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जारवा आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ना उनके वजूद के लिए खतरा है और उन्हें उनके हाल पर छोड़ना भी

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सुदूर अंडमान में हुई एक हत्या ने इन दिनों पुलिस-प्रशासन के सामने एक दुविधा खड़ी कर दी है. पांच महीने के इस बच्चे की हत्या नवंबर 2015 में हुई थी. लेकिन हत्या के आरोपी को गिरफ्तार करने को लेकर पुलिस अभी तक असमंजस में है.

इसकी वजह भी है. यह हत्या 300 वर्ग मील के दायरे में सिमट चुकी जारवा आदिवासी जनजाति के इलाके में हुई है. 50 हजार साल पहले अफ्रीका से भारत आई इस जनजाति में अब करीब 400 लोग ही बचे हैं और वे अभी भी लगभग उसी तरीके से रहते हैं जैसे हजारों साल पहले रहते थे. जारवाओं की आदिम संस्कृति को संरक्षण देने के उद्देश्य से उन्हें विशेष दर्जा मिला हुआ है. पुलिस को उनके मामलों में दखल देने की इजाजत नहीं है.

खबरों के मुताबिक पांच महीने के इस बच्चे की हत्या इसलिए हुई कि वह मिश्रित नस्ल का था. फिलहाल अधिकारी बहुत फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं. अभी तक मामले में दो बाहरी लोगों को गिरफ्तार किया गया है. इनमें महिला से बलात्कार का आरोपित और बच्चे का संभावित पिता भी शामिल है. दूसरा आरोपित वह है जिसने उस आदिवासी को शराब पिलाई जिस पर हत्या का शक है.

जारवा समुदाय समय-समय पर चर्चा में आता रहता है. कुछ साल पहले ब्रिटेन के अखबार द ऑब्जर्वर द्वारा जारी एक वीडियो के बाद भी यह समुदाय सुर्खियों का विषय बना था. वीडियो में कुछ पर्यटकों के सामने जारवा महिलाएं नाचती हुई दिखाई दे रही थीं. पर्यटकों के साथ एक पुलिसवाला भी था जो कुछ खाने के सामान के बदले इन महिलाओं को नाचने के लिए कह रहा था. मानवाधिकार संगठनों ने जारवा आदिवासियों के साथ हो रहे इस बर्ताव को रोकने के लिए भारत सरकार से तुरंत कार्रवाई करने की मांग की थी. इस घटना के बाद पिछले चार सालों में भारत सरकार और केंद्र शासित प्रदेश अंडमान के प्रशासन कुछ सख्ती जरूरी दिखाई है लेकिन आज भी अंडमान में अघोषित रूप से जारवा आदिवासियों की ह्यूमन सफारी जारी है.
बीते साल अंडमान ट्रंक रोड (एटीआर) पर भी विवाद हुआ था जो इन आदिवासियों के निवास क्षेत्र से गुजरती है. यह रोड उत्तरी अंडमान को दक्षिणी अंडमान से जोड़ती है. जारवा दक्षिण अंडमान में रहते हैं. इनकी मुख्य बसाहट के चारों तरफ पांच किमी का क्षेत्र सरकार द्वारा संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है. यह इलाका केंद्र शासित प्रदेश की राजधानी पोर्ट ब्लेयर और बरतांग के बीच में है. द्वीप समूह आने वाले पर्यटक एटीआर से ही सफर तय करते हैं. इस दौरान उनका सामना जारवा आदिवासियों से होता रहता है.

एटीआर से गुजरने वाले पर्यटकों के लिए आदिवासियों की तस्वीरें उतारने और उन्हें कुछ भी देने की मनाही है. लेकिन यह प्रतिबंध कभी कड़ाई से लागू नहीं किया गया. एक अनुमान के मुताबिक हर साल यहां तकरीबन दो लाख पर्यटक आते हैं और इनमें से ज्यादातर को जारवा आदिवासियों के ‘अजूबा’ होने की जानकारी होती है. पिछले कई सालों से ऐसी खबरें आती रही हैं कि स्थानीय टूर एजेंट और गाइड पर्यटकों से पैसा लेकर उन्हें जारवा आदिवासी दिखाने ले जाते हैं. पर्यटकों द्वारा इन्हें खानेपीने का सामान, जिसमें तंबाकू से लेकर शराब तक शामिल है, देने के मामले भी उजागर हुए हैं. मानवशास्त्री कहते हैं कि तकरीबन 50 हजार साल से मुख्य समाज से कटकर जंगल के बीच रह रहे ये आदिवासी अब शराब और तंबाकू के लती बन रहे हैं.
इस आदिवासी समुदाय का मुख्य समाज से कभी संबंध नहीं रहा इसलिए इनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता आधुनिक बीमारियों के सामने शून्य है.

