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4 दर्जन से भी ज्यादा लोग हैं टीम इंडिया के कोच के दावेदार

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मार्च-अप्रैल में भारत में खत्म हुए टी-20 वर्ल्ड कप के बाद टीम डायरेक्टर के रुप में रवि शास्त्री का कार्यकाल खत्म होने के बाद से टीम इंडिया में कोच का पद खाली है। अगले महीने जुलाई में टीम के वेस्टइंडीज जाने से पहले बोर्ड चाहता है कि नए कोच का चुनाव कर लिया जाए।

बोर्ड ने इसी सिलसिले में पहली जून को अपनी वेबसाइट पर नए कोच के लिए आवेदन मांगे थे और इसके लिए आवेदन करने के वास्ते 10 जून तक का समय दिया था।

अब कोच पद के लिए टीम इंडिया के पूर्व डायरेक्टर रवि शास्त्री और चयन समिति प्रमुख संदीप पाटिल सहित 57 लोगों ने मुख्य प्रशिक्षक पद के लिए आवेदन कर डाला है। आवेदन करने की अंतिम तिथि 10 जून थी।

बीसीसीआई ने एक बयान के जरिए इस बात की जानकारी दी है। हालांकि उसने आवेदन करने वालों के नामों की कोई जानकारी नहीं दी है। बीसीसीआई सचिव का कार्यालय अब इन आवेदनों को खंगालेगा और जो लोग जरूरी मापदंडों पर खरे उतरेंगे उनके नामों को आगे बढ़ाया जाएगा।

शास्त्री और पाटिल के अलावा जो अन्य प्रमुख नाम चल रहे हैं उनमें पूर्व तेज गेंदबाज वेंकटेश प्रसाद, बलविंदर सिंह संधू और पूर्व बल्लेबाज ऋषिकेश कानितकर शामिल हैं।

शास्त्री ग्रुप के सपोर्ट स्टाफ भरत अरुण, आर श्रीधर और संजय बांगड़ ने मुख्य प्रशिक्षक पद के लिए आवेदन नहीं किया है और संभवत: वे उस दूसरे दौर का इंतजार कर रहे जब बीसीसीआई बल्लेबाजी, गेंदबाजी और क्षेत्ररक्षण के लिए स्पेशलिस्ट कोच के लिए भर्ती करेगा।

जहां तक विदेशी नामों में सबसे बड़े नामों का सवाल है तो उसमें ऑस्ट्रेलिया से एक बड़ा नाम आ रहा था। मीडिया रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि ऑस्ट्रेलिया के पूर्व तेज गेंदबाज और इंग्लिश काउंटी में यॉर्कशायर के कोच जेसन गिलेस्पी ने भी इस पद के लिए आवेदन किया है। हालांकि गिलेस्पी ने इससे इंकार किया है।

ऑस्ट्रेलिया के ही एक अन्य पूर्व क्रिकेटर स्टुअर्ट लॉ जो जुलाई 2011 से लेकर जून 2012 तक बांग्लादेश के कोच रहे हैं ने भी टीम इंडिया का कोच बनने की इच्छा जताई है।

बीसीसीआई के सचिव अजय शिर्के 57 आवेदनकर्ताओं में से नाम छांटने के बाद क्रिकेट की एडवाइजरी पैनल के पास संशोधित नाम भेजेंगे। जुलाई में भारतीय टीम के कैरेबियाई दौरे से रवाना पहले से फाइनल निर्णय लिए जाने की खबर है।

वो देश, जहां फिल्मों को सेंसर करना है संविधान के खिलाफ

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अभिषेक चौबे की फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ को सेंसर किए जाने से जुड़ा विवाद एक मौका है जब फिल्मों और टीवी को सेंसर करने की स्वस्थ परंपराओं की शुरुआत की जा सकती है। इस जाँच की कसौटी को बनाने में अमरीका और यूरोप में फिल्मों की सेंसरशिप पर एक नजर डालने से मदद मिल सकती है। वैसे भारत में सेंसर को लेकर दोहरी दिक्कत है।

