इस्लामाबाद: पाकिस्तान ने भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता मिलने से रोकने के लिए गहन कूटनीतिक प्रयास किया था. यहां तक कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इसके लिए 17 प्रधानमंत्रियों को निजी तौर पर पत्र भी लिखा था.
पाकिस्तान के विदेशी मामलों के शीर्ष सलाहकार सरताज अजीज ने सोमवार को यह कहा. अजीज ने इस्लामाबाद में विदेश मंत्रालय में मीडिया से कहा, “प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इस मामले में विभिन्न देशों के 17 प्रधानमंत्रियों को निजी तौर पर पत्र भी लिखे थे, जो कि रिकॉर्ड में है.”
पिछले सप्ताह भारत एनएसजी की सदस्यता हासिल करने में नाकाम रहा था. चीन के नेतृत्व में कई सदस्य देशों ने एनएसजी में प्रवेश के लिए परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) की शर्त पूरी करने पर जोर दिया था.
अजीज का यह बयान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नफीस जकारिया के बयान के कुछ दिनों बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान अन्य देशों का समर्थन मांग रहा है. उन्होंने साथ ही भारत के खिलाफ पाकिस्तान की गुटबाजी के दावों का खंडन भी किया था.
भारत की NSG के सदस्यता के खिलाफ पाक ने लिखा था 17 देशों को खत
पाकिस्तान के विपक्ष ने संसद सदस्यता के लिए शरीफ को अयोग्य ठहराने की मांग की
इस्लामाबाद: अपनी संपत्ति का खुलासा नहीं करने पर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके चार रिश्तेदारों को नेशनल एसेंबली की सदस्यता से अयोग्य ठहराने की मांग करते हुए विपक्षी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने सोमवार को एक याचिका दायर की।
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सरदार लतीफ खोसा और फैसल करीम कुंडी ने यह मांग करते हुए चुनाव आयोग में याचिका दायर कर मांग की गई कि शरीफ के साथ ही उनके छोटे भाई और पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ, वित्त मंत्री इशाक डार, शरीफ के दामाद कैप्टन (सेवानिवृत्त) सफदर और भतीजे हमजा शाहबाज को अयोग्य ठहराया जाए।
याचिका में कहा गया है कि वे संसद की सदस्यता के पात्र नहीं है क्योंकि वे भ्रष्टाचार में शामिल हैं और संविधान के अनुच्छेद 62 और 63 के तहत ‘ईमानदार नहीं’ है। याचिका में दावा किया गया है कि शरीफ अपने परिवार के सदस्यों की पूर्ण आय का खुलासा नहीं कर पाए हैं।
एनएसजी सदस्यता पाने की भारत की कोशिश पूरी तरह नाकामयाब नहीं हुई है
परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता हासिल कर प्रतिष्ठित वैश्विक परमाणु व्यापार का अहम हिस्सा बनने की भारत की कोशिश पूरी तरह से नाकामयाब नहीं हुई है. दक्षिण कोरिया के सियोल में हुई एनएसजी की बैठक में चीन और कम से कम सात दूसरे देशों ने फिर से यह कहकर चिंता जताई थी कि परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत न करने वाले देशों को इस समूह का हिस्सा कैसे बनाया जा सकता है. भारत के वार्ताकारों ने जोर देकर कहा कि ऐसा करना न्यायसंगत है क्योंकि परमाणु अप्रसार के मामले में भारत का रिकॉर्ड बेदाग रहा है. परमाणु कारोबार के नियम-कायदे तय करने वाले एनसजी ने जब 2008 में भारत को विशेष छूट दी थी तो इसका आधार यही बात थी. दुर्भाग्य से इसके बावजूद 48 देशों वाला यह समूह इस मुद्दे पर किसी सहमति पर नहीं पहुंच सका.
लेकिन बैठक के कुछ दिन बाद ही एक अमेरिकी अधिकारी का बयान आया है कि आगे एक ऐसा रास्ता है जिसके जरिये 2016 के आखिर तक भारत एनसजी का पूर्णकालिक सदस्य बन सकता है. इस बीच भारत के लिए एक उत्साहजनक संकेत यह भी है कि इस मुद्दे पर भारत के साथ बातचीत जारी रखने के लिए एक विशेष दूत नियुक्त किया गया है. अतीत भी बताता है कि एनएसजी की सदस्यता के लिए भारत की कोशिश कामयाब हो सकती है. अगस्त 2008 में हुई एनसजी की बैठक के बाद जब उसी साल सितंबर में भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों से कारोबार करने की विशेष छूट दी गई थी तो इसका भी पहले काफी विरोध हुआ था. लेकिन अग्रसक्रिय कूटनीति ने इस विरोध को विफल कर दिया था.