इन्हीं चिंताओं के मद्देनजर जनवरी, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने एटीएआर के संरक्षित क्षेत्र वाले हिस्से को बंद करने का आदेश दे दिया था. लेकिन अंडमान में इसका विरोध होने लगा. दरअसल यह 287 किमी लंबी सड़क इस द्वीपसमूह की जीवनरेखा है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अंडमान प्रशासन ने अदालत को आश्वासन दिया कि वह जारवा आदिवासियों के संरक्षण के लिए नए नियम बनाएगा और उन्हें सख्ती से लागू करेगा. इसके बाद एटीआर पर लगी आवागमन की रोक खत्म हो गई. साथ में जारवा आदिवासियों की ह्यूमन सफारी फिर से चलने लगी, लेकिन सावधानी से.
अंडमान-निकोबार में एक समय मूल जनजातियों के पांच समूह पाए जाते थे. आज इनमें से सिर्फ चार बचे हैं. इनमें भी जारवा आदिवासियों की संख्या सबसे ज्यादा है. लंबे अरसे तक जारवा आदिवासियों की छवि आक्रामक बनी रही है. कहा जाता है कि 1950 के दशक में जब अंडमान ट्रंक रोड बन रही थी तब इन्होंने सड़क निर्माण में लगे मजदूरों पर हमले कर कुछ लोगों की हत्या कर दी थी. यह समुदाय 1997 में पहली बार मुख्य धारा के समाज के संपर्क में आया. तब एक जारवा लड़का सड़क दुर्घटना में घायल हो गया था. इसका इलाज पोर्टब्लेयर के अस्पताल में हुआ. जहां उसने थोड़ी बहुत हिंदी सीख ली थी. इसके जरिए जारवा आदिवासियों के बारे में कई जानकारियां मिलीं है. यह लड़का कुछ समय के बाद अपने मूल समुदाय में लौट गया. इस घटना के बाद जारवा और मुख्य समाज के बीच कुछ हद तक दोस्ताना संबंध बने हैं.

केंद्र सरकार ने जारवा जनजाति को 1956 के एक कानून के हिसाब से संरक्षित घोषित किया है. वह समय-समय पर अंडमान प्रशासन के जरिए इनके लिए नीतियां भी बनाती रही हैं. लेकिन इस सब के बीच यह बहस भी लगातार चलती रही है कि इस जनजाति को कैसे बचाया जाए. दुनियाभर में जनजातियों को बचाने के दो ही तरीके अपनाए जाते हैं. इनमें पहला है कि उन्हें जागरूक करके धीरे-धीरे मुख्यधारा में शामिल किया जाए. दूसरा तरीका है कि उनके लिए संरक्षित क्षेत्र बनाकर उनके समाज में न्यूनतम हस्तक्षेप किया जाए. जारवा आदिवासियों को बचाने का पूरा अभियान भी इस समय इन्हीं दो बिंदुओं के बीच उलझा हुआ है. इन दोनों विकल्पों के पक्ष और विपक्ष में कई तरह के तर्क दिए जाते हैं.
जो लोग जारवा आदिवासियों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए सरकारी कोशिशों को बढ़ाने की बात करते हैं उनका मानना है कि देश की कई जनजातियों का अस्तित्व इसी तरह से बचा है. अंडमान-निकोबार से भाजपा के सांसद विष्णु पांडा रे इसके सबसे बड़े समर्थक हैं. उनका कहना है कि इन लोगों को शिक्षित करके मुख्यधारा के समाज से जोड़ना चाहिए तभी ये बच सकते हैं. इस वर्ग का मानना है कि जारवा इलाके को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर देने से आप उन तक स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुंचा सकते. ऐसे में उनकी आबादी किसी भी समय संक्रामक बीमारियों की चपेट में आकर पूरी तरह खत्म हो सकती है.

मानवाधिकार संगठनों से लेकर सरकार तक में एक बड़ा तबका है जो जारवा आदिवासियों के सामाजिक तानेबाने में किसी भी तरह के हस्तक्षेप के सख्त खिलाफ है. ये लोग बाहरी लोगों और पर्यटकों से इनका संपर्क खतरनाक मानते हैं. सोसाइटी फॉर अंडमान-निकोबार इकोलॉजी (सेन) संगठन से जुड़े समीर आचार्य एक रिपोर्ट में कहते हैं कि पर्यटकों के कारण यह जनजाति नष्ट होने की कगार पर पहुंच रही है क्योंकि पर्यटक इन लोगों को खाने का सामान देते हैं जिससे आदिवासी बीमार पड़ रहे हैं. सर्वाइवल इंटरनेशनल का कहना है कि 50 हजार साल से यह जनजाति खुद को अपने में सीमित रखे हुए हैं इसलिए इनमें आधुनिक लोगों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया व वायरस से लड़ने की क्षमता नहीं है. यदि जारवा आधुनिक लोगों के संपर्क में आते हैं तो यह उनके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.

मानवाधिकार संगठन इसके लिए ग्रेट अंडमानी जनजाति का उदाहरण देते हैं जो बीते सालों में मुख्यधारा के समाज से काफी घुलमिल गई थी. लेकिन बीमारियों और शराब की लत में पड़कर यह जनजाति अब लगभग खत्म हो चुकी है. माना जाता है कि पूरे द्वीप समूह पर इस समय ग्रेट अंडमानी जनजाति के लोगों की तादाद 50 से ज्यादा नहीं है.