एक फिल्म सेंसर बोर्ड तो है ही जो प्रदर्शन से पहले हर फिल्म को देख कर उसे सार्वजनिक प्रसारण के लिए उपयुक्त या अनुपयुक्त करार देता है तो दूसरी ओर ऐसी घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं जब सेंसर का प्रमाणपत्र हासिल करने वाली फिल्मों का प्रदर्शन राजनीतिक या धार्मिक संगठनों के कार्यकर्ता स्थानीय स्तर पर रोक देते है।

सेंसर का तरीका बदलने से इस समस्या से निजात मिल सकती है। साठ के दशक तक पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में सेंसरशिप के नियम भारत की ही तरह कड़े थे। अमरीका में साठ के दशक में सेंसर की पाबंदियाँ नरम की गईं। ब्रिटेन, फ्रांस और स्पेन में साठ के दशक के मध्य से पहले ये कानून उदार नहीं थे।

आज काफी उदार कानूनों के बावजूद सेंसरशिप दूसरे रास्तों से अपना हस्तक्षेप करती रहती है। अपनी कठोर सेक्युलर संस्कृति के लिए चर्चित फ्रांस जैसे देश में भी मार्टिन स्कोरसीज़ की 1988 में प्रदर्शित फिल्म ‘दि लास्ट टेम्पटेशन ऑफ क्राइस्ट’ को कई शहरों के मेयरों ने प्रदर्शित नहीं होने दिया था। इसके पीछे वहाँ की प्रभावशाली कैथॅलिक लॉबी थी।

लेकिन यह एक अपवाद है। आज अमरीकी और यूरोपीय फिल्मों के लिए सेक्स, सेक्शुएलिटी और नग्नता का चित्रण अपने-आप में कोई बेचैन कर देने वाली समस्या नही है। इन फिल्मों में मैथुन के दृश्य भी आमतौर से दिखाए जाते है। लेकिन भारतीय फिल्मों में चुम्बन दिखाने को लेकर भी काफी बहस होती रही है।

इसी तरह हिंसा का मसला है। पश्चिमी फिल्मों में भीषण हिंसा और रक्तपात का चित्रण रोजमर्रा की जिदगी को दिखाता है, पर भारतीय पर्दे पर दिखाई जाने वाली मारपीट में घूँसों की आवाज तो खूब आती है, पर उसकी तुलना में न तो हड्डी टूटती है और न ही खून निकलता है।

इसी भारतीय रवैये के कारण यूरोप के कला सिनेमा के प्रभाव में बनी कला फिल्मों ने अपनी विषय-वस्तुओं से सामान्यतया सेक्स को दूर रखा जबकि फ्रांस और जर्मनी में बनी कला फिल्मों का एक मुख्य लक्षण सेक्स और सेंशुलिटी का चित्रण भी था।

अमरीका में तो इन फिल्मों का लोकप्रिय बाजार सेक्स सिनेमा के तौर पर ही तैयार हुआ था। खास बात यह है कि सेक्स का बिना संकोच इस्तेमाल करने वाली यूरोप की कला फिल्मों में वहाँ की सरकारों का पैसा लगा था।

अब तो स्थिति यह है कि अमरीका और जर्मनी में फिल्मों को सेंसर करना संविधान के खिलाफ माना जाता है। हॉलीवुड की फिल्मों पर ‘मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एंड डिस्ट्रीयूटर्स ऑफ अमेरिका’ नामक संस्था नजर रखती है जो सरकारी न हो कर फिल्म व्यवसाय द्वारा ही 1922 में बनाई गई थी।

23 साल तक इसके अध्यक्ष रहे विलियम एच हेज़ के नाम पर इसे हेज कोड के नाम से भी जाना जाता है। हेज की मान्यता थी कि अगर हॉलीवुड संघीय सरकार के हस्तक्षेप से खुद को बचाना चाहता है तो उसे खुद को सेंसर करने की कोशिश करनी चाहिए।

शुरुआत में यह काम हेज कोड ने किया। पर तीस के दशक में अपराध जगत और गिरोहबाजो को केंद्र में रख कर बनी फिल्म की आलोचना की प्रतिक्रिया में एक फिल्म निर्माण संहिता जारी की गई। इसका पालन करना सभी फिल्म कंपनियों के लिए जरूरी था।

