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वसु का कुटुम : निर्भया कांड की थीम पर बुनी गई लचर कहानी जिसमें महान संभावना थी

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एक मंझा हुआ निर्देशक हमेशा शानदार और सफल फिल्म नहीं बना पाता. ठीक उसी तरह एक अच्छा लेखक हमेशा अच्छा ही लिखे यह कतई जरूरी नहीं. और फिर अच्छे निर्देशक की एक बुरी फिल्म जिस तरह की खीज पैदा कर सकती है कुछ-कुछ यही बात अच्छे लेखक की बुरी रचना पर भी लागू होती है.
मृदुला गर्ग की यह लंबी कहानी ‘वसु का कुटुम’ एक अच्छी लेखिका की लचर कहानी है. यह एक ऐसी रचना है जो भरपूर संभावना पैदा करती है लेकिन, फिर उस पर खरा नहीं उतरती. ‘कठगुलाब’ और ‘मिलजुल मन’ जैसी सशक्त रचना देनेवाली लेखिका, वसु का कुटुम में वैसा जादू नहीं जगा पातीं.
यह कहानी बहुचर्चित निर्भया कांड को बुनियाद बनाकर लिखी गई है और इसकी केंद्रीय पात्र ‘दामिनी’ नाम की लड़की है. लेखिका दामिनी के बहाने समाजसेवा के नाम पर सिर्फ कमाई करने वाले एनजीओ, महत्वपूर्ण से महत्वपूर्ण मुद्दों पर ज्यादातर खोखली बहस करने वाले न्यूज चैनलों और मकान बनाते समय सरकारी नियमों को ताक पर रखने वाले बिल्डरों की पोल खोलती है.
इस पूरी कहानी में कई सारे झोल हैं. दामिनी जब बहुत बीमार हो जाती है तो राघवन नाम का दुकानदार, दामिनी के यहां काम करने वाली की एक महिला की मदद से उसे सफदरजंग अस्पताल ले जाता है. डॉक्टर एकदम से उसे पहचान लेते हैं कि यह वही दामिनी है जिसका केस काफी प्रसिद्ध हुआ था. किताब में आगे का घटनाक्रम कुछ यूं दिया गया है – ‘राघवन घबराकर उसके साथ हो लिया और रास्ते में सड़क पर झाडू़ लगा रही नजमा को भी आवाज लगा दी. तीनों ने मिलकर उसे एक टैक्सी में ठूंसा और अस्पताल ले गए. काफी देर बाद दो डॉक्टर नमूदार हुए. उनमें से एक ने उसे देखा नहीं कि घबराकर दो कदम पीछे हटकर बोला, ‘ये तो वही है.’ ‘कौन?’ रत्नाबाई ने कहा. ‘दामिनी!’ उसने डरकर ऐसे कहा, जैसे भूत देख लिया हो! ‘हां ये दामिनी है. मरने को पड़ी है. इसको लेकर चलो अन्दर. इलाज करो’ वह खड़ा देखता ही रहा. लगा, बेहोश होकर गिर जाएगा.
इस जगह यह बात साफ हो जाती है कि यह लड़की वही दामिनी है, जिसका मामला सुर्खियों में आया था. लेकिन इसके बावजूद राघवन एक जगह फिर से शंका करता है कि वह लड़की सच में दामिनी है या नहीं. – ‘फिर वही पुराना चक्कर तो था ही जो चक्रवात की तरह उसे घुमा रहा था, पटकनी दे-देकर. यह कि वह औरत वाकई दामिनी थी, जिसके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था, जिसे मरा हुआ घोषित कर दिया गया था और जिसका दाहकर्म बड़ी शानो-शौकत से हुआ था? या कोई और लड़की थी जिसका नाम दामिनी था? जिसके साथ वैसा ही हादसा हुआ था मगर मरने की नौबत नहीं आई थी? यह वह दामिनी नहीं थी जिसे सब मरा हुआ मान रहे थे, मगर जो मरी न होकर जिन्दा थी? कतई नहीं थी, इसका सबूत कोई उसे ला देता तो वह निजात पा जाता चक्रवात से.
राघवन दामिनी का सच जानने के लिए उसकी कामवाली को पूरी बात पता लगाने को कहता है – ‘एक काम करो मेरा रत्नाबाई.’ वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, ‘मैं तुम्हारे पांव पड़ता हूं. तुम एक काम कर दो मेरा.‘ ‘क्या?’ तुम बहुत नाक घुसेड़ू किस्म की औरत हो. हर के फटे में पांव डालती हो. हर चीज सूंघ लेती हो. सब जगह बात से बात निकालती हो. किसी तरह भी पता लगाओ, सबूत लाओ कि ये दामिनी है कि नहीं है.’
वह लड़की दामिनी है या नहीं यह जानने की स्वाभाविक जिज्ञासा तो समझ में आती है लेकिन यह जानने के लिए किसी के हाथ जोड़ना और पैर पड़ना बेहद अव्यावहारिक और अटपटा है. यह बात कहानी में आपको बुरी तरह खटकती है.
यह पूरी कहानी कहीं खुद को यथार्थ के करीब लाने के कोशिश करती है तो कहीं बिल्कुल कपोल-कल्पना लगती है. यह कहना सही होगा लेखिका ‘वसु का कुटुम’ में यथार्थ और कल्पना के बीच सही संतुलन नहीं बिठा सकीं. यह बात हैरान करती है कि एक इतनी सधी हुई लेखिका ऐसी कल्पना का सहारा लेती हैं जो थोड़ी भी सहज-स्वाभाविक नहीं लगती. वसु का कुटुम के एक पात्र राघवन को लेखिका अंत तक कन्फ्यूज ही दिखाती हैं सो इसके चलते पाठक भी कन्फ्यूज हो जाते हैं कि लड़की सच में वही दामिनी है जिसका मामला सुर्खियों में आया था या कोई और.
कहानी बहुत जगह अनचाहे झिलाऊ विवरणों से भरी पड़ी है. जो बात सिर्फ पात्रों के माध्यम से कहलवाई जा सकती थी वह लेखिका बार-बार खुद कहती हैं. ‘अब इसको बार-बार क्या दोहराना. आप तो जानते ही हैं अपने दफ्तरों को, सरकारी हों या गैर-सरकारी, उनका यही दस्तूर है. कोई भी काम हो, कह देते हैं, हो जाएगा. यह नहीं कहते कि नहीं होगा, कि आप निराश होकर घर बैठें. यह भी नहीं बतलाते कि कब होगा. जिससे आप एक मुकरर्र दिन, वहां पहुंचकर काम होने की पक्की तस्दीक कर सकें. बस कहते रहते हैं कि हो जाएगा.’ ऐसे ढेरों जबरदस्ती के विवरण इस कहानी में हैं जिनके कारण कहानी को पूरा पढ़ना और भी ज्यादा भारी लगता है.
कहानी में एक जगह राघवन रत्नाबाई से कहता है कि जिस स्त्री के साथ इतना अत्याचार हुआ हो, वह इतनी बेखौफ और जीवट होकर कैसे जी सकती है? इसके जवाब में रत्नाबाई कहती है ‘भइया, जिसे मार-मूरकर गेर दिया जावे, उसे किसी का डर नहीं रहता और वो बहुत जीवट हो जाती है.’ यह एक पंक्ति इस कहानी के लिए महान संभावना पैदा करती है. पूरी कहानी को पढ़कर ऐसा लगता है कि इस विचार के इर्द-गिर्द यदि यह पूरी कहानी रची जाती तो बहुत ही अलग और सशक्त बन पड़ती. तब इस कहानी में यह दिखाया जा सकता था कि वह दामिनी जब बिना अपनी पहचान छिपाए जीती है, तब उसे समाज कैसे-कैसे प्रताड़ित करता है? मोमबत्ती लेकर जुलूस निकालने वाला समाज व्यवहार में ऐसी ब्लात्कृत पीड़िताओं के प्रति कितना विनम्र और सहयोगी होता है, इसकी भी पोल खोली जाती. साथ ही मीडिया और एनजीओ कैसे ऐसी खबरों को अपने लिए कैश करते हैं यह बात उस कहानी में भी आसानी से दिखाई जा सकती थी. हालांकि यह लेखक का ही निर्णय होता कि वह अपनी कहानी में किस विचार को तवज्जो दे किसे नहीं.
कुल मिलाकर वसु का कुटुम एक ऐसी कहानी है जिसकी नायिका के बारे में लेखिका खुद बहुत स्पष्ट नहीं है. ऐसा होता तो इतनी अच्छी थीम से शुरू हुई कहानी कहीं ज्यादा सशक्त तरीके से बुनी जा सकती थी.
किताब : वसु का कुटुम
लेखिका : मृदुला गर्ग
प्रकाशक : राजकमल
मूल्य : 125 रुपये

