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हार के लिए मतदान

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चौंकाने वाली जीत और हार आमतौर पर सीधे चुनावों में देखी जाती है. अप्रत्यक्ष रूप से होने वाले राज्य सभा चुनावों में ऐसा कम होता है और जब होता है तो यह अक्सर आपसी कलह और संदिग्ध किस्म के बाहरी प्रभाव की कहानी कहता है. हालिया राज्य सभा चुनावों के आखिरी दौर में हरियाणा में कांग्रेस और कर्नाटक में जनता दल (सेकुलर) को उनके ही विधायकों ने झटका दे दिया. इन दलों के नेतृत्व ने जो रणनीति बनाई थी वह धरी की धरी रह गई. नेतृत्व के फैसलों से असंतुष्ट विधायकों ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार की हार सुनिश्चित कर दी.

हरियाणा में चेतावनी के संकेत पहले ही मिल गए थे. लेकिन भाजपा द्वारा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार और मीडिया क्षेत्र के दिग्गज सुभाष चंद्रा को किसी भी कीमत पर हराने को आतुर कांग्रेस हाईकमान ने इनकी उपेक्षा की. वरिष्ठ अधिवक्ता आरके आनंद को जिताने के लिए पार्टी नेतृत्व का इंडियन नेशनल दल से हाथ मिलाना कांग्रेस की हरियाणा इकाई के लिए झटका था. दोनों पार्टियां राज्य में एक-दूसरे की धुर विरोधी रही हैं. कांग्रेस हाईकमान और राज्य इकाई के हित आपस में टकरा रहे थे. हाईकमान इस पर अड़ा था कि राज्य सभा में भाजपा की सीटों में एक की ही सही पर कमी आए. लेकिन पार्टी के विधायक हरियाणा के सियासी रण के समीकरणों को लेकर ज्यादा फिक्रमंद थे.

कांग्रेस के लिए स्थिति इसलिए और खराब हो जाती है कि यह बागी विधायकों के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं है. जिन 15 विधायकों ने जानबूझकर अपने वोट अवैध करवाए उन्हें पार्टी की राज्य इकाई के एक बड़े धड़े का समर्थन हासिल है जिसकी अगुवाई पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुडा कर रहे हैं. अब सुनने की बारी कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व की है.
कर्नाटक में कांग्रेस के लिए हालात उलट रहे जहां उसे दूसरी पार्टी में पड़ी फूट का फायदा मिला. जनता दल (सेकुलर) में बगावत का इतिहास पुराना है. यहां क्रॉस वोटिंग का लेना-देना उम्मीदवार के चयन से ज्यादा पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली से था. बागी विधायकों में से कुछ मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के करीबी माने जाते हैं जो पहले खुद भी जनता दल (सेकुलर) में थे. फिर भी उनकी बगावत का मतलब कांग्रेस से लगाव नहीं बल्कि अपनी पार्टी के नेतृत्व को संदेश देना है. उत्तर प्रदेश में भी गुजराती मूल की कारोबारी प्रीति महापात्रा के पक्ष में कुछ क्रॉस वोटिंग हुई जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी समझा जाता है. हालांकि कांग्रेस के आधिकारिक प्रत्याशी कपिल सिब्बल यहां से जीतने में सफल रहे. अतीत में राज्य सभा चुनाव के कुछ उदाहरणों की तरह इस बार भी अमीर उम्मीदवारों को हर पार्टी से वोट मिलने की खबरें हैं. इससे यह धारणा और मजबूत होती है कि संसद के उच्च सदन के चुनाव में पैसे का असर जारी है.

कोहिनूर 10 लाख करोड़ के उस कर्ज के सामने कुछ भी नहीं जो ब्रिटेन ने हमें वापस नहीं किया

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कोहिनूर को तो शायद हमने ही अंग्रेजों को हमेशा के लिए दिया था पर दूसरे विश्वयुद्ध में आज के मुताबिक जो करीब 10 लाख करोड़ रुपयों का कर्ज ब्रिटेन ने हमसे लिया था, उसका क्या हुआ?
पिछले साल नौ मई को दूसरे विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की विजय की 70वीं जयंती मनाई गई. अमेरिका जैसे कई देशों के बहिष्कार के बीच मॉस्को में हुए इस आयोजन में भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी मौजूद थे. रूस पर इस युद्ध की मार सबसे ज्यादा पड़ी थी. दुनिया भर में चली इस लड़ाई में कुल मिला कर जो छह करोड़ लोग मरे थे, उनमें से दो करोड़ तत्कालीन सोवियत संघ के सैनिक व निवासी थे.

