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बिहार विधानसभा अध्यक्ष पर भड़के सम्राट चौधरी, बोले “व्याकुल नहीं होना है, चाहें तो…”

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जैसा कि सभी को पता है, बिहार में हमेशा ही राजनीति गर्म रहती है। जिसके चलते बिहार से कई मामले सुनने को मिलते हैं। हाल ही में बिहार विधानसभा में भी गर्मा गर्मी देखी गई। बुधवार को नीतीश सरकार के पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी विधानसभा में अध्यक्ष विजय सिन्हा पर ही भड़क गए। जिसको लेकर काफी समय तक सभा स्थगित कर दी गई। इस दौरान मंत्री सम्राट चौधरी ने विधानसभा अध्यक्ष विजय सिन्हा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आप व्याकुल न हो।

सत्ता और संत

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ज्योतिर्पीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज के परम शिष्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद जी देहरादून प्रवास पर १२ मार्च को आये हुए थे। जनता के कार्य से वे शनिवार १३ मार्च को मुख्य मंत्री तीरथ सिंह रावत से तय समय अनुसार दोपहर २ बजे बीजापुर गेस्ट हाउस के एनेक्सी में मिलने पहुंचे। स्वामीश्री के साथ मैं भी था, इसीलिए सत्ता और संत दोनों का स्वभाव देखा।

स्वामीश्री समय के पाबंद हैं और नए मुख्य मंत्री की व्यस्तता और समय का ख्याल करते हुए १.४५ यानि १५ मिनट पहले पहुँच गए। मुख्य मंत्री के स्टाफ ने उन्हें और उनके सहयोगियों को ससम्मान एक कक्ष में बैठाया। कुछ ही देर में वहां हमें पता चला कि स्वामीश्री का मिलने का समय २.३० बजे का है, स्वामीश्री इत्मीनान से अपने अनुयायी और सहयोगियों के साथ बैठ गए। मुख्य मंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी स्वामीश्री के पास आये और उन्होंने बताया कि मुख्य मंत्री जी मीटिंग में हैं अभी थोड़ी देर में उनसे मिलेंगे।

स्वामीश्री अविमुक्तेश्वरानंद जी ने जोशीमठ की जनता के लिए जोशीमठ में एक आधुनिक अस्पताल बनवाने का संकल्प लिया है जिसके लिए वे पहले भी वहां उपलब्ध सरकारी जमीन की मांग कर रहे थे। जोशीमठ में चिकित्सा स्वास्थ सेवाओं का बहुत आभाव है, वहां की जनता को इलाज कराने ऋषिकेश या देहरादून तक (१० घंटे का सफर) आने को मजबूर होना पड़ता है। वैसे तो इसकी प्रथम जिम्मेद्दारी प्रदेश सरकार की है… सत्ता की।

जोशीमठ या ज्योर्तिमठ हिन्दुओं के मोक्ष धाम बदरीनाथ जी से लगभग ४० किमी पहले बदरी विशाल के दर्शनों को आने वाले श्रद्धालुओं का मुख्य पड़ाव भी है। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद जी महाराज हैं, उनके मार्गदर्शन से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद वहां जोशीमठ में जनता के लिए एक १०० बेड वाला अस्पताल का निर्माण कराना चाह रहे हैं…. जनता के लिए।… तो आते हैं शनिवार १३ मार्च बीजापुर गेस्ट हाउस के अन्नेक्सी में मुख्य मंत्री से मिलने की प्रतीक्षा में बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद वाले कक्ष में।

दोपहर के २.३० भी बज चुके थे, साथ आये स्वामीश्री के भक्त दोबारा और तिबारा मुख्य मंत्री के स्टाफ को याद दिला रहे थे इसपर किसी स्टाफ से यह पता चला कि मुख्य मंत्री से मिलने अचानक कुछ संघ प्रचारक आ गए हैं और मुख्य मंत्री उनके साथ व्यस्त हैं। सत्ता, व्यस्त थी। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से तो संघ प्रमुख मोहन भगवत भी समय लेकर आते हैं और उनसे घंटो मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं।

