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26/11 हमले के वक्त PAK में मजे कर रहे थे भारतीय अफसर

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साल 2008 में भारत और पाकिस्तान के गृह सचिव स्तर की वार्ता के तुरंत बाद मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था. नए खुलासे में पता चला है कि पाकिस्तान के आग्रह पर भारतीय गृह सचिव को एक दिन और वहां रोक लिया गया था. दोनों देशों के बीच 26 नवंबर को ही वार्ता खत्म हुई थी और उसी दिन भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई पर आतंकी हमला किया गया था.
मुंबई हमले के दौरान देश के तत्कालीन गृह सचिव मधुकर गुप्ता और कुछ वरिष्ठ अधिकारी पाकिस्तान के खूबसूरत हिल स्टेशन मरी में रुके हुए थे. हमले के साढ़े सात साल बाद यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. गुप्ता के साथ अतिरिक्त सचिव (बॉर्डर मैनेजमेंट) अनवर अहसन अहमद और आखिरी वक्त में शामिल किए गए संयुक्त सचिव (आंतरिक सुरक्षा) दीप्ति विलास और दूसरे अधिकारी भी थे.

पाकिस्तानी अधिकारियों ने दलील दी थी कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल को वहां के गृह मंत्री से मिलना चाहिए, जो उस वक्त यात्रा पर थे. गृह मंत्रालय के अक तत्तकालीन अधिकारी ने कहा कि गृह सचिव स्तर की वार्ता खत्म होने के बाद भी पाक अधिकारियों ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल को एक और दिन रुकने के लिए कहा. उनके ऐसा करने की नीयत पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं.
बताया जा रहा है कि गुप्ता को 26 नवंबर को कहा गया था कि वह 27 नवंबर से पहले गृह मंत्री से बात नहीं कर सकते, क्योंकि वह यात्रा पर हैं. मुंबई में आतंकी हमला अगले दिन यानी 27 नवंबर को भी जारी रहा था. ऐसे हालात में पाक अधिकारियों का भारतीय समकक्षों को एक और दिन रुकने के लिए कहना और साथ ही भारतीय अफसरों का तैयार हो जाना चौंकाने वाला है.
एक पूर्व नौकरशाह ने बताया कि हालांकि हम इस्लामाबाद में दो दिन तक रुके थे. पाकिस्तान ने हमें मरी में एक हिल रिजॉर्ट में ठहराने की योजना बनाई थी. अब सोचें तो शक होता है कि क्या उनका असली मकसद भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का मुंबई हमले पर रिस्पॉन्स को कमजोर करना या इसमें देरी करना तो नहीं था.

भारतीय अफसरों का पाकिस्तान में तय वक्त से ज्यादा ठहरने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना भी सवाल खड़े करता है. क्योंकि हमले में शामिल लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI में कार्यरत अधिकारी भी हैंडल कर रहे थे. गृह मंत्रालय के एक पूर्व अधिकारी ने अब कहा है कि फोन के सिगनल कमजोर थे.

गुप्ता ने बताया है कि उन्हें हमले के बारे में पता चलने पर उन्होंने गृह मंत्रालय में विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) एम.एल. कुमावत से बात की थी. जो उस वक्त हमले पर शुरुआती प्रतिक्रियाएं दे रहे थे. संयुक्त सचिव (पूर्वोत्तर) नवीन वर्मा और उप सचिव (आतंरिक सचिव) आर.वी.एस. मणि उस रात गृह मंत्रालय के कंट्रोल रूम में रुके थे.

मणि ने उस रात को याद करते हुए बताया कि वह और वर्मा 10 घंटे तक कंट्रोल रूम में रुके थे. 27 नवंबर की सुबह NSA के एमके नारायणन ने चार्ज संभाल लिया था. जानकारी के मुताबिक गुप्ता भी 27 नवंबर की दोपहर दिल्ली पहुंच गए थे.

चीन ने NSG में भारत की सदस्यता को लेकर किया विरोध

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विएना: परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की विएना में हुई दो दिवसीय बैठक में इस मुद्दे पर किसी निष्कर्ष पर न पहुंच पाने के बाद एनएसजी में सदस्यता के लिए भारत की अर्जी पर दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में इस महीने के अंत में होने वाले एनएसजी के पूर्ण अधिवेशन में विचार किए जाने की संभावना है।

इससे पहले अमेरिकी समर्थन से मिले बल के बीच एनएसजी की सदस्यता के भारत के दावे को ज्यादातर सदस्य देशों से सकारात्मक संकेत मिले थे, लेकिन चीन इसके विरोध पर अड़ा था। चीन, भारत की सदस्यता का विरोध करने वाले देशों की अगुआई कर रहा था, वहीं तुर्की, न्यूजीलैंड, आयरलैंड, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रिया चीनी रुख के साथ थे।

चीन हमेशा से एनएसजी में भारत की सदस्यता का विरोध करता रहा है। वियना में हुई बैठक में चीन ने सीधे तौर पर तो भारत की सदस्यता का विरोध नहीं किया, लेकिन इसे एनपीटी पर दस्तखत न करने से जोड़ा।

चीन की दलील है कि सिर्फ परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत करने वाले देशों को ही इसमें एनएसजी की सदस्यता मिलनी चाहिए। चीन का यह भी कहना है कि यदि किसी तरह की रियायत देकर भारत को एनएसजी की सदस्यता दी जाती है तो पाकिस्तान को भी इस संगठन की सदस्यता दी जानी चाहिए।

अमेरिका भारत की सदस्यता का पुरजोर समर्थन कर रहा है और ज्यादातर सदस्य देश भी समर्थन कर रहे हैं, लेकिन इसका विरोध कर रहे चीन की दलील है कि एनएसजी को नए आवेदकों के लिए विशिष्ट शर्तों में ढील नहीं देनी चाहिए। एनएसजी संवेदनशील परमाणु प्रौद्योगिकी तक पहुंच को नियंत्रित करता है।