सियोल में नाकामयाब हुआ यह प्रयास एक आत्ममंथन का मौका लेकर भी आया है. भारत को खुद से यह पूछना चाहिए कि इस निरंतर विरोध के बावजूद वह कितनी और राजनीतिक और कूटनीतिक ऊर्जा खर्च करना चाहता है. यह भी कि अपने रणनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए उसके पास क्या वैकल्पिक रास्ते हैं. 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मद्देनजर भारत को जो छूट दी गई थी उसने कई तरह से भारत की मदद की. इसके बाद भारत ने रूस और फ्रांस जैसे देशों के साथ परमाणु रियेक्टरों और ऑस्ट्रेलिया के साथ परमाणु ईंधन की आपूर्ति के लिए समझौते किए. यह सही है कि 2010 से 2013 के बीच एनएसजी के नियमों में जो सुधार हुआ था उसके मुताबिक परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत न करने वाले किसी भी देश के साथ ‘एनरिचमेंट और रीप्रोसेसिंग’ (ईएनआर) के क्षेत्र में कारोबार नहीं किया जाएगा. दूसरे शब्दों में कहें तो भारत और किसी दूसरे एनएसजी सदस्य के साथ ईएनआर कारोबार नहीं हो सकता. यह तर्क दिया जाता है कि भविष्य में भारत के हितों को नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे प्रावधान न बनें, इसके लिए बेहतर है कि किसी बाहरी याचक के बजाय एक प्रभावशाली सदस्य बना जाए.
फिर भी ईएनआर प्रतिबंध को देखते हुए भारत को क्या एनएसजी में दूसरे दर्जे का नागरिक बनने की जरूरत है? खासकर जब उसके पास इस मामले में विकल्प अपने घर में ही मौजूद हैं? एक तरह से एनएसजी की यह बहस हमें गुटनिरपेक्षता की बुनियादी दिशा की याद दिलाती है. अगर इस अवधारणा को आज भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिहाज से देखा जाए तो अपने विशाल ऊर्जा बााजार को देखते हुए हमें परमाणु कारोबार के वैश्विक मंच पर आर्थिक साझेदार तलाशने की दिशा में असुरक्षित महसूस करने की जरूरत नहीं है.
स्पेक्ट्रम को फिर से व्यवस्थित करके मोदी सरकार ने एक तीर से दो शिकार किए हैं
रक्षा और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होने वाले स्पेक्ट्रम को फिर से व्यवस्थित करके सरकार ने लंबे समय से अटका पड़ा एक जरूरी काम किया है. इससे 1800 मेगाहर्ट्ज के बैंड में 200 मेगाहर्ट्ज का अतिरिक्त स्पेक्ट्रम उपलब्ध होगा. अतीत में स्पेक्ट्रम का आवंटन जिस तरह से हुआ उसका नतीजा यह रहा कि रक्षा विभाग और व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए इस्तेमाल होने वाले स्पेक्ट्रम के बैंड या कहें कि पट्टी में कई छोटे-छोटे हिस्से खाली रह गए. इनका इस्तेमाल न तो रक्षा विभाग कर पा रहा था और न ही कारोबारी कंपनियां. इससे एक तरफ देश का एक अहम संसाधन बेकार हो रहा था तो दूसरी ओर स्पेक्ट्रम की कमी से जूझ रहा दूरसंचार क्षेत्र भी प्रभावित हो रहा था.
स्पेक्ट्रम के इस पुनर्संयोजन के परिणाम दूरगामी होंगे. तरंगों की गतिशीलता के लिहाज से देखें तो 1800 मेगाहर्ट्ज बैंड की ठीक-ठाक उपयोगिता बनती है. हालांकि इस मामले में कम फ्रीक्वेंसी के बैंड बेहतर साबित होते हैं. ऊंची फ्रीक्वेंसी वाले बैंड्स की तुलना में 700 या 800 मेगाहर्ट्ज बैंड पर भेजे गए सिग्नल दीवारों और दूसरी बाधाओं को ज्यादा अच्छी तरह भेदते हैं और साथ ही कम बिजली भी खाते हैं. डिजिटल इंडिया और उसके साथ होने वाले डेटा के विस्फोट को देखते हुए यह तथ्य बहुत अहम है. दूसरे शब्दों में कहें तो हम कौन सी फ्रीक्वेंसी का बैंड चुनते हैं इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा खपत और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उसके द्वारा किए गए वादों पर पड़ेगा.
इसलिए सरकार का लक्ष्य यह होना चाहिए कि वह जितना हो सके कम फ्रीक्वेंसी के बैंड्स को उपलब्ध करवाए. यह काम कई तरीकों से हो सकता है. उदाहरण के लिए क्षेत्रीय प्रसारण के लिए एनॉलॉग सिग्नल की जो व्यवस्था इस्तेमाल होती है वह अब पुरानी पड़ चुकी है. इसे खत्म करके काफी स्पेक्ट्रम हासिल किया जा सकता है. कोशिश यह भी होनी चाहिए कि इस तरह मिले स्पेक्ट्रम को दूरसंचार कंपनियों को ऐसे मूल्य पर उपलब्ध करवाया जाए जिसे देश की जनता वहन कर सके. कम फ्रीक्वेंसी के बैंड्स के लिए सरकार जो ऊंची कीमत वसूलती है उसका जेब दूरसंचार कंपनियों के बजाय आखिर में उपभोक्ता की जेब पर ही पड़ता है.