सरकार भले न माने लेकिन ‘दो निशान, दो विधान और दो प्रधान’ नगालैंड में खुला रहस्य है

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पिछले साल तीन अगस्त को भारत सरकार और नगालैंड के सबसे प्रभावशाली विद्रोही गुट नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-आईएम) के बीच एक समझौता हुआ था. पहले इसे शांति समझौता (पीस एकॉर्ड) कहा जा रहा था लेकिन बाद में ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ नाम दिया गया. इसका मोटा-मोटा मतलब था कि दोनों पक्षों ने बातचीत और संभावित शांति समझौते की एक रूपरेखा पर सहमति जता दी है.
इस समझौते से जुड़ी शर्तें अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई हैं लेकिन एक मुद्दे पर यह समझौता भारी विवादों में है. पिछले दिनों कुछ समाचार वेबसाइटों और सोशल मीडिया साइटों पर खबर आई थी कि भारत सरकार ने एनएससीएन-आईएम की नगा लोगों के लिए अलग झंडे और पासपोर्ट की मांग मान ली है. नरेंद्र मोदी सरकार ने नगालैंड में शांति स्थापित करने की दिशा में इसे ऐतिहासिक समझौता करार दिया था लेकिन इन खबरों के बाद सरकार लगातार निशाने पर है.
भाजपा के लिए यह दोहरी मुसीबत है. वह खुद और उसका पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्याम प्रसाद मुखर्जी को आदर्श मानते हैं जिन्होंने कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’ का नारा दिया था. जबकि इसबार खुद उसकी सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि उसने नगालैंड के लिए यह मांग मंजूर कर ली है.
फिलहाल भारत सरकार ने इस खबर का खंडन किया है. केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू का कहना है कि अभी नगा संगठन से बातचीत चल रही है और अलग झंडे व पासपोर्ट की खबर सही नहीं है. अलग झंडे और पासपोर्ट का सीधा अर्थ है कि संबंधित भूभाग पर दूसरी सरकार है. केंद्र में किसी अन्य पार्टी की सरकार के लिए भी यह काफी मुश्किल होता और भाजपा के लिए तो यह मांग मानना तकरीबन असंभव ही है. लेकिन इस पूरे विवाद का एक अलग लेकिन सबसे दिलचस्प पहलू है कि नगालैंड में आज भी दो सरकारें चलती हैं. यहां दो झंडे हैं और नियम-कानून भी अलग-अलग हैं.
दीमापुर नगालैंड की व्यवसायिक राजधानी है. इससे तकरीबन 40 किमी दूर जंगल के बीच पहाड़ी पर एक विशाल परिसर में कई आवासीय इकाइयां बनी हुई हैं और यही कैंप हेब्रॉन कहलाता है. यह एनएससीएन-आईएम का केंद्रीय मुख्यालय (सीएचक्यू) और गवर्नमेंट ऑफ पीपल्स रिपब्लिक ऑफ नगालिम (जीपीआरएन) का भी मुख्यालय है. जीपीआरएम नगालैंड की स्वघोषित सरकार है. एनएससीएन-आईएम की स्थापना इसाक चिसी स्वू और थ्युंगालेंग मुइवा ने की थी. इसाक संगठन के चेयरमैन और सरकार में राष्ट्रपति हैं और संगठन के महासचिव मुइवा प्रधानमंत्री.
1995 में जब पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे तब केंद्र सरकार सभी विद्रोही नगा गुटों को बातचीत की टेबल पर लाने पर सफल हुई थी. फिर 1997 में एनएससीएन-आईएम ने भारत सरकार के साथ संघर्ष विराम समझौता कर लिया. इस गुट ने मांग की थी कि जब तक संघर्ष विराम लागू है केंद्र सरकार विद्रोहियों को रहने के लिए सुरक्षित जगह उपलब्ध कराए. इसी प्रक्रिया के तहत हेब्रॉन में विद्रोहियों के लिए शिविर या कैंप बनाए गए. लेकिन इन दो दशकों में दोनों पक्षों के बीच स्थायी संधि नहीं हो पाई और संघर्ष विराम लंबा खिंचता रहा. इस बीच कैंप हेब्रॉन के परिसर का विस्तार होता गया.
आज की तारीख में कैंप हेब्रॉन आकार या भव्यता में न सही लेकिन संरचना में एक संप्रभु राष्ट्र के मुख्यालय से कम नहीं लगता. स्क्रोल डॉट इन की एक रिपोर्ट के मुताबिक परिसर के भीतर जीपीआरएन के तमाम सरकारी विभागों के कार्यालय हैं. यहां कृषि मंत्रालय से लेकर पर्यावरण और वित्त मंत्रालय भी हैं. इस वित्त मंत्रालय के पास नगालैंड में कर वसूलने के लिए एक व्यवस्थित ढांचा भी मौजूद है और सिर्फ नगालैंड ही नहीं है पड़ोसी राज्यों के नगाबहुल इलाकों के नागरिकों से भी कर वसूला जाता है. यहां भी वित्त मंत्री सालाना बजट पेश करते हैं. फ्रंटलाइन की एक रिपोर्ट जीपीआरएन के एक अधिकारी के हवाले से जानकारी देती है कि इस सरकार का बजट भी करोड़ों रुपये का होता है. हर मंत्रालय के लिए एनएससीएन ने एक-एक मंत्री नियुक्त किया है. जीपीआरएन के संचालन की गंभीरता इससे भी समझी जा सकती है कि भारत सरकार से बातचीत की जिम्मेदारी इसके गृमंत्रालय को सौंपी गई है.