एनएसजी आम राय के आधार पर काम करती है और भारत के खिलाफ किसी एक देश का वोट भी उसकी दावेदारी में रोड़े अटका सकता है। 48 देशों के समूह एनएसजी में चीन के अलावा न्यूजीलैंड, आयरलैंड, तुर्की, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रिया भी भारत की दावेदारी के विरोध में हैं। सियोल में 24 जून को एनएसजी का पूर्ण अधिवेशन होने वाला है।

वहीं चीन ने माना है कि भारत और अमरीका के सम्बंध अभूतपूर्व मुकाम पर हैं। चीन ने सरकार नियंत्रित समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स के माध्यम से कहा है कि चीन भारत के विकास में सहयोग देने को तैयार है। चीन के बगैर भारत के सपने साकार नहीं होंगे।

चीन ने जहां अमरीका पर एशिया-प्रशांत क्षेत्र को अस्थिर करने का आरोप लगाया है, वहीं भारत को समझाने की कोशिश की है कि वह अपनी गुट निरपेक्ष नीति से न हटे। यह उसकी विरासत है।

प्यारे-मोहन संवाद

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प्यारे – ”मोहन कुछ सुना?”
मोहन – ”नहीं तो क्या हुआ?”
प्यारे – ”पूरी दुनिया में तहलका मच हुआ है.”
मोहन – ”क्यों ? आईएसआईएस वालों ने कहीं परमाणु बम गिर दिया क्या?”
प्यारे – ”उससे भी खतरनाक बम फटा है पनामा पेपर नाम का. दुनिया में जितने महान लोग हैं, सबने अपने-अपने देश से टैक्स चोरी करके अरबों रुपये फ़र्ज़ी कंपनी बनाकर जमा कर रखे थे.”
मोहन – ”यानी महान लोगों के महान कार्य.”
प्यारे – ”अब बेशर्मों की तरह कह रहे हैं कि हमने कोई चोरी नहीं की है.”
मोहन – ”महान लोगों की महान बातें. कुछ भी कहो, ये महान लोग हैं इनके इस महान कार्य को चोरी नहीं कहा जा सकता. चोरी उसे कहते हैं जो पेट भरने के लिए की जाये. और यह गरीब आदमी करता है जो इनके इन्हीं महान कार्यों की वजह से और गरीब होता जा रहा है.”
प्यारे – ”हाँ, यह तो सोचने वाली बात है.”

'भाभी जी घर पर हैं' को लेकर नर्वस थीं नई अंगूरी भाभी शुभांगी

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लोकप्रिय टेलीविजन धारावाहिक ‘भाभी जी घर पर हैं’ में शिल्पा शिंदे की जगह अंगूरी भाभी का किरदार निभा रहीं अभिनेत्री शुभांगी अत्रे ने बताया कि वह घर-घर में पहचानी जाने वाली अंगूरी भाभी का किरदार निभाने से पहले उत्साहित होने के साथ-साथ नर्वस भी थीं.

शुभांगी ने कहा, ‘टेलीविजन पर इस खूबसूरत किरदार को निभाने का विकल्प चुनने पर काफी उत्साहित होने के साथ-साथ मैं नर्वस भी थी. अंगूरी का किरदार निभाना चुनौतीपूर्ण है.’
छोटे पर्दे की ‘भाभी जी’ शिल्पा शिंदे का टीवी प्रोडक्शन हाउस एडिट-2 संपादित द्वितीय के साथ कुछ मतभेद हो गया था. उन्हें कानूनी नोटिस भेजा गया था. इसके बाद वह शो से निकल गईं.
‘कसौटी जिंदगी की’, ‘कस्तूरी’ और ‘चिड़ियाघर’ जैसे धारावाहिकों में नजर आ चुकीं शुभांगी को उम्मीद है कि किरदार की लोकप्रियता बनी रहेगी और उन्हें भी वही प्यार मिलेगा, जो पहले वाली ‘भाभी जी’ को मिला था. उन्होंने कहा, ‘अब मेरा काम निर्देशक के नजरिए को समझना है और इसके साथ पूरी तरह न्याय करना है. मुझे आशा है कि इस शो के प्रशंसक मुझे भी वहीं प्यार देंगे जो उन्होंने पहले इस किरदार को दिया.’

शुभांगी ने कहा कि धारावाहिक की पूरी टीम ने उन्हें सहज महसूस कराया. उन्होंने कहा, ‘शूटिंग के दौरान मैं पहले ही घबरा गई लेकिन सभी इतने मिलनसार थे कि उन्होंने मुझे सहज महसूस कराया.’

पुस्‍तक समीक्षा : ज़िन्दगी के ज़ज्बातों से खनकती एक अनूठी गुल्लक

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आज जब हिंदी में साहित्य का अर्थ निरपवाद रूप से केवल कहानी, कविता और बहुत हुआ तो उपन्यास रचना ही रह गया है, ऐसे में मनीषा श्री की किताब ‘जिंदगी की गुल्लक’ इतना संतोष जरूर देती है कि हिंदी साहित्य के इस बासी से हो रहे माहौल में भी कुछ नया व ताज़ा करने की कोशिश पूरी तरह से मरी नहीं है। मनीषा की इस किताब का सबसे प्रमुख नयापन है, इसमे मौजूद ‘विधागत प्रयोग’।

