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उप्र चुनाव: ‘पीके’ ने तैयार किया कांग्रेस का चुनावी रोडमैप

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कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के चुनावी महासमर का तानाबाना बुन लिया है। सरकार बनाने के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले प्रशांत किशोर (पीके) ने कांग्रेस के मिशन यूपी का रोडमैप तैयार कर दिया है। फिलहाल प्रशांत की सलाह पर पार्टी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में अकेले उतरने का निर्णय लिया है। इतना ही नहीं पार्टी ने यूपी की सियासत में अपनी युवा ब्रिगेड को आगे लाने का भी मन बनाया है।

पार्टी सूत्रों की मानें तो चुनावी समर में उतरने से पहले पार्टी का पूरा ध्यान फिलहाल संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करना है। अप्रैल से सितंबर तक संगठन की संरचना को चुस्त-दुरुस्त किया जाएगा। अक्तूबर से पार्टी के दिग्गज और अनुभवी नेता सूबे में प्रवास करेंगे।

पार्टी ने प्रशांत किशोर के सुझावों पर ही यूपी में युवा और बेदाग छवि वाले नेताओं पर दांव आजमाने की तैयारी की है। गौरतलब है कि प्रशांत किशोर यूपी में 500 कार्यकर्ताओं की भारी भरकम टीम के साथ उतर रहे हैं। पार्टी अपने चुनाव प्रचार में तकरीबन 400 करोड़ रुपये खर्च कर रही है।

यूपी में चुनाव प्रचार की कमान प्रियंका गांधी संभालेंगी। यह भी तय हो गया है कि प्रदेश में कांग्रेस पार्टी मुख्यमंत्री के तौर पर किसी को भी प्रोजेक्ट नहीं करेगी। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस पार्टी ने यूपी को लेकर अभी से आतंरिक सर्वेक्षण कराना शुरू कर दिया है।

पिछले दिनो सर्वे के सिलसिले में पीके की टीम वाराणसी भी आई थी। अमेरिकी चुनाव सर्वेक्षण के तौर पर प्रशांत किशोर की टीम पहली बार कांग्रेस के लिए पैनल सर्वे कर रही है, जिसके परिणामों से हर महीने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को अवगत कराया जाएगा।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस किसी भी दल से गठनबंधन नहीं करेगी। वह अकेले ही चुनाव लड़ेगी।

वाशिंगटन: शिखर सम्मेलन का केंद्र बिंदु परमाणु आतंकवाद का डर

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वाशिंगटन में गुरुवार शाम शुरू होने जा रहे परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलन में परमाणु हथियार के इस्लामिक स्टेट (आईएस) या किसी अन्य आतंकवादी संगठन के हाथों में न चले जाने का डर मुख्य मुद्दा होगा। इस शिखर सम्मेलन में रूस को छोड़कर 50 देश शामिल हो रहे हैं।

इस द्विवार्षिक शिखर सम्मेलन की शुरुआत 2010 में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रयास से हुई। उन्होंने अपने कार्यकाल की शुरुआत में परमाणु अप्रसार को प्राथमिकता बनाने का संकल्प लिया था।

पिछले सप्ताह बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में आतंकवादी हमलों के बाद परमाणु हथियारों व सामग्रियों की सुरक्षा की कोशिशों को बल मिला है।

डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर बेन रोडेस ने कहा कि परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलन का आगाज गुरुवार शाम व्हाइट हाउस में होगा, जहां राष्ट्रपति बराक ओबामा व संबंधित राष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल परमाणु आतंकवाद से संबंधित डर के बारे में अपना नजरिया साझा करेंगे।

उधर, क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने बुधवार को कहा कि दुनिया की महान परमाणु शक्तियों में से एक रूस प्रारंभिक चरण के दौरान इस शिखर सम्मेलन के कुछ मुद्दों और विषयों को लेकर उसे कोई खास तव्वजो न दिए जाने की वजह से विरोधस्वरूप इसमें शामिल नहीं हो रहा है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद, ब्रिटेन के डेविड कैमरन, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप ताईप एरदोगन, यूक्रेन के पेट्रो पोरोशेंको और कजाकस्तान के राष्ट्रपति नूरसुल्तान नजरबायेव इसमें शिरकत करेंगे।

'कोहली की बैटिंग देखकर मेरे बचे बाल भी खड़े हो गए थे'- गावस्कर

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पूर्व भारतीय कप्तान सुनील गावस्कर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ शानदार पारी खेलकर टीम इंडिया को टी-20 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में पहुंचने वाले विराट कोहली की तारीफ की है। गावस्कर ने कहा कि विराट इस समय दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज हैं।