कैंप हेब्रॉन के सबसे भीतरी हिस्से में नगा सेना का मुख्यालय (जीएचक्यू) है. यहां हर दिन नए रंगरूटों के प्रशिक्षण का काम चलता है. एक अंग्रेजी मैंगजीन की रिपोर्ट बताती है कि जीएचक्यू की तुलना भारतीय सेना की किसी भी छावनी से की जा सकती है. यहां 30 से ज्यादा रसोईघर हैं इसके साथ ही दर्जनों डाइनिंग हॉल हैं.
पिछले दिनों नगा सरकार के ‘लोकनिर्माण विभाग’ ने यहां एक बड़ी इमारत भी बनाई है. यह तातार होहो यानी जीपीआरएन की ‘संसद’ है. इस ‘संसद’ में नगाओं की अलग-अलग जनजातियों की तरफ से नामित और कुछ चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं. इन्हें तातार कहा जाता है. मंत्रियों और उपमंत्रियों की परिषद – ‘किलोनसेर्स’, विभिन्न विभागों के सचिव और प्रमुख और इनके साथ सेना के कमांडर संसद के सदस्य होते हैं.
एनएससीएन-आईएम गुट हर साल 14 अगस्त को ‘वृहत्तर नगालैंड’ या जिसे वह नगालिम कहता है, का स्वतंत्रता दिवस मनाता है. नगालैंड के पहले और मूल विद्रोही गुट नगा नेशनल काउंसिल (एनएससी) ने 14 अगस्त, 1947 को नगालैंड की आजादी की घोषणा की थी. भारत सरकार ने इसे खारिज कर दिया था लेकिन तब से हर साल 14 अगस्त को हेब्रॉन में ‘स्वतंत्रता’ दिवस कार्यक्रम मनाया जाता है. पिछले साल तक यहां नगालिम का एक अलग झंडा फहराया जाता रहा है. हेब्रॉन में मुख्य कार्यक्रम होता है इसके अलावा नगालैंड की राजधानी कोहिमा सहित सभी शहरों कस्बों में इस दिन नगालिम का झंडा फहराया जाता है.
जीपीआरएन ने इन सालों में अपनी एक औपचारिक न्याय प्रणाली भी बना ली है जिसमें परंपरागत कानूनों के हिसाब से फैसले सुनाए जाते हैं. फ्रंटलाइन की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसके सबसे निचले पायदान पर ग्राम अदालतें हैं. अलग-अलग जनजातीय क्षेत्रों में क्षेत्रीय अदालतें मौजूद हैं. इसी रिपोर्ट में जीपीआरएन के कर्मचारी दावा करते हैं कि ज्यादातर नगा आबादी भारतीय अदालतों के बजाय इन अदालतों पर भरोसा करती है.
नगालैंड की इन परिस्थितियों के बीच सवाल उठता है कि वहां चुनी हुई सरकार राज्य में एक समानांतर सत्ता क्यों चलने दे रही है? इस सवाल का सीधा जवाब यही है कि एनएससीएन-आईएम समानांतर सत्ता चलाने लायक ताकत रखता है. इस समय नगालैंड में नगा पीपल्स फ्रंट (एनपीएफ) की सरकार है और माना जाता है कि इसे विद्रोही गुट अप्रत्यक्षरूप से समर्थन देता है. एनपीएफ की स्थापना नेफियो रियो ने 2002 में की थी. इससे पहले वे कांग्रेस में थे. एनपीएफ कुछ सहयोगी दलों जिनमें भाजपा भी शामिल है, के साथ 2003 से ही नगालैंड में सत्ता में है. उसने कांग्रेस को बेदखल कर पहली बार सरकार बनाई थी.
राज्य में कांग्रेस एनएससीएन-आईएम की विरोधी पार्टी रही है लेकिन इस गुट का इतना प्रभाव है कि निजी स्तर पर कई कांग्रेस नेता उसी के समर्थन से चुनाव जीतते हैं. वहीं दूसरी तरफ एनपीएफ को तो गुट का समर्थन हासिल ही है. जाहिर है कि ऐसे में एनएससीएन की समानांतर सरकार को चुनी हुई सरकार चुनौती नहीं देगी.
इस राज्य में वैसे तो सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून लागू है पर एनएससीएन-आईएम केंद्र सरकार के साथ संघर्ष विराम की स्थिति में है. इसलिए यहां केंद्रीय सुरक्षाबल यथास्थिति बनाए रखते हुए विद्रोही गुट के लड़ाकों पर तब तक सीधे कार्रवाई नहीं करते जबतक कि वे किसी हिंसक संघर्ष की वजह न बन रहे हों.
पिछले साल भारत सरकार के साथ समझौते के बाद 14 अगस्त को हेब्रॉन में एनएससीन-आईएम ने ‘नगालिम’ का स्वतंत्रता दिवस मनाया था. इस दिन फिर से नगालैंड में जगह-जगह नगालिम के झंडे फहराए गए. तब कहा जा रहा था कि यह नगालिम का अंतिम स्वतंत्रता दिवस हो सकता है क्योंकि इसके बाद जल्दी ही शांति समझौता अंतिम रूप ले लेगा. फिलहाल एक साल के बाद भी इस दिशा में दोनों पक्षों के बीच मतभेद दिखाई दे रहे हैं और पूरी संभावना है कि इसबार फिर 14 अगस्त को हेब्रॉन में नगालिम का झंडा फहराया जाए.