बहस के इन दोनों बिंदुओं के बीच केंद्र सरकार ने 2004 में जारवाओं की सुरक्षा के लिए एक विशेष नीति बनाई थी. इसमें तय किया गया है जब तक इस जनजाति को बचाने से जुड़े अध्ययन पूरे नहीं हो जाते सरकार अपनी तरफ से इन लोगों के जीवन में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगी. केंद्र सरकार फिलहाल इसी नीति पर कायम है. लेकिन दूसरी तरफ पर्यटन के नाम पर अभी-भी जारवा आदिवासियों को बाहरी लोगों के मेलजोल का मौका-मिल रहा है. इस समय जनजाति को बचाने की किसी भी नीति पर पूरी तरह अमल नहीं हो पा रहा है.

हो सकता है एक बच्चे की हत्या के इस मामले के बाद जारवा क्षेत्र में पर्यटन पर लगी पाबंदियां और कड़ी हो जाएं. यह कदम जारवा आदिवासियों की मानवीय गरिमा तो बचा लेगा लेकिन उनके अस्तित्व का सवाल अभी-भी पहले की तरह अनुत्तरित रहेगा.

हरीश रावत ने किया सरकार बनाने का दावा, पहुंचे राजभवन

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प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगने के चंद घंटों के अंदर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सरकार बनाने का दावा किया है। इस संबंध में रावत ने राज्यपाल को पत्र दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री रावत पांच विधायकों के साथ राजभवन पहुंचे थे।

राज्यपाल से भेंट न होने के कारण रावत ने राजभवन में विशेष कार्याधिकारी को पत्र दिया। इसमें 28 मार्च को सदन के फ्लोर पर बहुमत साबित करने का दावा किया गया है।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्यपाल को संबोधित पत्र में कहा है कि ‘आपने मुझे 28 मार्च को विधानसभा सदन में बहुमत साबित करने का आदेश दिया था।

रावत ने कहा कि उनके पास पूर्ण बहुमत है वह राज्यपाल की आज्ञा के अनुपालन में सोमवार को सदन में अपना बहुमत साबित करेंगे। इसके लिए उन्हें एक मौका दिया जाना चाहिए।
पूर्व मुख्यमंत्री का कहना है कि उन्हें बहुमत साबित करने का मौका नहीं मिला और राष्ट्रुपति शासन लागू कर दिया गया।

पूर्व मुख्यमंत्री रावत के साथ वित्त और संसदीय कार्य मंत्री रहीं इंदिरा हृदयेश, विधायक हेमेश खर्कवाल, गणेश गोदियाल, मनोज तिवारी, अनुसुइया प्रसाद मैखुरी तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय रहे।

उत्तराखंड में लगाया गया राष्ट्रपति शासन, हाईकोर्ट में चुनौती दे सकती है कांग्रेस

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देहरादून: उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है। केंद्र सरकार ने बीती रात कैबिनेट की बैठक के बाद राष्ट्रपति से इसके लिए सिफ़ारिश की थी जिसे राष्ट्रपति ने मान लिया है। वहीं, कांग्रेस की ओर से कहा जा रहा है कि वह केंद्र के इस निर्णय के खिलाफ कोर्ट जाएंगे।

केंद्र सरकार का कहना है कि उत्तराखंड में संवैधानिक व्यवस्था चरमरा गई थी और विधायकों की ख़रीद फ़रोख़्त हो रही थी जिसे देखते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने का फ़ैसला किया गया है।
विधानसभा को भंग नहीं किया गया है बल्कि निलंबित रखा गया है। उधर, कांग्रेस और ख़ासतौर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे हरीश रावत ने इसे संविधान और लोकतंत्र की हत्या बताया है।
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि धारा 356 के प्रयोग का इससे बेहतर कोई दूसरा उदाहरण नहीं हो सकता है। पिछले नौ दिन से हर दिन संविधान के प्रावधानों की हत्या हो रही थी।
नौ दिन पहले कांग्रेस के नौ विधायकों की बग़ावत का पटाक्षेप उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के तौर पर हुआ। राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर केंद्रीय कैबिनेट की सिफ़ारिश राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मंजूर कर ली। ये फ़ैसला उत्तराखंड विधानसभा में बहुमत परीक्षण से ठीक एक दिन पहले हुआ।

केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था चरमरा चुकी थी।

जेटली ने कहा कि संविधान में लिखा है कि जब बजट फेल होता है तो इस्तीफ़ा देना होता है। स्वतंत्र भारत में पहला उदाहरण है जब एक एक फेल्ड बिल को बिना वोट लिए पारित होने की घोषणा कर दी गई। 18 तारीख़ के बाद से जो सरकार चली है वो असंवैधानिक है।

उधर, मुख्यमंत्री रहे हरीश रावत ने इसे लोकतंत्र और संविधान की हत्या बताते हुए केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए।

रावत ने कहा कि शायद ही ऐसा कोई उदाहरण जिसे बहुमत सिद्ध करने से एक दिन पहले ही बर्ख़ास्त कर दिया जाए। सरकार का बहुमत विधानसभा में तय होना चाहिए था। ऐसी क्या जल्दबाज़ी थी कि सरकार को भंग कर दिया गया।

अरुण जेटली ने ये भी कहा कि विधानसभा स्पीकर ने बीजेपी के एक बाग़ी विधायक के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही नहीं की जबकि वो कांग्रेस के नौ बाग़ी विधायकों के ख़िलाफ़ मनमाने तरीके से दल बदल कानून का प्रयोग कर रहे थे।