फुटबॉलर लायनल मेसी का अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से संन्यास
चिली के हाथों कोपा अमेरिका कप हारने के बाद अर्जेंटीना के फॉरवर्ड फुटबॉल खिलाड़ी लायनल मेसी ने अंतरराष्ट्रीय खेल से संन्यास लिया। मेसी अब अर्जेंटीना के लिए नहीं खेलेंगे लेकिन बार्सेलोना फुटबॉल कप के लिए अपना खेल जारी रखेंगे। मेसी को इस वक्त दुनिया का सबसे लाड़ला फुटबॉलर खिलाड़ी कहना शायद गलत नहीं होगा। बता दें कि कोपा अमेरिका फायनल में चिली ने अर्जेंटीना को पेनाल्टी शूट आउट में 4-2 से हराया। अर्जेंटीना फुटबॉल संघ के साथ मेसी की कुछ समस्याएं भी जग जाहिर थीं। कुछ दिन पहले उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर लिखा था – AFA एक मुसीबत है…!!
कोपा में अर्जेन्टीना के लिए खेलते वक्त मेस्सी पर दबाव कुछ ज्यादा ही रहा है, एक बार फिर मेस्सी दबाव में पिचक गए।
चिली के खिलाफ़ फ़ाइनल में शूटआउट के दौरान मेस्सी ने पेनाल्टी मिस कर दी। 2014 का विश्व कप फायनल और कोपा अमेरिका के तीन फायनल हारने के बाद 29 साल के बार्सेलोना खिलाड़ी ने कहा ‘मेरे और राष्ट्रीय टीम का साथ यहीं खत्म होता है। मैं जितना कर सकता था किया, चैंपियन नहीं होना दुख पहुंचाता है।’
जब भावुक मेसी से मीडिया ने पूछा कि क्या वह संन्यास की बात कर रहे हैं तो उन्होंने कहा ‘मैंने पूरी कोशिश की, चार फायनल हो गए हैं और मैं एक भी नहीं जीत पाया। मैंने जितना मुमकिन था किया, मुझे सबसे ज्यादा दुख पहुंचा है लेकिन यह साफ है कि यह सिर्फ मेरे लिए नहीं है।’ जब मेसी से पूछा गया कि क्या अब वह अपने देश की यूनिफॉर्म दोबारा नहीं पहनेंगे तो जवाब था – मुझे नहीं लगता, मैंने इसके बारे में सोचा, जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि मैंने जीतने की बहुत कोशिश की लेकिन अब बस। हमने चार फायनल हारे हैं।’
बता दें कि मेसी 5 बार के बैलन डि ओर विजेता हैं और उन्होंने अर्जेंटीना के लिए पहला मैच 2005 में खेला था। चिली के खिलाफ़ कोपा 2016 फ़ाइनल उनका 113वां अंतर्राष्ट्रीय मैच था। यही नहीं मेसी अर्जेंटीना के लिए सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी हैं, उन्होंने 55 गोल किए हैं। 2008 में मेसी ने ओलिंपिक में अर्जेंटीना को स्वर्ण पदक दिलवाया।
वसु का कुटुम : निर्भया कांड की थीम पर बुनी गई लचर कहानी जिसमें महान संभावना थी
एक मंझा हुआ निर्देशक हमेशा शानदार और सफल फिल्म नहीं बना पाता. ठीक उसी तरह एक अच्छा लेखक हमेशा अच्छा ही लिखे यह कतई जरूरी नहीं. और फिर अच्छे निर्देशक की एक बुरी फिल्म जिस तरह की खीज पैदा कर सकती है कुछ-कुछ यही बात अच्छे लेखक की बुरी रचना पर भी लागू होती है.
मृदुला गर्ग की यह लंबी कहानी ‘वसु का कुटुम’ एक अच्छी लेखिका की लचर कहानी है. यह एक ऐसी रचना है जो भरपूर संभावना पैदा करती है लेकिन, फिर उस पर खरा नहीं उतरती. ‘कठगुलाब’ और ‘मिलजुल मन’ जैसी सशक्त रचना देनेवाली लेखिका, वसु का कुटुम में वैसा जादू नहीं जगा पातीं.
यह कहानी बहुचर्चित निर्भया कांड को बुनियाद बनाकर लिखी गई है और इसकी केंद्रीय पात्र ‘दामिनी’ नाम की लड़की है. लेखिका दामिनी के बहाने समाजसेवा के नाम पर सिर्फ कमाई करने वाले एनजीओ, महत्वपूर्ण से महत्वपूर्ण मुद्दों पर ज्यादातर खोखली बहस करने वाले न्यूज चैनलों और मकान बनाते समय सरकारी नियमों को ताक पर रखने वाले बिल्डरों की पोल खोलती है.