दादर स्थित अंबेडकर भवन को गिराने के मामले ने पकड़ा तूल

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मुंबई: मुंबई के दादर इलाके में बने अंबेडकर भवन के बड़े हिस्से पर शुक्रवार देर रात हथौड़ा चलाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। डॉ. भीमराव अंबेडकर के पोते प्रकाश और आनंद राज की तहरीर पर भोईवाड़ा पुलिस ने पीपुल्स इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के खिलाफ मामले में शिकायत दर्ज कर ली है।
1930 से दादर में बनी ईंट-पत्थर की इमारत से बाबासाहेब गुलामी के खिलाफ सियासी सफहे भरते थे, इसी इमारत में कभी बाबासाहेब का पुस्तकालय था। यहां रखी प्रिटिंग प्रेस से उनकी कलम छपकर जाति व्यवस्था से लड़ती थी। लेकिन रात के अंधेरे में इसे तोड़ दिया गया। बाबासाहेब के परिजन इस तोड़-फोड़ के लिये पीपुल्स इंप्रूवमेंट ट्रस्ट को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं, उनके खिलाफ थाने में एफआईआर भी दर्ज करवाई गई है।
भोईवाड़ा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने वाले बाबासाहेब के पोते प्रकाश अंबेडकर ने कहा, ‘ऐतिहासिक प्रिंटिग प्रेस को बर्बाद कर दिया, ये लोग ट्रस्टी नहीं हैं, इनकी ट्रस्टीशिप को चैरिटी कमिश्नर ने मान्यता भी नहीं दी है, ये सिर्फ ज़मीन के कारोबारी इस्तेमाल के लिये ऐसा कर रहे हैं।’ हालांकि ट्रस्ट के लोग सारे आरोपों को खारिज कर रहे हैं। पीपुल्स इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के ट्रस्टी श्रीकांत गवरे ने कहा, ‘मैं 2001 से ट्रस्टी हूं, प्रेस ट्रस्ट का है, सिर्फ प्रेस में रखी मशीनें परिवार की हैं, जमीन पर बाबासाहेब का स्मारक बनेगा जिससे समाज का फायदा हो, हमारे खिलाफ लगाए गए आरोप गलत हैं।’
मुंबई महानगरपालिका ने बिल्डिंग को जर्जर की श्रेणी में रखा था, लेकिन उसने कहा है कि उसके कर्मचारी इसे तोड़ने में शामिल नहीं थे। वहीं ट्रस्ट चाहता है कि पार्किंग और सारी सुविधाओं से युक्त इस जगह पर 17 मंजिला नई इमारत बनाई जाए।