जेटली ने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची है जिसका डिसक्रिमिनेटरी तरीके से प्रयोग हुआ। ये पहला उदाहरण है स्वतंत्र उदाहरण में कि एविडेंस आया हो और अपने मुंह से मुख्यमंत्री जी हॉर्स ट्रेडिंग का प्रयास कर रहे हों।

राष्ट्रपति शासन के ऐलान के बावजूद उत्तराखंड विधानसभा के स्पीकर रहे गोविंद सिंह कुंजवाल ने बाग़ी विधायकों की सदस्यता रद्द करने का ऐलान कर दिया।
उत्तराखंड विधानसभा स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल ने कहा कि हमें राष्ट्रपति शासन की कोई सूचना नहीं मिली है।

साफ़ है कि उत्तराखंड की सियासत को लेकर खींचतान अभी बाक़ी है। विधानसभा को भंग नहीं किया गया है बल्कि निलंबित रखा गया है। ऐसे में राष्ट्रपति शासन के बावजूद किसी नई सरकार के गठन का विकल्प अभी खुला है। देखना है कि इसके लिए बीजेपी अगर पहल करती है तो कब।

उत्तराखंड में वसंत के मौसम में ही सियासी सरगर्मियों ने पारा काफ़ी बढ़ा दिया है। विधायकों की ख़रीदफ़रोख़्त के आरोपों के बीच बीते दो महीने में दूसरी बार किसी राज्य सरकार को बर्ख़ास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा है। हालांकि अरुणाचल में इसके बाद बीजेपी ने सरकार बना ली, लेकिन क्या उत्तराखंड में भी बाग़ियों के सहारे ऐसा करने की कोशिश होगी। ये एक बड़ा सवाल है।

मस्जिद से अजान के दौरान पीएम मोदी ने चुनावी भाषण से लिया कुछ विराम

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खड़गपुर (पश्चिम बंगाल): चुनावी जनसभा में तृणमूल कांग्रेस और वाम मोर्चा की नीतियों पर बरसने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना भाषण उस समय रोक दिया, जब पास की मस्जिद से अजान की आवाज आने लगी। पश्चिम मिदनापुर जिले में यहां के बीएनआर मैदान पर भाजपा प्रत्याशियों के लिए प्रचार के दौरान पीएम मोदी जनसभा को संबोधित कर रहे थे। जैसे ही अजान शुरू हुई, उन्होंने अपना भाषण रोक दिया और अजान खत्म होने की प्रतीक्षा की।

मैदान पर मौजूद हजारों लोगों ने उनसे बोलने का आग्रह किया, लेकिन पीएम मोदी ने हाथ के इशारे से उनसे शांत रहने को कहा।

भाषण शुरू करने पर उन्होंने कहा, “क्षमा करें, अजान हो रही थी। मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से किसी की इबादत में खलल पड़े। इसलिए मैं कुछ मिनट के लिए रुक गया।”
इसके बाद अपने भाषण में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस और वाम मोर्चा पर बंगाल को तबाह करने का आरोप लगाया।

नवंबर 2014 में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कोलकाता में भाषण के दौरान अजान शुरू होने पर इसी तरह भाषण रोक दिया था।

कोयला घोटाले में बड़ा फैसला; झारखंड इस्पात के दो निदेशक दोषी करार, 31 मार्च को सजा का ऐलान

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नई दिल्ली: सीबीआई की विशेष अदालत ने सोमवार को कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले के एक मामले में झारखंड इस्पात प्राइवेट लिमिटेड के दो निदेशकों आर एस रूंग्टा और आर सी रूंग्टा को दोषी ठहराया। कोर्ट ने आर एस रूंग्टा और आर सी रूंग्टा को भारतीय दंड संहिता के तहत आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के अपराधों के लिए दोषी ठहराते हुए उन्हें हिरासत में लेने के आदेश दिए। अदालत ने इस मामले में सजा की मात्रा पर दलीलों की सुनवाई के लिए 31 मार्च का दिन तय किया है। यानी दोषियों को सजा 31 मार्च को सुनाई जाएगी।

गौर हो कि सीबीआई के विशेष न्यायाधीश भरत पराशर ने पिछली 21 मार्च को मामले में फैसला सुनाने के लिये 28 मार्च की तारीख तय की थी। कोयला ब्लाक आवंटन घोटाला मामले में यह पहला प्रकरण है जिसमें विशेष अदालत अपना फैसला सुनाया है। विशेष अदालत कोयला घोटाला मामले से जुड़े सभी पहलुओं को देख रही है।

सीबीआई ने आरोप लगाया था कि कि जेआईपीएल और तीन अन्य कंपनियों- मेसर्स इलेक्ट्रो स्टील कास्टिंग लि., मेसर्स आधुनिक एलॉयज एंड पावर लि. तथा मेसर्स पवनजय स्टील तथा पावर लि. को संयुक्त रूप से धादू कोयला ब्लाक आबंटित किये गये। लेकिन न तो जांच समिति ने आवेदनकर्ता कंपनी के दावे का सत्यापन किया और न ही राज्यमंत्री (एमओएस) ने आवेदनकर्ता कंपनियों के आकलन के लिये कोई तौर-तरीके अपनायें। अदालत ने इन पर आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के आरोप में मुकदमा चलाया है।