कोहली ने नाबाद 82 रन की पारी खेलकर भारत को ग्रुप टू के अंतिम मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया पर छह विकेट से जीत दिलाई। इस जीत के साथ भारतीय टीम वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में पहुंच गई, जहां 31 मार्च को मुंबई में उसका मुकाबला वेस्टइंडीज से होगा।

गावस्कर ने कहा कि कोहली कुछ अलग है। मेरे जो भी थोड़े बाल बचे हैं वह इस युवा जीनियस की पारी देखकर खड़े हो गए थे। यह बेहतरीन पारी थी। कोहली की महानता इस तथ्य में है कि वह दबाव में शानदार प्रदर्शन करता है और टीम के हितों को हर चीज से ऊपर रखता है।

जब भारत लक्ष्य का पीछा कर रहा हो तो उसका रिकॉर्ड देखिये। वह हमेशा उन्हें मैच जिताता है और यह ताकत और टाइमिंग का संयोजन है। कुछ ही बल्लेबाज में टॉप और बाटम हैंड के साथ खेलने की क्षमता है। जब वह टॉप हैंड के साथ ड्र्राइव खेलता है तो यह शानदार होता है। उस व्यक्ति का नि:स्वार्थ देखिये।

वह अपने कप्तान को स्ट्राइक देकर खुश था क्योंकि उसे पता था कि कप्तान भी खुद को साबित करना चाहता है। कई बार जब आप इस तरह की बड़ी पारी खेलते हो तो विजयी रन बनाना चाहते हो। लेकिन वह पूरी तरह से टीम के लिए खेलने वाला व्यक्ति है। भगवान का शुक्र है कि वह भारत के लिए खेल रहा है।

वहींख्‍ पूर्व ऑस्ट्रेलियाई दिग्गज इयान चैपल भी कोहली की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। उनका कहना है कि कोहली का शॉट सेलेक्‍शन पूर्व कैरेबियाई दिग्गज ब्रायन लारा से भी बेहतर है।

वो फिल्में जो बाहुबली से ज्यादा दावेदार थीं नेशनल अवार्ड की

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एक दशक पहले तक नेशनल फिल्म अवार्ड में मनोरंजन करने वाली फिल्म का अवार्ड आमतौर पर किसी बॉलीवुड फिल्म को मिला करता था। जबकि अन्य श्रेणियों के श्रेष्ठ पुरस्कार तमिल, तेलुगु, मलयालम, बांग्ला और मराठी फिल्मों के नाम होते थे। एक तरह से नेशनल फिल्म अवार्ड भारत में हिन्दी के इतर बनने वाले सिनेमा को पहचान दिलाने और उसे जिंदा रखने में योगदान देने लगा था।

लेकिन 63वें नेशनल फिल्म में जिन नामों की घोषणा हुई है, उससे आभाष होता है कि अब इस अवार्ड की तस्वीर भी बदल रही है। धीरे-धीरे कर के यह अवार्ड भी फिल्मफेयर अवार्ड की भांति बॉलीवुड फिल्मों पर केंद्रित होता जा रहा है।

इस साल फीचर श्रेणी के छह स्वर्ण कमल पुरस्कारों में से तीन बॉलीवुड के खाते में गए। जिनमें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक (संजय लीला भंसाली/बाजीराव मस्तानी) सर्वश्रेष्ठ डेब्यू डायरेक्टर (नीरज घेवन/मसान) और सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म (बजरंगी भाईजान) शामिल हैं। सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म का चौथा पुरस्कार भी हिंदी के खाते में है।

जबकि सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली फिल्म बाहुबली ने हिंदी में 100 करोड़ रुपये कमाए थे और यह कीर्तिमान बनाने वाली वह साउथ की पहली डब फिल्म है। सीधे तौर पर बाहुबली बात करें तो भी यह फिल्म स्पेशल इफेक्ट के लिए ही याद रह जाती है। जबकि इसी साल में बॉलीवुड समेत भारत की अन्य भाषाओं में ऐसी फिल्में बनी हैं, जो नेशनल अवार्ड पाने का माद्दा रखती हैं। अगली स्लाइड में जानिए, उन फिल्मों के बारे में।
नेशनल फिल्म अवार्ड चयन ज्यूरी के नजदकी सूत्रों के मुताबिक फिल्म ‘मसान’ ने सर्वेश्रष्ठ फिल्म चुनी गई ‘बाहुबली’ को कड़ी टक्कर दी थी। ज्यूरी के सदस्यों में इन दोनों को लेकर लंबी बहस चली। लेकिन अंततः फैसला हुआ कि ‘बाहुबली’ ही सर्वश्रेष्ठ है। जबकि ‘मसान’ के निर्देशक नीरज घेवन को सर्वश्रेष्ठ डेब्यू डायरेक्टर अवार्ड देकर चलता कर दिया गया।