यूपी में अखिलेश मंत्रिमंडल का विस्तार, पांच मंत्री शामिल, एक मंत्री की छुट्टी

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोमवार को अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया। मंत्रिमंडल में विस्तार से पहले ही अखिलेश यादव ने राज्य के साइंस और टेक्नोलॉजी मंत्री मनोज पांडे को हटा दिया है। आज पांच नए मंत्री शामिल किए गए हैं। इनमें बलराम यादव, रविदास मेहरोत्रा, शारदा प्रताप शुक्ला, ज़ियाउद्दीन रिज़वी और नाराद राय का नाम शामिल हैं।।
इससे पूर्व अखिलेश यादव की जिद की वजह से कौमी एकता दल (कौएद) का समाजवादी पार्टी (सपा) में विलय आखिरकार रद्द हो गया था। पार्टी कार्यालय में हुई संसदीय बोर्ड की बैठक में तय हुआ कि सपा में कौएद का विलय नहीं होगा। बर्खास्त किए गए मंत्री बलराम यादव की अखिलेश कैबिनेट में वापसी हुई है। बैठक के पहले ही अखिलेश यादव ने इसके संकेत दे दिए थे। उन्होंने कहा था, “मुख्तार अंसारी जैसे लोगों का हमारी पार्टी में स्वागत नहीं हो सकता।”
सपा महासचिव प्रोफेसर रामगोपाल यादव ने कहा कि सपा में कौमी एकता दल का विलय नहीं होगा। पार्टी से बर्खास्त मंत्री बलराम यादव की मंत्रिमंडल में वापसी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि अखिलेश यादव यूपी में समाजवादी रथयात्रा निकालेंगे।
गौरतलब है कि मुख्तार की पार्टी कौमी एकता दल का सपा में विलय हुआ। इस विलय से अखिलेश खासे नाराज थे। नाराजगी की वजह से ही उन्होंने बलराम यादव को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया था। बाद में शिवपाल सिंह यादव का हालांकि बयान आया था कि अंसारी बंधुओं का विलय पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के कहने पर हुआ है। लिहाजा, यह पार्टी का फैसला है। इसे सबको मानना पड़ेगा।

MTCR में शामिल हुआ भारत, चीन और पाकिस्‍तान अब हो गए मिसाइल की ताकत में हमसे पीछे

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परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में शामिल होने से वंचित रहने के तीन दिन बाद आज सोमवार को भारत मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) का सदस्य बन जाएगा। एमटीसीआर दुनिया के चार महत्वपूर्ण परमाणु प्रौद्योगिकी निर्यात करने वाले महत्वपूर्ण देशों के समूह में से एक है।
भारत ने पिछले वर्ष एमटीसीआर की सदस्यता के लिए आवेदन किया था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने इस आशय की जानकारी देते हुए कहा कि एनएसजी पर भारत अपना प्रयास जारी रखेगा।
विदेश सचिव एस जयशंकर सोमवार को फ्रांस, नीदरलैंड और लक्जमबर्ग के राजदूतों की मौजूदगी में इस क्लब में शामिल होने के लिए दस्तावेज पर हस्ताक्षर करेंगे। विकास स्वरूप ने एनएसजी की सदस्यता न मिलने को असफलता मानने से इनकार करते हुए कहा कि इस मामले में हमें अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।
एकमात्र देश ने भारत की सदस्यता के दावे का विरोध किया था। गौरतलब है कि परमाणु प्रौद्योगिकी निर्यात करने वाले समूहों में भारत के शामिल होने की इच्छा वर्षों पुरानी है। इस क्रम में भारत ने एमटीसीआर और एनएसजी के लिए जोर लगाया था।
भविष्य में उसका इरादा इससे संबंधित दो अन्य समूहों ऑस्ट्रेलियन ग्रुप और वास्सेनार एग्रीमेंट में शामिल होने की है। एनएसजी में हालांकि भारत चीन के विरोध की दीवार नहीं लांघ पाया।
मगर एमटीसीआर में अंत समय में इटली का विरोध छोड़ने के बाद भारत का रास्ता साफ हो गया। स्वरूप ने बताया कि सोमवार को भारत एमटीसीआर का पूर्ण रूप से सदस्य बन जाएगा। उन्होंने कहा कि एनएसजी मामले में भारत की पाकिस्तान से तुलना कहीं से उचित नहीं है।
एमटीसीआर का सदस्य बनने से भारत को प्रमुख उत्पादनकर्ताओं से अत्याधुनिक मिसाइल टेक्नोलॉजी और निगरानी प्रणाली खरीद में मदद मिलेगी, जिसे केवल एमटीसीआर सदस्य देशों को ही खरीदने की इजाजत है। सदस्य होने के बाद भारत पर लगा अंकुश हट जाएगा।
भारत के लिए अमेरिका से ड्रोन तकनीकी लेना सरल हो जाएगा। साथ ही भारत मिसाइल तकनीकी का निर्यात कर सकेगा। हेग आचार संहिता में शामिल होने को मजबूती मिलेगी।
यह संहिता बैलेस्टिक मिसाइल अप्रसार संधि की निगरानी करती है। इसके साथ ही रूस के साथ संयुक्त उपक्रम को बल मिलेगा।
एमटीसीआर का उद्देश्य मिसाइलों के प्रसार को प्रतिबंधित करना, रॉकेट सिस्टम को पूरा करने के अलावा मानव रहित जंगी जहाजों पर 500 किलोग्राम भार के प्रक्षेपास्त्र को 300 किलोमीटर तक ले जाने की क्षमता वाली तकनीक को बढ़ावा देना है। व्यापक विनाश वाले हथियारों और तकनीक पर पाबंदी लगाना इस समूह का उद्देश्य है।