ये किताब न तो पूरी तरह गद्य है और न ही पूरी पद्य। यह न तो कोई कहानी, कविता, निबंध आदि का संग्रह है और न ही उपन्यास, नाटक आदि की रचना; इसकी रचावट-बनावट कुछ यूं है कि इसमे कविता भी है और कहानी भी। यूं कह सकते हैं कि कहानियों की कविताएं या कविताओं की कहानियों का संग्रह है ये किताब। चूंकि कोई भी कविता पढ़ते समय पाठक उसके प्रति मन में अपने अनुसार एक कल्पना-चित्र बना लेता है कि ये कविता इस भाव को प्रदर्शित कर रही है। लेकिन, यह कत्तई जरूरी नहीं कि रचनाकार ने उस कविता की रचना उसी भाव में की हो। अब जैसे कि एक पेड़ पर यदि पांच लोग कविता लिखें तो यह तय है कि सबकी नहीं तो कईयों की कविताएं अलग होंगी। निष्कर्ष यह कि पेड़ एक ही है, पर उसके प्रति सबका नजरिया अलग-अलग है।
इसी तरह कोई रचनाकार रचना अपनी दृष्टि से करता है और पाठक उसे अपनी दृष्टि से समझता है, दोनों की दृष्टि एक भी हो सकती है और अलग भी, लेकिन मनीषा की इस किताब में कविताओं की कहानियां देकर इस समस्या को ही समाप्त कर दिया गया है, यानी कि अमुक कविता किस कारण से और किस भाव व मनोस्थिति में लिखी गई है, ये पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया गया है। पुस्तक का जो गद्य है, उसे संस्मरण और डायरी जैसी श्रेणियों में रखा जा सकता है। बाकी तो छंदमुक्त-अतुकांत कविता है ही।

यूं तो इस किताब का प्रत्येक अध्याय अपने आप में स्वतंत्र है, लेकिन जरा गहराई से अगर गौर करें तो यह स्पष्ट होता है कि स्वतंत्र से दिखने वाले ये अध्याय कहीं न कहीं एक दूसरे से क्रमवार ढंग से न केवल जुड़े हैं, बल्कि लेखिका को अपने अब तक के जीवन में मिले अनुभवों का क्रमवार विश्लेषण भी हैं।

इसी क्रम में किताब के कुछ प्रमुख अध्यायों पर एक संक्षिप्त नज़र डालें, तो इसका पहला अध्याय ‘शब्द’ किताब की वास्तविक भूमिका है। इसमें जीवन की आपा-धापी से कुछ समय मिलने पर लेखिका में लेखन की अन्तःप्रेरणा उत्पन्न होती है, और वो अपनी सबसे प्यारी सहेली यानी अपनी डायरी की तरफ मुड़ती है। दूसरे अध्याय में चीजें फ्लैशबैक में चली जाती हैं और एक बच्चे को जन्म देने जा रही लेखिका काफी पीछे शादी से पहले की आईआईटी में ऑल इण्डिया 20 रैंक लाने वाली एक छात्रा हो जाती है, जिसे तब उसके नाना समझाते हैं कि कामयाबियां कितनी भी बड़ी हों, कदम हमेशा जमीन पर ही रहने चाहिए और नाना की यही सीख लेखिका के इस अध्याय की कविता है – कदम जमीन पर रहें।

तीसरे अध्याय ‘जिंदगी’ में लेखिका आइआइटी मे अंतिम वर्ष में है, लेकिन आर्थिक मंदी के कारण प्लेसमेंट करने कोई कंपनी नहीं आ रही, जिस कारण बेहद हताश और परेशान है। वो काबिल है, लेकिन किस्मत के कारण उसे नौकरी नहीं मिल पा रही। तिस पर घर वालों की उम्मीदों का दबाव अलग है। इन तनावों में उलझा उसका दिमाग एक बारगी आत्महत्या जैसी चीज तक सोच लेता है। हताशा की इस हालत में जब फोन पर उसके पापा यह कहते हैं कि ‘पापा इज ऑलवेज विथ यू’ तो जैसे उसे ‘लाइफ टॉनिक’ मिल जाती है और जिंदगी फिर खूबसूरत लगने लगती है।
कुल मिलाकर ज़िन्दगी के उत्साह-उम्मीद-निराशा-तनाव आदि विविध गाढ़े-फीके रंगों और उन पर मनुष्य की प्रतिक्रियाओं का बाखूबी चित्रण इस अध्याय में हुआ है। ऐसे ही, 13वे अध्याय ‘कोशिश’ में दुर्घटना से पैर में फ्रैक्चर के बावजूद लेखिका अकेले ही खुद को और अपने छोटे-से बेटे को अपनी कोशिशों से संभालने की घटना का जिक्र कर कोशिश के महत्व और उसके बाद होने वाले संतोष को बाखूबी बयां की है, तो वही 14वें अध्याय ‘सपने’ में लेखिका ने अपने मां बनने के सपने और उसके पूरे होने में हुई जद्दोजहद का वर्णन करते हुए यही कहने की कामयाब कोशिश की है कि सपना कोई भी हो, उसके पूरा होने का एक सही वक़्त होता है और उसे तभी पूरा होना चाहिए।

इसी तरह आगे के कुछ अध्यायों जैसे ‘दहेज़’, ‘बेटी की मां’, ‘मां हूं, भगवान् नहीं’, आदि में लेखिका द्वारा बेटी या कि स्त्री के प्रति समाज के संकुचित दृष्टिकोण पर बेबाकी और तार्किकता के साथ अपनी बात कहने की काफी हद तक कामयाब कोशिश की गई है। ‘मां’ और ‘मेरे पापा’ जैसे अध्याय तो शीर्षक से ही स्पष्ट हैं कि लेखिका के अपने माता-पिता से समबन्ध के वर्णन को समर्पित हैं। फिर अन्धविश्वास, वक़्त, टुकड़े, असमंजस, नदी की कहानी, आदि में भी जीवन के विविध पहलुओं की मौजूदगी है।