खैर, स्वामीश्री के भक्त मुख्य मंत्री के स्टाफ से फिर निवेदन करते हैं और इसी सब में दोपहर के ३ बज जाते हैं, एक घंटा १५ मिनट की प्रतीक्षा के बाद स्वामीश्री ३ बजे अन्नेक्सी से मुख्य मंत्री से बिना मिले चले आते हैं। निर्धारित समय देने के बाद भी मुख्य मंत्री तीरथ सिंह रावत एक संत के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं। स्वामीश्री जाते जाते भी नए मुख्य मंत्री के हाथों जनता के लिए शुभ कार्य हों का आशीर्वाद देते हुए हरिद्वार कुम्भ के लिए प्रस्थान कर देते हैं। स्वामीश्री अपने संकल्प पर आज भी कायम हैं कि वे जोशीमठ की जनता के लिए अस्पताल बनवाएंगे, सत्ता का सहयोग हो या न हो।

भारत भूषण नौटियाल

कब हुई भारत में गौहत्या की शुरूआत

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भारत में पहली बार 1000 ई. के आसपास जब विभिन्न इस्लामी आक्रमणकारियों तुर्की, ईरान (फारस), अरब और अफगानिस्तान से आये तो वे अपनी इस्लामी परंपराओं के अनुसार विशेष अवसरों पर ऊंट और बकरी, भेड़ बलिदान करते थे। हालांकि, मध्य और पश्‍चिम एशिया के इस्लामी शासक, गोमांस खाने के आदी नहीं थे, उन्होंने भारत में आने के पश्‍चात्‌ गाय के वध को और गायों की कुरबानी, विशेष रूप से बकरी – ईद के अवसर पर शुरू कर दिया।

उन्होंने भारत के मूल निवासियों को अपमानित करने और उनके भोजन प्रयोजनों में संप्रभुता और श्रेष्ठता साबित करने के लिए किया था। इनके इस कार्य अर्थात गौवध के कारण इस देश के मूल हिंदू आबादी में असंतोष पनपने लगा। कहा जाता है हिंदुओं के विरोध को संज्ञान लेते हुए अकबर और औरंगजेब जैसे मुगल शासकों ने मुस्लिम त्यौहारों के दौरान गायों की हत्या और गायों की कुरबानी को निषिद्ध घोषित किया था।

गाय के पेट से प्लास्टिक समाप्त करने का सफल उपचार

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हिन्दू धर्म में मां के रूप में पूजी जाने वाली गौमाता के जीवन पर प्लास्टिक की थैलियाँ भारी पड़ रही हैं। पेट में पॉलिथीन होने से गाय को अफरा आता है जिस कारण वह श्‍वास ले पाने में असमर्थ होती है। गाय के पेट में जमा पॉलिथीन निकालने के लिए पशु चिकित्सकों को गाय के पेट का ऑपरेशन करना पड़ता है। पेट चीरकर पॉलिथीन निकालने की प्रक्रिया काफी कष्टदायी होती है और इसमें गाय के बचने की सम्भावना भी कम ही होती है। परन्तु अब एक बेहद सामान्य से उपचार के माध्यम से गाय के पेट से बड़ी मात्रा में पॉलिथीन आसानी से निकाली जा सकती है, वह भी गाय को बिना कोर्इ कष्ट दिए। जयपुर के पशुपालन अधिकारी डॉ. कैलाश मोड़े ने गाय के पेट से पॉलिथीन निकालने की एक बेहद सामान्य उपचार प्रक्रिया र्इजाद की है। वे स्वयं इस उपचार प्रक्रिया के माध्यम से लगभग 250 गायों का जीवन बचा चुके हैं। इस उपचार प्रक्रिया के माध्यम से एक गाय के पेट से 5 से 15 किलो तक पॉलिथीन वे स्वयं निकाल चुके हैं। आप चाहें तो डॉ. साहब से फोन पर संपर्क कर सकते हैं।

ऐसे करें उपचार

सामग्री: 100 ग्राम सरसों का तेल,100 ग्राम तिल का तेल, 100 ग्राम नीम का तेल और 100 ग्राम अरण्डी का तेल
विधि: इन सबको खूब मिलाकर 500 ग्राम गाय के दूध की बनी छाछ में डालें तथा 50 ग्राम फिटकरी, 50 ग्राम सौंधा नमक पीस कर डालें। ऊपर से 25 ग्राम साबुत रार्इ डालें। यह घोल तीन दिन तक पिलायें और साथ में हरा चारा भी दें। ऐसा करने से गाय जुगाली करते समय मुँह से पॉलिथीन निकालती है। कुछ ही दिनों में पेट में जमा सारा प्लास्टिक का कचरा बाहर निकल जायेगा। यह उपचार सफल सिद्ध हो रहा है!