इस पूरी कहानी में कई सारे झोल हैं. दामिनी जब बहुत बीमार हो जाती है तो राघवन नाम का दुकानदार, दामिनी के यहां काम करने वाली की एक महिला की मदद से उसे सफदरजंग अस्पताल ले जाता है. डॉक्टर एकदम से उसे पहचान लेते हैं कि यह वही दामिनी है जिसका केस काफी प्रसिद्ध हुआ था. किताब में आगे का घटनाक्रम कुछ यूं दिया गया है – ‘राघवन घबराकर उसके साथ हो लिया और रास्ते में सड़क पर झाडू़ लगा रही नजमा को भी आवाज लगा दी. तीनों ने मिलकर उसे एक टैक्सी में ठूंसा और अस्पताल ले गए. काफी देर बाद दो डॉक्टर नमूदार हुए. उनमें से एक ने उसे देखा नहीं कि घबराकर दो कदम पीछे हटकर बोला, ‘ये तो वही है.’ ‘कौन?’ रत्नाबाई ने कहा. ‘दामिनी!’ उसने डरकर ऐसे कहा, जैसे भूत देख लिया हो! ‘हां ये दामिनी है. मरने को पड़ी है. इसको लेकर चलो अन्दर. इलाज करो’ वह खड़ा देखता ही रहा. लगा, बेहोश होकर गिर जाएगा.
इस जगह यह बात साफ हो जाती है कि यह लड़की वही दामिनी है, जिसका मामला सुर्खियों में आया था. लेकिन इसके बावजूद राघवन एक जगह फिर से शंका करता है कि वह लड़की सच में दामिनी है या नहीं. – ‘फिर वही पुराना चक्कर तो था ही जो चक्रवात की तरह उसे घुमा रहा था, पटकनी दे-देकर. यह कि वह औरत वाकई दामिनी थी, जिसके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था, जिसे मरा हुआ घोषित कर दिया गया था और जिसका दाहकर्म बड़ी शानो-शौकत से हुआ था? या कोई और लड़की थी जिसका नाम दामिनी था? जिसके साथ वैसा ही हादसा हुआ था मगर मरने की नौबत नहीं आई थी? यह वह दामिनी नहीं थी जिसे सब मरा हुआ मान रहे थे, मगर जो मरी न होकर जिन्दा थी? कतई नहीं थी, इसका सबूत कोई उसे ला देता तो वह निजात पा जाता चक्रवात से.
राघवन दामिनी का सच जानने के लिए उसकी कामवाली को पूरी बात पता लगाने को कहता है – ‘एक काम करो मेरा रत्नाबाई.’ वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, ‘मैं तुम्हारे पांव पड़ता हूं. तुम एक काम कर दो मेरा.‘ ‘क्या?’ तुम बहुत नाक घुसेड़ू किस्म की औरत हो. हर के फटे में पांव डालती हो. हर चीज सूंघ लेती हो. सब जगह बात से बात निकालती हो. किसी तरह भी पता लगाओ, सबूत लाओ कि ये दामिनी है कि नहीं है.’
वह लड़की दामिनी है या नहीं यह जानने की स्वाभाविक जिज्ञासा तो समझ में आती है लेकिन यह जानने के लिए किसी के हाथ जोड़ना और पैर पड़ना बेहद अव्यावहारिक और अटपटा है. यह बात कहानी में आपको बुरी तरह खटकती है.
यह पूरी कहानी कहीं खुद को यथार्थ के करीब लाने के कोशिश करती है तो कहीं बिल्कुल कपोल-कल्पना लगती है. यह कहना सही होगा लेखिका ‘वसु का कुटुम’ में यथार्थ और कल्पना के बीच सही संतुलन नहीं बिठा सकीं. यह बात हैरान करती है कि एक इतनी सधी हुई लेखिका ऐसी कल्पना का सहारा लेती हैं जो थोड़ी भी सहज-स्वाभाविक नहीं लगती. वसु का कुटुम के एक पात्र राघवन को लेखिका अंत तक कन्फ्यूज ही दिखाती हैं सो इसके चलते पाठक भी कन्फ्यूज हो जाते हैं कि लड़की सच में वही दामिनी है जिसका मामला सुर्खियों में आया था या कोई और.
कहानी बहुत जगह अनचाहे झिलाऊ विवरणों से भरी पड़ी है. जो बात सिर्फ पात्रों के माध्यम से कहलवाई जा सकती थी वह लेखिका बार-बार खुद कहती हैं. ‘अब इसको बार-बार क्या दोहराना. आप तो जानते ही हैं अपने दफ्तरों को, सरकारी हों या गैर-सरकारी, उनका यही दस्तूर है. कोई भी काम हो, कह देते हैं, हो जाएगा. यह नहीं कहते कि नहीं होगा, कि आप निराश होकर घर बैठें. यह भी नहीं बतलाते कि कब होगा. जिससे आप एक मुकरर्र दिन, वहां पहुंचकर काम होने की पक्की तस्दीक कर सकें. बस कहते रहते हैं कि हो जाएगा.’ ऐसे ढेरों जबरदस्ती के विवरण इस कहानी में हैं जिनके कारण कहानी को पूरा पढ़ना और भी ज्यादा भारी लगता है.