मसान वो फिल्म है, जिसे कांस फिल्म फेस्टिवल में देखने के बाद दुनियाभर के फिल्मों के जानकार खड़े होकर लगातार तीन मिनट तक ताली बजाते रहे थे। ‘मसान: अ सेलिब्रेशन ऑफ लाइफ, डेथ एंड एवरीथिंग इन बिटवीन’ ने साल 2015 में एक नये तरह के सिनेमा की ओर ध्यानाकर्षित किया था। इसमें कोई तकनीकी खिलवाड़ नहीं था, पैसों से बनाया गया सिनेमा नहीं था, फिल्म में जीवन की कहानी पर उसका दर्शन हावी था। जीवन दर्शन की रेल पर्दे पर धड़धड़ाती गुजरती है और कहानी पुल की तरह थरथराती रह जाती है।

इस श्रेणी में दूसरी फिल्म थी, ‘माझी’। सिनेमा अपने कथानकों में साधारण इंसान को नायक बनाता है। निर्देशक केतन मेहता की मांझी सच्चे अर्थों में यह काम किया था। बिहार के गया जिले में स्थित गहलोर गांव और वजीरगंज ब्लॉक के बीच एक ऊंचे पहाड़ को काट कर रास्ता बना देने वाले दशरथ मांझी (1934-2007) की कहानी को केतन ने इस तरह से रुपहले पर्दे पर उतारा था कि पहाड़ को काट दिए जाने से उभर आए रास्ते को पर्दे पर देखते वक्त खालीपन नहीं दिखता। ऐसा महसूस होता है मानो कोई अदृश्य ताजमहल खड़ा है!!

इसी श्रेणी की तीसरी फिल्म एंग्री इंडियन गॉडेसेस थी, जो नेशनल अवार्ड का माद्दा रखती थी। हमारे शास्त्रों में देवियां पूजनीय हैं लेकिन घर और समाज में उनका क्या स्थिति है? हमारे दौर के सबसे ज्वलंत प्रश्नों में एक यह भी है। इस पर तेज गति से मंथन हो रहा है और मंथन से अमृत तथा विष दोनों निकल रहे हैं। निर्देशक पैन नलिन बदलते हुए भारतीय समाज में स्त्रियों के संघर्ष बेहद प्रासंगिक फिल्‍म खड़ी की थी। पैन नलिन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह गुजरात से आते हैं और उनके पिता भी रेलवे स्टेशन पर चाय बेचा करते थे। पैन अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में विशेष स्थान रखते हैं और उनकी एंग्री इंडियन गॉडेसेस कई देशों के फिल्म समारोहों में सराही गई।

चौथी फिल्म का नाम है, ‘मार्गरेटा विद द स्ट्रा’, जिसे नेशनल अवार्ड में महज मेंशन कर के छोड़ दिया गया। भारतीय सिनेमा में जिंदगी के पन्नों की तरतीब बदल कर कैसे कहानी बुनी जा सकती है, मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ इसका बढ़िया उदाहरण थी। इस तरह से मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ की कहानी ऐसी किशोरवय युवती का जीवन हमारे सामने लाती है, जो सेरेब्रल प्लेसी की शिकार है और अपनी यौन इच्छाओं का दमन नहीं करती। उसे लड़के हैंडसम लगते हैं और हमउम्र लड़की से भी उसे प्यार हो जाता है। ऐसे विषय पर फिल्म बनाने का साहस दिखाकर निर्देशिका शोनाली बोस बड़ा कदम उठाया था। ऐसे साहसी कार्यों को प्रोत्साहन की खूब जरूरत पड़ा करती थी।

इसी साल रिलीज हुई फिल्म ‘तितली’ में वो माद्दा था कि उसे नेशनल फिल्‍म अवार्ड में जगह दी जाए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लूटमार करने वाले परिवार की कहानी पर बनी यह फिल्‍म देश विदेश कई नामी फिल्म फेस्टिवल में जगह बनाने में कामयाब रही थी। विदेशी भाषा श्रेणी में इसके पास कई अवार्ड भी हैं, जो कई अन्य विदेशी फिल्म एसोसिएशनों ने दिए हैं। निर्देशक कनु बहल की यह फिल्म यथार्थवादी सिनेमा के काफी करीब पहुंची थी। बीते सालों में अनुराग कश्यप की इसी तरह की फिल्मों को नेशनल अवार्ड में जगह दी थी।

