प्रशासनिक लापरवाही के नतीजे हैं अवैध बूचड़खाने

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मांस व्यापार के लिए मवेशियों और बूचड़खाने को लेकर बहुत सारे नियम हैं। मवेशियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना कहां और कैसे काटा जाए, निर्यात किए जाने वाले मांस के प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) इन सबके लिए ढेरों कानून हैं। इन सभी कानूनों का पालन सरकार के हर स्तर-केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर होना है लेकिन ऐसा होता नहीं है। हालांकि कर्इ सारे दिशा-निर्देश एक दूसरे से मिलते-जुलते हैं, पशुओं से संबंधित मामलों के लिए दो नियम हैं। पहला, पशु क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम 2001, जिसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी स्थानीय सरकारी तंत्र की है जैसे नगर निगम, नगर पालिका और पंचायत। दूसरा खाद्य सुरक्षा और उसके मानक (खाद्य व्यवसाय और पंजीकरण) अधिनियम, जिसके कार्यान्वयन की जिम्मेदारी भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण या (एफएसएसएआर्इ) की है। पर्यावरण संबंधित मानकों के लिए पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, 1986 है जिसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की है।

बूचड़खाना को एफएसएसएआर्इ के नियम के अनुसार खाद्य व्यवसाय संचालक के तौर पर पारिभाषित किया गया है जिसके अंतर्गत एक खास क्षेत्र में बड़े और छोटे पशुओं को काटा जाता है। इनमें भेड़, बकरी और विभिन्न प्रकार के पक्षी भी शामिल हैं। इसके अनुसार इस जगह पर मांस का उत्पादन, विक्रय इत्यादि सब होता है। इस परिभाषा के अनुसार गली-मोहल्लों के मुर्गे की दुकान भी बूचड़खाना कहलाएगी। पशु क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम के अनुसार ‘वह स्थान जहां 10 या अधिक जानवर रोज कटते हों’, को बूचड़खाने के तौर पर परिभाषित किया जा सकता है। जैसे ही जानवर खरीदे जाते हैं, पशु क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम की भूमिका शुरू होती है। इस नियम में कर्इ तरह के जानवर के काटे जाने पर प्रतिबंध है जैसे अगर पशु गर्भ से है, तीन महीने से छोटे जानवर, जिसका तीन महीने से छोटा बछड़ा हो या पशुओं के डॉक्टर द्वारा काटे जाने के लिए पूर्ण रूप से फिट होने का सर्टिफिकेट न दिया गया हो।

जानवर के काटे जाने के इन नियमों के सुनिश्‍चित हो जाने के बाद बूचड़खाने से संबंधित नियम की भूमिका शुरू होती है। जैसे बूचड़खाने में आने वाले पशुओं के लिए रिसेप्शन क्षेत्र होना चाहिए। पशुओं के आराम करने के लिए जगह होनी चाहिए। इसके तहत एक बड़े जानवर को कम से कम 2.8 वर्ग मीटर और छोटे जानवर को 1.6 वर्ग मीटर की जगह दी जानी चाहिए। इसका स्पष्ट उल्लेख सेक्शन 5 (3) में है। इसके अतिरिक्त सेक्शन 5 (4) के अनुसार यह विश्रामगृह ऐसे बना होना चाहिए जहां जानवर गर्मी, सर्दी और बरसात में सुरक्षित रहें। इस कानून में बूचड़खाने में रोशनी से लेकर हवा के आने-जाने तक, सबके लिए प्रावधान है।

‘आंतरिक दीवार चिकनी और सपाट होनी चाहिए। ये दीवार मजबूत चीजों से बनी होनी चाहिए जैसे र्इंट, टार्इल्स, सीमेंट या प्लास्टर इत्यादि।’ इसमें आगे यहां तक कहा गया है ‘कोर्इ व्यक्ति जो संक्रामक या अन्य फैलने वाले रोग से ग्रसित है तो उसे जानवर काटने की इजाजत नहीं दी जा सकती है।’ अगर इसको सामान्य भाषा में समझा जाए तो जिसको सर्दी हुर्इ होगी उसे नुक्कड़ की दुकानों में मुर्गा काटने की इजाजत नहीं होगी।