ब्रेक्जिट के बाद लेबर पार्टी संकट में : मुखिया कोर्बीन को लेकर हो रही है बगावत

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लंदन: जेरेमी कोर्बीन के अपने विदेश मंत्री को बर्खास्त कर देने और इसके बाद भारतीय मूल की एक मंत्री सहित शैडो कैबिनेट (समानांतर मंत्रिमंडल) के अन्य वरिष्ठ सदस्यों के इस्तीफा देने से ब्रिटेन की विपक्षी लेबर पार्टी को आज बगावत का सामना करना पड़ा। यूरोपीय संघ (ईयू) के जनमत संग्रह से ढुलमुल तरीके से अपने दिग्गज नेता के निबटने पर पार्टी में यह मतभेद उभर कर आया है।
हिलेरी बेन को विदेश मंत्री पद से बर्खास्त किए जाने के बाद वित्त विभाग की मुख्य शैडो मंत्री सीमा मल्होत्रा कोर्बीन के खिलाफ बगावत करने वाले अपने सात सहकर्मियों की फेहरिस्त में शामिल हो गई हैं। कोर्बीन के मंत्रालय में भरोसा नहीं रह जाने की बात कहने के बाद शैडो विदेश मंत्री हिलेरी बेन को बर्खास्त कर दिया गया। इसके शीघ्र बाद उनके सहकर्मी शैडो स्वास्थ्य मंत्री हेइदी एलेक्जेंडर ने ट्विटर पर अपने इस्तीफे की घोषणा की। इस्तीफा देने वाले अगले मंत्री ग्लोरिया डे पीयरो थे जो युवा मामलों और मतदाता पंजीकरण के शैडो मंत्री थे। साथ ही, स्कॉटलैंड के लिए शैडो मंत्री इयान मर्ररे ने भी इस्तीफा दे दिया। मल्होत्रा के इस्तीफा देने के शीघ्र बाद शैडो परिवहन मंत्री लिलियन ग्रीनवुड, शिक्षा मंत्री लुसी पॉवेल और पर्यावरण, खाद्यान्न एवं ग्रामीण मामलों के प्रभारी केरी मैककार्थी ने भी इस्तीफा दे दिया। कोर्बीन के शैडो कैबिनेट के अन्य सदस्यों के भी इसी तर्ज पर चलने की उम्मीद है क्योंकि कई लेबर सांसद ब्रिटेन के ईयू पर जनमत संग्रह से निपटने के तरीके पर कोर्बीन की आलोचना कर रहे हैं।
28 सदस्यीय यूरोपीय संघ से बाहर होने का देश को स्तब्ध कर देने वाला फैसला कई लेबर सांसदों की इच्छा के खिलाफ है। बेन ने कहा, ‘‘यदि जेरेमी नेता बने रहते हैं तो अगला चुनाव जीतने का कोई भरोसा नहीं है। जेरेमी को एक फोन कॉल में मैंने उनसे कहा कि मैंने पार्टी का नेतृत्व करने की उनकी क्षमता पर भरोसा खो दिया है और उन्होंने मुझे बर्खास्त कर दिया।’’
खबरों के मुताबिक यदि कोर्बीन अविश्वास प्रस्ताव की अनदेखी करते हैं तो इस स्थिति में बेन शैडो मंत्रियों को इस्तीफा देने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। बेन ने पार्टी नेतृत्व के लिए खुद के आगे आने की महत्वाकांक्षा से इनकार करते हुए बीबीसी से कहा कि ईयू जनमतसंग्रह नतीजे के बाद हमारे देश की इस बेहद नाजुक घड़ी में लेबर पार्टी को सरकार को जवाबदेह ठहराने के लिए पार्टी को मजबूत और प्रभावी नेतृत्व की जरूरत है। फिलहाल हमारे पास वह नहीं है और इस पर भरोसा नहीं है कि जेरेमी के नेता रहते हम आम चुनाव जीत पाने में सक्षम होंगे। 67 वर्षीय कोर्बीन अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर रहे हैं ।
ब्रेग्जिट के पक्ष में जनमत संग्रह आने के बाद लेबर सांसद डेम मार्गरेट हॉज और एन कोफी ने संसदीय लेबर पार्टी (पीएलपी) के अध्यक्ष जॉन क्रेयर को अविश्वास प्रस्ताव का एक नोटिस सौंपा। प्रस्ताव में कोई संवैधानिक शक्ति नहीं है लेकिन उसमें कल पीएलपी की अगली बैठक में चर्चा की मांग की गयी है। अध्यक्ष इस पर फैसला करेंगे कि इस पर चर्चा हो या नहीं। यदि यह स्वीकार हो जाता है तो मंगलवार को लेबर सांसदों का एक गुप्त मतदान हो सकता है।

अब सलमान करेंगे सारे गायकों की छुट्टी!

