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उना का दलित आंदोलन क्या हिंदू समाज को बदल पाएगा?

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गुजरात के उना और आसपास के इलाकों से जो ख़बरें आ रही हैं, वे आने वाले कुछ और दिन बनी रहीं तो जिसे हम हिंदू समाज कहते हैं, उसकी सबसे बड़ी विडंबना से एक वास्तविक मुठभेड़ की चुनौती हमारे सामने होगी. बताया जा रहा है कि इन इलाकों में सड़कों पर जानवरों के शव पड़े हुए हैं क्योंकि दलितों ने उन्हें उठाने से इनकार कर दिया है. यह युक्ति बरसों पहले अंबेडकर ने दलितों को सुझाई थी, लेकिन उस पर अमल अब हो रहा है.
इस घटना के राजनीतिक निहितार्थों को फिलहाल छोड़ दें – हालांकि वे भी लोगों को महत्वपूर्ण लग रहे हैं, क्योंकि दलितों के इस नए गुस्से में मुसलमानों का पुराना दर्द भी शामिल है और आरक्षण मांग रहे पाटीदारों का आहत दर्प भी इससे जुड़ सकता है, जो मिलकर गुजरात सरकार के लिए मुसीबत बन सकते हैं – लेकिन इसके सामाजिक पहलू बेहद महत्वपूर्ण हैं.
हम यह सोचें कि अगर दलितों ने वाकई वे सारे काम छोड़ दिए जो वे करते रहे हैं, तो बाकी समाज क्या करेगा? अपनी शिक्षा, अपनी सेहत और अपनी नौकरी का निजी प्रबंधन कर चुका यह तबका क्या अपनी गंदगी का भी कोई इंतज़ाम कर पाएगा? हो सकता है, वह अपनी ताकत के दम पर कुछ ज़ोर-जबरदस्ती करे, पैसे का भी प्रलोभन दे, यह सब न चले तो मारपीट भी करे, लेकिन अगर यह अहिंसक प्रतिरोध जारी रहा तो क्या होगा? देर-सबेर शेष हिंदू समाज को अपने इन अछूत और हेय भाइयों की अहमियत समझनी होगी, उनके काम का मोल समझना होगा, उसकी कहीं ज़्यादा बेहतर क़ीमत चुकानी होगी.
लेकिन अगर इसके बाद भी दलित न मानें तो? क्या बाकी समाज के कुछ गरीब हिस्से इस काम के लिए तैयार होंगे? हो सकता है हो जाएं, और अगर हुआ तो यह भी शुभ होगा, क्योंकि अंततः इससे उन कामों को हिकारत से देखने की प्रवृत्ति कमज़ोर पड़ेगी जो कई लिहाज से हमारे सबसे ज़रूरी काम हैं. कह सकते हैं कि पेशागत जाति-व्यवस्था पर इससे कुछ चोट प़डेगी.
लेकिन यह भी बहुत दूर का और बहुत सुहाना सपना है. सच यह है कि हिंदुओं की उच्च जातियों में श्रेष्ठता का दर्प इतना ज़्यादा है कि वे सारा गंदा काम करने के बाद भी अछूतों को अछूत ही रहने देंगे. इसी श्रेष्ठता और जातिगत अपरिहार्यता को समझते हुए अंबेडकर ने अस्सी बरस पहले कहा था कि हिंदू तभी एक होते हैं, जब उन्हें मुसलमानों से लड़ना होता है, वरना हिंदू समाज एक मिथ है. उसका कोई वजूद नहीं है. यह बस जातियों का समुच्चय है. उसका बाकी सारा जीवन सामाजिक भेदभाव में बीत जाता है. साझा जीवन अभ्यासों के बावजूद वह एक समाज नहीं है क्योंकि वह कुछ भी साझा नहीं करता. जाति वह सामाजिक व्यवस्था है जो हिंदुओं के एक विकृत हिस्से के अहंकार और स्वार्थ को अंगीकार करती है जो सामाजिक क्रम में इतने प्रबल रहे कि उन्होंने इसे फैशन बना दिया और अपने से नीचे वालों पर थोप दिया.
बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर ने यह बात जात-पांत तोड़क मंडल के न्योते पर लाहौर में उनके कार्यक्रम की सदारत के परचे के तौर पर लिखी थी. यह पूरा परचा मंडल को इतना नागवार गुजरा कि उसने अपनी उन दिनों की तथाकथित उदारता के बावजूद अंबेडकर का न्योता रद्द कर दिया. 1936 में लिखा गया – मगर पढ़ा न जा सका – यह परचा बाद में ‘जाति का उन्मूलन’ नाम के लेख के तौर पर चर्चित हुआ जिस पर कुछ बरस पहले अरुंधती रॉय ने एक किताब बराबर टिप्पणी लिख डाली.