1968 में इसकी जगह ‘मोशन पिक्चर्स एसोसिएशन ऑफ अमेरिका’ (एमपीएए) ने एक रेटिंग सिस्टम लागू किया जो आज तक सफलतापूर्वक साथ काम कर रहा है। हम कई गलत बातों के लिए पश्चिम और अमरीका की तरफ देखते है। अगर अमरीका से कुछ सीखना ही है, तो ये सीखना चाहिए कि उनका फिल्म उद्योग बिना सरकारी हस्तक्षेप के खुद को कैसे सेंसर करता है। जो हॉलीवुड में होता है, वह बॉलीवुड में भी हो सकता है।

ग्लेशियर सिकुड़ने से नहीं सूखेंगी नदियां

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ग्लेशियरों के सिकुड़ने या पिघलने से नदियों में पानी खत्म नहीं होगा। उच्च हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों से गंगा व ब्रह्मपुत्र बेसिन में आने वाले पानी का अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि ग्लेशियरों के सिकुड़ने से नदियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

अध्ययन के मुताबिक हिमालय की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए कम से कम इस शताब्दी में तो नदियों में पानी की मात्रा पर कोई अंतर नहीं आने वाला। पर्यावरण से जुड़े कुछ संगठन अक्सर यह आशंका जताते रहे हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से सिकुड़ रहे ग्लेशियरों के कारण नदियों में पानी खत्म हो जाएगा।

स्विट्जरलैंड के वैज्ञानिक डब्ल्यूडब्ल्यू इमरजील, एफ पिकोटी और एमएफपी ब्रिकेंस ने हिमालय क्षेत्र में इस बाबत अध्ययन किया। उच्च हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों से ब्रह्मपुत्र और गंगा में आने वाले पानी की मात्रा जांची गई। पाया गया गया कि नदियों में ग्लेशियर का सिर्फ 10 फीसदी पानी ही होता है। नदियों में बाकी पानी बारिश और भूगर्भ जलस्रोतों से आता है।

वैज्ञानिकों की मानें तो जलवायु परिवर्तन से बारिश के समय में तो बदलाव आया है लेकिन वर्षा जल की मात्रा में कोई कमी नहीं आई है। उनका कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग से पहले रिमझिम बारिश कई दिनों तक चलती थी, लेकिन अब एक ही समय में इकट्ठी बारिश हो जा रही है।

हिमालय क्षेत्र में अब बर्फबारी के बाद बर्फ जल्द पिघल जाती है, जिससे ग्लेशियरों को नुकसान हो रहा है। अगर ग्लेशियर से पिघल कर आने वाला पानी बहुत कम हो जाएगा तो भी बारिश से नदियों को पर्याप्त जल मिलता रहेगा। देश के वैज्ञानिक भी यही बात कहते आए हैं।

CM हरीश रावत सोशल मीडिया पर कर रहे शिकायतों का समाधान

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अब मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी सोशल मीडिया को लोगों की समस्याओं के समाधान के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।

पहली बार रविवार को मुख्यमंत्री हरीश रावत का सोशल मीडिया संवाद कार्यक्रम आयोजित हुआ। वह अपने फेसबुक व ट्वीटर अकाउंट के माध्यम से आनलाइन लोगों से रूबरू हुए। उनके लाइव आते ही बड़ी संख्या में लोगों ने कमेंट करने शुरू कर दिए। यही कारण रहा की रविवार को फेसबुक पर अपने फालोअर्स की संख्या दो लाख को पार कर गई।

ऊधम सिंह नगर के नील भंडारी ने अपने क्षेत्र में स्वीकृत मार्ग पर निर्माण कार्य शुरू करवाने का मुख्यमंत्री से अनुरोध किया, उन्होंने तत्काल वहां के डीएम से फोन पर वार्ता कर निर्माण कार्य शुरू कराने के निर्देश दिए। सुनील दत्त सहित कई लोगों ने बेरोजगारों की समस्या पर मुख्यमंत्री का ध्यान आकर्षित किया, जिस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार इस वर्ष अंत तक 30 हजार लोगों को रोजगार उपलब्ध करा देगी।

थराली के अभिषेक राणा ने मुख्यमंत्री को बताया कि वहा दिव्यांग बच्चों का आवासीय विद्यालय है जो बजट के अभाव में समस्या से जूझ रहा है, जिस पर सीएम ने तुरंत ही दो लाख रुपये की धनराशि विद्यालय के लिए स्वीकृत कर दी। इसके अलावा और भी सैकड़ों लोगों के सुझाव, शिकायतें आई जिनमें बहुतों को मुख्यमंत्री ने व्यक्तिगत रूप से जवाब दिए। मुख्यमंत्री ने सभी सुझावों को रिकार्ड रखने के निर्देश संबंधित अधिकारियों को दिए।