कहानी में एक जगह राघवन रत्नाबाई से कहता है कि जिस स्त्री के साथ इतना अत्याचार हुआ हो, वह इतनी बेखौफ और जीवट होकर कैसे जी सकती है? इसके जवाब में रत्नाबाई कहती है ‘भइया, जिसे मार-मूरकर गेर दिया जावे, उसे किसी का डर नहीं रहता और वो बहुत जीवट हो जाती है.’ यह एक पंक्ति इस कहानी के लिए महान संभावना पैदा करती है. पूरी कहानी को पढ़कर ऐसा लगता है कि इस विचार के इर्द-गिर्द यदि यह पूरी कहानी रची जाती तो बहुत ही अलग और सशक्त बन पड़ती. तब इस कहानी में यह दिखाया जा सकता था कि वह दामिनी जब बिना अपनी पहचान छिपाए जीती है, तब उसे समाज कैसे-कैसे प्रताड़ित करता है? मोमबत्ती लेकर जुलूस निकालने वाला समाज व्यवहार में ऐसी ब्लात्कृत पीड़िताओं के प्रति कितना विनम्र और सहयोगी होता है, इसकी भी पोल खोली जाती. साथ ही मीडिया और एनजीओ कैसे ऐसी खबरों को अपने लिए कैश करते हैं यह बात उस कहानी में भी आसानी से दिखाई जा सकती थी. हालांकि यह लेखक का ही निर्णय होता कि वह अपनी कहानी में किस विचार को तवज्जो दे किसे नहीं.
कुल मिलाकर वसु का कुटुम एक ऐसी कहानी है जिसकी नायिका के बारे में लेखिका खुद बहुत स्पष्ट नहीं है. ऐसा होता तो इतनी अच्छी थीम से शुरू हुई कहानी कहीं ज्यादा सशक्त तरीके से बुनी जा सकती थी.
किताब : वसु का कुटुम
लेखिका : मृदुला गर्ग
प्रकाशक : राजकमल
मूल्य : 125 रुपये
सरकार भले न माने लेकिन ‘दो निशान, दो विधान और दो प्रधान’ नगालैंड में खुला रहस्य है
पिछले साल तीन अगस्त को भारत सरकार और नगालैंड के सबसे प्रभावशाली विद्रोही गुट नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-आईएम) के बीच एक समझौता हुआ था. पहले इसे शांति समझौता (पीस एकॉर्ड) कहा जा रहा था लेकिन बाद में ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ नाम दिया गया. इसका मोटा-मोटा मतलब था कि दोनों पक्षों ने बातचीत और संभावित शांति समझौते की एक रूपरेखा पर सहमति जता दी है.
इस समझौते से जुड़ी शर्तें अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई हैं लेकिन एक मुद्दे पर यह समझौता भारी विवादों में है. पिछले दिनों कुछ समाचार वेबसाइटों और सोशल मीडिया साइटों पर खबर आई थी कि भारत सरकार ने एनएससीएन-आईएम की नगा लोगों के लिए अलग झंडे और पासपोर्ट की मांग मान ली है. नरेंद्र मोदी सरकार ने नगालैंड में शांति स्थापित करने की दिशा में इसे ऐतिहासिक समझौता करार दिया था लेकिन इन खबरों के बाद सरकार लगातार निशाने पर है.
भाजपा के लिए यह दोहरी मुसीबत है. वह खुद और उसका पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्याम प्रसाद मुखर्जी को आदर्श मानते हैं जिन्होंने कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’ का नारा दिया था. जबकि इसबार खुद उसकी सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि उसने नगालैंड के लिए यह मांग मंजूर कर ली है.
फिलहाल भारत सरकार ने इस खबर का खंडन किया है. केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू का कहना है कि अभी नगा संगठन से बातचीत चल रही है और अलग झंडे व पासपोर्ट की खबर सही नहीं है. अलग झंडे और पासपोर्ट का सीधा अर्थ है कि संबंधित भूभाग पर दूसरी सरकार है. केंद्र में किसी अन्य पार्टी की सरकार के लिए भी यह काफी मुश्किल होता और भाजपा के लिए तो यह मांग मानना तकरीबन असंभव ही है. लेकिन इस पूरे विवाद का एक अलग लेकिन सबसे दिलचस्प पहलू है कि नगालैंड में आज भी दो सरकारें चलती हैं. यहां दो झंडे हैं और नियम-कानून भी अलग-अलग हैं.
दीमापुर नगालैंड की व्यवसायिक राजधानी है. इससे तकरीबन 40 किमी दूर जंगल के बीच पहाड़ी पर एक विशाल परिसर में कई आवासीय इकाइयां बनी हुई हैं और यही कैंप हेब्रॉन कहलाता है. यह एनएससीएन-आईएम का केंद्रीय मुख्यालय (सीएचक्यू) और गवर्नमेंट ऑफ पीपल्स रिपब्लिक ऑफ नगालिम (जीपीआरएन) का भी मुख्यालय है. जीपीआरएम नगालैंड की स्वघोषित सरकार है. एनएससीएन-आईएम की स्थापना इसाक चिसी स्वू और थ्युंगालेंग मुइवा ने की थी. इसाक संगठन के चेयरमैन और सरकार में राष्ट्रपति हैं और संगठन के महासचिव मुइवा प्रधानमंत्री.
1995 में जब पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे तब केंद्र सरकार सभी विद्रोही नगा गुटों को बातचीत की टेबल पर लाने पर सफल हुई थी. फिर 1997 में एनएससीएन-आईएम ने भारत सरकार के साथ संघर्ष विराम समझौता कर लिया. इस गुट ने मांग की थी कि जब तक संघर्ष विराम लागू है केंद्र सरकार विद्रोहियों को रहने के लिए सुरक्षित जगह उपलब्ध कराए. इसी प्रक्रिया के तहत हेब्रॉन में विद्रोहियों के लिए शिविर या कैंप बनाए गए. लेकिन इन दो दशकों में दोनों पक्षों के बीच स्थायी संधि नहीं हो पाई और संघर्ष विराम लंबा खिंचता रहा. इस बीच कैंप हेब्रॉन के परिसर का विस्तार होता गया.