बहरहाल, अंबेडकर ने हिंदू समाज और उसमें निहित घृणा के छोटे-छोटे घरों के बारे में जो कुछ कहा था, वह जैसे कुछ और वजनी होकर आज हमारे सामने मौजूद है. इस समाज के वर्चस्ववादी तबके अब भी समाज को चलाए रखना अपनी ठेकेदारी मानते हैं और इसीलिए कभी गोरक्षा के नाम पर दलितों को पीटते हैं, कभी संस्कृति रक्षा के नाम पर लड़कियों पर हमले करते हैं और कभी राष्ट्र रक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों को डराते हैं. इनको चुपचाप दी जाने वाली स्वीकृति इतनी प्रबल है कि प्रधानमंत्री एक लंबी चुप्पी के बाद एक सांस में दलितों की जगह ख़ुद को गोली मार देने की भावुक अपील करते हैं और दूसरी सांस में राज्य को सही और गलत गोरक्षकों में फर्क करने की नसीहत देते हैं. इसके बाद हरियाणा सरकार इन गोरक्षकों को लाइसेंस देने में जुट जाती है.
समाज के भीतर दबदबे वाले समूहों की व्यवस्था इसी समानांतर सोच की वजह से संभव बनी हुई है. इस व्यवस्था से जुड़ी राजनीति अस्मितावादी संघर्षों के असुविधाजनक और ठोस सवालों से मुंह मोड़कर कुछ सतही और भावनात्मक मुद्दों के आधार पर सबको गोलंबद करने की कोशिश करती है. ऐसा करते समय वह बड़ी चालाकी से यह देखती है कि कहां उसे बोलना है, कहां चुप हो जाना है. इसलिए जब गोमांस के नकली मुद्दे पर दादरी में अख़लाक को घर से निकाल कर मार डालने का मामला सामने आता है तो यह राजनीति का नहीं, समाज का मामला हो जाता है. राजनीति चुपचाप इसे पीछे से शह और समर्थन देती है.
इस शह और समर्थन के बल पर तथाकथित हिंदू समाज और भी जोर-शोर से गोरक्षा दल बनाता है और ट्रक ड्राइवरों, खलासियों और उन कमज़ोर लोगों को सबक सिखाता है जो किसी मजबूरी में गोमांस या उसके चमड़े के कारोबार से जुडे हुए हैं. वह उना में चार दलित लड़कों को बिल्कुल गाड़ी से बांध कर पीटता है और फिर उसके वीडियो बनाकर दूसरों को धमकाता है कि गाय की चमड़ी उतारने वालों का क्या हश्र होता है. वैसे यह सिर्फ अंधा गोप्रेम ही नहीं है जो उसे इस हिंसा के लिए उकसाता है, वह किसी भी मुद्दे पर अपने सामाजिक वर्चस्व और दबदबे को कायम रखने का प्रयास भी है. उना से पहले और बाद में लगभग रोज़ ऐसे हादसे और हमले मिल सकते हैं जिसमें किसी दबंग हिंदू की लाठी, गोली, या उसका चाबुक किसी दलित, आदिवासी या अल्संख्यक की छाती या पीठ एक जैसे बहाने बनाकर लाल कर रहे हों.
यह भी विडंबना ही है कि वर्चस्ववादी सोच और व्यवस्था का राजनीतिक प्रतिरोध करने के नाम पर मायावती के समर्थक भी कुछ ऐसा ही करते हैं जो अंततः अपने नतीजों में दलित और स्त्री विरोधी ही दिखता है. यह बात मायावती समझ पातीं तो दलितों की वास्तविक नेता हो पातीं. अभी वे इस देश में दलित असंतोष की नुमाइंदगी करती हैं – क्योंकि यह काम और कोई नहीं करता.
ऐसे में भारतीय लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा यह भी है कि वह दलित को मनुष्य जैसा मान दिला सके और किसी दलित नेता को यह समझ कि देर-सबेर उसे सबका नेता होना होगा – जातिगत घृणा या गोलबंदी की एक य़थास्थिति को तोड़कर दूसरी यथास्थिति बनाने की जो भूल मंडल समर्थक जातियों ने अपनी राजनीतिक हड़बड़ी में की उसे दुहराने से बचना होगा. तभी मौजूदा गैररचनात्मक, बल्कि विध्वंसात्मक राजनीति को बदलने का रास्ता निकाल सकेगा.
उना की ताज़ा घटनाएं यह रास्ता निकाल सकती हैं. वे हिंदूवादी राजनीति को पीछे हटने पर मजबूर कर सकती हैं और वृहत्तर भारतीय समाज में यह संदेश दे सकती हैं कि जातियों की नहीं, पेशों की अहमियत है और इस आधार पर किसी को ऊंचा-नीचा आंकना अमानवीय है. बेशक, यह सबक सवर्ण जातियां आसानी से अपने हलक में उतारने को तैयार नहीं होंगी, लेकिन पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का एक बड़ा तबका, जो इस तरह के कारोबार से जुड़ा है, उनके करीब आ सकता है. इस तरह सोचें तो पिछले 20 बरस से हिंदुत्व की प्रयोगशाला बना रहा गुजरात अब दलित आंदोलन की प्रयोगशाला भी बन सकता है. हां, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि इसके लक्ष्य अंततः व्यापक सामाजिक बदलाव से जुड़ें न कि तात्कालिक राजनीतिक हितों से. बेशक, यह बहुत टेढ़ा और उलझाऊ काम है जिसका कोई सपना भी बहुत उलझा हुआ हो सकता है, इस लेख की ही तरह.