भारत के इस शहर में लगती है लाशों की बोली! पढ़ें – कैसे काम करते हैं गिरोह

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मुंबई। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि सपनों के शहर मुंबई में होता है लाशों का सौदा और हर लाश की बोली लगती है, साथ ही पुलिस से लेकर वकील तक इस रैकेट में शामिल हैं। मुंबई की लाइफ लाइन लोकल ट्रेन में कुछ लोगों की जिंदगी का सफर हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जाता है, लेकिन कुछ लोग ऐसी ही मौत के ताक में घात लगाए बैठे होते हैं। जी हां मुसाफिरों की मौत के सौदागर पूरे मुंबई में फैले हुए हैं और रेलवे के सख्त नियमों में भी इन लोगों ने सेंध लगा रखी है और अगर आरपीएफ की मानें तो ये सिलसिला पिछले कई सालों से चल रहा है।
मुंबई में रेल हादसों में मरने वाले लोगों के नाम पर फर्जी क्लेम करने का पूरा कारोबार बड़ी बेफिक्री से चलाया जा रहा है। खुद रेलवे के अधिकारी मानते हैं कि इस रैकेट में दलाल के साथ वकीलों, जीआरपी और रेल अधिकारियों की सांठगांठ है और ये लोग मिलकर रेलवे को करोड़ों का चूना लगा रहे हैं। ये लोग रेल हादसे में मारे गए लोगों के नाम पर क्लेम करते हैं और पैसे आने पर पूरा पैसा हड़प कर धमकियां देते हैं।

साल 2013 में रामकलाबाई गनबास नाम के शख्स के बेटे की ट्रेन से कटकर मौत हो गई थी। बेटे की मौत के बाद इन्होंने ने एक वकील ने संपर्क किया और तय हुआ कि वकील इन्हें मुआवजा दिलवाएगा। इन लोगों ने तमाम जरुरी दस्तावेज वकील को दे दिए। रेल ट्रिब्यूनल बोर्ड में मुआवजा के लिए केस भी चला और कोर्ट ने बतौर मुआवजा चार लाख रुपये गनबास परिवार को देने का आदेश दिया जो कि सीधा रामकला के खाते में जमा होना था।

लेकिन मुआवजा की रकम का ऐलान होते ही गिरोह सक्रिय हो गया और वकील ने रामकला से कुछ सादे कागजों पर अंगूठे का निशान ले लिया और दूसरे बैंक में खाता खोलकर पूरी रकम हड़प ली। इतना ही नहीं मुंह बंद रखने के लिए इन्हें कुछ रुपये दे दिए और जब इन्होंने अपने हक की रकम मांगी तो धमकियां अब धमकियां मिल रही हैं।

गनबास परिवार तो केवल बानगी है इस शहर में मौजूद उन तमाम परिवार का दर्द बताने के लिए जो शातिर गिरोह का शिकार हो चुके हैं। सही मुआवजा न मिलने और फर्जी क्लेम के कई मामले सामने आने के बाद आरपीएफ ने तफ्तीश की और कई चौंकाने वाले खुलासे किए। आरपीएफ के मुताबिक ये गिरोह बेहद संगठित तरीके से पिछले कई सालों से ऑपरेट कर रहा है। तफ्तीश में लाश के सौदागरों की मॉडस ऑपरेंडी का खुलासा हुआ है। इस गिरोह के सदस्य सुबह ही चर्चगेट से विरार, सीएसटी से कल्याण और हार्बर लाईन की करीब 30 रिटर्न टिकट खरीद लेते हैं।