आज की तारीख में कैंप हेब्रॉन आकार या भव्यता में न सही लेकिन संरचना में एक संप्रभु राष्ट्र के मुख्यालय से कम नहीं लगता. स्क्रोल डॉट इन की एक रिपोर्ट के मुताबिक परिसर के भीतर जीपीआरएन के तमाम सरकारी विभागों के कार्यालय हैं. यहां कृषि मंत्रालय से लेकर पर्यावरण और वित्त मंत्रालय भी हैं. इस वित्त मंत्रालय के पास नगालैंड में कर वसूलने के लिए एक व्यवस्थित ढांचा भी मौजूद है और सिर्फ नगालैंड ही नहीं है पड़ोसी राज्यों के नगाबहुल इलाकों के नागरिकों से भी कर वसूला जाता है. यहां भी वित्त मंत्री सालाना बजट पेश करते हैं. फ्रंटलाइन की एक रिपोर्ट जीपीआरएन के एक अधिकारी के हवाले से जानकारी देती है कि इस सरकार का बजट भी करोड़ों रुपये का होता है. हर मंत्रालय के लिए एनएससीएन ने एक-एक मंत्री नियुक्त किया है. जीपीआरएन के संचालन की गंभीरता इससे भी समझी जा सकती है कि भारत सरकार से बातचीत की जिम्मेदारी इसके गृमंत्रालय को सौंपी गई है.
कैंप हेब्रॉन के सबसे भीतरी हिस्से में नगा सेना का मुख्यालय (जीएचक्यू) है. यहां हर दिन नए रंगरूटों के प्रशिक्षण का काम चलता है. एक अंग्रेजी मैंगजीन की रिपोर्ट बताती है कि जीएचक्यू की तुलना भारतीय सेना की किसी भी छावनी से की जा सकती है. यहां 30 से ज्यादा रसोईघर हैं इसके साथ ही दर्जनों डाइनिंग हॉल हैं.
पिछले दिनों नगा सरकार के ‘लोकनिर्माण विभाग’ ने यहां एक बड़ी इमारत भी बनाई है. यह तातार होहो यानी जीपीआरएन की ‘संसद’ है. इस ‘संसद’ में नगाओं की अलग-अलग जनजातियों की तरफ से नामित और कुछ चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं. इन्हें तातार कहा जाता है. मंत्रियों और उपमंत्रियों की परिषद – ‘किलोनसेर्स’, विभिन्न विभागों के सचिव और प्रमुख और इनके साथ सेना के कमांडर संसद के सदस्य होते हैं.
एनएससीएन-आईएम गुट हर साल 14 अगस्त को ‘वृहत्तर नगालैंड’ या जिसे वह नगालिम कहता है, का स्वतंत्रता दिवस मनाता है. नगालैंड के पहले और मूल विद्रोही गुट नगा नेशनल काउंसिल (एनएससी) ने 14 अगस्त, 1947 को नगालैंड की आजादी की घोषणा की थी. भारत सरकार ने इसे खारिज कर दिया था लेकिन तब से हर साल 14 अगस्त को हेब्रॉन में ‘स्वतंत्रता’ दिवस कार्यक्रम मनाया जाता है. पिछले साल तक यहां नगालिम का एक अलग झंडा फहराया जाता रहा है. हेब्रॉन में मुख्य कार्यक्रम होता है इसके अलावा नगालैंड की राजधानी कोहिमा सहित सभी शहरों कस्बों में इस दिन नगालिम का झंडा फहराया जाता है.
जीपीआरएन ने इन सालों में अपनी एक औपचारिक न्याय प्रणाली भी बना ली है जिसमें परंपरागत कानूनों के हिसाब से फैसले सुनाए जाते हैं. फ्रंटलाइन की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसके सबसे निचले पायदान पर ग्राम अदालतें हैं. अलग-अलग जनजातीय क्षेत्रों में क्षेत्रीय अदालतें मौजूद हैं. इसी रिपोर्ट में जीपीआरएन के कर्मचारी दावा करते हैं कि ज्यादातर नगा आबादी भारतीय अदालतों के बजाय इन अदालतों पर भरोसा करती है.
नगालैंड की इन परिस्थितियों के बीच सवाल उठता है कि वहां चुनी हुई सरकार राज्य में एक समानांतर सत्ता क्यों चलने दे रही है? इस सवाल का सीधा जवाब यही है कि एनएससीएन-आईएम समानांतर सत्ता चलाने लायक ताकत रखता है. इस समय नगालैंड में नगा पीपल्स फ्रंट (एनपीएफ) की सरकार है और माना जाता है कि इसे विद्रोही गुट अप्रत्यक्षरूप से समर्थन देता है. एनपीएफ की स्थापना नेफियो रियो ने 2002 में की थी. इससे पहले वे कांग्रेस में थे. एनपीएफ कुछ सहयोगी दलों जिनमें भाजपा भी शामिल है, के साथ 2003 से ही नगालैंड में सत्ता में है. उसने कांग्रेस को बेदखल कर पहली बार सरकार बनाई थी.