इन सब में किताब का 12वां अध्याय ‘मै चुप थी’ सबसे बेहतरीन है। इसमें काम से थकी-हारी लेखिका जब अपने पति के पास जाती है तो वो खुद अपनी परेशानियों में उलझा है और लेखिका पर चिल्ला पड़ता है तथा गुस्से में उसके सभी पारिवारिक योगदानों को नकार देता है। लेखिका इन बातों का जवाब देने में पूर्णतः समर्थ है, लेकिन वो अपने रिश्ते को इस क्षणिक आवेश की भेंट नहीं चढ़ने देना चाहती, इसलिए चुप रहती है और अगली सुबह सबकुछ ठीक हो जाता है। लेकिन उसका यह भी कहना है कि आज तो मै चुप रही…“बस एक गुज़ारिश है कि समय पड़ने पर तुम भी मुझको सुनना, मेरे गुस्से को झेलना क्योंकि मेरे पास सिवा तुम्हारे कोई नहीं है जिसके सामने अपना दिल खोल सकूं।”

इस प्रकार अधिकांश समकालीन स्त्रीवादियों के लिए भी यह अध्याय पठनीय है कि सशक्त स्त्री के नाम पर उनके द्वारा स्त्री को लड़ाकू, हठी या अभिमानिनी बनाने के जो विचार गढ़े जा रहे हैं, वो कत्तई सच्चा स्त्री सशक्तिकरण नहीं है। वे इस अध्याय की स्त्री को देखें जो सशक्त तो है किन्तु समझदार, लचीली और धैर्यवान भी है और अपनी सशक्तता के भौंडे प्रदर्शन के लिए अपने रिश्ते की तिलांजलि नहीं देती क्योंकि, उसमे ये समझ है कि हर बात को सिर्फ स्त्री-पुरुष की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। कुल मिलाकर इस अध्याय को हासिल-ए-किताब भी कहा जा सकता है।
भाषा-शैली की बात करें तो मनीषा की भाषा काफी लचीली है, जिसमे वे बातचीत के अंदाज में अपनी बातें कहती जाती हैं। हालांकि अभी यह मनीषा की पहली किताब है तो इसमें शब्दों के प्रयोग में तनिक असावधानी दिखती है। असावधानी ये कि एक ही वाक्य में चार हल्के और सामान्य शब्दों के साथ दो भारी-भरकम शब्दों जिनका पर्याय आम बोलचाल के शब्दों में भी उपलब्ध है, का इस्तेमाल मनीषा कर गई हैं। जैसे कुछ वाक्य हैं, ‘बेफिक्र होकर अपना कर्म कर’, ‘भले लड़का कितना ही विवेकशील क्यों न हो’, ‘जीत नमक रहित पकवान की भांति’ इन वाक्यों में कर्म, विवेकशील, भांति जैसे भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग हुआ है जिनसे अर्थ पर तो नहीं लेकिन, वाक्य के प्रवाह और सौन्दर्य पर प्रभाव पड़ता है। दूसरे वाक्य में ‘विवेकशील’ की जगह समझदार शब्द रखिये तो भी अर्थ यही रहेगा लेकिन, वाक्य अधिक सहज और ग्राह्य हो जाएगा। यह लेखन का कला-पक्ष है, इसमे मनीषा को अभी जरा और काम करने की आवश्यकता है।

इसी क्रम में अगर कविताओं की बात करें तो मनीषा के पास कथ्य और भाव तो भरपूर हैं जिन्हें उन्होंने अपनी कविताओं में ठीकठाक बयाँ भी किया है। लेकिन अभी इस दिशा में उन्हें और मेहनत करने की जरूरत है। अतुकांत कविता के स्तर को गिराकर आज के रचनाकारों ने उसे जरूरत से ज्यादा आसान बना दिया है, अन्यथा उसका भी एक ढंग होता है।

चूंकि, अतुकांत कविता में लय-तुक नहीं होती, इसलिए अगर आप सावधान नहीं रहे तो वो कब गद्य बन जाएगी आपको पता भी नहीं चलेगा। इसलिए उसकी रचना के समय उसके पदों में एक अलग-सा प्रवाह रखा जाता है ताकि वो गद्य न बने और ये करना पूरी तरह से रचनाकार की सृजन क्षमता पर ही निर्भर करता है। मनीषा ने काफी हद ऐसा करने की कोशिश की है लेकिन, अभी और प्रयास की जरूरत है। साथ ही कविताओं में भी शब्दों को लेकर उन्हें उपर्युक्त प्रकार से ही सावधान रहने की जरूरत है।

बहरहाल, कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि मनीषा की इस गुल्लक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये अपनी बनावट (डिजाईन) में ही एकदम अलग और अनूठी है और हमें यह मानना होगा कि इस गुल्लक ने अपने आप में हिंदी साहित्य को विधागत स्तर पर और समृद्ध करने का ही काम किया है। गुल्लक के अन्दर सबके लिए कुछ न कुछ मौजूद है।

बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक किसीको भी ये गुल्लक निराश नहीं करने वाली। और चूंकि, मनीषा शहरी परिवेश में पली-बढ़ी एक प्रगतिशील लड़की रही हैं, इसलिए उनके अनुभवों से भरी ये गुल्लक कहीं न कहीं शहरी प्रगतिशील लड़कियों के अनुभवों का प्रतिनिधित्व करने की भी विशेष क्षमता रखती हैं।

संभव है कि मनीषा की इस गुल्लक से कहानी-कविता-उपन्यास में डूबे हिंदी साहित्य के समकालीन सूरमाओं को भी कुछ नया रचने की प्रेरणा मिले और वे समझें कि अभी बहुत कुछ है, जिसे रचकर हिंदी साहित्य को न केवल कथ्य के बल्कि कला और शिल्प के स्तर पर भी और समृद्ध किया जा सकता है। आखिर में, इस सुन्दर व सार्थक रचना के लिए मनीषा को ढेरों बधाइयां.!

