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रमजान में दंगा भड़काना चाहता था ISIS, मंदिर में बीफ के टुकड़े रखने की थी योजना

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राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने बुधवार को हैदराबाद में 9 जगहों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की. इस दौरान बर्बर आतंकी संगठन ISIS से संबंध रखने वाले 5 युवाओं को गिरफ्तार किया गया, जबकि 6 अन्य को हिरासत में रखकर पूछताछ भी की जा रही है. जांच एजेंसी का कहना है कि आईएस रमजान के पाक महीने में दंगा भड़काने की साजिश रच रहा था. यही नहीं, इसके लिए चारमीनार के पास मंदिर में गोमांस रखने की भी योजना थी.
एनआईए को बुधवार की छापेमारी में गिरफ्तार युवाओं के पास से शक्तिशाली बम और करीब 15 लाख रुपये कैश भी मिले हैं. जांच एजेंसी ने खुलासा किया है कि आतंकी संगठन की योजना हैदराबाद शहर को धमाकों से दहलाने की थी. वो शहर के वीवीआईपी और भीड़भाड़ वाले इलाकों को निशाना बनाना चाहते थे. लेकिन, उनका मुख्य मकसद शहर में सद्भाव बिगाड़ने और दंगा भड़काने की थी. इसके लिए वो चारमीनार के पास स्थित भाग्यलक्ष्मी मंदिर में गोमांस और भैंस का मीट रखने वाले थे.
जांच एजेंसी के मुताबिक आईएस का हैदराबाद से गिरफ्तार युवा आईएस के हैंडलर शफी अरमर के साथ नियमित रूप से संपर्क में थे. इन युवकों पर पिछले 4-5 महीनों से एनआईए नजर बनाए हुए था.
एनआईए ने 25 जून को इन युवकों की टेलिफोन पर हुई बातचीत को सुनने के बाद संदिग्धों को हिरासत में लेने का करने का फैसला किया. एनआईए के सूत्र ने बताया, ‘बातचीत के दौरान एक संदिग्ध ने दूसरे व्यक्ति से फोन पर उस दिन गाय और भैंस के मांस के चार-चार टुकड़े, और अगले दिन गोमांस के सात टुकड़े लाने को कहा.’ सूत्र ने बताया कि हमला अगले कुछ दिनों में हो सकता था और मॉड्यूल के लिए फंड दुबई के रास्ते निकल चुका था.
एनआईए ISIS के हैदराबाद मॉड्यूल के भंडाफोड़ को बड़ी सफलता मान रही है, क्योंकि यह भारत में आईएस से प्रेरित पहला बड़ा आधुनिक हथियारबंद गुट है. हालांकि इससे पहले रूड़की में मॉड्यूल का भंडाफोड़ हुआ था, लेकिन उसके पास मिले हथि‍यार इतने चिंताजनक नहीं थे.
एनआईए के एक अधिकारी ने कहा, ‘गोमांस को लेकर टेलिफोन पर हुई बातचीत के बाद एनआईए ने एक्शन लेने का फैसला किया. हमारा अनुमान है कि आईएस से प्रेरित ये युवा, जो सीरिया में बैठे हैंडलर आमिर से संपर्क में थे, वीवीआईपी और मॉल्स, शॉपिंग सेंटर्स, चारमीनार के आसपास के इलाकों को निशाना बनाना चाहते थे. इसके साथ ही करीब के मंदिरों में गोमांस प्लांट करना चाहते थे. इसमें भाग्यलक्ष्मी मंदिर भी एक संभावित निशाना हो सकता था.’ एनआईए सूत्र ने आशंका जताई है कि आमिर ही शफी अरमर उर्फ यूसुफ अल हिन्दी है.
गौरतलब है कि खुफिया इनपुट के आधार पर बुधवार सबुह हैदराबाद शहर के करीब 9 जगहों पर एनआईए ने छापेमारी की है. NIA ने मामले में 22 जून को ही एक FIR दर्ज किया था, जिसके तहत बुधवार को 5 लोगों की गिरफ्तारी हुई है. जांच एजेंसी ने UAPA, 121A,122 और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है. एफआईआर में मो इलियास यजदी (अमान नगर, हैदराबाद), मोहम्मद इब्राहिम यजदी (अमान नगर), हबीब बरकस, मो. इरफान (चट्टा बाजार) और अब्दुल्ला बिन अहमद अलमुदि उर्फ फहद (चार मीनार) के नाम शामिल हैं.
एजेंसी बाकी के 6 युवकों से पूछताछ कर रही है. जिन 5 लोगों को गिरफ्तार किया है, उनसे पूछताछ के बाद ही बाकी के 6 लोगों को हिरासत में रखा गया है. बताया जाता है कि बुधवार को छापेमारी में इन 11 युवकों के पास से 15 लाख रुपये, 25 मोबाइल फोन, एक एयरगन, एयरगन की ट्रेनिंग के लिए टारगेट, बम बनाने के लिए नट बोल्ट, नाइट्रेट कैमिकल और IED की बरामदगी हुई है.

मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल और विस्तार से पहले मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड देखेंगे PM मोदी

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नई दिल्‍ली: आगामी 18 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मॉनसून सत्र से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कैबिनेट में नए मंत्रियों के शामिल होने और कुछ जूनियर मंत्रियों की तरक्‍की की संभावना है। सरकार के सूत्रों ने यह जानकारी दी। खबर यह भी है कि कैबिनेट विस्तार से पहले पीएम नरेंद्र मोदी आज मंत्रियों के साथ बैठक करेंगे। गुरुवार शाम चार बजे पीएम की मुलाकात मंत्रियों से होगी जहां वह अपने काम का रिपोर्ट कार्ड देंगे, जिसके बाद उनके काम की समीक्षा होगी। इससे पूर्व बुधवार को पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बीच इस मामले पर 5 घंटे बैठक चली।
कैबिनेट में इस बदलाव की घोषणा 6 जुलाई से पहले किए जाने की संभावना है, जब प्रधानमंत्री मोदी अफ्रीका दौरे के लिए रवाना होंगे। दो प्रमुख राज्‍य मंत्रियों, पीयूष गोयल और धमेंद्र प्रधान को कैबिनेट रैंक पर पदोन्‍नत किया जा सकता है। कुछ खाली जगहों को भी भरे जाने की संभावना है। सर्बानंद सोनोवाल ने असम के मुख्‍यमंत्री की कमान संभाली, जबकि रावसाहेब पाटिल दनवे ने महाराष्‍ट्र बीजेपी के अध्‍यक्ष बनाए जाने के बाद इस्‍तीफा दे दिया था। जूनियर मंत्रियों को पंजाब, उत्‍तराखंड और उत्तर प्रदेश के चुनावों को देखते हुए इन राज्‍यों की कमान दिए जाने की उम्‍मीद है। कैबिनेट विस्तार से पहले जुलाई के शुरूआती हफ्ते में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी अपनी टीम का पुनर्गठन करने वाले हैं। इसमें राष्ट्रीय कार्यकारिणी का पुनर्गठन होगा, वहीं संसदीय बोर्ड में बदलाव की संभावना नहीं है।
सूत्रों का कहना है कि कुछ मंत्रियों के विभागों में अदला-बदली की जा सकती है। कानून मंत्री सदानंद गौड़ा को मदद देने के लिए उनके साथ एक ताकतवर राज्‍यमंत्री को लगाया जा सकता है। कैबिनेट में 82 से ज्‍यादा मंत्री नहीं हो सकते, जबकि वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित इसमें 70 सदस्य हैं। उत्‍तर प्रदेश से करीब दर्जन भर मंत्री हैं, जहां अगले साल चुनाव होने है। देश के सर्वाधिक आबादी वाले इस राज्‍य के परिणाम से 2019 के लोकसभा चुनावों के संभावित परिणामों का आकलन किया जाएगा। कैबिनेट पर चर्चा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्‍त मंत्री अरुण जेटली और बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह के बीच बुधवार शाम बैठक हुई है। नाम न छापने की शर्त पर सरकार के सूत्रों ने यह जानकारी दी है।

अमेरिका की दो टूक, 'एक देश नहीं रोक सकता NSG में भारत की राह'