मुंबई और आसपास के इलाकों में जानलेवा होते जा रहे सड़क के गड्ढे

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मुंबई: मुंबई और आसपास के इलाकों में सड़कों पर गड्ढे जानलेवा होते जा रहे हैं. कल्याण में भिवंडी रोड के नजदीक बैंक मैनेजर विजय केंद्रे की मोटरसाइकिल गड्ढे की वजह से गिर गई तभी एक तेज रफ्तार ट्रक ने उन्हें रौंद दिया.
पुलिस ने आरोपी ट्रक चालक को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन परिवार सड़क पर पड़े गड्ढों के लिये जिम्मेदार ठेकेदार और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई चाहता है. विजय की पत्नी पूनम केंद्रे बोलने से ज्यादा बिलख पड़ती हैं, समझ नहीं आ रहा अपने बच्चे को कैसे समझाएं कि पिता अब कभी दफ्तर से घर नहीं आएंगे. कहती हैं कल्याण-भिवंडी रोड पर सड़क पर पड़े गड्ढों ने निजी बैंक में मैनेजर उनके पति विजय केंद्रे की जान ले ली. उन्होंने सिर्फ इतना कहा, “गड्ढे ने जान ले ली है, हमको छोड़ कर चले गये.”
भिवंडी-कल्याण सड़क पर विजय का हेलमेट अब भी पड़ा है, उनके पीछे बैठे अमित पाठक का कहना है, ”दो गड्ढे उन्होंने पार कर लिये लेकिन तीसरे में उनकी मोटरसाइकिल गिर गई, इतने में पीछे से आ रहे ट्रक ने उन्हें रौंद दिया. हम लोग आ रहे थे, एक गड्ढा आया उसे संभाला, तभी दूसरा आया हम संभाल नहीं पाए गिर गये. उसका सिर ट्रक के नीचे आ गया, मैं पीछे बैठा था, रिक्शा रोकने की कोशिश की लेकिन कोई नहीं रुका, आधे घंटे में पुलिसवाले आए.”
कोणगांव पुलिस ने आरोपी ट्रक ड्राइवर को गिरफ्तार कर लिया है लेकिन परिजनों का कहना है कि असली दोष सड़क बनाने वाले ठेकेदार और अधिकारियों का है. विजय के पड़ोसी प्रमोद शिंदे ने कहा, “प्रशासन जिम्मेदार है, गड्ढे ने उसकी जान ली, उसके जाने की वजह से जो नुकसना हुआ है परिवार को वो कौन भरके देगा. वहीं उनके साले अमित लोखंडे ने कहा, “रास्ते का काम होता तो मेरे जीजा की जान नहीं जाती, सरकार जिम्मेदार है. घर पर आ रहे थे, दो गड्ढा बचा लिया, तीसरे पर गिर गये. छोटा लड़का है, क्या करेगा अभी. अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिये.”
टिटवाला के अभिदर्शन गार्डन में रहने वाले विजय को हाल ही में प्रमोशन मिला था. दस दिन पहले उन्हें अच्छे काम के ऐवज में सम्मानित भी किया गया था. लेकिन एक गड्ढे ने उनके सपनों, उनके अपनों को दूर बहुत दूर कर दिया.