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सलमान खान का गायकों से पंगा पुराना है. न सिर्फ अरिजीत सिंह बल्कि सोनू निगम से भी उनके रिश्ते अब ठीक नहीं रहे. पिछले साल टी-सीरीज की एक पार्टी में न सिर्फ सलमान ने पब्लिकली यह कहा था कि गायकों को फिल्मी गानों के लिए जरूरत से ज्यादा क्रेडिट दिया जाता है बल्कि पार्टी में मौजूद सोनू निगम के सामने ही यह भी कह दिया कि उनके गानों को किसी सोनू निगम की जरूरत नहीं है, और वे खुद ही इतने अच्छे गायक हैं कि टेक्नोलाजी की थोड़ी सी मदद लेकर अपने गाने खुद गा सकते हैं! बात यहीं खत्म नहीं हुई, और ‘किक’ के लिए पार्श्वगायन करने स्टूडियो आए सोनू निगम से वहां भी सलमान ने ऐसा ही कुछ कहा. कहते हैं कि सोनू निगम इस गलत बात से इतने नाराज हुए कि न सिर्फ अब वे सलमान के लिए गाते नहीं हैं बल्कि जब भी मौका मिलता है पब्लिकली ये भी दर्ज कराते हैं कि कैसे आजकल ऑटोट्यून की गईं आवाजों के भरोसे ही हिंदी गीत चल रहे हैं. वे यह भी कहने से नहीं चूकते कि अच्छे गायकों की असल परीक्षा तो स्टेज पर गाते वक्त होती है.

लेकिन सलमान अपनी बात को लेकर अभी भी सीरियस हैं. खुद को अच्छा गायक साबित करने के लिए और बाकी गायकों की छुट्टी करने के लिए वे पिछले कई महीनों से लगातार गायकी का अभ्यास कर रहे हैं! इसमें उनकी मदद अनु मलिक के भतीजे और आज के हिट कंपोजर अरमान मलिक कर रहे हैं. वे भाई का आदेश आते ही अपने सगे भाई और गायक अमाल मलिक के साथ भाई के पनवेल वाले फार्महाउस पर पहुंच जाते हैं. ताकि भाई की गायकी पर सभी मिलकर काम कर सकें!

‘हीरो’ फिल्म में इन्हीं अरमान मलिक के गीत ‘मैं हूं हीरो तेरा’ को सलमान ने अपनी जिद्द मनवाने के लिए ही खुद गाया था और इसकी तैयारी के लिए न सिर्फ महीनों तक इसके रफ वर्जन को जिम से लेकर अपनी गाड़ी तक में बजवाया बल्कि ऑटोट्यून सॉफ्टवेयर का भी लेटेस्ट वर्जन ही संगीतकार से खरीदवाया! अब वे आगे भी ऐसा ही करके न सिर्फ अच्छे गायकों को हाशिए पर ढकेल देना चाहते हैं बल्कि आपके शब्दकोश में आए ‘कर्कश गायक’ शब्द की परिभाषा भी शायद अपने नाम करवाना चाहते हैं!

क्या ‘सरबजीत’ की दुर्दशा के जिम्मेदार खुद उसके निर्देशक हैं?

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‘सरबजीत’ में जितनी तारीफ रणदीप हुड्डा के अभिनय की हुई उतनी ही बुराई फिल्म के ट्रीटमेंट और ऐश्वर्या से ओवर द टॉप एक्टिंग करवाने के लिए फिल्म के निर्देशक ओमंग कुमार की भी हुई. अब फिल्मी गलियारा इन खबरों की गूंज से पटा हुआ है कि पब्लिक एपीयरेंस, रियलिटी शोज और कान फिल्म फेस्टिवल में शिरकत करने की वजह से ओमंग कुमार ने ‘सरबजीत’ के पोस्ट-प्रोडक्शन पर बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया. फिल्म का फाइनल कट भी उनकी अनुपस्थिति में तैयार हुआ और एडिटिंग से जुड़े ज्यादातर निर्णय उन्होंने फोन पर ही अपने संपादक को दिए. फिल्म की लंबाई को कम करने से लेकर ऐश्वर्या के ओवर द टॉप अभिनय पर ओवर द टॉप ही बैकग्राउंड स्कोर चढ़ाने जैसे फैसले भी उन्होंने चलते-फिरते ही लिए और अपना ज्यादातर वक्त उस वक्त मिल रही लाइमलाइट को एंजॉय करने में खर्च किया. ऐसा ही होता है, जब निर्देशक खुद को ही फिल्म की ऐश्वर्या राय समझने लगता है, तब वो फिल्म पर नहीं सिर्फ अपनी एपीयरेंस पर काम करने लगता है और फिल्म सरबजीत जैसी फ्लॉप हो जाती है.