रुलाने वाली है 'प्यासा' बनने के पीछे की कहानी

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गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ को हिन्दी सिनेमा इतिहास की दुर्लभ फिल्मों में से एक है। फिल्म की पढ़ाई होने वाले संस्‍थानों में इसे भगवान की तरह पूजते हैं। इसके बनने में एक वेश्या का बहुत बड़ा योगदान है। इसके बारे में फिल्म के लेखक अब्रार आल्वी किताब ‘टेन ईयर्स विद गुरुदत्त’ में बड़े ही विस्तार से और भावनात्मक तरीके से बताते हैं।

एक दिन अब्रार से उनके कॉलेज के दिनों के कुछ दोस्त मिलने आए। उन्हें लेकर समुद्र किनारे निकल गए। वहां कुछ बातचीत के बाद तीन लड़कियां पेश की गईं। उनमें दो पंद्रह-सोलह साल की थी और तीसरी अट्ठाइस-उनतीस साल की। अब्रार से उनमें एक चुनने के लिए कहा गया। अब्रार बताते हैं कि तब वह इन मामलों में ‘अनाड़ी’ थे। उनकी समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। दोस्तों की जिद थी कि कोई एक चुननी पड़ेगी मजबूरी में अब्रार ने बड़ी उम्र की औरत की ओर इशारा किया।

अब्रार बताते हैं कि इस पर वह औरत भौंचक्की रह गई। उसने परेशान होकर कहा, ‘इन कमसिन कलियों के होते हुए, मुझे’। हालांकि फिर शाम ढली, रात आई, जैसे रात जवान होती गई, उनके सारे दोस्त समुद्र किनारे लड़कियां लेकर निकलते गए। लेकिन अब्रार वहीं उस औरत के साथ एक कुटीर में बैठे रहे, उससे बात करने पर पता चला उसका नाम, ‘गुलाबो’ है।
फिल्म ‘प्यासा’ में गुलाबो की पहली झलक भ्रामक है। वह अपनी पीछ कैमरे की ओर किए खड़ी होती है, एक महीन, पारदर्शी साड़ी में लिपटी। जैसे फिल्‍म आगे बढ़ती है, गुलाबो का चरित्र खुलकर सामने आता है। वह एक पारंपरिक सड़कछाप वेश्या है। लेकिन उसमें एक गरिमा छिपी है साथ ही उस शायर के लिए प्रेम और सम्मान भी। यह कोई कोरी कल्पना नहीं। उस रात के बाद अब्रार और गुलाबो के बीच पनपे रिश्ते की असल कहानी है।

अब्रार एक लेखक थे। स्वभावतन लेखक किस्म के आदमियों को जिंदगियों की अनुभव खींचते हैं। उस रात जब अब्रार को उनके दोस्त गुलाबों सौंप कर रंगरेलिया मनाने में व्यस्त हो गई, तब अब्रार ने उस औरत से लगातार बातें करते रहे। सुबह करीब छह बजे जब अब्रार के दोस्तों को आया तो वह वहां से तत्काल चले जाना चाहते थे। लेकिन अब्रार का मन था कि उन्हें उसी कार में बिठाया जाए, जिसमें गुलाबो को बैठाया जा रहा है, ताकि वह उससे थोड़ी और बात कर सकें।

अब्रार बताते हैं कि इन सब के बीच अचानक गुलाबो ने अचानक मेरी कलाई पकड़कर कहा, ‘मेरे साथ चलो ना, कुछ देर और साथ रहेगा’‌। मैंने कहा, ‘कार में इतनी जगह नहीं है कि सब अट पाएं’, तो उसने कहा, ‘मेरी गोद में बैठ जा ना बुद्धू’ और हंसने लगी। किताब लिखे जाने तक अब्रार की अच्छी खासी उम्र हो चली थी, लेकिन उनकी यादयाश्त की दाद देनी पड़ेगी। उन्हें पूरी तरह से याद था। गुलाबो का घर बस स्टेशन के बाद पहली गली यानि तेली गली के पास गुलाबो का निवास था। उसका कोठा मुर्गी गली में था।

उस एक रात में अब्रार ने गुलाबो के साथ शारीरिक संबंध तो नहीं बनाए थे, लेकिन उन्होंने गुलाबो को इतना आकर्षित कर लिया था कि गुलाबो ने खुद ही उनसे आगे मिलने के तरीके ढूंढ़ने लगी थी। एक दिन अब्रार उसके निवास स्‍थान पर उससे मिलने गए तो एक लड़की ने बहाना बनाकर उन्हें गुलाबो से रोकने की कोशिश की। लेकिन गुलाबो ने उसे सुन लिया और शेरनी की तरह उस पर झपट्टा मार पड़ी। एक-दूसरे नोचते-खरोचते गुलाबो ने अब्रार का हा‌‌थ पकड़ा और एक टैक्सी में बैठ गई।

कुछ देर बाद एलिफिंस्टिन रोड स्थित एक इमारत के सामने टैक्सी रोकवाई। अब्रार के पास टैक्सी वाले को देने को पैसे भी नहीं थे। अब्रार बताते हैं कि उन्होंने खुद को बेहद असहाय महसूस किया। वहां हल्की और फीकी रोशनी थी और कमरे में बस एक ही बिस्तर था। दोनों बैठकर बातें करने लगे। तभी कोई दरवाजा खटखटाने लगा। अब्रार की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। लेकिन गुलाबो ने दौड़कर दरवाजा खोला। सामने वाले शख्स ने उसे अखबार में लिपटी हिन्दुस्तानी व्हिस्की का एक पौवा दिया।