तपती गर्मियों में इन 5 घरेलू नुस्खों से दूर करे स्किन टैनिंग

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तपती, झुलसती गर्मियों में त्वचा के कालेपन से परेशान होकर ब्यूटी सैलून जाने के बजाय इस बार इन प्राकृतिक उपायों को अपनाकर आप इस समस्या से छुटकारा पा सकती हैं। नींबू का रस: प्रभावित स्थान पर नींबू का रस लगाएं। इसे 15-20 मिनट के लिए ऐसे ही छोड़ दें उसके बाद ठंडे पानी से धो लें। कुछ सप्ताह यह करने पर त्वचा का कालापन और दाग धब्बे भी कम होंगे। नींबू के रस के साथ खीरा या दही मिलाकर भी लगा सकते हैं। कच्चा टमाटर: टमाटर के टुकड़े काटें और प्रभावित स्थान पर लगाएं। यह कालापन दूर करता है और नियमित इस्तेमाल करने पर कुछ सप्ताह में त्वचा की रंगत साफ करता है। दही: त्वचा पर दही और अन्य दुग्ध उत्पाद लगाने से त्वचा मुलायम होती है और उसकी रंगत और दाग धब्बों में भी सुधार होता है। एलोवेरा, गुलाब जल और ग्लीसरीन: इन तीनों का मेल त्वचा की खूबसूरती के लिए बेहद प्रभावशाली है। यह दाग धब्बों और कालेपन को हल्का करता है और त्वचा को चमकदार बनाता है। जई का आटा, शहद, दही: धूप के कारण झुलसी त्वचा की मृत कोशिकाओं को दूर करने के लिए ये कारगर घरेलू स्क्रब हैं। त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाने से कुछ दिनों में कालापन दूर हो जाता है और त्वचा खिली निखरी हो जाती है।

सूखे की स्थिति और पानी का सीएम ने लिया जायजा

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मुंबई। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए राज्य के 21 कलेक्टरों के साथ बातचीत कर सूखे की स्थिति और चारा-पानी की उपलब्धता का जायजा लिया। इस दौरान सीएम ने जिला कलेक्टरों को यह अधिकार दिया कि वे सूखे से निपटने के लिए अपनी शक्तियों का पूरा इस्तेमाल करें, साथ ही किसानों और आम जनता की मदद के लिए एक हेल्पलाइन नंबर जारी करने और उसे चौबीस घंटे संचालित करने के लिए वार रूम बनाने का निर्देश भी दिया।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि मुख्यमंत्री ने कलेक्टरों को निर्देश दिया कि पानी की आपूर्ति पर ध्यान केंद्रित करें और अवैध रूप से पानी की बिक्री में लगे लोगों पर कठोरतम कार्रवाई करें। सीएम ने कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से फसल बीमा योजना, जलयुक्त शिवार योजना और मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत शुरू काम की प्रगति पर समीक्षा की। खेत तालाब योजना, स्थान व्यवहार्यता के लिए भूजल सर्वेक्षण करने का भी निर्देश दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार को राज्य में खेत तालाबों के लिए 69,986 आवेदन पत्र मिले हैं। उन्होंने कलेक्टरों को प्रधानमंत्री कृषि सिंचन योजना को जिले वार लागू करने के निर्देश दिए हैं। इंदिरा आवास योजना, रमाई और शबरी योजना को तेजी से लागू करने के भी आदेश दिए।

बागी विधायकों को लेकर स्थिति समझ से परे : अंबिका सोनी

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उत्तराखंड मामले में नैनीताल उच्च न्यायालय के निर्णय पर कांग्रेस ने सधी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी महासचिव अंबिका सोनी ने मोटे तौर पर फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि बागी विधायकों को लेकर अदालत का दिशानिर्देश समझ से परे है। सोनी ने कहा कि इसके बाबत कांग्रेस कानूनी राय ले रही है।

सोनी ने कहा कि बागी विधायकों की सदस्यता को विधानसभा अध्यक्ष ने खत्म कर दिया है। सदन की सदस्यता के मामले में विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता। ऐसे में ये विधायक सदन के भीतर घुसने और मतदान में हिस्सा लेने के पात्र नहीं रह गए हैं।