'भारतीय जासूस' के बयान को भारत ने किया खारिज, वीडियो पर उठाए सवाल

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भारत और पाकिस्तान के बीच मंगलवार को तब वाकयुद्ध शुरू हो गया जब पाकिस्तानी सेना ने गिरफ्तार किए गए भारतीय नौसेना के एक पूर्व अधिकारी का एक वीडियो जारी किया, जिसमें उन्होंने अपने देश के इशारे पर बलूचिस्तान में आतंकी गतिविधियों में शामिल रहने का कथित इकबालिया बयान देने का दावा किया। हालांकि, भारत ने इस आरोप को खारिज कर दिया और आरोप लगाया कि हो सकता है कि उन्हें ईरान से अपह्त कर लिया गया हो।

भारत ने साथ ही पाकिस्तान से भारतीय नागरिक को दूतावास तक पहुंच मुहैया कराने की मांग की है।

पाकिस्तानी सेना के इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (आईएसपीआर) प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल असीम बाजवा और संघीय सूचना मंत्री परवेज राशिद ने वीडियो जारी करने के लिए इस्लामाबाद में एक संवाददाता सम्मेलन किया। उन्होंने कहा कि कुलभूषण यादव ने अशांत बलूचिस्तान प्रांत में संकट पैदा करने के लिए भारतीय गुप्तचर एजेंसी रॉ के लिए काम करने की बात स्वीकार की है।
यादव को हाल ही में पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया था और पाकिस्तान ने उन्हें भारतीय नौसेना का अधिकारी बताया है। हालांकि भारत सरकार ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि नौसेना से समय पूर्व सेवानिवृत्ति लेने के बाद से उनका सरकार से कोई सम्पर्क नहीं है। यद्यपि बाजवा ने दावा किया कि यादव अब भी सेवारत अधिकारी हैं जिन्हें 2022 में सेवानिवृत्त होना है।
विदेश मंत्रालय ने दिल्ली में मंगलवार रात जारी एक बयान में कहा, हमने पाकिस्तानी अधिकारियों द्वारा भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी का जारी वीडियो देखा है, जो ईरान में व्यापार कर रहे थे तथा जो अस्पष्ट परिस्थितियों में पाकिस्तान की हिरासत में हैं। वीडिया में यह व्यक्ति जो बयान दे रहा है उसका वास्तव में कोई आधार नहीं है। व्यक्ति जो यह दावा करता है कि वह ये बयान अपनी इच्छा से दे रहा है, न केवल सहज विश्वास को चुनौती देता है बल्कि स्पष्ट तौर पर सिखाये जाने का संकेत करता है।
बयान में कहा गया है, सरकार इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है कि यह व्यक्ति हमारे इशारे पर पाकिस्तान में विध्वंसकारी गतिविधियों में लिप्त था। हमारी जांच से यह खुलासा होता है कि ईरान से एक वैध व्यापार संचालित करने के दौरान उसे परोक्ष रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था।
इसमें कहा गया है, हम जहां इस पहलु की आगे भी जांच कर रहे हैं, अब उसकी पाकिस्तान में मौजूदगी के साथ ही ईरान से उसके अपहरण की आशंका सवाल खड़े करती है। यह तभी स्पष्ट होगा जब हमें उस तक दूतावास पहुंच मुहैया करायी जाए तथा हम पाकिस्तान सरकार से आग्रह करते हैं वह हमारे अनुरोध पर तत्काल जवाब दें।
बयान में आगे कहा गया है, यहां यह ध्यान देना प्रासंगिक है कि हमारे अनुरोध के बावजूद हमें किसी विदेशी देश में हिरासत में रखे गए एक भारतीय नागरिक तक दूतावास पहुंच मुहैया नहीं करायी गई है जो एक स्वीकार्य अंतरराष्ट्रीय प्रथा है।

यादव के मामले का उल्लेख करते हुए बाजवा ने भारत पर पाकिस्तान में राज्य प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान में भारत के हस्तक्षेप का इससे स्पष्ट सबूत नहीं हो सकता।

पाकिस्तान का दावा है कि यादव ने ईरान के चाबहार में एक छोटा कारोबार खड़ा किया था और कराची तथा बलूचिस्तान में पाक विरोधी गतिविधियों को निर्देशित किया।
बाजवा ने राशिद के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा, उसने इस्लाम धर्म अपना लिया और कबाड़ कारोबारी के रूप में गदानी में काम कर रहा था।

लाहौर में बच्चों के पार्क के बाहर आत्मघाती हमला, 69 मरे

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पाकिस्तान के लाहौर में रविवार शाम एक चिल्ड्रनपार्क के बाहर हुए आत्मघाती हमले में कम से कम 69 लोगों की मौत हो गई है। डॉन न्यूज ने पुलिस के हवाले से बताया है कि शहर के गुलशन-ए-इकबाल पार्क के बाहर हुए इस जबरदस्त विस्फोट में 300 से अधिक लोग घायल हो गए हैं।