अब्रार कहते हैं कि उस रात पीते-पिलाते और बातें करते उन्होंने ऐसी गुलाबो देखी जो पहले कभी नहीं देखी थी। वह कहते हैं, ‘मुझे याद है कि बातों के बीच में मैंने एक बार गालियों की झड़ी लगा डाली। जिसे सुनते ही गुलाबो ने आगे झुककर मेरे मुंह पर हाथ रख दिया। अरे ये क्या, क्यों मुझे रोक रही हो! उसने मुझे एक पल के लिए देखा और अपना सिर दीवार की तरफ घुमाते हुए अपने हाथों से अपनी आंखें बंद करते हुए दिल पर लगने वाली बात बोली।’

गुलाबो ने अब्रार से कहा, ‘मैं एक गिरी हुई लड़की हूं, एक वेश्या, पर तुम तो ऐसी नहीं। तुम्हारे मुंह से ये अपशब्द शोभा नहीं देते।’ बाद पता चला गुलाबो जन्म से वेश्यावृति के धंधे में नहीं थी। वह मजबूरन इस धंधे में आई थी। उसका जन्म एक हिन्दु ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उसका नाम, ‘देवी’ था। किशोरावस्था में एक मनमोहक हृष्टपुष्ट सिपाही पर उसका दिल आ गया। उसी के चक्कर में वह घर छोड़कर भाग गई। लेकिन भागने के बाद पता चला वह पहले से शादीशुदा है।

बेघर और विवशता की हालत में वह इधर-उधर भटक रही थी। तभी एक कोठे वाली मौसी की नजर उस पर पड़ी। और वही से वो ‘देवी’, ‘गुलाबो’ हो गई। एक तरफ गुलाबो खुलती गई। दूसरी तरफ अब्रार ‘मिस्टर एंड मिसिज 55’ में व्यस्त होते गए। उन दिनों को याद करते हुए अब्रार बताते हैं, ‘मुझे कभी-कभी ऐसा लगता था कि मैं गुलाबो पर कठोर हो रहा था, उसकी मित्रता को गंभीरता से नहीं ले रहा था।’ कुछ सोचकर अब्रार धीरे कहते हैं, ‘कुछ भी हो उस समय की सच्चाई यही थी। आज अगर जब मैं उन दिनों को याद करता हू तो मेरा मन ग्लानि से भर जाता है’। क्या हुआ इसके बाद गुलाबो का।

कई दिनों अपनी शूटिंग में व्यस्त रहने के बाद एक दिन अचानक जब अब्रार गुलाबो से मिलने पहुंचे तो एक लड़के ने उन्हें रोका, ‘मेरी मां बहुत बीमार है। पिताजी उसे डॉक्टर के पास ले गए हैं। वह जल्दी ही आती होगी। उसने मुझसे कहा था कि आप आ सकते हैं। वह चाहती थी उसके आने तक आप रुको।’

कुछ देर बाद वो आ गई। कुछ बातों के बाद अब्रार जाने लगे। इस पर अचानक उनको देखा और बोली, ‘तुम अब नहीं आओगे न। अब तुम व्यस्त हो चले हो। तुम अपनी गुलाबो को भूल जाओगे। जब कभी भूले भटके मुझसे मिलने आओगे तब बहुत देर हो चुकी होगी।’ असल में उसे टीबी हो गई थी।

एक दिन अब्रार उससे मिलने को व्याकुल हुए। वह उसी इलाके से बस से गुजर रहे थे। उन्होंने बाहर झांक देखा गुलाबो की शव यात्रा गुजर रही थी। पता नहीं क्या उसके चेहरे को नहीं ढका गया था।

एक दिन घर में बैठकर अब्रार ने अपने दिल की ये टीस बस यूं ही गुरुदत्त को सुनाई। गुरुदत्त कहानी पर संम्मोहित हो गए। उन्होंने इस पर फिल्म बनाने की ठान ली। फिल्म बनाते वक्त इसमें आवश्यकतानुसर जोड़-घटाव किए गए। लेकिन मूल कहानी प्यासा की यही से उपजी। फिल्म में कुछ पंक्तियां तो हूबहू वैसी की वैसी रखी गई जैसी गुलाबो के मुंह से निकली थीं।

'वन नाइट स्टैंड'में सनी लियोनी ने तोड़ दी बोल्डनेस की हदें

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सनी लियोनी की आने वाली फिल्म ‘वन नाइट स्टैंड’ का टीजर रिलीज किया गया है। सनी फिल्म में बेहद बोल्ड दिखी हैं। उन्होंने इस फिल्म में जो सीन किए हैं, वो उनकी पुरानी फिल्मों के सारे रिकॉर्ड तोड़ने वाले हैं।

सनी लियोनी की फिल्म ‘वन नाइट स्टैंड’ के नाम से ही साफ है कि फिल्म का विषय बोल्ड होगा। फिल्म के पोस्टर रिलीज के साथ भी फिल्म के बोल्ड होने का प्रमाण मिला। अब फिल्म के टीजर ने तो बोल्डनेस की हदें तोड़ दी हैं।

सनी लियोनी और तनुज वीरवानी की मुख्य भूमिकाओं वाली ‘वन नाइट स्टैंड’ एक ऐसे जोड़े की कहानी है, जो मिलते हैं और एक-दूसरे के नाम तक सही से पूछे बिना सेक्स करते हैं।

एक रात के सेक्स के बाद दोनों अलग हो जाते हैं। मगर इसके बाद भी लड़का लड़की को भूलता नहीं। इस पर लड़की साफ करती है कि वो एक रात के लिए मिले थे इस रिश्ते को आगे मत बढ़ाओ।

इसके बाद भी दोनों के बीच नजदीकी बढ़ती रहती है। लेकिन जब दोनों पास आते हैं, तो दोनों में झगड़े होने लगते हैं।

फिल्म में बिना ज्यादा पहचान के एक रात के लिए संबंध बनाने और फिर अपने रास्ते चल देने की कहानी है। फिल्म में दिखाया गया है कि एक रात के लिए सेक्स करने के लिए बिस्तर पर आना और फिर अपने रास्ते चल देना क्या है। इस तरह के रिश्तों में परेशानी क्या आती है।

