भारत-अमेरिका संबंध : गर्मजोशी के साथ सावधानी भी जरूरी है

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अमेरिकी संसद में अपने शानदार भाषण के आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मशहूर कवि वाल्ट विटमैन की एक पंक्ति उद्धृत की और संकेत दिया कि भारत और अमेरिका के संबंध में एक नई ताल के साथ आगे बढ़ रहे हैं. बीते दो वर्षों के दौरान दोनों देशों के आपसी रिश्तों को देखें तो उनकी यह बात गलत नहीं लगती. सुरक्षा क्षेत्र को लेकर भारत-अमेरिका के संबंध तीन स्तर से मजबूत हुए हैं. पहला, अमेरिका से सुरक्षा खरीद और साझा परियोजनाओं के स्तर पर जिनका आर्थिक आंकड़ा 14 अरब डॉलर से भी ऊपर जाता है. दूसरा, दोनों देशों की सेनाओं के बीच समन्वय, सहयोग और सूचना की साझीदारी के स्तर पर. तीसरा, पाइरेसी, शांति अभियान, गश्त को लेकर संयुक्त अभियानों के विचार को लेकर.

गुटनिरपेक्षता पर भारत के रुख को देखें तो अमेरिका के साथ उसके रणनीतिक संबंधों में सबसे ज्यादा नाटकीय बदलाव आया है. हालांकि केंद्र ने गठबंधन और साझा गश्त को लेकर एक हद तय कर दी है लेकिन, यह साफ है कि सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर मोदी सरकार अमेरिका से घनिष्ठता और बढ़ाना चाहती है. बीते साल दोनों देशों ने नई दिल्ली में जिस घोषणापत्र पर दस्तखत किए उससे भी यह स्पष्ट होता है. इसकी स्वीकारोक्ति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान अमेरिका ने ऐलान किया कि भारत उसका ‘अहम सुरक्षा साझीदार’ है. यह शब्द दोनों देशों के नए रिश्ते को परिभाषित करने के लिए गढ़ा गया है और यह इसके मायने दोनों देशों के सैन्य गठबंधन से जरा ही कम हैं. 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अमेरिकी संसद को बताया था कि कैसे भारत की तरक्की और खुशहाली अमेरिका के हित में है. आज दोनों देशों के बीच करीब 107 अरब डॉलर का सालाना व्यापार हो रहा है. बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी ने मनमोहन सिंह की बात को आगे बढ़ाया. उन्होंने कहा कि मजबूत और खुशहाल भारत अमेरिका के रणनीतिक हित में है.

हर ताल में नियमित अंतराल पर छोटे-छोटे विराम भी होते हैं. अमेरिकी प्रशासन में आगे बदलाव की संभावनाओं के बीच सरकार को भी थोड़ा विराम लेना चाहिए. यह जरूरी है कि अमेरिका के साथ रणनीतिक निकटता बढ़ाते हुए वह रूस से लेकर चीन और अपने दूसरे पड़ोसियों के साथ अपनी अहम द्विपक्षीय साझेदारियों को भी ध्यान में रखे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अमेरिका के साथ भारत की मजबूत साझेदारी यह सुनिश्चित करेगी कि एशिया से अफ्रीका और हिंद महासागर से प्रशांत महासागर तक व्यापारिक जलमार्ग आजाद और सुरक्षित रहें. उनके इस बयान से बीजिंग की चिंताएं बढ़ेंगी. भारत को उसे फिर से आश्वस्त करना चाहिए या फिर इस मोर्चे पर बीजिंग की किसी प्रतिक्रिया के लिए तैयार हो जाना चाहिए. नरेंद्र मोदी का यह कहना कि हम इतिहास की हिचक पर जीत हासिल कर चुके हैं, संकेत है कि शीत युद्ध के समय भारत ने जो रुख अख्तियार किया था उसे वह पीछे छोड़ चुका है. अगर अमेरिकी संसद में ऐसी बेबाक स्वीकारोक्ति की जा सकती है तो यह देश की विदेश नीति के हित में होगा कि मोदी सरकार संसद में भी इस रणनीतिक बदलाव की व्याख्या करे. घरेलू मोर्चे पर यह काम जरूरी है ताकि भारत अमेरिका का यह रिश्ता और भी एकजुट, मानवीय और खुशहाल दुनिया का पुल बने.