भारतीय गायों के अस्तित्व का प्रश्‍न

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भारत में गाय को पूजनीय मानकर माता कहा जाता है जबकि विश्‍व के दूसरे देशों में ऐसा नहीं है। भारतीय गाय के दूध के अलावा गोमूत्र और गोबर को भी पवित्र माना जाता है। सुख, समृद्धि की प्रतीक रही भारतीय गाय आज गौशालाओं में भी उपेक्षित है। अधिक दूध के लिए विदेशी गायों को पाला जा रहा ह जबकि भारतीय नस्ल की गायें, जो आज भी सर्वाधिक दूध देती हैं, त्याज्य ही हैं। गौशाला में देशी गोवंश के संरक्षण, संवर्द्धन की परंपरा भी खत्म हो रही है। हमारी गौशालाएं ‘डेयरी फार्म’ बन चुकी हैं, जहां दूध का ही व्यवसाय हो रहा है और सरकार भी इसी को अनुदान देती है। हमें देशी गाय के महत्त्व और उसके साथ सहजीवन को समझना जरूरी है। आज भारतीय गौशालाओं से भारतीय गोवंश सिमटता जा रहा है।

गाय की उत्पत्ति स्थल भी भारत ही है। इसका सर्वप्रथम विकास लगभग 15 लाख वर्ष पूर्व एशिया में हुआ। इसके बाद गाय अफ्रीका और यूरोप में फैली। गायों का विकास दुनिया के पर्यावरण, वहां की आबोहवा के साथ उनके भौतिक स्वरूप व अन्य गुणों में परिवर्तित हुआ। विदेशी नस्ल की गाय को भारतीय संस्कृति की दृष्टि से गौमाता नहीं कहा जा सकता। जर्सी, होलस्टीन, फ्रिजियन, आस्ट्रियन आदि नस्लें आधुनिक गोधन जिनेटिकली इंजीनियर्ड है। इन्हें मांस व दूध के अधिक उत्पादन के लिए सुअर के जींस से विकसित किया गया है। अधिक दूध की मांग के आगे नतमस्तक होते हुए भारतीय पशु वैज्ञानिकों ने बजाय भारतीय गायों के संवर्द्‌धन के विदेशी गायों व नस्लों को आयात कर एक आसान रास्ता अपना लिया। आज ब्राजील भारतीय नस्ल की गायों का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। भारतीय नस्ल की गायें सर्वाधिक दूध देती थीं और आज भी देती हैं। ब्राजील में भारतीय गौवंश की नस्लें सर्वाधिक दूध दे रही हैं। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की रिपोर्ट में कहा गया है- ब्राजील भारतीय नस्ल की गायों का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। वहां भारतीय नस्ल की गायें होलस्टीन, फ्रिजीयन (एचएफ) और जर्सी गाय के बराबर दूध देती हैं।

भारतीय नस्ल के गायों की शारीरिक संरचना अद्भुत है। इसलिए गोपालन के साथ वास्तु शास्त्र में भी गाय को विशेष महत्त्व दिया गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भारतीय नस्ल के गायों की रीढ़ में सूर्यकेतु नामक एक विशेष नाड़ी होती है। जब इस पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं, तब यह नाड़ी सूर्य किरणों के तालमेल से सूक्ष्म स्वर्ण कणों का निर्माण करती है। यही कारण है कि देशी नस्ल की गायों का दूध पीलापन लिए होता है। इस दूध में विशेष गुण होता है। ध्यान दें कि अनेक पालतू पशु दूध देते हैं, पर गाय के दूध को उसके विशेष गुण के कारण सर्वोपरि काह गया है।गाय के दूध के अलावा उसके गोबर व मूत्र में अद्भुत गुण हैं। रासायनिक विश्‍लेषण से पता चलता है कि खेती के लिए जरूरी 23 प्रकार के प्रमुख तत्त्व गोमूत्र में पाए जाते हैं।