दूसरे विश्व युद्ध की मार भारत पर भी कम नहीं पड़ी थी. आंकड़े बताते हैं कि करीब 25 लाख भारतीय सैनिकों ने इसमें हिस्सा लिया था. लड़ाई के दौरान इनमें 24 हजार से भी ज्यादा मारे गए. घायल या लापता होने वालों की संख्या इससे करीब तिगुनी थी. लड़ाई का खर्च गुलाम भारत के करदाताओं ने भी उठाया. आज के हिसाब से देखा जाए तो भारत ने ब्रितानी हुकूमत को जो रकम लडाई के लिए दी थी, वह आज 150 अरब डॉलर (करीब नौ लाख 75 हजार करोड़ रुपये) से कम नहीं होगी. लेकिन न तो भारत ने कभी यह उधार वापस मांगा, न ही ब्रिटेन ने कभी इसकी कोई चर्चा की.

दूसरे विश्व युद्ध में भारत के करीब 25 लाख सैनिकों ने हिस्सा लिया था. इनमें 24 हजार से भी ज्यादा मारे गए. घायल या लापता होने वालों की संख्या इससे करीब तिगुनी थी.
जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ़ हिटलर ने एक सितंबर 1939 की सुबह पौने पांच बजे पोलैंड पर अकारण हमला कर जब द्वितीय विश्वयुद्ध छेड़ा था, तब भारत अंग्रेज़ों का उपनिवेश था. भारत का इस युद्ध से कुछ लेना-देना नहीं था. तब भी उसे बहुत कुछ देना पड़ गया. दो ही दिन बाद तीन सितंबर को दिन में 11 बजे ब्रिटेन ने और पांच बजे फ्रांस ने भी जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी. दोनों देश पोलैंड की स्वाधीनता के संरक्षक थे. इसी दिन भारत की ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार की ओर से वाइसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो ने कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम लीग के नेताओं और देश की जनता को बताया कि भारत भी जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की स्थिति में है, उसे ब्रिटेन के हाथ मज़बूत करने होंगे.

जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी ने भारत पर थोपी गई इस एकतरफा युद्ध-घोषणा का ज़ोरदार विरोध किया. उनका कहना था कि ब्रिटेन यदि भारतीय जनता का समर्थन चाहता है तो उसे पहले बताना होगा कि युद्ध खत्म होने के बाद भारत के प्रति उसके ‘लक्ष्य और आदर्श’ क्या होंगे. दरअसल ब्रिटिश सरकार प्रथम विश्व युद्ध के समय भी स्वतंत्रता का प्रलोभन देकर भारत को युद्ध में घसीट चुकी थी. कांग्रेस के नेता फिर किसी झांसे में नहीं आना चाहते थे.