राज्य में कांग्रेस एनएससीएन-आईएम की विरोधी पार्टी रही है लेकिन इस गुट का इतना प्रभाव है कि निजी स्तर पर कई कांग्रेस नेता उसी के समर्थन से चुनाव जीतते हैं. वहीं दूसरी तरफ एनपीएफ को तो गुट का समर्थन हासिल ही है. जाहिर है कि ऐसे में एनएससीएन की समानांतर सरकार को चुनी हुई सरकार चुनौती नहीं देगी.
इस राज्य में वैसे तो सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून लागू है पर एनएससीएन-आईएम केंद्र सरकार के साथ संघर्ष विराम की स्थिति में है. इसलिए यहां केंद्रीय सुरक्षाबल यथास्थिति बनाए रखते हुए विद्रोही गुट के लड़ाकों पर तब तक सीधे कार्रवाई नहीं करते जबतक कि वे किसी हिंसक संघर्ष की वजह न बन रहे हों.
पिछले साल भारत सरकार के साथ समझौते के बाद 14 अगस्त को हेब्रॉन में एनएससीन-आईएम ने ‘नगालिम’ का स्वतंत्रता दिवस मनाया था. इस दिन फिर से नगालैंड में जगह-जगह नगालिम के झंडे फहराए गए. तब कहा जा रहा था कि यह नगालिम का अंतिम स्वतंत्रता दिवस हो सकता है क्योंकि इसके बाद जल्दी ही शांति समझौता अंतिम रूप ले लेगा. फिलहाल एक साल के बाद भी इस दिशा में दोनों पक्षों के बीच मतभेद दिखाई दे रहे हैं और पूरी संभावना है कि इसबार फिर 14 अगस्त को हेब्रॉन में नगालिम का झंडा फहराया जाए.
दादर स्थित अंबेडकर भवन को गिराने के मामले ने पकड़ा तूल
मुंबई: मुंबई के दादर इलाके में बने अंबेडकर भवन के बड़े हिस्से पर शुक्रवार देर रात हथौड़ा चलाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। डॉ. भीमराव अंबेडकर के पोते प्रकाश और आनंद राज की तहरीर पर भोईवाड़ा पुलिस ने पीपुल्स इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के खिलाफ मामले में शिकायत दर्ज कर ली है।
1930 से दादर में बनी ईंट-पत्थर की इमारत से बाबासाहेब गुलामी के खिलाफ सियासी सफहे भरते थे, इसी इमारत में कभी बाबासाहेब का पुस्तकालय था। यहां रखी प्रिटिंग प्रेस से उनकी कलम छपकर जाति व्यवस्था से लड़ती थी। लेकिन रात के अंधेरे में इसे तोड़ दिया गया। बाबासाहेब के परिजन इस तोड़-फोड़ के लिये पीपुल्स इंप्रूवमेंट ट्रस्ट को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं, उनके खिलाफ थाने में एफआईआर भी दर्ज करवाई गई है।
भोईवाड़ा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने वाले बाबासाहेब के पोते प्रकाश अंबेडकर ने कहा, ‘ऐतिहासिक प्रिंटिग प्रेस को बर्बाद कर दिया, ये लोग ट्रस्टी नहीं हैं, इनकी ट्रस्टीशिप को चैरिटी कमिश्नर ने मान्यता भी नहीं दी है, ये सिर्फ ज़मीन के कारोबारी इस्तेमाल के लिये ऐसा कर रहे हैं।’ हालांकि ट्रस्ट के लोग सारे आरोपों को खारिज कर रहे हैं। पीपुल्स इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के ट्रस्टी श्रीकांत गवरे ने कहा, ‘मैं 2001 से ट्रस्टी हूं, प्रेस ट्रस्ट का है, सिर्फ प्रेस में रखी मशीनें परिवार की हैं, जमीन पर बाबासाहेब का स्मारक बनेगा जिससे समाज का फायदा हो, हमारे खिलाफ लगाए गए आरोप गलत हैं।’
मुंबई महानगरपालिका ने बिल्डिंग को जर्जर की श्रेणी में रखा था, लेकिन उसने कहा है कि उसके कर्मचारी इसे तोड़ने में शामिल नहीं थे। वहीं ट्रस्ट चाहता है कि पार्किंग और सारी सुविधाओं से युक्त इस जगह पर 17 मंजिला नई इमारत बनाई जाए।
यूपी में अखिलेश मंत्रिमंडल का विस्तार, पांच मंत्री शामिल, एक मंत्री की छुट्टी
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोमवार को अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया। मंत्रिमंडल में विस्तार से पहले ही अखिलेश यादव ने राज्य के साइंस और टेक्नोलॉजी मंत्री मनोज पांडे को हटा दिया है। आज पांच नए मंत्री शामिल किए गए हैं। इनमें बलराम यादव, रविदास मेहरोत्रा, शारदा प्रताप शुक्ला, ज़ियाउद्दीन रिज़वी और नाराद राय का नाम शामिल हैं।।