इन तत्त्वों में कर्इ महत्त्वपूर्ण मिनरल, लवण, विटामिन, एसिड्स, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट होते हैं। गोबर में विटामिन बी-12 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह रेडियोधर्मिता को भी सोख लेता है। हिंदुओं के हर धार्मिक कार्यों में गोबर से बने गणेश और गौरी (पार्वती) को पूजा स्थल में रखा जाता है। सर्वप्रथम गौरी-गणेश पूजन के बाद ही पूजा कार्य होता है। गाय के गोबर में खेती के लिए लाभकारी जीवाणु, बैक्टीरिया, फंगल आदि बड़ी संख्या में रहते हैं। गोबर खाद से अन्न उत्पादन व गुणवत्ता में वृद्धि होती है। इन्हीं सब गुणों के कारण भारतीय धर्म, दर्शन, संस्कृति और परंपरा में गाय को पूजनीय माना जाता है। हम भारतीय गौवंश को अपनाकर उन्हें गोशाला में संरक्षित, संवर्धित कर सकते हैं, जिसका सर्वाधिक लाभ भी हमें ही मिलेगा।

बांग्लादेशी तस्करों के जाल में फँसी गौमाता, सालाना 40 हजार करोड़ की गौतस्करी

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बांग्लादेश तीन तरफ से भारत से घिरा हुआ है। दोनों देशों के बीच 4,156 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो दुनिया का पांचवां सबसे लंबा बॉर्डर एरिया है। पश्‍चिम बंगाल और असम के कर्इ इलाके जमीन और जलमार्ग से बांग्लादेश से जुड़े हुए हैं। गायों की तस्करी के लिए जल और जमीन दोनों ही रास्तों का इस्तेमाल हो रहा है।पश्‍चिम बंगाल में 2,216 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा के जरिए हर साल बड़ी संख्या में मवेशियों की बांग्लादेश में तस्करी होने का अनुमान है। सीमावर्ती क्षेत्र मालदा-मुर्शिदाबाद के कच्चे रास्ते से रोजाना गायें बांग्लादेश पहुंचती हैं। सीबीआर्इ का मानना है कि जिस संख्या में गायों की तस्करी होती है उसमें से केवल पांच फीसदी ही बीएसएफ के जवान रोक पाते हैं। बाकियों की या तो जानकारी कम है या फिर मिलीभगत है।

अब सीबीआई इसके पीछे काम करने वाले सिंडिकेट के बीच सांठगांठ का खुलासा करने की कोशिश में है। एक समाचार के मुताबिक संदेह के आधार पर सीबीआई ने कर्इ बड़े नाम वालों को गायों की तस्करी में लिप्त होने का अनुमान लगाया है। इनमें से एक नाम तो तृणमूल कांग्रेस के एक नेता का भी है। कहा जाता है कि पशु तस्करी करके इस नेता ने काफी धन बनाया है इसकी जांच भी अब एजेंसी कर रही हैं। बांग्लादेश में गायों की कीमत नस्ल और ऊंचाई के आधार पर तय होती है। जैसे हरियाणा और यूपी की नस्लें ज्यादा कीमत पर बिकती हैं, जबकि बंगाल की गायों की कीमत अपेक्षाकृत कम है। ईद के दौरान इनकी मांग बढ़ने से कीमत भी ज्यादा हो जाती है। जब कभी किसी गिरोह द्वारा तस्करी की जा रही गायों को बीएसएफ जब्त करती है और बाद में उनकी नीलामी होती है तो इनकी कीमत जानबूझकर कम लगाई जाती है। यह कीमत भी तस्करी में शामिल लोगों द्वारा ही तय की जाती है। साथ ही केवल कुछ ही व्यापारियों को कम कीमत पर इन्हें खरीदने की इजाजत मिलती है।

नीलामी के बाद गायों को दोबारा बढ़ी हुई कीमत पर व्यापारी बांग्लादेशी तस्करों को बेच देते हैं। गायों या दूसरे मवेशियों की तस्करी के लिए तस्कर आए दिन नए तरीके अपनाते हैं। लंबा-चौड़ा बॉर्डर होने के कारण उसके चारों ओर बाड़ नहीं लगायी जा सकती और न ही सीमा पर उतनी पक्की चौकसी हो पाती है। इसी बात का फायदा तस्कर उठाते हैं। कई बार गायों को सीमा पार ले जाने के लिए महिलाओं या बच्चों का इस्तेमाल भी होता है क्यों कि उन पर आसानी से शक नहीं किया जाता। लीवर के इस्तेमाल से भी मवेशी सीमा पार भेजे जाते हैं, जिसे झूला तकनीक कहते हैं। ये तकनीक छोटे मवेशियों के लिए इस्तेमाल होती है। साल 2016 में सीबीआई ने इस तस्करी का अनुमानित फायदा लगभग 15 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा माना था। इसके अलावा असम से भी तस्करी होती है। आंकड़ों के लिहाज से भी ये मुद्दा गंभीर दिखता है। साल 2014 में तस्करी करके ले जाए जा रहे करीब एक लाख दस हजार पशुओं को बीएसएफ ने जब्त किया था।