फिल्म की चर्चा इसके हॉट सीन को लेकर हो रहा है। टीजर में सनी लियोनी अपने चिर-परिचित अदांज में बेहद मादक लग रही हैं।

कोहली की करिश्माई पारी ने खोला टीम इंडिया के लिए सेमीफाइनल का 'दरवाजा'

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मोहाली में महिला टीम की हार के बाद उसी मैदान पर विराट कोहली के बल्ले ने ऐसा आग उगला कि कंगारू टीम के सारे आक्रमण धरे के धरे रह गए। एक तरह से नॉकआउट कहे जाने वाले इस मुकाबले में टीम इंडिया ने कोहली के चमत्कारिक प्रदर्शन की बदौलत ऑस्ट्रेलिया को 5 गेंद शेष रहते 6 विकेट से हराते हुए लगातार दूसरी बार सेमीफाइनल में प्रवेश कर लिया।

पिछली बार की उपविजेता रही टीम इंडिया ने सेमीफाइनल में पहुंचने के लिए दमदार खेल दिखाया और ऑस्ट्रेलिया से मिले 161 रनों के लक्ष्य के जवाब में भारत ने 19.1 ओवर में ही यह लक्ष्य हासिल कर लिया। कोहली एक बार फिर जीत के नायक बने और उन्होंने 51 गेंदों में 9 चौके और 2 छक्के की मदद से अविजित 82 रनों की पारी खेली। साथ ही उन्होंने कप्तान धोनी के साथ पांचवें विकेट के लिए 67 रनों की अटूट साझेदारी की। जीत का चौका धोनी के बल्ले से निकला। कप्तान ने 9 गेंदों में 14 रन बनाए।

अब सेमीफाइनल में टीम इंडिया का मुकाबला वेस्टइंडीज से 31 मार्च को होगा। जब‌कि वर्ल्ड कप का पहला सेमीफाइनल मुकाबला बुधवार 30 मार्च न्यूजीलैंड और इंग्लैंड के बीच होगा। मोहाली में पहले बल्लेबाजी करते हुए कंगारू टीम ने 6 विकेट पर 160 रन बनाए। उसकी ओर से ऐरोन फिंच ने 43 रनों की सबसे बड़ी पारी खेली।

हार्दिक पांड्या ने 2 विकेट झटके जबकि अपना अंतिम अंतरराष्ट्रीय मैच खेल रहे शेन वाटसन ने भी 23 रन देकर 2 विकेट लिए। ऑस्ट्रेलिया के बाहर होने से वाटसन का अंतरराष्ट्रीय करियर यहीं पर खत्म हो गया। उन्होंने इस मैच से पहले ही ऐलान कर दिया था कि इस टी-20 वर्ल्ड कप के बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लेंगे।

सेमीफाइनल में जाने के लिए मिले 161 रनो के जवाब में भारतीय ओपनिंग जोड़ी ने अच्छी शुरुआत दी। शिखर धवन ने पहले ओवर में अपनी पहली गेंद पर चौका जड़ा। तीसरे ओवर में धवन ने हेजलवुड की गेंद पर छक्का लगाया। अगले ओवर में रोहित ने भी मैच में अपना पहला चौका घुमाया। लेकिन चौ‌थे ओवर में वह (13) कैच आउट हुए।

पहला विकेट गिरने के बाद विराट कोहली ने आते ही लगातार दो चौके लगाए। कुछ ही देर में रोहित शर्मा (12) कंगारू गेंदबाज शेन वॉटसन की गेंद पर बोल्ड हुए। इसके बाद सुरेश रैना (10) ने एक चौका लगाया। लेकिन कंगारू ऑलराउंडर वॉटसन की घातक गेंद का शिकार हो गए।

12 वें ओवर में विराट कोहली ने टीम की ओर से दूसरा छक्का लगाया। अगले ओवर में युवराज के छक्के ने मोहाली के मैदान की रौनक बढ़ा दी। चोटिल होने के चलते युवराज मैदान में काफी संघर्ष करते हुए नजर आए। 14 वें ओवर में उन्होंने अपना विकेट गंवाया। दोनों के बीच चौथे विकेट के लिए 45 रनों की साझेदारी हुई। युवराज 21 के स्कोर पर वॉटसन के शानदार कैच का शिकार हुए।

उनके बाद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी क्रीज पर पहुंचे। धोनी के चौके ने भारत के 100 रन पूरे किए। फिर कोहली ने अपने बल्ले की हनक दिखाई और 17 वें ओवर में फिफ्टी पूरी की। अगले ओवर की पहली दो गेंदों पर कोहली ने दो ताबड़तोड़ चौके और अगली गेंद पर एक छक्का लगाया। अब 12 गेंदों पर भारत को जीत के लिए 20 रनों की जरुरत थी। पहली गेंद डॉट जाने के बाद कोहली ने 19 वें ओवर की दूसरी, तीसरी और चौ‌थी गेंद पर ताबड़तोड़ तीन चौके जड़े। आखिरी गेंद पर भी कोहली ने चौका लगाया। आखिर ओवर में कप्तान धोनी के चौके ने टीम इंडिया की जीत में मुहर लगा दी।

टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी ऑस्ट्रेलियाई टीम की बल्लेबाजी बेहद आक्रामक रही। हालांकि पहले ओवर में भारतीय तेज गेंदबाज आशीष नेहरा ने कंगारू ओपनर उस्मान ख्वाजा को एक ही चौका दिया लेकिन अगले ओवर में ख्वाजा ने जसप्रीत बुमराह को नहीं बख्‍शा और उनके ओवर में चार ताबड़तोड़ चौके जड़ दिए। तीन ओवर में 32 रन लुटाने के बाद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने चौथे ओवर में ही फिरकी गेंदबाज आर अश्विन को उतार दिया।