इससे पूर्व अखिलेश यादव की जिद की वजह से कौमी एकता दल (कौएद) का समाजवादी पार्टी (सपा) में विलय आखिरकार रद्द हो गया था। पार्टी कार्यालय में हुई संसदीय बोर्ड की बैठक में तय हुआ कि सपा में कौएद का विलय नहीं होगा। बर्खास्त किए गए मंत्री बलराम यादव की अखिलेश कैबिनेट में वापसी हुई है। बैठक के पहले ही अखिलेश यादव ने इसके संकेत दे दिए थे। उन्होंने कहा था, “मुख्तार अंसारी जैसे लोगों का हमारी पार्टी में स्वागत नहीं हो सकता।”
सपा महासचिव प्रोफेसर रामगोपाल यादव ने कहा कि सपा में कौमी एकता दल का विलय नहीं होगा। पार्टी से बर्खास्त मंत्री बलराम यादव की मंत्रिमंडल में वापसी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि अखिलेश यादव यूपी में समाजवादी रथयात्रा निकालेंगे।
गौरतलब है कि मुख्तार की पार्टी कौमी एकता दल का सपा में विलय हुआ। इस विलय से अखिलेश खासे नाराज थे। नाराजगी की वजह से ही उन्होंने बलराम यादव को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया था। बाद में शिवपाल सिंह यादव का हालांकि बयान आया था कि अंसारी बंधुओं का विलय पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के कहने पर हुआ है। लिहाजा, यह पार्टी का फैसला है। इसे सबको मानना पड़ेगा।
MTCR में शामिल हुआ भारत, चीन और पाकिस्तान अब हो गए मिसाइल की ताकत में हमसे पीछे
परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में शामिल होने से वंचित रहने के तीन दिन बाद आज सोमवार को भारत मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) का सदस्य बन जाएगा। एमटीसीआर दुनिया के चार महत्वपूर्ण परमाणु प्रौद्योगिकी निर्यात करने वाले महत्वपूर्ण देशों के समूह में से एक है।
भारत ने पिछले वर्ष एमटीसीआर की सदस्यता के लिए आवेदन किया था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने इस आशय की जानकारी देते हुए कहा कि एनएसजी पर भारत अपना प्रयास जारी रखेगा।
विदेश सचिव एस जयशंकर सोमवार को फ्रांस, नीदरलैंड और लक्जमबर्ग के राजदूतों की मौजूदगी में इस क्लब में शामिल होने के लिए दस्तावेज पर हस्ताक्षर करेंगे। विकास स्वरूप ने एनएसजी की सदस्यता न मिलने को असफलता मानने से इनकार करते हुए कहा कि इस मामले में हमें अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।
एकमात्र देश ने भारत की सदस्यता के दावे का विरोध किया था। गौरतलब है कि परमाणु प्रौद्योगिकी निर्यात करने वाले समूहों में भारत के शामिल होने की इच्छा वर्षों पुरानी है। इस क्रम में भारत ने एमटीसीआर और एनएसजी के लिए जोर लगाया था।
भविष्य में उसका इरादा इससे संबंधित दो अन्य समूहों ऑस्ट्रेलियन ग्रुप और वास्सेनार एग्रीमेंट में शामिल होने की है। एनएसजी में हालांकि भारत चीन के विरोध की दीवार नहीं लांघ पाया।
मगर एमटीसीआर में अंत समय में इटली का विरोध छोड़ने के बाद भारत का रास्ता साफ हो गया। स्वरूप ने बताया कि सोमवार को भारत एमटीसीआर का पूर्ण रूप से सदस्य बन जाएगा। उन्होंने कहा कि एनएसजी मामले में भारत की पाकिस्तान से तुलना कहीं से उचित नहीं है।
एमटीसीआर का सदस्य बनने से भारत को प्रमुख उत्पादनकर्ताओं से अत्याधुनिक मिसाइल टेक्नोलॉजी और निगरानी प्रणाली खरीद में मदद मिलेगी, जिसे केवल एमटीसीआर सदस्य देशों को ही खरीदने की इजाजत है। सदस्य होने के बाद भारत पर लगा अंकुश हट जाएगा।
भारत के लिए अमेरिका से ड्रोन तकनीकी लेना सरल हो जाएगा। साथ ही भारत मिसाइल तकनीकी का निर्यात कर सकेगा। हेग आचार संहिता में शामिल होने को मजबूती मिलेगी।
यह संहिता बैलेस्टिक मिसाइल अप्रसार संधि की निगरानी करती है। इसके साथ ही रूस के साथ संयुक्त उपक्रम को बल मिलेगा।
एमटीसीआर का उद्देश्य मिसाइलों के प्रसार को प्रतिबंधित करना, रॉकेट सिस्टम को पूरा करने के अलावा मानव रहित जंगी जहाजों पर 500 किलोग्राम भार के प्रक्षेपास्त्र को 300 किलोमीटर तक ले जाने की क्षमता वाली तकनीक को बढ़ावा देना है। व्यापक विनाश वाले हथियारों और तकनीक पर पाबंदी लगाना इस समूह का उद्देश्य है।