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के एक धड़े जमातुल अहरार ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। लाहौर के डीआईजी हैदर अशरफ ने कहा, ‘यह शक्तिशाली धमाका था। यह आशंका है कि आत्मघाती हमलावर ने पार्क के मेन गेट पर खुद को उड़ा लिया।’ हमलावर 20 साल का एक युवक बताया जा रहा है।

ईस्टर की छुट्टी के मौके पर रविवार शाम को शहर के पॉश रिहायशी इलाके में स्थित गुलशन-ए-इकबाल पार्क में काफी भीड़ थी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पार्क में खून ही खून और शव बिखरे पड़े थे। घायलों में ज्यादातर महिलाएं और बच्चे हैं। डॉन न्यूज से बातचीत में एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि पार्क में हर जगह मृतक और घायल पड़े थे। घायल लोगों को रिक्शा और टैक्सी के जरिये अस्पताल पहुंचाया गया।

कई लोगों ने कहा कि पार्क के आसपास कोई सुरक्षा कर्मी तैनात नहीं था। एक व्यक्ति ने बताया कि यह पार्क बहुत बड़ा है और इसमें कई प्रवेश द्वार है। बचाव अधिकारियों और पुलिस ने कहा कि घटना की सूचना मिलते ही वे घटनास्थल पर पहुंचे।

पंजाब इमरजेंसी सेवा बचाव 1122 के प्रवक्ता दीबा शाहनाज ने कहा कि बड़ी संख्या में घायल लोगों की स्थिति गंभीर बनी हुई है। उन्होंने कहा कि विभाग के पास शाम 6:44 बजे इमरजेंसी कॉल आई थी और इसके बाद घटनास्थल पर 23 एंबुलेंस भेजे गए। घायलों को लाहौर के विभिन्न अस्पतालों में दाखिल कराया गया।
डॉक्टरों का कहना है कि मृतकों की संख्या बढ़ सकती है। लोगों से घायल लोगों के लिए रक्तदान करने की अपील की गई। शहर के सभी सरकारी अस्पतालों में इमरजेंसी घोषित कर दी गई और भारी संख्या में पुलिस बल ने क्षेत्र को सील कर दिया। पुलिस अधिकारियों के अनुसार इस धमाके के लिए 10 से 15 किलोग्राम विस्फोटक सामग्री का इस्तेमाल किया गया होगा। मौके से बॉल बेयरिंग बरामद हुई हैं।

इस हमले की जिम्मेदारी लेने वाले आतंकी संगठन जमातुल अहरार ने दावा किया है कि उसके निशाने पर ईसाई समुदाय था। संगठन के एक प्रवक्ता एहशानुल्लाह एहसान ने हमले के बाद बयान जारी कर कहा कि धमाके में ईसाईयों को लक्ष्य किया गया था।

हम प्रधानमंत्री नवाज शरीफ तक संदेश पहुंचाना चाहते थे कि हम लाहौर में घुस गए हैं। वह जो चाहें कर सकते हैं लेकिन हमें रोक नहीं पाएंगे। हमारे आत्मघाती हमलावर इस तरह के हमले जारी रखेंगे। हालांकि पुलिस अधिकारियों ने इस बात को खारिज किया है कि आतंकियों के निशाने पर ईसाई थे।

उनका कहना है कि यह पार्क केवल ईसाईयों के लिए नहीं था। मरने वालों में यह समुदाय भी हो सकता है। अमेरिका ने पाकिस्तान में हुए आत्मघाती हमले की निंदा की है। अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा कि उनका देश अपने सहयोगियों के साथ पाकिस्तान और पूरे क्षेत्र में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पाकिस्तानी समकक्ष नवाज शरीफ को फोन कर लाहौर हमले के पीड़ितों के प्रति संवेदना जाहिर की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने बताया कि मोदी ने नवाज से बातचीत के दौरान आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में किसी तरह का समझौता नहीं करने की जरूरत बताई है।
पीएम ने इससे पहले ट्वीट कर भी शोक जताया था।

उन्होंने लिखा था, ‘लाहौर में हुए विस्फोट के बारे में सुना। मैं कड़े शब्दों में इसकी निंदा करता हूं। मृतकों के परिजनों के प्रति मैं अपनी संवेदना व्यक्त करता हूं और घायलों के लिए प्रार्थना करता हूं।’

हमारी परीक्षाओं की भी परीक्षा होनी चाहिए

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अगर यह हैरान करने वाली बात नहीं तो जगहंसाई वाली बात तो है ही. बिहार में इंडरमीडिएट की परीक्षा में टॉप करने वाले दो छात्र इंटरव्यू के दौरान साधारण से सवालों के जवाब भी नहीं दे पाए. हद तो तब हो गई जब एक अपने विषय का नाम भी ठीक से नहीं बता सका. हाल ही में बिहार सरकार ने दावा किया था कि उसने बोर्ड परीक्षाएं कड़ी सुरक्षा के बीच करवाई हैं. लेकिन इस प्रकरण ने उसे शर्मसार कर दिया है. हालांकि पास होने वाले छात्रों की संख्या में गिरावट बता रही है कि सरकार ने गंभीरता से कोशिश की है. मौजूदा प्रकरण के बाद पुलिस ने एक कॉलेज और चार टॉपरों के खिलाफ मामला दर्ज किया है. इस मामले की विशेष जांच के आदेश भी दे दिए गए हैं.