नीतीश कुमार का स्‍वतंत्रता दिवस पर एलान, बिहार में खोले जाएंगे पांच नए मेडिकल कॉलेज

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार की महागठबंधन सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम ‘सात निश्चय’ से जुड़ी विभिन्न योजनाओं सहित प्रदेश में पांच नए मेडिकल कॉलेज की स्थापना के साथ कई अन्य योजनाओं की सोमवार घोषणा की। 70वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में राष्ट्र ध्वज तिरंगा फहराने के बाद अपने संबोधन में नीतीश ने घोषणा की कि विकसित बिहार के 7 निश्चय के तहत आर्थिक हल युवाओं को बल के निश्चय के अंतर्गत इस वर्ष गांधी जयंती (आगामी 2 अक्तूबर) से युवाओं के लिए समेकित कार्य योजना लागू की जाएगी।
उन्होंने कहा कि जिला मुख्यालय में निर्माणाधीन पंजीकरण एवं परामर्श केंदों में युवाओं का ऑनलाइन पंजीकरण होगा और वे अपनी इच्छानुसार निम्न योजनाओं का लाभ ले सकेंगे। नीतीश ने कहा कि सात निश्चय में शामिल उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्टूडेन्ट क्रेडिट कार्ड योजना के तहत 4 लाख तक का शिक्षा ऋण प्राप्त कर सकेंगे। स्वयं सहायता भत्ता योजना के अन्तर्गत 20 से 25 वर्ष के बेरोजगार युवाओं को रोजगार तलाशने के दौरान सहायता के तौर पर 1000 रुपए प्रतिमाह की दर से स्वयं सहायता भत्ता की सुविधा दो वर्षो के लिए दी जाएगी।
उन्होंने कहा कि भाषा एवं संवाद और बुनियादी कंप्यूटर ज्ञान के लिए कुशल युवा योजना का लाभ उठा सकेंगे। सभी 534 प्रखंडों में कौशल विकास केंद्र का निर्माण किया जा रहा है। नीतीश ने घोषणा की कि उद्यमिता विकास एवं स्टार्ट अप कैपिटल हेतु योजना का सूत्रण इसी माह में कर लिया जाएगा। युवा जो नवाचार एवं तकनीक के क्षेत्र में उद्योग लगाकर स्वरोजगार करना चाहते हैं उनको आवश्यक वित्तीय सहायता एवं नीतिगत समर्थन उपलब्ध कराया जाएगा।
उन्होंने कहा कि राज्य के सभी सरकारी विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों में निशुल्क वाई-फाई की सुविधा फरवरी 2017 से उपलब्ध कराई जाएगी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की कि अवसर बढ़े आगे पढ़े निश्चय के तहत जिला एवं अनुमंडल में उच्च व्यवसायिक एवं तकनीकी शिक्षा की समुचित व्यवस्था की जा रही है और इस निश्चय को पूरा करने के लिए प्रदेश में 23 जीएनएम स्कूल, 54 एएनएम स्कूल, 33 पैरा मेडिकल इन्स्टीट्यूट, 16 नर्सिंग कॉलेज, 11 पॉलिटेकनिक, 54 सरकारी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान, 22 महिला औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान एवं 25 अभियंत्रण महाविद्यालयों की स्थापना अगले 4 वर्ष में की जाएगी।
उन्होंने बताया कि इसी तरह पांच नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना के लिए बेगूसराय , वैशाली, सीतामढ़ी, भोजपुर एवं मधुबनी जिले का चयन किया गया है। साथ ही पूर्णिया एवं पाटलिपुत्र विश्वविद्यालयों तथा में बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय की स्थापना का निर्णय लिया गया है। नीतीश ने घोषणा की कि स्वतंत्रता संग्राम की नींव बापू ने चंपारण सत्याग्रह से रखी थी, इस ऐतिहासिक स्मृति को अगले वर्ष चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह का आयोजन किया जाएगा। इसी तरह जनवरी 2017 में गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज की 350वीं जयंती मनाई जाएगी और इस अवसर पर गुरु गोविन्द सिंह के जीवन परिचय एवं उपलब्धियों से अवगत कराने के लिए पटना में एक बहुउद्देशीय प्रकाश पर्व केंद्र की स्थापना की जाएगी।