साल 2016 तक आते – आते सीमा पर जब्त पशुओं की संख्या एक लाख 69 हजार तक पहुंच गर्इ। जब्ती की इस संख्या से इस बात का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि सही मायने में कितने पशुओं की तस्करी हुर्इ। एक बात ये भी है कि बांग्लादेश में पशु तस्करी को अपराध नहीं माना जाता, बल्कि ये वहां की सरकार के लिए राजस्व का जरिया है। भारत का तस्कर बांग्लादेश की सीमा में जाते ही पशुओं के बदले टैक्स चुकाता है और बाकायदा व्यापारी कहलाता है। बांग्लादेश में पशुओं को खरीदकर ज्यादा कीमत पर दूसरे बीफ खाने वाले देशों को भी बेचा जाता है। ये भी वहां आय का एक जरिया है। साथ ही पशुओं से जुड़े चमड़ा उद्योग भी वहां खूब चलते हैं। तो कुल मिलाकर हमारे यहां के मवेशी पड़ोसी देश की जीडीपी में योगदान दे रहे है।

भारत से गायों की तस्करी को लेकर सीबीआई ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि देश के गायों की खेप की खेप बांग्लादेश सीमा के जरिए बाहर पहुंचायी जा रही हैं। यहां तक कि इस तस्करी में बीएसएफ और कस्टम वालों के अलावा कर्इ सफेद पोश लोगों की मिलीभगत बतायी जा रही है।
एक प्रमुख समाचार पत्र में छपी रिपोर्ट के अनुसार भारत-बांग्लादेश सीमा पर गौतस्करी का धंधा सालाना 35-40 हजार करोड़ रुपये का है। भारत में जिस गाय की कीमत 20 हजार होती है बॉर्डर पार करवाते ही बांग्लादेश में वह औसतन 50 हजार में बिकती है।

इंसान की गलतियों से दर्दनाक मौत मर रहीं हमारी गौमाताएं

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इंसान की गलतियों का खामियाजा हमारी गौमाताएं भुगत रहीं हैं। भारत के छोटे बड़े शहरों में इधर-उधर भटकती गायें और आवारा घूम रहे गौवंशों में से 95 प्रतिशत पशु अपने पेट के अंदर खतरनाक सामग्री के कारण विभिन्न बीमारियों से पीड़ित हैं, उनमें से 90 प्रतिशत प्लास्टिक बैग हैं जो मनुष्यों द्वारा खाद्य पदार्थ भरकर कचरे के ढेर पर फेंक दिया जाता है। गायों के पेट से भारी मात्रा में जहरीला कचरा निकल रहा है। इसमें न सिर्फ पॉलिथीन की थैलियां बल्कि प्लास्टिक की बोतलों के ढक्कन, लोहे की कीलें, सिक्के, ब्लेड, सेफ्टी पिन, पत्थर और मंदिरों में चढ़ावे से निकला कचरा भी शामिल है। डॉक्टरों के मुताबिक गायों के पेट में कचरे का जमाव बेहद सख्त होता है जिसे काटकर बाहर निकालने के लिए कर्इ बार आरी की मदद भी लेनी पड़ती है। शहर में घूम रही गायें हर दिन प्लास्टिक खा रही हैं। पेट में जब अधिक प्लास्टिक जमा हो जाता है तो वह दम तोड़ दे रही हैं। दो साल में हुए पोस्टमार्टम की रिपोर्ट को जानकर आप भी हैरान हो जाएंगे। छह सौ गायों की मौत के बाद पशु विभाग द्वारा कराए गए पोस्टमार्टम में एक हजार किलो प्लास्टिक निकला है। पशु स्वास्थ्य को लेकर यह गंभीर मामला है जिसे लेकर डॉक्टरों ने भी रिपोर्ट दी है।

