इत्यादि) रोज काटता हो। दूसरा वह जो 50 बड़े जानवर और 150 छोटे जानवर या 1,000 चिड़िया रोज काटता हो और तीसरा वो जो इससे भी अधिक जानवर काटता हो। इस नियम के अनुसार छोटे उत्पादक को राज्य खाद्य सुरक्षा आयुक्त के तौर पर नियुक्त/अधिसूचित पंजीकरण प्राधिकारी-जो पंचायत या नगर निगम का अधिकारी हो सकता है- से पंजीकरण प्रमाणपत्र और फोटो पहचान पत्र लेना होता है।
दूसरी श्रेणी में आता है मांस उत्पादक, जिसे राज्य या केंद्र शासित राज्य के अधिकारी से लाइसेंस लेना पड़ता है। वह अधिकारी राज्य के खाद्य सुरक्षा आयुक्त द्वारा नियुक्त किया जाता है। तीसरी श्रेणी में आने वाले उत्पादक को केंद्र लाइसेंसिंग प्राधिकरण से लाइसेंस लेना होता है। इस प्राधिकरण की नियुक्ति एफएसएसएआर्इ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी द्वारा किया जाता है। सबसे छोटे उत्पादक को एक महीने के भीतर लाइसेंस मिल जाना चाहिए और पंजीकरण करने वाले अधिकरी को एक साल में कम से कम एक बार बूचड़खाने का निरीक्षण करना चाहिए। एफएसएसएआर्इ के नियम के अनुसार पशुओं को काटने से पहले सुन्न करना होता है ताकि ‘पशुओं को किसी प्रकार के डर, तनाव या दर्द से मुक्त किया जा सके।’
इस नियम के साथ सबसे बड़ी समस्या निगरानी की है। जैसे कि बूचड़खाने अथवा व्यापार के लिए ही सही, जानवर ले जा रहे ट्रक की गति सीमा 40 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक नहीं होनी चाहिए, ताकि इन्हे झटके से बचाया जा सके। उस ट्रक में कुछ और नहीं लादा जाना चाहिए, साथ ही उस ट्रक को गैर जरूरी जगहों पर नहीं रुकना चाहिए। इस नियम में लोगों को तेज आवाज निकालने, जैसे सीटी बजाना इत्यादि से बचने को कहा गया है। जिससे की पशुओं को कोर्इ तनाव न हो। लेकिन वाहन चालकों द्वारा इन नियमों की पूरी तरह अनदेखी किया जाना आम है।
यह स्पष्ट है कि मांस उत्पादन संबंधी ढेरों कानून हैं। पशुओं को सलीके से एक जगह से दूसरी जगह ले जाने से लेकर, काटने में मानवीयता बरतने, साफ-सफार्इ और निकलने वाले कचरे के निपटारे तक। लेकिन समस्या इन नियमों के क्रियान्वयन में है। जिन संस्थाओं को इन बूचड़खानों की निगरानी करना है उनके पास या तो स्टाफ की भारी किल्लत है अथवा सही दिशा निर्देशों का अभाव। जिसके चलते ये नियम पूरी तरह से लागू नहीं हो पा रहे हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के एक बड़े अधिकारी का कहना है कि यहां हर स्तर पर गैरकानूनी काम हो रहा है। बीफ खाने वाले लोग सस्ता मांस खरीदना पसंद करते हैं जो सिर्फ अवैध बूचड़खानों से ही मिल सकता है। जगह-जगह चल रहे अवैध बूचड़खाने इन नियमों को लागू कराने वाले जिम्मेदारों की अकर्मण्यता और रिश्वतखोरी के नतीजे हैं।

