शिवपाल ने फिर दी इस्तीफे की धमकी, कहा- सपा में खुशामद का दौर चल रहा है

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चाचा और राज्य के काबीना मंत्री शिवपाल यादव के इस्तीफे की धमकी से समाजवादी पार्टी में हड़कंप मच गया है। उत्तर प्रदेश सरकार में नंबर दो माने जाने वाले शिवपाल ने मैनपुरी में रविवार को अवैध कब्जों व भ्रष्टाचार पर चिंता जताते हुए कहा था कि अगर ये चीजें नहीं रुकीं तो वे इस्तीफा दे देंगे। उन्होंने कहा था कि पार्टी में सभी बड़े नेता सुविधाभोगी हो गए हैं। मैंने अखिलेश से कहा था कि गांव-देहात में निकलो, वहां रात गुजारो लेकिन वे नहीं निकले। उनके मंत्री भी नहीं निकले। सब मंत्री गड़बड़ कर रहे हैं। सपा में खुशामद का दौर है। असल कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हो रही है।
शिवपाल ने फिर सोमवार (15 अगस्त) को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अपने गृह जिले इटावा में शहीद श्रद्धांजलि यात्रा के शुभारंभ लगभग वही चीजें दोहराते हुए कहा कि हमारे कहने के बावजूद कई ऐसे अधिकारी हैं, जो बातें अनसुनी कर जाते हैं। हम तो बहुत कुछ त्याग करने को तैयार हैं। अगर यह नहीं रुका तो मैं इस्तीफा भी दे सकता हूं। उन्होंने कहा कि आज जो स्थिति है कुछ लोगों ने पार्टी को कमजोर किया है। नेताजी ने बहुत मेहनत से पार्टी को खड़ा किया, लेकिन आज जो बेइमानी और उत्पीड़न हो रहा है। या तो ये होगा, नहीं तो हमें इस्तीफा देना होगा। उन्होंने कहा कि राज्य में अवैध शराब की बिक्री और अवैध कब्जे हो रहे हैं। सीओ इंस्पेक्टर और तहसीलदार इस काम को अंजाम दे रहे हैं। जनता का शोषण हो रहा है और अधिकारी सुन नहीं रहे हैं। यह सब नहीं रुका तो मैं इस्तीफा दे दूंगा।
प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री यहीं नहीं रुके और उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अवैध धंधे करने वाले और शराब बेचने वालों की सूची बनाई जा रही है। इन लोगों पर जल्द कार्रवाई होगी। सपा ने सारे वादे पूरे किए लेकिन फिर भी कुछ लोगों की वजह से जनता परेशान है। भले ही उन्हें इस्तीफा देना पड़े लेकिन ऐसे लोगों को सबक जरूर सिखाया जाएगा। ठेकेदारों और इंजीनियरों की जांच कराई जा रही है। दोषी मिलने पर एफआइआर होगी और इनसे जुर्माना वसूला जाएगा। उन्होंने कहा कि थाने, तहसील और चकबंदी कार्यालय भ्रष्टाचार का अड्डा बन रहे हैं। ईमानदारी से काम नहीं हुआ तो वे चकबंदी पर रोक लगा देंगे। तहसीलों में जनता के काम नहीं हो रहे। उन्होंने कहा कि बता देना, अबकी बार कहीं पर भी कब्जा हो तो मैं उसी तहसील में तहसील दिवस के दिन आऊंगा। अधिकारियों को लाकर यहीं पर उनके खिलाफ कार्रवाई करेंगे, देखें कितनी चलती है। जब विभाग मेरे पास है, उसके बाद भी दखल दूसरों का, ये तो नहीं हो सकता। या तो हमें इस्तीफा देना पड़ेगा, या उनके खिलाफ कार्रवाई होगी।
शिवपाल यादव कौमी एकता दल के विलय पर अपने भतीजे अखिलेश से मात खाने के वक्त से ही नाराज हैं और रह रह कर सरकार के कामकाज पर अपना गुस्सा उतार देते हैं। लेकिन ये पहली बार है जब शिवपाल यादव ने इस्तीफे तक की धमकी दे डाली है। बताते चलें कि इसके पहले दो अगस्त को इटावा जिला सहकारी बैंक की 67वीं वार्षिक बैठक में शिवपाल सिंह यादव ने अपने भाई और सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव का अनुसरण करते हुए अवैध कब्जों में लिप्त सपाइयों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। उन्होंने पार्टी के इस रह के नेताओं व कार्यकर्ताओं के खिलाफ 15 दिन का विशेष अभियान चलाने का एलान भी किया था। उन्हों अफसरों को भी नहीं बख्शा और कहा कि उनकी मिलीभगत से ही भ्रष्टाचार हो रहा है। दो अगस्त के बाद शिवपाल सिंह यादव के संबोधनों में राज्य सरकार के मंत्रियों और अफसरों के खिलाफ बढ़ती तल्खी देखी जा सकती है।