एक गाय के पेट से 20 किलो तक निकल रहा प्लास्टिक: पोस्टमार्टम रिपोर्ट खंगालने और उस पर अध्ययन करने पर पाया गया कि औसतन एक गाय के पेट से 20 किलो तक प्लास्टिक निकला है। जुलाई 2017 के बाद से अब तक लगभग छह सौ गायों के पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन करने पर यह बात सामने आयी है। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों का कहना है इनमें से 90 प्रतिशत गायों की मौत का कारण उनके पेट में जमा प्लास्टिक है। गायों का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि सड़कों पर घूमने वाली गाय सब्जी व अन्य खाने वाले सामानों के साथ उस प्लास्टिक को भी निगल जाती हैं, जिसमें वह खाद्य पदार्थ फेंका जाता है।

प्लास्टिक गाय के पेट में जाकर जमा हो जाता है और फिर वह धीरे-धीरे आंतों को जाम कर देता है। एक समय ऐसा आता है जब आंतों में फंसी प्लास्टिक गाय की मौत का कारण बन जाता है। पोस्टमार्टम के दौरान जानवर की आंत को देखना होता है और उससे मौत का कारण पता लगाया जाता है। हर गाय की मौत का कारण प्लास्टिक सामने आ रहा है और पेट से 15 से 20 किलो तक प्लास्टिक निकलता है। इसमें पालीथीन, प्लास्टिक के बोरे, प्लास्टिक की रस्सियों के साथ अन्य खतरनाक कूड़े होते हैं, जो पेट में गलते नहीं हैं। पोस्टमार्टम के दौरान आसपास मौजूद डॉक्टर व पशु स्वास्थ्य कर्मियों को चक्कर आ जाता है। पेट में प्लास्टिक इस तरह फंसा होता है कि उसे निकालने में डॉक्टरों को पसीना छूट जाता है।

गायब हो गयीं चारागाहों की जमीनें

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चारागाह पशुरक्षण और पशु संवर्द्धन का आधार है। पशुधन इस देश के कृषि, व्यापार, उद्योग इत्यादि अनेक उपयोगी विषयों के मूल में पशुधन ही है। सच तो यह है कि देश के धर्म, संस्कृति, कृषि, व्यापार, उद्योग, समृध्दि और सामाजिक व्यवस्था तथा जनता की शांति व सुरक्षितता की जीवन-रेखा देश के समृध्द चरागाह ही हैं। पशुओं के चरने की जमीन को चरागाह कहते हैं। कहीं-कहीं इसे गोचर भूमि भी कहा जाता है। सौराष्ट्र में उसे घास की वीडी कहते हैं। जो देश स्वयं को उद्योग प्रधान कहलाते हैं और जिनके उद्योगों को भी भारत के कृषि उत्पादों पर आधारित रहना पड़ता है वे भी पशुओं के परिपालन की ओर ध्यान देते है और संभव हो उतनी ज्यादा जमीनें चरागाह के लिए सुरक्षित रखते हैं।

ब्रिटेन खुद के लिए अनाज आयात करके भी और जापान रूई आयात करके भी चरागाहों को सुरक्षित रखते हैं। क्योंकि उनको चरागाहों और पशुओं का महत्व समझ में आया है।इंग्लैंड हरेक पशु के लिए औसतन 3.5 एकड़ जमीन चरने के लिए अलग रखता है। जर्मनी 8 एकड़, जापान 6.7 एकड़ और अमेरिका हर पशु के लिए औसतन 12 एकड़ जमीन चरनी के लिए अलग रखता है। इसकी तुलना में भारत में एक पशु के लिए चराऊ जमीन 1920 में 0.78 एकड़ अर्थात अंदाजन पौने एकड़ थी। अब यह संख्या घटकर प्रति पशु 0.09 एकड़ हो गर्इ है। अर्थात अमेरिका में 12 एकड़ पर 1 पशु चरता है जबकि भारत में एक एकड़ पर 11 पशु चरते हैं। सिर्फ एक ही साल में भारत में चारागाहों की साढ़े सात लाख एकड़ जमीन का नाश कर दिया गया। 1968 में गोचर भूमि 3 करोड़ 32 लाख 50 हजार एकड़ थी, जो 1969 में घटकर 3 करोड़ 25 लाख एकड़ हो गर्इ। और अगले पांच सालों में अर्थात 1974 में और ढाई लाख एकड़ कम होकर 3 करोड़ 22 लाख 50 हजार एकड़ हो गई।