जब पंचायत, जिला परिषद या नगर निगम पशु क्रूरता निवारण (वधशाला) नियम संबंधी अनापत्ति प्रमाणमत्र (एनओसी) जारी कर दे, तब एफएसएसएआर्इ की जिम्मेदारी शुरू होती है। इसके अनुसार बूचड़खाने तीन श्रेणी में बंटे हैं। पहला वह मांस उत्पादक जो दो बड़े और करीब 10 छोटे जानवर या 50 चिड़िया (मुर्गे इत्यादि) रोज काटता हो। दूसरा वह जो 50 बड़े जानवर और 150 छोटे जानवर या 1,000 चिड़िया रोज काटता हो और तीसरा वो जो इससे भी अधिक जानवर काटता हो। इस नियम के अनुसार छोटे उत्पादक को राज्य खाद्य सुरक्षा आयुक्त के तौर पर नियुक्त/अधिसूचित पंजीकरण प्राधिकारी-जो पंचायत या नगर निगम का अधिकारी हो सकता है- से पंजीकरण प्रमाणपत्र और फोटो पहचान पत्र लेना होता है।

दूसरी श्रेणी में आता है मांस उत्पादक, जिसे राज्य या केंद्र शासित राज्य के अधिकारी से लाइसेंस लेना पड़ता है। वह अधिकारी राज्य के खाद्य सुरक्षा आयुक्त द्वारा नियुक्त किया जाता है। तीसरी श्रेणी में आने वाले उत्पादक को केंद्र लाइसेंसिंग प्राधिकरण से लाइसेंस लेना होता है। इस प्राधिकरण की नियुक्ति एफएसएसएआर्इ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी द्वारा किया जाता है। सबसे छोटे उत्पादक को एक महीने के भीतर लाइसेंस मिल जाना चाहिए और पंजीकरण करने वाले अधिकरी को एक साल में कम से कम एक बार बूचड़खाने का निरीक्षण करना चाहिए। एफएसएसएआर्इ के नियम के अनुसार पशुओं को काटने से पहले सुन्न करना होता है ताकि ‘पशुओं को किसी प्रकार के डर, तनाव या दर्द से मुक्त किया जा सके।’

इस नियम के साथ सबसे बड़ी समस्या निगरानी की है। जैसे कि बूचड़खाने अथवा व्यापार के लिए ही सही, जानवर ले जा रहे ट्रक की गति सीमा 40 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक नहीं होनी चाहिए, ताकि इन्हे झटके से बचाया जा सके। उस ट्रक में कुछ और नहीं लादा जाना चाहिए, साथ ही उस ट्रक को गैर जरूरी जगहों पर नहीं रुकना चाहिए। इस नियम में लोगों को तेज आवाज निकालने, जैसे सीटी बजाना इत्यादि से बचने को कहा गया है। जिससे की पशुओं को कोर्इ तनाव न हो। लेकिन वाहन चालकों द्वारा इन नियमों की पूरी तरह अनदेखी किया जाना आम है।

यह स्पष्ट है कि मांस उत्पादन संबंधी ढेरों कानून हैं। पशुओं को सलीके से एक जगह से दूसरी जगह ले जाने से लेकर, काटने में मानवीयता बरतने, साफ-सफार्इ और निकलने वाले कचरे के निपटारे तक। लेकिन समस्या इन नियमों के क्रियान्वयन में है। जिन संस्थाओं को इन बूचड़खानों की निगरानी करना है उनके पास या तो स्टाफ की भारी किल्लत है अथवा सही दिशा निर्देशों का अभाव। जिसके चलते ये नियम पूरी तरह से लागू नहीं हो पा रहे हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के एक बड़े अधिकारी का कहना है कि यहां हर स्तर पर गैरकानूनी काम हो रहा है। बीफ खाने वाले लोग सस्ता मांस खरीदना पसंद करते हैं जो सिर्फ अवैध बूचड़खानों से ही मिल सकता है। जगह-जगह चल रहे अवैध बूचड़खाने इन नियमों को लागू कराने वाले जिम्मेदारों की अकर्मण्यता और रिश्‍वतखोरी के नतीजे हैं।