हालांकि यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि क्या हुआ होगा. भारत के कई हिस्सों खासकर हिंदी पट्टी में ऐसे अधिकारियों की कमी नहीं है जो धोखाधड़ी से पास करवाने का काम करते हैं. बड़े स्तर पर नकल से लेकर पर्चा लीक करने, किसी दूसरे की जगह पर परीक्षा देने और परीक्षा कक्ष में मोबाइल फोन के जरिये उत्तर लिखवाने तक नकल के अनगिनत किस्से मिल जाएंगे. इनमें से कुछ मामलों में स्कूल/कॉलेज स्टाफ की भी मिलीभगत रहती है. बीते साल एक तसवीर खूब चर्चा में रही थी. उसमें पटना के पास एक गांव के स्कूल की इमारत में कई लोग नकल की पर्चियां पकड़ाने के लिए अपनी जान हथेली पर रखकर खिड़कियों पर चढ़े हुए दिख रहे थे. सवाल उठता है कि क्या हमने खाना पहुंचाने वाले मुंबई के मशहूर डब्बावालों की तरह नकल की एक अचूक व्यवस्था विकसित कर ली है.

मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले ने दिखाया कि सरकारी नौकरियों के लिए परीक्षाओं में बड़े स्तर पर धोखाधड़ी हुई. वहां हाल में हुई कई हत्याओं को इसी से जोड़ा गया. उत्तर प्रदेश में 1990 की शुरुआत में भाजपा सरकार ने एक नकल विरोधी कानून बनाया था. बाद में विरोधी पार्टी की सरकार ने इसे हटा दिया और फिर राजनीतिक दांवपेंच के चलते यह एक बार फिर वापस आया. गुजरात में हाई स्कूल की परीक्षाओं में नकल के खिलाफ बना कानून 1972 से ही है जिसके तहत दोषी पाए जाने पर दो साल की सजा हो सकती है.
लेकिन नकल की समस्या भारत में व्यापक रूप से बनी हुई है. जानकार बताते हैं कि परीक्षा में धोखाधड़ी और जाति प्रमाणपत्र का इस्तेमाल (वह असली हो या नकली) एक ऐसा मेल है जो बहुत से उम्मीदवारों को कई दशक के लिए सरकारी नौकरी की सुरक्षा और आराम दिला सकता है. हम इस बात से तसल्ली कर सकते हैं कि आर्थिक तरक्की के मामले में भारत जिस चीन की नकल करना चाहता है उसने बीते साल एक नया कानून बनाया है. इसके तहत नकल करने की कोशिश कर रहे छात्रों को सात साल तक की जेल हो सकती है.
समय आ गया है कि शिक्षा व्यवस्था में गहरे धंस चुकी नकल की समस्या का अंत हो. बिहार का हालिया प्रकरण जागने के लिए एक चेतावनी है. परीक्षाओं की व्यवस्था के झोल भरे जाने चाहिए और जांच के काम में और कड़ाई बरती जानी चाहिए. इस काम में वही नई तकनीक मदद कर सकती है जिसका अब तक धोखाधड़ी करने वाले इस्तेमाल करते आ रहे हैं. इसके अलावा इस सड़न से मुक्ति पाने के लिए सीसी टीवी, औचक निरीक्षण या साक्षात्कार और उच्च स्तर पर फिर से कॉपियों की जांच जैसे विकल्प भी अपनाए जा सकते हैं. शिक्षा राज्य का विषय है लेकिन केंद्र को भी इस स्थिति में दखल देना चाहिए और देखना चाहिए कि जो राज्य सरकारें इस मामले में अपना काम ठीक से नहीं कर रहीं उन्हें वह दंड और पुरस्कार जैसे किसी तरीके से ऐसा करने को प्रोत्साहित कर सकता है या नहीं.

भारत-अमेरिका संबंध : गर्मजोशी के साथ सावधानी भी जरूरी है

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अमेरिकी संसद में अपने शानदार भाषण के आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मशहूर कवि वाल्ट विटमैन की एक पंक्ति उद्धृत की और संकेत दिया कि भारत और अमेरिका के संबंध में एक नई ताल के साथ आगे बढ़ रहे हैं. बीते दो वर्षों के दौरान दोनों देशों के आपसी रिश्तों को देखें तो उनकी यह बात गलत नहीं लगती. सुरक्षा क्षेत्र को लेकर भारत-अमेरिका के संबंध तीन स्तर से मजबूत हुए हैं. पहला, अमेरिका से सुरक्षा खरीद और साझा परियोजनाओं के स्तर पर जिनका आर्थिक आंकड़ा 14 अरब डॉलर से भी ऊपर जाता है. दूसरा, दोनों देशों की सेनाओं के बीच समन्वय, सहयोग और सूचना की साझीदारी के स्तर पर. तीसरा, पाइरेसी, शांति अभियान, गश्त को लेकर संयुक्त अभियानों के विचार को लेकर.