ब्रिटेन का साथ नहीं देने की नेहरू-गांधी की नीति और 1942 में महात्मा गांधी के ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’ आंदोलन के बावजूद भारत के 25 लाख से अधिक लोग ब्रिटिश सेना में भर्ती हो कर द्वितीय विश्व युद्ध के एशियाई, यूरोपीय और अफ्रीकी मोर्चों पर लड़े. 30 अप्रैल 1945 को हिटलर द्वारा बर्लिन के अपने बंकर में आत्महत्या कर लेने के एक ही सप्ताह बाद आठ मई को जर्मन सेना ‘वेयरमाख़्त’ के तीन उच्च कमांडरों ने बिना शर्त आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए. इसके साथ ही यूरोप में युद्ध का अंत हो गया. लेकिन एशिया में लड़ाई तब तक चलती रही जब तक छह अगस्त 1945 को हिरोशिमा और नौ अगस्त को नागासाकी पर गिरे अमेरिकी परमाणु बमों ने जापान को तीन सितंबर 1945 के दिन विधिवत आत्मसमर्पण करने पर विवश नहीं कर दिया.
द टेलीग्राफ में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि युद्ध का अंत होते-होते ब्रिटेन पर कुल तीन अरब पाउंड-स्टर्लिंग का जो कर्ज चढ़ गया था उसमें 1.24 अरब की रकम भारत से आई थी.
यह युद्ध तब तक 24,348 भारतीय सैनिकों के प्राणों की भी बलि ले चुका था. 64,354 घायल हुए और 11,754 का कोई पता नहीं चला. जापान में रासबिहारी बोस, जर्मनी में नेताजी सुभाषचंद्र बोस और मलाया-सिंगापुर में कैप्टन मोहन सिंह ने ब्रिटिश सेना से पलायन करने वालों या जापानियों और जर्मनों द्वारा युद्धबंदी बनाये गये भारतीय सैनिकों को मिला कर लगभग 40 हज़ार सैनिकों की एक ‘आज़ाद हिंद फ़ौज़’ बनाई थी. यह फौज ही नेताजी बोस के नेतृत्व में अंग्रेज़ों से लड़ते हुए भारत की पूर्वी सीमा तक पहुंच गयी थी. ये फ़ौज़ी तब तक लड़ते रहे, जब तक जापान ने अमेरिकी परमाणु बमों की मार से हार कर घुटने नहीं टेक दिये.

1914 से 1918 तक चले प्रथम विश्वयुद्ध की तरह दूसरे विश्वयुद्ध के समय भी भारतीय सैनिकों की संख्या सभी मित्र राष्ट्रों के सैनिकों के बीच सबसे अधिक थी. इस बार भी इन सैनिकों के खाने-पीने, अस्त्र-शस्त्र और लड़ने का सारा ख़र्च गुलाम भारत के करदाताओं को उठाना पड़ा. उस समय ब्रिटिश मुद्रा पाउन्ड-स्टर्लिंग के कुल भंडार का एक-तिहाई भारत के पास हुआ करता था. ब्रिटेन की सरकार ने उसमें से जो धन निकाला या उधार लिया, उसे कभी नहीं लौटाया. स्वतंत्र भारत की सरकारें इतनी दानवीर निकलीं कि उन्होंने इस पैसे का न कभी हिसाब-किताब मांगा और न ही कभी इसे लौटाने की बात की. ब्रिटिश अखबार द टेलीग्राफ में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि युद्ध का अंत होते-होते ब्रिटेन पर कुल तीन अरब पाउंड-स्टर्लिंग का जो कर्ज चढ़ गया था उसमें 1.24 अरब भारत से आया था. आज के हिसाब से देखा जाए तो यह आंकड़ा 150 अरब डॉलर से कम नहीं होगा.

इस प्रसंग में इस समय कर्ज के बोझ से कराह रहे यूनान (ग्रीस) का उदाहरण लिया जा सकता है. उसका जर्मनी के साथ एक प्रमुख झगड़ा यह है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जर्मनी ने यूनान पर क़ब्ज़ा करके वहां के राष्ट्रीय बैंक से ज़बरदस्ती जो उधार लिया था, उसे आज तक लौटाया नहीं. इस उधार और युद्ध के कारण हुए नुकसान को यूनानी वित्त मंत्रालय आज 279 अरब यूरो के बराबर बताता है. जबकि यूनान पर आज जो बाहरी कर्ज है, वह कुल मिलाकर 240 अरब यूरो के बराबर है. दूसरे शब्दों में, जर्मनी यदि वह क्षतिपूर्ति कर दे तो यूनान अपने सारे ऋणभार से मुक्त हो जाये. भारत में विदेशी बैंकों में रखे काले धन को लेकर चौतरफ़ा गुहार तो है, पर दूसरे विश्वयुद्ध में ब्रिटेन ने गुलाम भारत से जो उधार लिया उसे लौटाने की बात कभी किसी ने नहीं की.