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अमेरिका ने कहा है कि न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी पर बनी अंतरराष्ट्रीय सहमति को कोई एक देश नहीं रोक सकता है। अमेरिका के राजनीतिक मामलों के उपमंत्री थॉमस शैनान ने कहा कि ऐसा करने वाले देश को जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
शैनान ने सोल में भारत को सफलता न मिलने पर अफसोस जताते हुए कहा कि अमेरिका परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता के लिए प्रतिबद्ध है। उनका यह बयान दक्षिण कोरिया के सोल में हुए एनएसजी के सम्मेलन के एक हफ्ते बाद आया है। सम्मेलन में चीन के विरोध के बाद भारत की दावेदारी पर सहमति नहीं बन पाई थी।
चीन ने कहा था कि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत नहीं किए हैं। इसलिए उसे एनएसजी की सदस्यता नहीं मिल सकती है, क्योंकि सदस्यता के लिए यह बुनियादी शर्त है।
दिल्ली में मंगलवार को भारतीय अधिकारियों से मुलाकात के बाद अमेरिकी नेता ने कहा भारत का मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) में प्रवेश बताता है कि भारत जिम्मेदार और परमाणु अप्रसार का महत्वपूर्ण खिलाड़ी है।
थॉमस शैनान ने कहा कि अब दोनों देशों को मिलबैठ कर इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि सोल में क्या कमी रह गई और अगली बार उन कमियों को दूर करने की जरूरत है जिससे की सदस्यता सुनिश्चित हो सके।
अमेरिकी राजनयिक ने कहा कि दक्षिण चीन सागर में चीन जो कर रहा है, वह पागलपन है। उन्होंने कहा कि अमेरिका चाहता है कि भारत हिंद महासागर में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। उन्होंने कहा कि चीन के उभार को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि हिंद महासागर में भारत को व्यापक और मजबूत उपस्थिति के लिए अमेरिका उसके साथ मिलकर काम करना चाहता है।
एनएसजी की सदस्यता न मिलने के लिए भारत ने चीन को जिम्मेदार ठहराया था। चीन के सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ के संपादकीय में भारत के आरोपों का चीन ने जवाब दिया। अखबार के मुताबिक भारत ने एनपीटी पर दस्तखत नहीं किए हैं, लेकिन वह एनएसजी में शामिल होने के लिए सबसे उत्सुक आवेदक है।