दूसरी तरफ अदालत के निर्णय के अनुसार यदि ये सदन के बाहर वोट देंगे, तो नई परंपरा होगी। इसलिए यह निर्णय समझ से परे है। इसको लेकर कांग्रेस कानूनी विशेषज्ञों मसलन कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी समेत अन्य से राय ले रही है।

कांग्रेस महासचिव ने कहा कि पुरानी कहावत है, एक गलत काम करो तो कई ऐसे काम करने पड़ते हैं। केंद्र सरकार ने ऐसा अरुणाचल प्रदेश से शुरू किया था। इसके बाद उसने उत्तराखंड में ऐसा किया। केंद्र सरकार की भारत को कांग्रेस मुक्त बनाने की मंशा से मणिपुर, हिमाचल की कांग्रेस सरकारों में भी डर है।

अंबिका ने कहा कि उत्तराखंड में हम अपने नाराज विधायक नहीं संभाल पाए, यह हमारी कमजोरी है। पार्टी का अंदरूनी मामला है, लेकिन भाजपा इनकी कौन है? आखिर भाजपा कैसे इन्हें बस में बैठाकर राज्यपाल के पास ले गई, कॉमन मेमोरेंडम पर दस्तखत कराया, चार्टर्ड प्लेन से इन्हें गुड़गांव के लीला होटल में लाई?

सोनी ने कहा कि हमें पता है कुछ विधायक क्यों नाराज थे, कुछ मंत्री, सांसद, या कुछ बनना चाहते थे। कांग्रेस अपने विधायकों के साथ क्या करती है, कैसे करती है, देखने की बात है। यह हमें करना है। इसमें भाजपा कौन होती है?

सोनी ने कहा कि 31 मार्च को सदन में हरीश रावत सरकार बहुमत साबित कर देगी। पहले भी साबित कर देते, लेकिन जैसे ही केंद्र सरकार को आभास हुआ उसने 24 घंटे पहले राज्य सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी।

सोनी ने कहा कि रावत के साथ 34 विधायकों ने शपथ पत्र के साथ राज्यपाल से भेंट की है। वह भाजपा और अमित शाह को रोकने के लिए डटे हैं। ऐसे में शक्ति परीक्षण के दौरान पार्टी व्हिप जारी करना तो केवल प्रक्रियागत होगा।

हाईकोर्ट के फैसले से मोदी सरकार और भाजपा की उलझन बढ़ी

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उत्तराखंड में रावत सरकार की विदाई के साथ सरकार बनाने का तानाबाना बुन रही भाजपा की बनी बनाई रणनीति पर नैनीताल हाईकोर्ट ने फिलहाल पानी फेर दिया है। इस फैसले से भाजपा और मोदी सरकार कानूनी पेंच में भी बुरी तरह उलझ गई है।

सरकार फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में अपील करने पर विचार कर रही है। अगर शीर्ष अदालत में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक नहीं लगी तो सरकार को राज्य में रविवार को लगाया गया राष्ट्रपति शासन हटाना होगा।

शीर्ष अदालत में जाने के बदले नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले को स्वीकार करने की स्थिति में भी केंद्र को राष्ट्रपति शासन हटाना होेगा। फिलहाल केंद्र सरकार और भाजपा हाईकोर्ट के फैसले के तकनीकी पेंच को समझने के लिए कानूनी राय ले रही है।

हालांकि संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि हाईकोर्ट के फैसले के बावजूद कई सवाल अनसुलझे हैं। दरअसल भाजपा और सरकार को हाईकोर्ट से इस तरह के फैसले की उम्मीद नहीं थी।

यही कारण है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के बाद इस पर संसद की सहमति लेने की प्रक्रिया से बचने के लिए पार्टी के रणनीतिकारों ने बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू होने से पहले सरकार गठन करने की रणनीति भी तैयार कर ली थी।

पार्टी के लिए मुश्किल यह है कि हाईकोर्ट ने कांग्रेस के 9 बागी विधायकों को भी शक्ति परीक्षण के दौरान मत डालने का अधिकार तो दिया है, मगर इनके मतों को फिलहाल अलग रखने का आदेश दिया है।

ऐसे में भाजपा को डर इस बात का भी है कि कहीं इन विधायकों के मतों को अयोग्य घोषित कर रावत सरकार बहुमत न हासिल कर ले।

जारवा आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ना उनके वजूद के लिए खतरा है और उन्हें उनके हाल पर छोड़ना भी

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सुदूर अंडमान में हुई एक हत्या ने इन दिनों पुलिस-प्रशासन के सामने एक दुविधा खड़ी कर दी है. पांच महीने के इस बच्चे की हत्या नवंबर 2015 में हुई थी. लेकिन हत्या के आरोपी को गिरफ्तार करने को लेकर पुलिस अभी तक असमंजस में है.