फ्रांस ने जीत के साथ किया यूरो कप का आगाज, रोमानिया को 2-1 हराया

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पेरिस। फुटबॉल-प्रेमियों का इंतजार खत्म हुआ और रंगारंग प्रस्तुतियों के बीच यूरो कप 2016 का आगाज हो गया। कड़ी सुरक्षा के बीच शुरू हुए इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में पहला मैच फ्रांस और रोमानिया के मध्य खेला गया।

फ्रांस ने ग्रुप ए के पहले मैच में रोमानिया पर 2-1 से जीत हासिल कर विजय अभियान का आगाज किया। फ्रांस को यह जीत मैच के आखिरी मिनटों में दिमित्री पाएट के गोल की वजह से मिली।
मैच के 89वें मिनट में दिमित्री ने यह गोल दागा। फर्स्ट हाफ तक दोनों टीमों की ओर से कोई गोल नहीं हुआ था। मैच का पहला गोल 58वें मिनट में फ्रांस के ओलिवर ने हेडर की मदद से किया।
इस गोल के साथ फ्रांस ने 1-0 की बढ़त बना ली थी। हालांकि बढ़त ज्यादा देर तक नहीं रही और 65वें मिनट में रोमानिया को पेनल्टी शूटआउट मिला और स्टेकियू ने गोल कर मैच 1-1 की बराबरी पर ला दिया था, लेकिन मैच के बाकी समय में रोमानिया की टीम संघर्ष करती नजर आई। जिसका फायदा फ्रांस की टीम ने उठाया और आखिरी मिनट में दिमित्री ने गोल दाग कर 2-1 से जीत दिलाई।

यूरो फुटबॉल कप 2016 के लिए आज दो मैच खेले जाएंगे। टूर्नामेंट का दूसरा मैच भारतीय समयानुसार शाम 6.30 बजे ग्रुप ए की टीम स्विट्जरलैंड और अल्बानिया के बीच होगा। तीसरा मैच ग्रुप बी की टीम वेल्स और स्लोवाकिया के बीच रात 9.30 बजे से होगा।

समय से पहले रिलीज होगी पुलकित-यामी की फिल्म 'जुनूनियत'

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बॉलीवुड एक्टर पुलकित सम्राट और यामी गौतम स्टारर फिल्म ‘जुनूनियत’ 24 जून को रिलीज होने के बजाय अब 17 जून को रिलीज होगी. फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने इसे बिना किसी कट के मंजूरी दे दी है.

फिल्म निर्देशक ने बताया, ‘हम पहले से ही फिल्म के साथ तैयार थे. फिल्म के गाने काफी लोकप्रिय हुए हैं. फिल्म को लेकर काफी एक्साइटमेंट है, इसलिए हमने इसे पहले ही रिलीज करने का फैसला लिया.’

उन्होंने कहा, ‘फिल्म को समय से पहले रिलीज करना पोस्टपोन करने से बेहतर है. इससे फिल्म निर्माता का फिल्म के प्रति आत्मविश्वास का पता चलता है. हमें सेंसर बोर्ड से बिना किसी कट के ‘यू’ सर्टिफिकेट मिला. सेंसर बोर्ड ने कहा कि हम चाहते हैं कि ज्यादातर निर्देशक ऐसी खूबसूरत फिल्में बनाएं.’

दाऊद मामले में खड़से को क्लीन चिट

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मुंबई एटीएस ने महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री एकनाथ खड़से को क्लीन चिट देते हुए कहा है कि उनके मोबाइल पर पिछले एक महीने में कोई अंतरराष्ट्रीय कॉल न आया और न ही रिसीव किया गया. एटीएस अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से खड़से के संबंध होने के आरोपों की जांच कर रही थी.

जलगांव के रहने वाले एथिकल हैकर मनीष भंगाले ने पाकिस्तान टेलिकॉम विभाग में सेंध मारकर दावा किया था कि अंडरवर्ल्ड सरगना दावूद इब्राहिम के कराची स्थित घर से खड़से के मोबाइल फ़ोन पर कई बार काल किए गए. इसके बाद चौतरफ़ा आलोचना के बीच उन्हें महाराष्ट्र सरकार में राजस्व मंत्री का पद छोड़ना पड़ा था. लेकिन क़रीब एक महीने तक इस मामले की जाँच करने के बाद एटीएस ने खडसे को इस मामले में क्लीन चिट दी है.