कहानी ‘गुनाहों का देवता’ उपन्यास पर न बन सकी उस फिल्म की जिसके नायक बच्चन थे

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धर्मवीर भारती के सर्वकालिक महान उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ को पर्दे पर सिर्फ एकबार उतारा गया है और वह भी एक साधारण से सीरियल ‘एक था चंदर एक थी सुधा’ में. यह सीरियल पिछले साल आया था. भारतीय जनमानस पर एक लंबे समय तक इस उपन्यास का जो असर रहा उसे देखते हुए इस बात पर हैरानी होती है कि गुनाहों का देवता पर कोई फिल्म नहीं बनी. किसी महान उपन्यास की ऐसी नाकद्री शायद ही दूसरे देशों के सिनेमा ने अपने साहित्य के साथ की होगी लेकिन हमारे यहां इस उपन्यास पर सिर्फ एक कोशिश के बाद ही फिल्मकारों ने हमेशा के लिए हार मान ली है.

वो पहली और शायद आखिरी कोशिश 1969 में शुरू हुई जब इस उपन्यास पर ‘एक था चंदर एक थी सुधा’ नाम से ही फिल्म बनाने का फैसला लिया गया. उपन्यास का ओरिजनल नाम ‘गुनाहों का देवता’ इस फिल्म के टाइटल के लिए उपयोग नहीं किया जा सका क्योंकि उसी दौरान रिलीज हुई जितेंद्र की एक फिल्म का नाम भी ‘गुनाहों का देवता’ था, हालांकि उस फिल्म का धर्मवीर भारती के उपन्यास से कोई लेना देना नहीं था.

‘एक था चंदर एक थी सुधा’ में नायक का किरदार निभाने के लिए अमिताभ बच्चन को लिया गया और नायिका के लिए रेखा को. यह उस दौर की बात है जब बच्चन फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत फ्लॉप फिल्म से कर चुके थे और इस वजह से इस फिल्म के लिए भी धन जुटाने में निर्माताओं को पसीने छूट रहे थे. फिल्म की शूटिंग कुछ दिनों तक इलाहाबाद में हुई भी और अमिताभ व रेखा के बीच रोमांटिक गीत भी शूट हुए. लेकिन जल्द ही पैसों की तंगी ने फिल्म को डिब्बाबंद करवा दिया.

एक लंबा वक्त गुजरने के बाद 1973 में ‘जंजीर’ आई और बच्चन की बढ़ चुकी मार्केट वेल्यू ने इस फिल्म के दोबारा फ्लोर पर जाने की उम्मीदें बढ़ा दीं. लेकिन इस दौरान बच्चन न सिर्फ दूसरी बड़ी फिल्मों में व्यस्त हो चुके थे बल्कि एंग्री यंग मैन की छवि में भी कैद हो चुके थे. पैसा लगाने वाले सेठों ने ऐसी किसी भी फिल्म पर पैसा लगाने से इंकार कर दिया जो बच्चन की धन कमाकर देने वाली इमेज को भुनाने की नीयत नहीं रखती थी.

इसके बाद ‘गुनाहों का देवता’ के इस फिल्मी संस्करण को बड़ा परदा कभी नसीब नहीं हुआ. कई सालों बाद दक्षिण के एक निर्माता पूर्णचंद्र राव ने डिब्बाबंद ‘एक था चंदर…’ के राइट्स खरीदने के साथ ही अमिताभ बच्चन का फिल्म के लिए किया कांट्रेक्ट भी अपने नाम कर लिया और उस कांट्रेक्ट के सहारे अमिताभ को रजनीकांत की एक फिल्म में छोटी-सी भूमिका ऑफर की. यह भूमिका वक्त के साथ बड़ी होते-होते मुख्य नायक की हो गई और 1983 में अमिताभ बच्चन के हिस्से में रजनीकांत और हेमा मालिनी के साथ वाली मशहूर फिल्म ‘अंधा कानून’ आई.
विडंबना देखिए, एक तरफ तो ‘एक था चंदर…’ 13-14 साल के लंबे इंतजार के बाद भी बन न सकी, वहीं उस फिल्म के डिब्बाबंद होने की वजह से ही अमिताभ बच्चन के हिस्से में ‘अंधा कानून’ नाम की वो फिल्म आई जो अपने समय की बड़ी सफलता कहलाई.

साइना ने फिर किया कमाल, दूसरी बार जीता ऑस्ट्रेलियन ओपन का खिताब

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भारतीय बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल ने चीन की सुन यू को हराकर ऑस्ट्रेलियन ओपन सुपर सीरीज अपने नाम कर ली है। सिडनी में हुए मुकाबले में साइना ने एक घंटे 11 मिनट में ऑस्ट्रेलियन ओपन का खिताब जीता। साइना ने सुन यू को 11-21, 21-14, 21-19 से हराया।

पहले सेट में साइना नेहवाल को 11-21 से हार का सामना करना पड़ा। लेकिन साइना ने जबरदस्त वापसी करते हुए दूसरा सेट 21-14 से और तीसरा सेट 21-19 से जीत लिया। इसके साथ ही साइना ने इस साल का पहला खिताब अपने नाम कर लिया।

इससे पहले साइना ने चीन की ही वांग यिहान को सीधे सेटों में हराकर ऑस्ट्रेलियन ओपन सुपर सीरीज के फाइनल का टिकट कटाया था। सेमीफाइनल में वर्ल्ड नंबर 8 साइना ने वर्ल्ड नंबर 2 यिहान को 21-8, 21-12 से हराया। यह ऑस्ट्रेलियाई ओपन में साइना की दूसरी खिताबी जीत है इससे पहले 2014 में भी यहां खिताबी जीत दर्ज की थी। इस सत्र के पहले खिताब के साथ साइना ने 7.5 लाख डॉलर ईनामी राशि भी जीती।