इसकी वजह भी है. यह हत्या 300 वर्ग मील के दायरे में सिमट चुकी जारवा आदिवासी जनजाति के इलाके में हुई है. 50 हजार साल पहले अफ्रीका से भारत आई इस जनजाति में अब करीब 400 लोग ही बचे हैं और वे अभी भी लगभग उसी तरीके से रहते हैं जैसे हजारों साल पहले रहते थे. जारवाओं की आदिम संस्कृति को संरक्षण देने के उद्देश्य से उन्हें विशेष दर्जा मिला हुआ है. पुलिस को उनके मामलों में दखल देने की इजाजत नहीं है.

खबरों के मुताबिक पांच महीने के इस बच्चे की हत्या इसलिए हुई कि वह मिश्रित नस्ल का था. फिलहाल अधिकारी बहुत फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं. अभी तक मामले में दो बाहरी लोगों को गिरफ्तार किया गया है. इनमें महिला से बलात्कार का आरोपित और बच्चे का संभावित पिता भी शामिल है. दूसरा आरोपित वह है जिसने उस आदिवासी को शराब पिलाई जिस पर हत्या का शक है.

जारवा समुदाय समय-समय पर चर्चा में आता रहता है. कुछ साल पहले ब्रिटेन के अखबार द ऑब्जर्वर द्वारा जारी एक वीडियो के बाद भी यह समुदाय सुर्खियों का विषय बना था. वीडियो में कुछ पर्यटकों के सामने जारवा महिलाएं नाचती हुई दिखाई दे रही थीं. पर्यटकों के साथ एक पुलिसवाला भी था जो कुछ खाने के सामान के बदले इन महिलाओं को नाचने के लिए कह रहा था. मानवाधिकार संगठनों ने जारवा आदिवासियों के साथ हो रहे इस बर्ताव को रोकने के लिए भारत सरकार से तुरंत कार्रवाई करने की मांग की थी. इस घटना के बाद पिछले चार सालों में भारत सरकार और केंद्र शासित प्रदेश अंडमान के प्रशासन कुछ सख्ती जरूरी दिखाई है लेकिन आज भी अंडमान में अघोषित रूप से जारवा आदिवासियों की ह्यूमन सफारी जारी है.

बीते साल अंडमान ट्रंक रोड (एटीआर) पर भी विवाद हुआ था जो इन आदिवासियों के निवास क्षेत्र से गुजरती है. यह रोड उत्तरी अंडमान को दक्षिणी अंडमान से जोड़ती है. जारवा दक्षिण अंडमान में रहते हैं. इनकी मुख्य बसाहट के चारों तरफ पांच किमी का क्षेत्र सरकार द्वारा संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है. यह इलाका केंद्र शासित प्रदेश की राजधानी पोर्ट ब्लेयर और बरतांग के बीच में है. द्वीप समूह आने वाले पर्यटक एटीआर से ही सफर तय करते हैं. इस दौरान उनका सामना जारवा आदिवासियों से होता रहता है.

एटीआर से गुजरने वाले पर्यटकों के लिए आदिवासियों की तस्वीरें उतारने और उन्हें कुछ भी देने की मनाही है. लेकिन यह प्रतिबंध कभी कड़ाई से लागू नहीं किया गया. एक अनुमान के मुताबिक हर साल यहां तकरीबन दो लाख पर्यटक आते हैं और इनमें से ज्यादातर को जारवा आदिवासियों के ‘अजूबा’ होने की जानकारी होती है. पिछले कई सालों से ऐसी खबरें आती रही हैं कि स्थानीय टूर एजेंट और गाइड पर्यटकों से पैसा लेकर उन्हें जारवा आदिवासी दिखाने ले जाते हैं. पर्यटकों द्वारा इन्हें खानेपीने का सामान, जिसमें तंबाकू से लेकर शराब तक शामिल है, देने के मामले भी उजागर हुए हैं. मानवशास्त्री कहते हैं कि तकरीबन 50 हजार साल से मुख्य समाज से कटकर जंगल के बीच रह रहे ये आदिवासी अब शराब और तंबाकू के लती बन रहे हैं.

इस आदिवासी समुदाय का मुख्य समाज से कभी संबंध नहीं रहा इसलिए इनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता आधुनिक बीमारियों के सामने शून्य है.