भस्मासुर को पालने वाले उसका ही शिकार हो जाते हैं, तुर्की इसका सबसे नया उदाहरण है

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मंगलवार रात इस्तांबुल हवाई अड्डे पर हुए आत्मघाती बम धमाके ने एक बार फिर याद दिलाया है कि तुर्की किस खतरनाक दौर से गुजर रहा है. इसकी दक्षिणी सीमा सीरिया जाने वाले जिहादियों के लिए आसान रास्ता बन चुकी है जबकि पूर्वी और दक्षिण पूर्वी हिस्से में इसके सुरक्षा बल कुर्दिश चरमपंथियों के साथ लड़ाई में उलझे हुए हुए हैं. 41 लोगों की जान लेने वाला इस्तांबुल में हुआ यह ताजा धमाका इस साल इस शहर पर हुआ चौथा बड़ा हमला है जो बताता है कि तुर्की के शहरों की सुरक्षा व्यवस्था खराब होती जा रही है. अब तक किसी भी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है. लेकिन तुर्की की सरकार और पश्चिमी विश्लेषकों का मानना है कि यह इस्लामिक स्टेट (आईएस) की कार्रवाई है.
अगर ऐसा है तो यह तुर्की के लिए खुद का चलाया तीर वापस लौटकर खुद पर लगने जैसा है. सीरिया को लेकर राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोआन ने जो आक्रामक नीति अख्तियार की उसने पश्चिम एशिया के इस हिस्से में अतिवादियों की फलने-फूलने में खूब मदद की. सीरिया संकट के शुरू होते ही वहां के राष्ट्रपति बशर अल असद के इस्तीफे की मांग का जो अभियान चला उसकी अगुवाई एर्दोआन ने ही की. सीरिया के गृह युद्ध में सरकार विरोधी गुटों की आर्थिक मदद करने के लिए तुर्की ने असद के दूसरे क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों से हाथ मिला लिया जिनमें सऊदी अरब और कतर भी शामिल हैं. इसके अलावा उसने सीरिया के साथ लगती अपनी 800 किमी लंबी सीमा भी खुली रखी ताकि दुनिया भर से आने वाले जिहादी सीरिया में आराम से दाखिल हो सकें. आईएस ने विदेशी लड़ाकों की जो फौज खड़ी कर डाली उसमें तुर्की की इस नीति की अहम भूमिका रही.
लेकिन लघुकालिक लक्ष्य पूरे करने के लिए अतिवादी संगठनों को संरक्षण देना अक्सर दीर्घकालिक हितों के लिए नुकसानदेह होता है. जब तक तुर्की ने आईएस को लेकर अपनी नीति बदलना (जिसमें कुछ हद तक पश्चिमी देशों के दबाव की भी भूमिका थी) शुरू किया तब तक यह एक दुर्दांत आतंकी संगठन में तब्दील होकर अपने हमलावरों का रुख उत्तर की तरफ कर चुका था. पहले इसने तुर्की के सुरुक और अंकारा शहर में हुई वामपंथियों की रैलियों पर हमले किए. यह बीते साल की बात है. अब इसका इस्तांबुल पर हमला करना तुर्की के नेतृत्व के लिए गंभीर चेतावनी है.
एर्दोआन का कहना है कि तुर्की आखिर तक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखेगा. लेकिन सवाल यह है कि उनकी रणनीति क्या है. सुरक्षा से जुड़ी जो मुख्य चुनौतियां तुर्की के मुंह बाये खड़ी हैं उनका लेना देना प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सीरिया में चल रही लड़ाई से ही है. एर्दोआन चाहे मानें या न मानें, सच यह है कि असद को सत्ता से हटाकर सीरिया में तुर्की के असर का दायरा फैलाने की उनकी महत्वाकांक्षी योजना औंधे मुंह गिर गई है. जितनी जल्दी वे अपनी नीति बदल लें सीरिया और तुर्की के लिए उतना ही बेहतर रहेगा.
सबसे पहले तो तुर्की को सीरिया से लगी अपनी सीमा सील करनी चाहिए ताकि आतंकवादियों की सीमा पार आवाजाही रुक सके. इसे असद के खिलाफ अपनी परोक्ष लड़ाई बंद करने की भी जरूरत है. पश्चिमी देश सीरिया की सरकार और विरोधी गुटों में बातचीत करवाने की जिस कोशिश के जरिये शांति स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, तुर्की को उसमें हाथ बंटाना चाहिए. इसके बाद वह आईएस पर ध्यान केंद्रित कर सकता है और इस संगठन पर काबू पाने की साझा क्षेत्रीय कोशिशों में मदद कर सकता है.
हालांकि तुर्की सीरिया में जितना दखल दे चुका है उसके बाद यह बदलाव आसान नहीं होगा. लेकिन उसे यह समझना होगा कि अगर उसके शहर ही अराजकता और हिंसा की चपेट में आ जाएंगे तो कितना भी अहम रणनीतिक दांव उसके लिए किसी काम का नहीं.