बेंगलुरु : भारत विरोधी नारों को लेकर एमनेस्टी इंडिया के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मामला दर्ज

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बेंगलुरु: बेंगलुरु शहर की जेसी नगर पुलिस ने एमनेस्टी इंडिया के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मामला सोमवार को दर्ज किया है. आईपीसी की धारा 142, 143, 147, 124A, 153A और 149 के तहत मामले दर्ज किये गए हैं. हालांकि ये सभी मामले संस्था के खिलाफ दर्ज हुए हैं, किसी व्यक्ति के नहीं.
मामला पिछले शनिवार रात का है. एमनेस्टी इंटरनेशनल की तरफ से बेंगलुरु में एक सेमिनार का आयोजन किया गया जिसमें कुछ कश्मीरी परिवारों को बुलाया गया था, जो ये बता रहे थे कि कश्मीर में किस तरह से उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है. इसी बीच कश्मीरी पंडितों का एक दल वहां आया और फिर दोनों गुटों में तीखी झड़प हुई. इस झड़प के बाद का एक तथाकथित वीडियो सामने आया जिसमें कुछ युवा चिल्लाते हुए सुने जा सकते हैं, “हमको चाहिए आज़ादी.”
इसके बाद एबीवीपी और कुछ दूसरे संगठनों ने उस सभागार के बाहर विरोध प्रदेर्शन किया जहां इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. बाद में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता बी एस येदियुरप्पा ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर इस मामले में हस्तछेप करने का आग्रह किया.
वहीं दूसरी तरफ़ एमनेस्‍टी इंटरनेशनल की तरफ एक विज्ञप्ति जारी कर ये कहा गया कि मानवाधिकारों से जुड़े मामलों पर संगठन ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करता रहता है और वो किसी का पक्षधर नहीं है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर आकार पटेल ने देशद्रोह का मामला दर्ज होने पर कहा कि संवैधानिक मूल्यों की हिफाज़त विषय पर कार्यक्रम भी अब अपराध माना जा रहा है. इस कार्यक्रम के लिए पुलिस को भी बुलाया गया था. देशद्रोह का मामला दर्ज होने से साफ़ होता है कि मौलिक अधिकार और अभिव्‍यक्ति की आज़ादी बेमानी है.

कांग्रेस ने पीएम मोदी से कहा : सीजेआई की सलाह पर गौर करें

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नई दिल्‍ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में न्यायाधीशों की नियुक्ति का उल्लेख नहीं होने को लेकर प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) टीएस ठाकुर द्वारा निराशा जताए जाने पर विपक्षी दलों ने भी प्रतिक्रिया दी और कांग्रेस ने कहा कि प्रधानमंत्री को शीर्ष न्यायाधीश की सलाह पर ध्यान देना चाहिए.
कांग्रेस ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री के भाषण पर न्यायमूर्ति ठाकुर की टिप्पणी ‘‘अभूतपूर्व लेकिन पूरी तरह से सही’’ है वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री तथा आप नेता अरविन्द केजरीवाल ने सीजेआई के ‘साहस’’ के लिए उनकी ‘‘प्रशंसा’’ की. कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्विटर पर कहा, ‘‘प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में कानूनी अड़चन पर चुप्पी को लेकर सीजेआई ने सवाल किए. अभूतपूर्व लेकिन पूरी तरह से सही.’’
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को प्रधान न्यायाधीश की सलाह पर ध्यान दने की आवश्यकता है और इस मुद्दे पर क्षुद्र राजनीति नहीं होनी चाहिए. उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘मोदी जी, स्वतंत्रता दिवस पर 1.25 अरब भारतीय निष्पक्ष न्यायिक प्रणाली के लिए प्रतिबद्धता की मांग करते हैं. कृपया सीजेआई की सलाह पर ध्यान दीजिए.’’ कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय द्वारा मंजूर किए गए उच्च न्यायालय के 75 न्यायाधीशों के नामों पर रोक लगा दी गयी, न्यायाधीशों की नियुक्ति का मेमोरेंडम नाकाम हो गया. ‘जिद्दी’ प्रधानमंत्री द्वारा जानबूझकर न्याय में बाधा.’’ केजरीवाल ने भी ट्वीट के जरिए सीजेआई की सराहना की.
उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘मैं वास्तव में सीजेआई के साहस, प्रतिबद्धता और न्याय के लिए उनकी चिंता की सराहना करता हूं.’’ न्यायपालिका और सरकार के बीच गतिरोध जारी रहने के बीच प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि वह इस बात से निराश हैं कि प्रधानमंत्री ने अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में न्यायाधीशों की नियुक्ति का कोई उल्लेख नहीं किया.
प्रधान न्यायाधीश ने यहां एक कार्यक्रम में कहा, ‘‘मैंने लोकप्रिय प्रधानमंत्री को डेढ़ घंटे तक सुना… मुझे उम्मीद थी कि वह न्याय क्षेत्र और न्यायाधीशों की नियुक्ति के बारे में भी कुछ जिक्र करेंगे.’’ इस कार्यक्रम में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद भी मौजूद थे. अपनी नाखुशी जाहिर करते हुए न्यायमूर्ति ठाकुर ने कहा, ‘‘मैं प्रधानमंत्री से सिर्फ एक ही बात कहना चाहता हूं, आप गरीबी हटाएं, रोजगार का सृजन करें, योजनाएं लाएं लेकिन देशवासियों के लिए न्याय के बारे में भी सोचें.’’