इस तरह सिर्फ छह सालों में 10 लाख एकड़ गोचर भूमि का नाश किया गया। वर्तमान में गोचर भूमि का कोर्इ प्रमाणिक आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं है। फिर भी किसानों का विकास करने की, गरीबों को रोजी दिलाने का वादा करने वाले, विशेषकर किसानों, पशुपालकों व गांव के कारीगरों के वोट से चुनाव जीतने वाले किसी भी विधानसभा या लोकसभा के सदस्य ने उसका न तो विरोध किया, न ही उसके प्रति चिन्ता व्यक्त की है। हमारे देश के धर्म, संस्कृति, समृध्दि व सलामती की आधारशिला हमारे पशु थे और पशुओं की जीवन- रेखा हमारे चारागाह। हमारी गायों को कत्लखाने ढकेलने की साजिश के एक भाग के रूप में अंग्रेजों ने चरगाहों का नाश कर दिया। इस्लाम के आक्रमण के समय तलवार के सामने तलवारें टकरार्इ थीं, लेकिन यूरोपीय आक्रमण अलग ही प्रकार का था। उसमें भलाई और भोलेपन के सामने कपट व नीचता टकरायी, एकवचनीपन और नीति के खिलाफ दोगलापन व दगाबाजी टकरायी जिसमें भारतवासियों की पराजय हुई।

इस कल्पनातीत युध्द में भारत ने दो सौ वर्षों तक जो खून रिसते जख्म सहे हैं, वह खून तो शायद अगर हम अब भी सावधान हो जायें तो 100-200 सालों में बहना बंद हो जायेगा, लेकिन इन जख्मों को भरने में शायद एक हजार साल लग जायेंगे।आज समाज के लिए चरागाह जीवन मरण का और मूलभूत विषय है। क्योंकि जब तक चरनियां भरपूर मात्रा में फिर से विकसित नहीं होंगी, तब तक घर-घर में फिर से गाय को परिवार के सदस्य की तरह नहीं रख सकेंगे। जब तक हरेक घर में गाय फिर से बांधी नहीं जायेगी, तब तक हिंदू प्रजा नाममात्र की हिंदू रहेगी। हिंदू की तरह जी नहीं पायेगी।

भारत के रंग – एकल विद्यालय के संग, एकल श्री हरि राष्ट्रीय रजत जयंती महोत्सव का शंखनाद

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श्री हरि ने वनवासी बच्चों को व्यासपीठ दी। यही धर्म की भाषा है। वनवासी समाज को प्रेम व सम्मान चाहिए। राम का आत्मविश्वास राम है। जो रामजी का काम करे वह राम सेवक है। – श्याम जी गुप्त
क्या ऐसा कोई भारतवासी होगा जो भारत माँ को नहीं मानता हो? क्या कोई ऐसा हिन्दू होगा जिसे राम की याद न आती हो? यदि राम की याद आती है तो वनवासी समाज की दशा भी याद आना चाहिए। माता शबरी याद आना चाहिए। हमने वनवासी राम की पूजा की है न कि राजा राम की। वनवासी राम को भक्त नहीं कार्यकर्ता चाहिए। लक्ष्मी व सरस्वती के साधक विकास तो करेंगे किंतु रक्षा करेंगे दुर्गा के साधक। 1947 में देश आजाद हुआ किन्तु हिन्दू आज भी गुलाम है। कई प्रश्न हैं किन्तु समाधान कौन करेगा? संतों ने धर्म को मोक्ष का मार्ग बना दिया है। हम राम की कथा तो करते हैं किन्तु उनके कार्यों की चर्चा नहीं करते। वनवासी समाज धर्म को समझता है। सेवा स्वार्थ जगाती है जबकि संस्कार त्याग जगाता है और वह त्याग उसी धर्ममय सेवा से जागेगा। नगरवासियों के गले लगेगा।

बीजेपी के उम्मीदवार ने दिया राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा, महुआ मोइत्रा ने कहा धन्यवाद…

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चुनाव की डेट आगे आते ही पश्चिम बंगाल में राजनीतिक लड़ाई शुरू हो गई है। एक तरफ भाजपा ममता बनर्जी की पार्टी को टारगेट बना रही है तो वहीं दूसरी ओर टीएमसी भी बीजेपी को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। हाल ही में टीएमसी नेता और लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा (Mahua Moitra) ने भाजपा के उम्मीदवार पर नियमों का पालन न करने का आरोप लगाया था। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के स्वपन दासगुप्ता (Swapan Dasgupta) की उम्मीदवारी पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दें।