मुंबई एटीएस प्रमुख जॉइंट पुलिस कमिशनर अतुलचंद्र कुलकर्णी ने बताया कि खड़से के मोबाइल फ़ोन के कॉल रिकॉर्ड की जाँच में यह सामने आया है कि इस नंबर पर न कभी अंतरराष्ट्रीय कॉल आया न किया गया. एटीएस ने खड़से को कुछ हद तक राहत दी है. हालांकि उन पर लगे बाकी आरोपों की अभी जाँच चल रही है.

दाभोलकर हत्या मामले में पहली गिरफ्तारी से खुलेंगे कलबुर्गी-पनसारे हत्या के राज़

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अंधविश्वास के खिलाफ अभियान चलाने वाले तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के सिलसिले में सीबीआई को पहली सफलता हाथ लगी है। सीबीआई ने इस हत्या के सिलसिले में पहली गिरफ़्तारी करते हुए वीरेन्द्र सिंह तावड़े नाम के एक शख्स को गिरफ्तार किया है। तावड़े को हिंदू जनजागृति समिति नामक संगठन का सदस्य बताया जा रहा है। तावड़े की गिरफ्तारी को कन्नड़ लेखक कलबुर्गी और वामपंथी नेता गोविंद पनसारे की हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए भी काफी अहम् माना जा रहा है।
गौरतलब है कि तावड़े को पनवेल से कल देर रात गिरफ्तार किया गया और उसे आज पुणे की एक विशेष अदालत में पेश किया जाएगा। सीबीआई के प्रवक्ता देवप्रीत सिंह ने बताया कि सीबीआई टीम ने दाभोलकर की हत्या के मामले की जांच के संबंध में वीरेन्द्र सिंह तावड़े को गिरफ्तार किया है। बता दें कि जनजागृति समिति का संबंध गोवा की सनातन संस्था से है। सनातन संस्था पहले ही पनसारे की हत्या की जांच के दायरे में है।
तावड़े की गिरफ़्तारी के बाद सीबीआई कलबुर्गी और पनसारे की हत्या की गुत्थी के सुलझने की भी उम्मीद जता रही है। बता दें कि फोरेंसिक जांच में पहले ही सामने आ चुका है कि कलबुर्गी, पनसारे और दाभोलकर की हत्या में जिन कारतूसों का इस्तेमाल किया गया था वे आपस में मेल खाते हैं। इन तीनों की हत्या में 7.65 एमएम के कारतूसों का इस्तेमाल किया गया था।
कन्नड लेखक कलबुर्गी की हत्या के बाद महाराष्ट्र एटीएस द्वारा गिरफ्तार सनातन संस्था के सदस्य समीर गायकवाड़ से कर्नाटक पुलिस ने सांगली में पूछताछ की थी। पुलिस को उम्मीद थी कि कलबुर्गी और सामाजिक कार्यकर्ता दाभोलकर की हत्या में भी इसी गिरोह का हाथ हो सकता है, हालांकि इससे सम्बंधित कोई ठोस सबूत बरामद नहीं हुआ। समीर को ही पनसारे हत्याकांड में भी गिरफ्तार किया गया था। समीर से मिली जानकारी के आधार पर कर्नाटक पुलिस ने एक महिला समेत 4 लोगों को हिरासत में लिया था।
आरोपी तावड़े मुंबई के एक हॉस्पिटल में बतौर ईएनटी स्पेशलिस्ट 15 साल से काम कर रहा है। तावड़े ने दाभोलकर के खिलाफ एक प्रोटेस्ट मार्च में भी हिस्सा लिया था। सीबीआई को सनातन संस्था के सदस्य सारंग अकोलकर के घर छापेमारी के दौरान तावड़े के शामिल होने की जानकारी मिली थी। ये दोनों ईमेल के जरिए एक दूसरे से कॉन्टैक्ट में थे। 2009 में गोवा में हुए ब्लास्ट मामले में सारंग का नाम सामने आया था। सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में तीन और संदिग्धों को सीबीआई जल्द ही गिरफ्तार कर सकती है।
बता दें कि दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को दिनदिहाड़े गोली मारकर की गई हत्या के मामले की जांच मुंबई हाईकोर्ट ने मई 2014 में सीबीआई को सौंप दी थी। इस हत्या पर कई जानेमाने लोगों ने रोष व्यक्त किया था साथ ही कई लेखकों और अन्य हस्तियों ने कथित असहिष्णुता के विरोध में अपने पुरस्कार भी लौटा दिए थे।