अश्विन को भी कंगारूओं ने नहीं छोड़ा और उनके पहले ही ओवर में एेरोन फिंच ने लगातार दो छक्के जड़ दिए। ऑस्ट्रेलियाई टीम महज चौ‌थे ओवर में ही 50 रन का आंकड़ा पार कर गई। लेकिन पांचवें ओवर में टीम की वापसी कराते हुए नेहरा ने ख्वाजा (26 रन, 6 चौके) को विकेट के पीछे कैच आउट कराकर चलता किया। पहले झटके के बाद भारतीय गेंदबाजों ने कंगारू बल्लेबाजों पर दबाव डालना शुरू किया। तीसरे नंबर पर डेविड वॉर्नर पहुंचे। दूसरी सफलता अश्विन ने डेविड वॉर्नर (6) को आउट कर दिलाई।

युवराज ने अपनी पहली ही गेंद पर कंगारू कप्तान स्टीव स्मिथ (2) को आउट कर भारत की झोली में तीसरी सफलता डाली। 13 वें ओवर में फिंच (43) ने हार्दिक पांड्या की गेंद पर चौका जड़कर टीम के 100 रन पूरे किए। हालांकि अगली गेंद पर वह बाउंड्री पर कैच आउट हो गए। 17 वें ओवर में तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह ने खतरनाक लग रहे ग्लेन मैक्सवेल (31) को आउट कर भारत की झोली में पांचवीं सफलता डाली। आखिर में भारत की ओर से कसी हुई गेंदबाजी हुई। हार्दिक ने आखिर ओवर की पहली गेंद पर जेम्स फॉकनर (10) को बाउंड्री पर कैच आउट किया।

सूखे की स्थिति और पानी का सीएम ने लिया जायजा

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मुंबई। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए राज्य के 21 कलेक्टरों के साथ बातचीत कर सूखे की स्थिति और चारा-पानी की उपलब्धता का जायजा लिया। इस दौरान सीएम ने जिला कलेक्टरों को यह अधिकार दिया कि वे सूखे से निपटने के लिए अपनी शक्तियों का पूरा इस्तेमाल करें, साथ ही किसानों और आम जनता की मदद के लिए एक हेल्पलाइन नंबर जारी करने और उसे चौबीस घंटे संचालित करने के लिए वार रूम बनाने का निर्देश भी दिया।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि मुख्यमंत्री ने कलेक्टरों को निर्देश दिया कि पानी की आपूर्ति पर ध्यान केंद्रित करें और अवैध रूप से पानी की बिक्री में लगे लोगों पर कठोरतम कार्रवाई करें। सीएम ने कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से फसल बीमा योजना, जलयुक्त शिवार योजना और मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत शुरू काम की प्रगति पर समीक्षा की। खेत तालाब योजना, स्थान व्यवहार्यता के लिए भूजल सर्वेक्षण करने का भी निर्देश दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार को राज्य में खेत तालाबों के लिए 69,986 आवेदन पत्र मिले हैं। उन्होंने कलेक्टरों को प्रधानमंत्री कृषि सिंचन योजना को जिले वार लागू करने के निर्देश दिए हैं। इंदिरा आवास योजना, रमाई और शबरी योजना को तेजी से लागू करने के भी आदेश दिए।

अलग राज्य की मांग करने वाले महाराष्ट्र के महाधिवक्ता ने दिया इस्तीफा

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अलग विदर्भ राज्य की मांग करके चौतरफा फंसे राज्य के महाधिवक्ता श्रीहरि अणे ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने आज सुबह अपना इस्तीफा राज्यपाल के विद्यासागर राव को सौंप दिया। हालांकि अभी उसे स्वीकार किया गया नहीं इस संबंध में कोई जानकारी नहीं मिल सकी है।

बता दें कि महाराष्ट्र के महाधिवक्ता श्रीहरि अणे ने मराठवाड़ा को अलग राज्य बनाने की मांग की थी। जिसके बाद महाराष्ट्र की सियासत गरमा गई। राज्य सरकार में शामिल शिवसेना सहित विपक्षी दल कांग्रेस और एनसीपी ने अणे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया ‌था। विपक्ष ने अणे के बयान को लेकर सोमवार को विधानसभा और विधान परिषद में कामकाज नहीं होने दिया।
वहीं, शिवसेना भी उनके खिलाफ खुलकर सामने आ गई और शिवसेना के मंत्रियों ने अणे को पद से हटाए बिना कैबिनेट की बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया। इस हंगामे के बाद भाजपा के एक नेता ने बताया था कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अणे को अपना पद छोड़ने के लिए कह सकते हैं।

शिवसेना ने श्रीहरि अणे को महाराष्ट्र का ओवैसी बताते हुए कहा है कि जिस तरह से एमआईएम के औवैसी बंधु देश के टुकड़े करने का प्रयास कर रहे हैं, उसी तरह राज्य के महाधिवक्ता महाराष्ट्र के टुकड़े करने की बयानबाजी कर रह रहे हैं। विधानसभा में विपक्ष के नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल एवं एनसीपी नेता धनंजय मुंडे ने अणे को निलंबित किए जाने की मांग की थी।

वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि अणे को पदमुक्त किए जाने तक सदन नहीं चलने देंगे। अणे इससे पहले विदर्भ को अलग राज्य बनाने के लिए जनमत संग्रह कराए जाने की मांग कर चुके हैं। हालांकि उनके उस बयान पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उस समय उनका बचाव करते हुए कहा था कि अलग राज्य के गठन का अधिकार संसद और केंद्र सरकार का है, इसलिए उन्हें त्यागपत्र देने की जरूरत नहीं है।