जैसे ही किसी के रेल हादसे में मरने की खबर आती है तो जीआरपी, हमाल और स्टेशन मास्टर की टीम मौके पर पहुंचती है। मरने वाले शख्स के पास रेल टिकट या पास हुआ तो ठीक वरना जीआरपी के कर्मचारी उस शख्स की जेब में अपना खरीदा हुआ टिकट डाल देते हैं फिर जीआरपी के अधिकारी गिरोह में शामिल वकील को पीड़ित परिवार के पास भेजते हैं और उनसे मुआवजा दिलाने के ऐवज में सौदेबाजी करता है घरवालों से बात हो जाने के बाद केस हाथ में आते ही गिरोह में शामिल रेल विभाग के अधिकारी और जीआरपी बडी ही सफाई से सबूतों में हेरफेर करते हैं।
कोर्ट की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जो मुआवजा मिलता है उसमें से महज 30 फीसदी पैसे ही घरवालों को दिए जाते हैं और बाकी पैसों की बंटरबाट हो जाती है। आरपीएफ सूत्रों के मुताबिक, लाशों का सौदा करने वाला सिर्फ एक गिरोह नहीं बल्कि कई गिरोह सक्रिय है। पिछले कई सालों में इन सौदागरों ने फर्जी क्लेम हासिल कर सरकारी तिजोरी में करोडों की चपत लगा चुके हैं।

वहीं रेल हादसों में मरने वाले लोगों को मिलने वाले मुआवजे के लिए लाशों की बोली लगाने वाले इस तरह के गिरोह की कमर तोडने की कोशिश भी की जाती रही है और इसके लिए बाकायदा अनटुवर्ड इंसीटेंड इंवेस्टिगेशन सेल भी बनाया गया है। रेल हादसों में मरने वाले यात्री के क्लेम हासिल करने के लिये सबूतों से छेडछाड करने वाले इस गिरोह पर लगाम लगाने के लिये ही आरपीएफ ने यूआईआईसी सेल बनाया है। पहले होता ये था कि किसी भी हादसे के समय केवल जीआरपी के अधिकारी ही जाते थे।

लेकिन अब जीआरपी के साथ आरपीएफ के जवान भी मौके पर पहुंचते हैं और अलग तफ्तीश करते है। हादसे की जगह का साइट मैप बनाया जाता है हादसे की जगह की फोटोग्राफी की जाती है किलोमीटर नंबर दर्ज किया जाता है। यात्री के पास टिकट या पास है या नहीं इसकी जांच होती है, जिस ट्रेन से हादसा हुआ है उसके मोटर मैन का बयान दर्ज किया जाता है। मौके से मिले तमाम सबूत ये एक बात ये साफ हो जाती है कि हादसे में मरने वाला शख्स वैध मुसाफिर था या अवैध। यात्री अगर वैध भी है तो ये भी देखा जाता है की उसने रेल नियमों का पालन किया या नहीं। सारे सबूत इकट्ठा करने के बाद आरपीएफ उन्हें कोर्ट में जमा करती है। युआईआईसी की वजह से रेल विभाग की तिजोरी में सेंधमारी में काफी कमी आई है।

बता दें कि साल 2012 में मुआवजे के लिए 510 आवेदन आए, जिनमें से 37 को खारिज किया गया, इससे दो करोड़ 80 लाख रुपये बचे साल 2013 में मुआवजे के लिए 376 आवेदन ही आए जिनमें से 83 खारिज हो गए और 4 करोड 88 लाख की बचत हुई। साल 2014 में मुआवजे के लिए 355 आवेदन आए इनमें से 279 आवेदन खारिज हुए साल अप्रैल 2015 से मार्च 2016 तक मुआवजे के लिए कुल 340 आवेदन आए इनमें से 114 आवेदन खारिज हुए, सात करोड़ से ज्यादा की बचत हुई। हालांकि जानकारों का कहना है की रेल प्रशासन कुछ और सुधार करके फर्जीवाड़ा आसानी से रोक सकता है।

महाराष्ट्र में शिकायतकर्ताओं को व्हाट्सएप के जरिए मिलेगी एफआईआर की कॉपी

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मुंबई: महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक प्रवीण दीक्षित ने पुलिसकर्मयों को निर्देश दिए हैं कि वे शिकायतकर्ताओं को प्राथमिकी की प्रति व्हाट्सएप के जरिए भेजें। दीक्षित ने बताया कि उन्होंने इस संबंध में निर्देश दिए हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता (प्राथमिकी दर्ज होने के बाद) अपने मोबाइल या कैमरे के जरिए इसकी तस्वीर भी ले सकते हैं।

एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने कहा, ज्‍यादातर मामलों में शिकायतकर्ता को एफआईआर की कॉपी एक या दो दिन की देरी से मिलती है। अब इस कदम के जरिए शिकायकर्ताओं को प्राथमिकी की कॉपी जल्‍द उपलब्‍ध हो सकेगी।

बिहार टॉपर्स घोटाले में अब आया पूर्व जेडीयू एमएलए का नाम, 12 साल की उम्र में ही कर ली थी ग्रेजुएशन

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बिहार के टॉपर्स घोटाले में एक और नया खुलासा हुआ है, अभी तक बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष लालकेश्वर सिंह को ही इस घोटाले का मुख्य सूत्रधार मानकर चल रही पुलिस को अब उसकी पूर्व विधायक पत्नी के खिलाफ भी पुख्ता सबूत हाथ लगे हैं।

जेडीयू के टिकट पर गया जिले की हिलसा सीट से दो बार विधायक रही लालकेश्वर ‌की पत्नी उषा सिंह अपने करीबियों के माध्यम से बोर्ड परीक्षा में पास और फेल कराने के इस रैकेट को संचालित करती थी। पति पत्नी की यह जोड़ी बिहार की राजनीति के साथ ही शिक्षा क्षेत्र में भी काफी रसूख रखती थी।

उषा सिंह के बारे में हुए एक और चौंकाने वाला खुलासा यह भी हुआ है कि उसने फर्जी डिग्रियों के माध्यम से कालेज में शिक्षक की नौकरी पाई ‌थी। वहीं सवाल चुनाव के दौरान आयोग को दिए गए उसके हलफनामे पर भी है। वहीं मामले के दूसरे मुख्य आरोपी बच्चा राय से भी इस दंपति की काफी नजदीकी सामने आई है।

मामले की तलाश में लगी एसआईटी ने दो दिन पूर्व लालकेश्वर प्रसाद सिंह और उषा सिंह के घर पर छापामारी की थी। इस दौरान पति पत्नी दोनों फरार मिले, लेकिन पुलिस को उनके घर की तलाशी में काफी महत्वपूर्ण सबूत हाथ लगे हैं।

जिसके बाद पुलिस का दावा है कि पास और टॉप कराने के इस रैकेट में पति लालकेश्वर के साथ उषा सिंह की भी बराबर की भागीदारी थी। उषा सिंह के लिए बोर्ड का सारा काम उसके दो नजदीकी लोग देखते थे, वो ही शिकार की तलाश करके इनके पास लाते और फिर सेटिंग का सारा खेल चलता था। पुलिस ने अभी तक कुल 8 लोगों को गिरफ्तार किया है।

लालकेश्वर और उनकी पत्नी उषा सिंह का बिहार की राजनीति के साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी रसूख था। लालकेश्वर बोर्ड अध्यक्ष बनने से पहले जहां पटना कालेज में प्रधानाचार्य पद पर थे वहीं उनकी पत्नी दो बार विधायक रहने से पूर्व और हाल फिलहाल पटना स्थित गंगा देवी महिला महाविद्यालय की प्राचार्या भी थी।

उनके रसूख का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब तक उषा सिंह विधायक रही जब तक वह कालेज से अनिश्चितकालीन छुट्टी पर रहीं और जब इस बार उन्हें जेडीयू से टिकट नहीं मिला तो वापिस कालेज आकर प्रधानाचार्या पद की कुर्सी संभाल ली।

इसके अलावा वह संस्कृत बोर्ड में भी सदस्य थीं। उषा सिंह के बारे में एक चर्चा ये भी है कि उन्होंने फर्जी डिग्रियों के माध्यम से कालेज में लेक्चरर का पद पाया था जिससे वह प्रधानाचार्या के पद तक पहुंची। मीडिया में चल रही खबरों के अनुसार उषा सिंह ने उत्तर प्रदेश के जिस विश्वविद्यालय से साल 1976 में एमए किया था वह तो कहीं अस्तित्व में ही नहीं है।

साल 2010 के विधानसभा चुनावों में दिए हलफनामे में उषा सिंह ने अपनी योग्यता 1973 में गोरखपुर से बीए-बीएड और 1976 में आमोध विश्वविद्यालय से एमए और 1984 में मगाध विश्वविद्यालय से पीएचडी करना बताया है। सवाल उनके एमए करने के लेकर है क्योंकि जिस आमोध विश्‍वविद्यालय से उन्होंने अपनी डिग्री बताई है वो कहीं है ही नहीं।