70वां स्वतंत्रता दिवस : PM मोदी ने बलूचिस्तान और PoK का जिक्र कर पाकिस्तान को घेरा

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नई दिल्ली: 70वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले की प्राचीर से पीएम नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान पर निशाना साधा। पीएम मोदी ने कहा कि वे हम पर हमला करने वाले आतंकवादियों का महिमामंडन करते हैं, जबकि भारत पेशावर में आतंकी हमले में बच्चों के मारे जाने पर रोया था। यह पहली बार है जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने लाल किले से पीओके (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) और बलूचिस्तान का जिक्र किया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सभी पड़ोसी देश साथ मिलकर गरीबी से लड़ें, गरीबी से आजादी से बड़ी आजादी कोई और नहीं हो सकती। पेशावर के स्कूल में हुई आतंकी घटना का‍ जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उस दौरान भारत की संसद से लेकर देश के लोगों की आंखों में आंसू थे। ये ही हमारी मानवता से पली-बढ़ी संस्कृति हैं, जो सभी का दर्द समझती है। लेकिन कुछ जगह आतंकवादी घटनाओं में लोगों के मारे जाने पर जश्न मनाया जाता है।
पीएम ने पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान का जिक्र करते हु्ए कहा कि मैं वहां के लोगों को धन्यवाद देता हूं कि ये लोग मेरी तारीफ करते हैं। मैं उन लोगों का आभारी हूं। यह मेरा नहीं देश का सम्मान है। मैं पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों का शुक्रिया अदा करता हूं।
पीएम ने कहा कि देश आतंकवाद और चरमपंथ को सहन नहीं कर सकता। मोदी ने युवाओं से हिंसा को त्यागने और मुख्यधारा में लौटने की अपील की। उन्होंने कहा कि हिंसा किसी भी समस्या का हल नहीं है। मोदी ने इस दौरान गिलगित और बलूचिस्तान का जिक्र भी किया। गौर हो कि वहां लोगों ने पीएम मोदी के उस बयान का स्वागत किया था, जिसमें उन्होंने वहां हो रही ज्यादतियों का सर्वदलीय बैठक में जिक्र किया था।

स्वतंत्रता दिवस के जश्न के बीच असम में ब्लास्ट, कोई हताहत नहीं

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तिनसुकिया (असम): स्वतंत्रता दिवस के जश्न के बीच असम के तिनसुकिया जिले में उल्फा-इंडीपेंडेंट के संदिग्ध उग्रवादियों ने चार विस्फोट किये, हालांकि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ।
पुलिस के अनुसार तिनसुकिया के बाहरी इलाके लैपुली के इंदिरा गांधी स्कूल के निकट सुबह 7.15 बजे आईईडी विस्फोट हुआ। इसके बाद डूमडूमा इलाके के बदलाभाटा चाय बागान के लाइन नंबर 6 में दूसरा धमाका हुआ। तीसरा विस्फोट मसूवा इलाके में हुआ।
पुलिस का कहना है कि चौथा धमाका फिलोबरी के गमतुमाटी इलाके में हुआ । इसी इलाके के बाहबोन गांव में उल्फा-आई के उग्रवादियों ने 12 अगस्त की रात दो लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी थी और छह अन्य लोगों को घायल कर दिया था।