मंदिर में दलितों के रोक पर हाईकोर्ट ने मांगा डीएम दून से जवाब

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विकासनगर के एक मंदिर में दलितों के प्रवेश पर पिछले दिनों हुए भेदभाव का मामला जनहित याचिका के जरिए हाईकोर्ट पहुंच गया है। याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने डीएम देहरादून को दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है। साथ ही कोर्ट ने याची व उसके परिवार को सुरक्षा देने के निर्देश एसएसपी देहरादून को दिए हैं।

विकासनगर, देहरादून निवासी दौलत कुंवर ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा कि जौनसार भाबर में पिछले दिनों दलितों के मंदिर में प्रवेश करने पर सवर्ण जाति के लोगों ने आपत्ति जताई तथा मारपीट की। पथराव में याचिकाकर्ता व उसके साथी घायल हो गए थे। उस दौरान सांसद तरुण विजय पर भी हमला किया गया था।

याची ने कोर्ट से अनुरोध किया कि जौनसार भाबर के मंदिरों में दलितों के जाने पर सवर्णों द्वारा रोकने से बचाने के लिए प्रशासन से कहा जाए और उनके मंदिरों में प्रवेश को सुनिश्चित करवाया जाए। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता आयुष नेगी की ओर से बताया गया कि जनहित याचिका दायर करने के बाद याचिकाकर्ता व उसके परिवार को जान का खतरा हो गया है।

शुक्रवार को पक्षों की सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ एवं न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता व उसके परिवार को सुरक्षा मुहैया कराने के निर्देश एसएसपी देहरादून को दिए। न्यायालय ने डीएम देहरादून को इस संबंध में दो सप्ताह के भीतर विस्तृत शपथपत्र देने को कहा है।

वहीं याचिकाकर्ता दौलत कुंवर की ओर से मीडिया को बताया गया कि वह पिछले 13 वर्षों से उत्तराखंड में दलितों पर होने वाले अत्याचारों का विरोध करते हुए उनके हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने पिछले साल जौनसार भाबर के परशुराम मंदिर में दलितों और औरतों के प्रवेश कराने में जीत हासिल की है।

देश की निगहबानी को IMA ने सौंपे 565 जाबांज अफसर

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देहरादून स्थित देश की प्रतिष्ठित भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) में शनिवार को पासिंग आउट परेड के साथ ही देश की सेनाओं 565 जांबाज अफसर मिल गए। 45 विदेशी कैडेट्स भी आईएमए से पास आउट होकर अपने देश की सेनाओं में सेवा देंगे। इसके साथ ही आईएमए से निकले अफसरों की संख्या 58983 पर पहुंच गई।
शनिवार को सुबह आईएमए की ऐतिहासिक चेटवुड बिल्डिंग के सामने मैदान में ड्रिल स्क्वायर में पासिंग आउट परेड की गई। जनरल ऑफिसर इन कमांडिंग चीफ ले. जन. सरथ चंद्र परेड की सलामी ली।

यहां 610 जेंटलमैन कैडेट्स अंतिम पग पार कर अफसर बन गए। इनमें 45 विदेशी जीसी भी शामिल हैं। इसी के साथ आईएमए के साथ एक और उपलब्धि हासिल की। जेंटलमैन कैडेट्स के अंतिम पग पार करते ही आईएमए के इतिहास में देश को 58983 अफसर देने का रिकॉर्ड जुड़ गया।

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इसमें 1908 फॉरेन जीसी भी शामिल हैं। 425 जीसी 138-रेगुलर कोर्स के होंगे, जिनमें से 107 डायरेक्ट एंट्री, 279 एक्स एनडीए और 39 एक्स एसीसी वाले कैडेट्स शामिल हैं।
इसके साथ ही 140 कैडेट्स 121-टेक्निकल ग्रेजुएट कोर्स के पासआउट होंगे। 45 विदेशी कैडेट्स भी 138-रेगुलर कोर्स के पासआउट हुए।