इसके अलावा उनके द्वारा दी गई एक और जानकारी पर भी सवाल उठ रहा है हलफनामे में दी गई उनकी इस जानकारी पर यकीन करें तो उन्होंने आठ साल की उम्र में दसवीं और दस साल की उम्र में 12वीं की परीक्षा पास कर ली थी।

सूत्रों के अनुसार उन्होंने 2010 में हिलसा सीट से विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन करते समय अपनी उम्र 49 साल बताई ‌थी। जिसके अनुसार उनका जन्म का वर्ष 1961 बैठता है। वहीं हलफनामे के अनुसार उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा 1969 में और इंटरमीडिएट की 1971 में पास कर ली थी।

अब अगर उनके हलफनामे पर यकीन किया जाए तो उसके अनुसार उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा मात्र आठ साल में ही पास कर ली थी और इंटर की परीक्षा मात्र दस साल की उम्र में। इसी तरह 1973 में मात्र 12 साल की उम्र में उनकी ग्रेजुएशन और 15 साल की उम्र में उनकी पीजी कंपलीट हो गई थी।

हलफनामे का सच क्या है यह तो उषा सिंह की बता सकती हैं लेकिन वह पुलिस की पकड़ से दूर चल रही हैं। माना जा रहा है कि पति पत्नी की गिरफ्तारी के बाद इस पूरे मामले से कुछ बड़े रहस्य बेपर्दा हो सकेंगे।

कैराना पर बोलीं मेनका, एक दिन सब छोड़ देंगे यूपी

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यूपी के शामली जिला के कैराना में हिंदुओं के पलायन के मामले पर सियासत तेज हो गई है। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने यूपी सरकार पर बड़ा हमला बोलते हुए कहा है कि ऐसे हालात रहे तो राज्य से सभी लोग पलायन कर जाएंगे। वहीं इस मामले पर शामली के ASP का कहना है कि प्रशासन ने 150 परिवारो की जांच की है, जिसमें से सभी परिवारों ने किसी निजी काम या कारोबार की वजह से पलायन करने की बात कही है।

ASP के मुताबिक हिन्दुओं के साथ साथ मुस्लिम परिवार भी कैराना से गए हैं। वहीं कैराना मामले पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि इस मामले में राज्य सरकार पूरी तरह से नाकाम साबित हो रही है…वहीं, कैराना से बीजेपी सांसद हुकुम सिंह ने इन परिवारों के मुखिया के नाम की लिस्ट जारी की। उन्होंने दावा किया है कि ये लोग डर और जान बचाने के लिए अपना घर छोड़ने को मजबूर हुए जबकि बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने कहा कि कैराना को कश्मीर बनाने की कोशिश की जा रही है।

इलाहाबाद में बीजेपी कार्यकारिणी की बैठक में कैराना मुद्दा गर्माने के बाद वहां पहुंचे नेताओं की तरफ से भी प्रतिक्रिया आनी शुरू हुई। आंवला से सांसद और केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने राज्य सरकार पर हमला किया और कहा कि एक वक्त ऐसा भी आएगा जब सभी लोग यूपी छोड़ना चाहेंगे। उन्होंने कहा, ‘मैं सांसद हूं और मुझे दिन में 10 या 15 फोन आते हैं… कोई कहता है कि मेरी बेटी का अपहरण हो गया है, कोई कहता है, गाय कटने जा रही है, पुलिस कुछ नहीं कर रही है।’

केंद्रीय मंत्री ने आगे कहा कि पुलिस का राजनीतिकरण करके हमने अच्छा नहीं किया। शर्म नाम की चीज यहां की सरकार में है ही नहीं। अगर राष्ट्रपति शासन लगाने से कोई फायदा हो तो मैं कहूंगी कि लगा देना चाहिए।

यूपी के कैराना में हिंदुओं के पलायन मुद्दे पर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरन रिजीजू ने बयान दिया। रिजीजू ने अभी तक की खबर पर चिंता जताई और कहा कि राज्य सरकार को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को इसपर एक आधिकारिक रिपोर्ट भी भेजनी चाहिए।