इन्हीं चिंताओं के मद्देनजर जनवरी, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने एटीएआर के संरक्षित क्षेत्र वाले हिस्से को बंद करने का आदेश दे दिया था. लेकिन अंडमान में इसका विरोध होने लगा. दरअसल यह 287 किमी लंबी सड़क इस द्वीपसमूह की जीवनरेखा है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अंडमान प्रशासन ने अदालत को आश्वासन दिया कि वह जारवा आदिवासियों के संरक्षण के लिए नए नियम बनाएगा और उन्हें सख्ती से लागू करेगा. इसके बाद एटीआर पर लगी आवागमन की रोक खत्म हो गई. साथ में जारवा आदिवासियों की ह्यूमन सफारी फिर से चलने लगी, लेकिन सावधानी से.

अंडमान-निकोबार में एक समय मूल जनजातियों के पांच समूह पाए जाते थे. आज इनमें से सिर्फ चार बचे हैं. इनमें भी जारवा आदिवासियों की संख्या सबसे ज्यादा है. लंबे अरसे तक जारवा आदिवासियों की छवि आक्रामक बनी रही है. कहा जाता है कि 1950 के दशक में जब अंडमान ट्रंक रोड बन रही थी तब इन्होंने सड़क निर्माण में लगे मजदूरों पर हमले कर कुछ लोगों की हत्या कर दी थी. यह समुदाय 1997 में पहली बार मुख्य धारा के समाज के संपर्क में आया. तब एक जारवा लड़का सड़क दुर्घटना में घायल हो गया था. इसका इलाज पोर्टब्लेयर के अस्पताल में हुआ. जहां उसने थोड़ी बहुत हिंदी सीख ली थी. इसके जरिए जारवा आदिवासियों के बारे में कई जानकारियां मिलीं है. यह लड़का कुछ समय के बाद अपने मूल समुदाय में लौट गया. इस घटना के बाद जारवा और मुख्य समाज के बीच कुछ हद तक दोस्ताना संबंध बने हैं.

केंद्र सरकार ने जारवा जनजाति को 1956 के एक कानून के हिसाब से संरक्षित घोषित किया है. वह समय-समय पर अंडमान प्रशासन के जरिए इनके लिए नीतियां भी बनाती रही हैं. लेकिन इस सब के बीच यह बहस भी लगातार चलती रही है कि इस जनजाति को कैसे बचाया जाए. दुनियाभर में जनजातियों को बचाने के दो ही तरीके अपनाए जाते हैं. इनमें पहला है कि उन्हें जागरूक करके धीरे-धीरे मुख्यधारा में शामिल किया जाए. दूसरा तरीका है कि उनके लिए संरक्षित क्षेत्र बनाकर उनके समाज में न्यूनतम हस्तक्षेप किया जाए. जारवा आदिवासियों को बचाने का पूरा अभियान भी इस समय इन्हीं दो बिंदुओं के बीच उलझा हुआ है. इन दोनों विकल्पों के पक्ष और विपक्ष में कई तरह के तर्क दिए जाते हैं.

जो लोग जारवा आदिवासियों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए सरकारी कोशिशों को बढ़ाने की बात करते हैं उनका मानना है कि देश की कई जनजातियों का अस्तित्व इसी तरह से बचा है. अंडमान-निकोबार से भाजपा के सांसद विष्णु पांडा रे इसके सबसे बड़े समर्थक हैं. उनका कहना है कि इन लोगों को शिक्षित करके मुख्यधारा के समाज से जोड़ना चाहिए तभी ये बच सकते हैं. इस वर्ग का मानना है कि जारवा इलाके को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर देने से आप उन तक स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुंचा सकते. ऐसे में उनकी आबादी किसी भी समय संक्रामक बीमारियों की चपेट में आकर पूरी तरह खत्म हो सकती है.

मानवाधिकार संगठनों से लेकर सरकार तक में एक बड़ा तबका है जो जारवा आदिवासियों के सामाजिक तानेबाने में किसी भी तरह के हस्तक्षेप के सख्त खिलाफ है. ये लोग बाहरी लोगों और पर्यटकों से इनका संपर्क खतरनाक मानते हैं. सोसाइटी फॉर अंडमान-निकोबार इकोलॉजी (सेन) संगठन से जुड़े समीर आचार्य एक रिपोर्ट में कहते हैं कि पर्यटकों के कारण यह जनजाति नष्ट होने की कगार पर पहुंच रही है क्योंकि पर्यटक इन लोगों को खाने का सामान देते हैं जिससे आदिवासी बीमार पड़ रहे हैं. सर्वाइवल इंटरनेशनल का कहना है कि 50 हजार साल से यह जनजाति खुद को अपने में सीमित रखे हुए हैं इसलिए इनमें आधुनिक लोगों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया व वायरस से लड़ने की क्षमता नहीं है. यदि जारवा आधुनिक लोगों के संपर्क में आते हैं तो यह उनके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.