आईएमए से इस बार उत्तराखंड के 52 जाबांज अफसर पास आउट हुए। जनसंख्या के लिहाज से छोटे राज्यों में शुमार उत्तराखंड का इतनी बड़ी संख्या में ऑफिसर देना मिसाल है। जनसंख्या घनत्व के हिसाब से उत्तराखंड देश को सबसे ज्यादा जांबाज देने वाले राज्यों के शीर्ष पर दस वर्षों से जमा हुआ है।

वहीं इस बार यूपी के सर्वाधिक 98 जेंटलमैन कैडेट्स पासआउट होंगे। बिहार और हरियाण से 60-60 जांबाज ऑफिसर सेना का हिस्सा बनेंगे।

पुलिस ने रामवृक्ष समेत 27 लोगों को जिंदा पकड़ा और उसके बाद…

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जवाहर बाग कांड को लेकर अब मथुरा में लोग जुबान खोलने लगे हैं। एक सिपाही की बात पर अगर यकीन किया जाए तो वह दो जांबाजों की शहादत के बाद भी अपने विभाग को ही कठघरे में खड़ा कर रहा है। वह खुद सीबीआई जांच को जरूरी बताकर पुलिस के किए पर गंभीर सवाल उठा रहा है। इतना ही नहीं, उसका दावा यह भी है कि पुलिस ने रामवृक्ष को परिवार समेत जिंदा पकड़ लिया था, बाद में उसे मारा गया।

मथुरा पुलिस लाइन पर एक सिपाही ने जवाहर बाग कांड पर बमुश्किल बात की। सिपाही (जिसकी बातचीत रिकार्ड है) की बातें पुलिस कार्रवाई को सवालों के घेरे में खड़ा कर रही हैं। हालांकि उसकी बातों में कितनी सच्चाई है यह दीगर बात है। उसका कहना है कि पुलिस अफसरों ने कार्रवाई को छिपाया। कार्रवाई सुबह करनी चाहिए थी, भीड़ की तादाद का अंदाजा आसानी से लग जाता। उसने दावा किया कि अफसरों की मौत के बाद पुलिस ने रामवृक्ष समेत 27 लोगों को पकड़ लिया था।

सिपाही का दावा है कि सभी को पुलिस लाइन के सभागार में लाया गया। लखनऊ के एक अफसर को यह सब बताया भी गया। बकौल सिपाही उसके बाद सभी को मारकर आग में फेंका गया। रामवृक्ष को मारने के बाद भी शिनाख्त नहीं की। उसको साजिश के तहत दो दिन लापता दिखाया। पांच हजार का इनाम घोषित करने के बाद मरा हुआ दिखा दिया। सिपाही का कहना है कि जवाहर बाग में काफी लोगों की जान ली गई। कुछ को शवदाह गृह में जला दिया गया।

जवाहर बाग के नजदीक मवई कालोनी के एक दुकानदार का कहना है कि पुलिस ने कार्रवाई के दौरान अंदर किसी को नहीं जाने दिया। पर अब काफी तादाद में लोगों के मरने की चर्चा है। लेकिन सच्चाई तो पुलिस वाले ही बता सकते हैं। इसी कालोनी के बीटेक कर रहे एक छात्र का कहना था कि पुलिस के साथ भीड़ भी थी। भीड़ ने भी मारा। इसी कालोनी के एक बुजुर्ग का कहना था कि जितने मुंह उतनी बात। मरने वालों की तादाद ज्यादा हो सकती है। अगर मरने वाले मथुरा के होते तो सच का पता चल जाता लेकिन सभी दूसरे प्रदेश के थे। उनका कोई अब यहां है नहीं।
कब्जेधारी बड़ी तादाद में घायल हुए। उनको पकड़कर जेल भेजा गया। अस्पतालों में भर्ती कराया गया। लेकिन घायलों से मिलने पर पुलिस का पहरा है। हालांकि बातचीत में लोग अब कहने लगे हैं कि बाग के भीतर का सच पुलिस और कब्जेधारी ही जानते है। अगर घायलों से बात करा दी जाए तब सारी असलियत सामने आ जाएगी।