कैराना से सैकड़ों हिंदू परिवारों के पलायन पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सख्त रुख अपनाने और शनिवार को आईबी के पहुंचने के बाद तेजी से हरकत में आए प्रशासन ने दो ही दिन में 150 परिवारों का सत्यापन कर लिया। हालांकि इस सत्यापन में पलायन के क्या कारण सामने आये, इस पर प्रशासन चुप्पी साधे हुए है। तर्क है कि समग्र रिपोर्ट डीएम को जल्दी ही सौंप दी जाएगी। इस बारे में शासन स्तर से ही कुछ कहा जाएगा।

वहीं, इस मुद्दे को उठाने वाले बीजेपी सांसद हुकुम सिंह ने कहा कि उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से मिली जानकारी के बाद ही यह सूची जारी की। उन्होंने कहा, ‘मैंने प्रमाणिकता की जांच की और पाया कि लिस्ट सही है। एक और दो नाम गलत हो सकते हैं लेकिन व्यापक रूप से यह सही है।

केंद्रीय मंत्री और गौतमबुद्धनगर से सांसद महेश शर्मा ने कहा कि कैराना की घटना को बिल्कुल अलग तरह से देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि अखिलेश को इस्तीफा दे देना चाहिए और राष्ट्रपति को कार्रवाई करनी चाहिए।

जोधपुर में इमारत पर गिरा मिग 27, दोनों पायलट सुरक्षित

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जोधपुर: जोधपुर में एक मिग27 विमान गिर गया। इसमें सवार दोनों पायलट सुरक्षित हैं। यह विमान एक इमारत पर गिरा, जिसमें दो या तीन लोगों के घायल होने की खबर है। वायुसेना ने कोर्ट ऑफ इनक्वायरी के आदेश दे दिए हैं। यह विमान ट्रेनिंग मिशन पर था।

यह विमान रनवे से 7 किलोमीटर दूर एक इमारत पर 11.32 मिनट पर दुर्घटनाग्रस्त हुआ। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, इंजन फेल होने की वजह से इसकी इमरजेंसी लैंडिंग की कोशिश की जा रही थी।

गौरतलब है कि यह काफी पुराना विमान है। यह अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था। इसे अपग्रेड करके उड़ाया जा रहा था। यह विमान रूस में बना था।

NSG : चीन को उसी की 'भाषा' में समझाने में जुट गए पीएम मोदी

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तू डाल डाल तो मैं पात पात…’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब चीन को उसी की भाषा में समझाने की पहल शुरू कर दी है. मामला है न्‍यूक्लियर सप्‍लाई ग्रुप में एंट्री का.

चीन की ये मुराद की भारत की एनएसजी में एंट्री न हो, इसे लेकर पीएम मोदी अब सख्‍त हो गए हैं. उन्‍होंने इस बाबत रूस से मदद मांगी है. बकायदा पीएम ने रूस के राष्‍ट्रपति व्‍लादिमीर पुतिन से फोन पर बात की और उनसे कहा कि वह भारत का एनएसजी ग्रुप में एंट्री का समर्थन करता रहे.

रूस की तरफ से जारी किए गए बयान में बताया गया है कि, ‘भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से शनिवार को फोन आया था. दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए व्यापक सहयोग पर बात की, दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी भी रही है.’ मोदी और पुतिन के बीच जल्द ही मुलाकात होने की संभावना भी जताई जा रही है.
हाल ही में प्रधानमंत्री को पांच देशों के दौरे के बाद एनएसजी के मुद्दे पर भारत के लिए समर्थन जुटाने में कामयाबी हासिल हुई है. अमेरिका और मैक्सिको ने भारत का एनएसजी पर खुलकर समर्थन किया.

दरअसल चीन और पाकिस्तान ने भारत की न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में एंट्री रोकने के लिए हाथ मिलाया है. बीजिंग ने पाक का सपोर्ट करते हुए कहा है कि एनएसजी में भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को एंट्री मिले या किसी को भी नहीं. चीन ने भारत को रोकने के लिए पाकिस्तान की नॉन-स्टार्टर पोजिशन का इस्तेमाल किया है. एनएसजी के सूत्रों की मानें तो चीन और पाकिस्तान, भारत की एंट्री रोकने के लिए साथ मिलकर काम कर रहे हैं.