गुटनिरपेक्षता पर भारत के रुख को देखें तो अमेरिका के साथ उसके रणनीतिक संबंधों में सबसे ज्यादा नाटकीय बदलाव आया है. हालांकि केंद्र ने गठबंधन और साझा गश्त को लेकर एक हद तय कर दी है लेकिन, यह साफ है कि सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर मोदी सरकार अमेरिका से घनिष्ठता और बढ़ाना चाहती है. बीते साल दोनों देशों ने नई दिल्ली में जिस घोषणापत्र पर दस्तखत किए उससे भी यह स्पष्ट होता है. इसकी स्वीकारोक्ति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान अमेरिका ने ऐलान किया कि भारत उसका ‘अहम सुरक्षा साझीदार’ है. यह शब्द दोनों देशों के नए रिश्ते को परिभाषित करने के लिए गढ़ा गया है और यह इसके मायने दोनों देशों के सैन्य गठबंधन से जरा ही कम हैं. 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अमेरिकी संसद को बताया था कि कैसे भारत की तरक्की और खुशहाली अमेरिका के हित में है. आज दोनों देशों के बीच करीब 107 अरब डॉलर का सालाना व्यापार हो रहा है. बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी ने मनमोहन सिंह की बात को आगे बढ़ाया. उन्होंने कहा कि मजबूत और खुशहाल भारत अमेरिका के रणनीतिक हित में है.

हर ताल में नियमित अंतराल पर छोटे-छोटे विराम भी होते हैं. अमेरिकी प्रशासन में आगे बदलाव की संभावनाओं के बीच सरकार को भी थोड़ा विराम लेना चाहिए. यह जरूरी है कि अमेरिका के साथ रणनीतिक निकटता बढ़ाते हुए वह रूस से लेकर चीन और अपने दूसरे पड़ोसियों के साथ अपनी अहम द्विपक्षीय साझेदारियों को भी ध्यान में रखे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अमेरिका के साथ भारत की मजबूत साझेदारी यह सुनिश्चित करेगी कि एशिया से अफ्रीका और हिंद महासागर से प्रशांत महासागर तक व्यापारिक जलमार्ग आजाद और सुरक्षित रहें. उनके इस बयान से बीजिंग की चिंताएं बढ़ेंगी. भारत को उसे फिर से आश्वस्त करना चाहिए या फिर इस मोर्चे पर बीजिंग की किसी प्रतिक्रिया के लिए तैयार हो जाना चाहिए. नरेंद्र मोदी का यह कहना कि हम इतिहास की हिचक पर जीत हासिल कर चुके हैं, संकेत है कि शीत युद्ध के समय भारत ने जो रुख अख्तियार किया था उसे वह पीछे छोड़ चुका है. अगर अमेरिकी संसद में ऐसी बेबाक स्वीकारोक्ति की जा सकती है तो यह देश की विदेश नीति के हित में होगा कि मोदी सरकार संसद में भी इस रणनीतिक बदलाव की व्याख्या करे. घरेलू मोर्चे पर यह काम जरूरी है ताकि भारत अमेरिका का यह रिश्ता और भी एकजुट, मानवीय और खुशहाल दुनिया का पुल बने.

चारधाम यात्रा शुरू होने से ठीक पहले 'तोड़' दिए रेस्ट हाउस

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चारधाम यात्रा शुरू होने के ठीक पहले एडीबी ने आपदा ग्रस्त रेस्ट हाउसों में तोड़फोड़ शुरू कर दी है। रेस्ट हाउसों की हालत पर अब जाकर जीएमवीएन का ध्यान गया है।
गोचर में जीएमवीएन के एक रेस्ट हाउस की मरम्मत के लिए दो कमरों और छत में तोड़फोड़ कर दी। जीएमवीएन के आपत्ति जताने के बाद एडीबी ने अपने पांव पीछे खींच लिए हैं। अब यात्रा के बाद ही रेस्टहाउसों की मरम्मत का काम होगा।
दरअसल, जीएमवीएन ने सभी रेस्ट हाउसों के लिए बुकिंग कर ली है। उधर, एडीबी की पीआईयू (प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन यूनिट) ने इनकी मरम्मत शुरू कर दी। गोचर में टूरिस्ट रेस्ट हाउस की मरम्मत के लिए छत उड़ा दी। इसके साथ ही पानी सप्लाई भी बाधित हो गई।

निगम अधिकारियों तक मामला पहुंचा तो उन्होंने एडीबी से जवाब मांगा और सात मई तक रेस्ट हाउस सही करने को कहा। इसके बाद एडीबी बैकफुट पर आ गया और यात्रा के बाद काम शुरू करने का निर्णय लिया।
जीएमवीएन के पर्यटन महाप्रबंधक बीएल राणा ने कहा,- ‘गोचर में छत के साथ तीन कमरों में तोड़फोड़ हुई है। इस संबंध में एडीबी को पत्र लिखकर सात मई तक सब सही करने को कह दिया गया है। यदि उन्हें काम करना ही था तो यात्रा से पहले करना चाहिए था। अब सभी जगह बुकिंग फुल है। ऐसे में ऐन वक्त में यह रेस्ट हाउस तोड़ देंगे तो हम यात्रियों को क्या जवाब देंगे।’