पीएम नरेंद्र मोदी के भाषण के दौरान सो गए अरविंद केजरीवाल

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नई दिल्ली: देश के 70वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण को लाखों-करोड़ों लोगों ने टीवी पर देखा-सुना होगा, लेकिन पीएम के शब्द दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को कतई उत्साहित नहीं कर पाए, और उन्हें समारोह स्थल पर अन्य वीआईपी मेहमानों के साथ बैठे होने के बावजूद ऊंघते हुए देखा गया.
इससे भी ज़्यादा दिलचस्प तथ्य यह रहा कि जब सोशल मीडिया में अरविंद केजरीवाल के ऊंघने की ओर इशारा किया गया, तब उनके उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने इसका ‘दोष’ प्रधानमंत्री के ‘बोरिंग’ भाषण को दिया.
वैसे भी, आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों के प्रधानमंत्री के डेढ़ घंटे से भी लंबे भाषण से उत्साहित होने की उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि वे आमतौर पर अदालतों में, और बाहर भी, प्रधानमंत्री पर दिल्ली की उनकी सरकार से मूलभूत अधिकारों को छीन लेने का आरोप लगाते रहे हैं, ताकि राज्य पर केंद्र सरकार का ज़रूरत से ज़्यादा आधिपत्य व नियंत्रण बना रहे. पिछले ही सप्ताह दिल्ली हाईकोर्ट ने अरविंद केजरीवाल के खिलाफ फैसला भी सुनाया था, और कहा था कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के प्रशासक हैं.
कुछ ही दिन पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यूट्यूब पर एक वीडियो भी अपलोड किया था, जिसमें उन्होंने यहां तक आशंका जताई थी कि प्रधानमंत्री ‘उनकी हत्या तक करवा सकते हैं, क्योंकि वह बौखलाए हुए हैं.’ इसके साथ ही उन्होंने 10 दिन तक विपश्यना साधना के लिए जाने की भी घोषणा की थी, जिसमें वह मौन रहते हैं. पिछले ही हफ्ते दिल्ली वापसी के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को पंजाब, गुजरात और गोवा में चुनावी चुनौती देने की योजना बनाई, जहां जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. फिलहाल तीनों ही राज्यों में बीजेपी सत्ता में है (बीजेपी पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ मिलकर सत्तासीन है).

मुलायम सिंह का बड़ा बयान- अखिलेश ने बनी बनाई पार्टी बर्बाद कर दी

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लखनऊ : समाजवादी पार्टी के अध्‍यक्ष मुलायम सिंह यादव ने सोमवार को यूपी के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव और उनके मंत्रियों को जमकर फटकार लगाई। लखनऊ में आज जब मुलायम पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे, उन्‍होंने अखिलेश को खूब खरी खोटी सुनाई। हैरत की बात यह रही कि मुलायम डांटते रहे और वहां मौजूद अखिलेश यादव सुनते रहे।
मुलायम ने यूपी के मुख्‍यमंत्री की लखनऊ में कार्यकर्ताओं के बीच खूब आलोचना की। उन्‍होंने कहा कि अखिलेश यादव मेहनत नहीं करते हैं। अखिलेश के मंत्री बोझ हैं, भ्रष्‍ट हैं। उन्‍हें मेहनत करनी नहीं, रात को रुकना नहीं।
सपा अध्‍यक्ष ने यह भी कहा कि पार्टी के वरिष्‍ठ नेता शिवपाल यादव के खिलाफ साजिश हो रही है। शिवपाल ने दो बार इस्‍तीफे की पेशकश की। मैंने शिवपाल को इस्‍तीफा देने से रोका। यदि शिवपाल पार्टी छोड़ देंगे तो बड़ी मुश्किल होगी। उन्‍होंने कहा कि कुछ लोग शिवपाल के पीछे पड़े हैं। अगर मैं खड़ा हो गया तो सब भाग जाएंगे।
कहा जा रहा है कि मुलामय सिंह यादव यह चाहते हैं कि विरोधी गुट भी पार्टी के साथ रहें। मुलायम अखिलेश के विरोधी गुट को भी साथ लेकर चलते हैं। मुलायम को पता है कि पार्टी के वरिष्‍ठ नेताओं को साथ लेकर कैसे चला जाए।