जवाहर बाग की घटना के बाद ड्यूटी पर तैनात एक पुलिस अफसर ने माना कि अफसरों की मौत के बाद फायरिंग की गई। हालांकि उनका कहना था कि गोली पैरों में मारने के निर्देश दिए गए थे। भीड़ को निकालने के लिए पुलिस ने दो जगह से बाउंड्री तोड़ी। ताकि पुलिस के दबाव बनाने पर वह भाग सके, लेकिन लोग नहीं भागे। वहां तैनात एक दारोगा का तर्क था कि भीड़ ने झोपड़ियों में आग लगाई ताकि पुलिस उससे डरकर भागे। दारोगा का कहना था कि पुलिस पर हमले के बाद जवाबी कार्रवाई की गई।

मायावती और सोनिया गांधी की नज़दीकियों से बिगड़ सकते हैं अन्य दलों के समीकरण

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भाजपा का खौफ बसपा प्रमुख मायावती और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीच दूरियां घटा रहा है। बसपा और कांग्रेस के बीच नया दोस्ताना संबंध विकसित हो रहा है। राज्यसभा चुनाव में यह केमेस्ट्री भाजपा का खेल बिगाड़ रही है। भाजपा ने निर्दलीय और दूसरे दलों के बागियों के बूते कांग्रेसी दिग्गजों की राह पथरीली बनाने की रणनीति बनाई थी। लेकिन मायावती की बदली सियासत से भाजपाई चक्रव्यूह टूटता नजर आ रहा है। राज्यसभा चुनाव में राजस्थान और उत्तर प्रदेश में मायावती कांग्रेस के तारणहार की भूमिका में उभर रही है। मध्य प्रदेश में बसपा के समर्थन ने कांग्रेस के विवेक तन्खा की राह आसान कर दी है।

मायावती ने उत्तराखंड में समर्थन देकर संकट से उबारा था। दोनों दलों की निकटता से उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए नए समीकरण की बुनियाद रखी जा रही है। हांलाकि बसपा प्रमुख ने उत्तर प्रदेश में अकेले चुनाव लडने का ऐलान किया है लेकिन नई दोस्ती सीटों पर दोस्ताना संघर्ष के समझौते का रूप ले सकती है। आपसी समझदारी से चुनाव के लिए सेनाएं सजाने की रणनीति संभव है। मायावती अब सपा और भाजपा पर ज्यादा आक्रामक हैं और कांग्रेस के प्रति अपेक्षाकृत नरमी दिखा रही हैं। भाजपा ने उप्र में सपा से अपना मुकाबला बताकर बसपा को अपरोक्ष तरीके से घेरने की योजना बनाई है लेकिन मायावती से दांव से भाजपा का गणित गड़बड़ हो रहा है।

भाजपा ने राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के कपिल सिब्बल की राह रोकने के लिए निर्दलीय प्रीति महापात्रा को समर्थन दिया है लेकिन बसपा के बदले रुख से सिब्बल को राहत मिलती दिख रही है। बसपा के पास दो प्रत्याशियों को जिताने की क्षमता के बाद भी 12 अतिरिक्त वोट हैं। ये मत अगर सिब्बल को मिलते हैं तो उनकी नैया पार हो सकती है। रालोद के अजित सिंह ने पहले ही सपा और कांग्रेस दोनों को समर्थन का एलान कर रखा है। जीत के लिए 34 वोट चाहिए जबकि कांग्रेस के 29 विधायक हैं। एक-दो विधायक क्रास वोटिंग भी कर सकते हैं। ऐसे में कांग्रेस की उम्मीदें मायावती पर ही टिकी हैं। सपा अपने सभी सात प्रत्याशियों की जीत के प्रति आश्वस्त है।

राजस्थान में बसपा के तीन विधायक कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार कमल मोरारका को समर्थन दे रहे हैं। हांलाकि मोरारका की राह कठिन हो गई है लेकिन बसपा और कांग्रेस की दोस्ती राजस्थान में कायम है। सूत्रों के मुताबिक भाजपा ने जरूरी वोटों का इंतजाम कर लिया है। भाजपा के वैंकेया नायडू, ओम माथुर, हर्षवर्धन ंसिंह और आर के वर्मा की राह आसान दिख रही है। हरियाणा में भाजपा समर्थित सुभाष चंद्रा के लिए मुश्किलें पैदा हुई हैं।