मानवाधिकार संगठन इसके लिए ग्रेट अंडमानी जनजाति का उदाहरण देते हैं जो बीते सालों में मुख्यधारा के समाज से काफी घुलमिल गई थी. लेकिन बीमारियों और शराब की लत में पड़कर यह जनजाति अब लगभग खत्म हो चुकी है. माना जाता है कि पूरे द्वीप समूह पर इस समय ग्रेट अंडमानी जनजाति के लोगों की तादाद 50 से ज्यादा नहीं है.

बहस के इन दोनों बिंदुओं के बीच केंद्र सरकार ने 2004 में जारवाओं की सुरक्षा के लिए एक विशेष नीति बनाई थी. इसमें तय किया गया है जब तक इस जनजाति को बचाने से जुड़े अध्ययन पूरे नहीं हो जाते सरकार अपनी तरफ से इन लोगों के जीवन में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगी. केंद्र सरकार फिलहाल इसी नीति पर कायम है. लेकिन दूसरी तरफ पर्यटन के नाम पर अभी-भी जारवा आदिवासियों को बाहरी लोगों के मेलजोल का मौका-मिल रहा है. इस समय जनजाति को बचाने की किसी भी नीति पर पूरी तरह अमल नहीं हो पा रहा है.

हो सकता है एक बच्चे की हत्या के इस मामले के बाद जारवा क्षेत्र में पर्यटन पर लगी पाबंदियां और कड़ी हो जाएं. यह कदम जारवा आदिवासियों की मानवीय गरिमा तो बचा लेगा लेकिन उनके अस्तित्व का सवाल अभी-भी पहले की तरह अनुत्तरित रहेगा.

बंद पड़े खातों पर भी मिलेगा ब्याज, लाभान्वित होंगे करोड़ों लोग

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कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने एक अप्रैल से निष्क्रिय यानी बंद पड़े खातों पर ब्याज देने का फैसला किया है। सरकार के इस फैसले से नौ करोड़ खाताधारकों को लाभ होगा जिसमें 32,000 करोड़ रुपये से अधिक जमा हैं।

बीते दिन ही सरकार की ओर से कर्मचारी भविष्य निधि कोष के निष्क्रिय खातों पर भी ब्याज देने की स्वीकृति मिल गई है। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री बंडारु दत्तात्रेय ने मंगलवार को कहा कि ईपीएफ के निष्क्रिय खातों पर ब्याज देने का फैसला कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के केंद्रीय न्यासी बोर्ड की 212वीं बैठक में लिया गया है।

ईपीएफओ का निर्णय लेने वाला शीर्ष निकाय केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) ने इस आशय का निर्णय किया। सीबीटी के अध्यक्ष श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय हैं। सीबीटी की बैठक के बाद दत्तात्रेय ने कहा, ‘संप्रग सरकार ने निष्क्रिय खातों पर ब्याज देना बंद कर दिया था।

अब हमने कर्मचारियों के हित में फैसला किया है।’ उन्होंने कहा, हमने अब निष्क्रिय पड़े खातों में ब्याज देने का फैसला किया है। लिहाजा ऐसे में अब कोई भी खाता निष्क्रीय नहीं होगा, क्योंकि उस पर भी ब्याज मिलेगा। दत्तात्रेय ने यह भी कहा कि निष्क्रिय खातों पर ब्याज का भुगतान एक अप्रैल से लागू किया जाएगा।

आपको बता दें कि निष्क्रिय खाते वे हैं जहां 36 महीने से कोई योगदान नहीं आ रहा है। गौरतलब है कि पहले ईपीएफओ की ओर से 1 अप्रैल 2011 से ऐसे खातों पर ब्याज देना बंद कर दिया था। इसका मकसद इन निष्क्रिय खातों में कोष ईपीएफओ के पास छोड़े रखने को लेकर लोगों को हतोत्साहित करना था। लेकिन अब सरकार ने सभी को निष्क्रीय खाताधारकों की समस्याओं को ध्यान में रखकर ये फैसला लिया है। सरकारी प्रतिभूतियों में ईपीएफओ का निवेश 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने के प्रस्ताव के बारे में पूछे जाने पर श्रम सचिव शंकर अग्रवाल ने कहा, ‘वित्त मंत्रालय इस बारे में पहले ही निर्णय कर चुका है।’