BCCI की योजना पर पानी फिरा, इस साल नहीं होगा गुलाबी टेस्ट मैच

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पिछले साल ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच खेले गए पहले दिन-रात के टेस्ट मैच की अपार सफलता के बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) भी काफी उत्साहित हो गया था कि वह भी अपने घर में दिन-रात का टेस्ट मैच गुलाबी गेंद से कराए। बोर्ड की योजना भी थी कि सितंबर-अक्टूबर में न्यूजीलैंड के साथ होने वाली टेस्ट सीरीज में एक मैच गुलाबी गेंद से खेली जाए लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।
अप्रैल में तत्कालीन बीसीसीआई के सचिव अनुराग ठाकुर ने ऐलान किया था कि सितंबर-अक्टूबर में न्यूजीलैंड के भारत दौरे के दौरान खेली जाने वाली टेस्ट सीरीज का एक मैच दिन-रात का खेला जाएगा। लेकिन अनुराग के इस बयान के ठीक एक दिन बाद न्यूजीलैंड क्रिकेट ने बयान जारी कर कहा कि इस मामले में अभी कुछ भी अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
खुद बीसीसीआई और अनुराग की इस योजना पर पानी फिरता दिखा जब पिछले हफ्ते अनुराग ठाकुर ने माना कि इस सीरीज में फ्लडलाइट टेस्ट कराने की संभावना कम दिखती है और भारत दिन-रात के टेस्ट मैच खेलने को लेकर कोई हड़बड़ी में नहीं है।
भारत और न्यूजीलैंड के बीच 3 मैचों की टेस्ट सीरीज 22 सितंबर से शुरू होगी। सभी तीनों टेस्ट भारतीय समयानुसार सुबह 9:30 बजे से शुरू होगा। बीसीसीआई की शुरुआती प्रेस रिलीज में कहा गया था कि सीरीज का दूसरा टेस्ट इंदौर और तीसरा टेस्ट कोलकाता में खेला जाएगा। लेकिन बाद में कार्यक्रम में थोड़ा सा फेरबदल कर दिया गया। और अब दूसरा टेस्ट कोलकाता में होगा जबकि तीसरा टेस्ट इंदौर में खेला जाएगा। कार्यक्रम में फेरबदल अक्टूबर में होने वाले दूर्गा पूजा को ध्यान में रखकर किया गया है।
फिलहाल मंगलवार को बीसीसीआई ने एक अनोखी परंपरा की शुरुआत करते हुए पहली बार टीम इंडिया के शीर्ष क्रिकेटरों द्वारा घरेलू सीरीज के कार्यक्रम का ऐलान करवाया। टीम इंडिया के घरेलू सत्र का आगाज सितंबर-अक्टूबर में न्यूजीलैंड के खिलाफ होने वाली घरेलू सीरीज से हो रहा है। ट्विटर की जरिये भारत के शीर्ष खिलाड़ियों ने इसके कार्यक्रम की घोषणा की।
टेस्ट कप्तान विराट कोहली ने अपने ट्विटर हैंडल पर घोषणा की कि न्यूजीलैंड के खिलाफ पहला टेस्ट कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम में 22 से 26 सितंबर तक आयोजित किया जाएगा। दूसरा टेस्ट कोलकाता के ईडन गार्डंस में 30 सितंबर से चार अक्टूबर तक खेला जाएगा जबकि तीसरा और अंतिम टेस्ट जो आठ से 12 अक्टूबर तक चलेगा वो इंदौर के होलकर स्टेडियम में खेला जाएगा। इंदौर पहली बार किसी टेस्ट मैच की मेजबानी करने जा रहा है।
इससे पहले बल्लेबाज अजिंक्य रहाणे ने ट्वीट किया था कि दूसरा टेस्ट इंदौर के होलकर स्टेडियम में 30 सितंबर से चार अक्टूबर तक खेला जाएगा जबकि मोहम्मद शमी ने ट्वीट किया कि ईडन गार्डंस को तीसरा और अंतिम टेस्ट दिया गया है जो आठ से 12 अक्टूबर तक चलेगा।

हॉकी: भारत ने आयरलैंड को 2-1 से दी मात

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भारतीय हॉकी टीम ने छह राष्ट्रों के हॉकी टूर्नामेंट में मंगलवार को आयरलैंड को 2-1 से हरा दिया. अपने पहले मैच में जर्मनी के खिलाफ हार झेलने के बाद भारतीय टीम ने इस मैच में अच्छा प्रदर्शन किया.
भारत के लिए तलविंदर सिंह ने 22वें मिनट में और कप्तान सरदार सिंह ने 32वें मिनट में गोल किए. आयरलैंड के लिए एक मात्र गोल कयाल गुड ने किया. पहले क्वार्टर में आयरलैंड ने भारत पर हमले चालू रखे और उसे चौथे मिनट में सफलता भी मिली. इसके बाद भारतीय टीम ने अपने खेल में थोड़ा सुधार किया, लेकिन इस क्वार्टर में वह बराबरी नहीं कर पाई.
दूसरे क्वार्टर में भारत को 22वें मिनट में पेनाल्टी कॉर्नर मिला, जिसे तलविंदर सिंह ने गोल में बदल भारत को बराबरी दिलाई. बराबरी करने के बाद भारतीय टीम काफी आक्रामक हो गई. इस दौरान कप्तान सरदार ने 32वें मिनट में गोल कर भारत को आगे कर दिया.
चार मिनट बाद भारत को एक और पेनाल्टी कॉर्नर मिला, लेकिन वह इसे गोल में तब्दील नहीं कर पाई. अंतिम क्वार्टर में दोनों टीमों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला, लेकिन दोनों टीमों ने एक-दूसरे को गोल नहीं करने दिया और भारत ने 2-1 से मैच अपने नाम किया.

इस 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के चक्कर में हमारी तो शादियां तक नहीं हो रही

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‘उडता पंजाब’ को सेंसर बोर्ड की हरी झंडी के बाद अब अनुराग कश्यप की आने वाली फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर-3’ के विरोध की पटकथा लिखी जा रही है। झारखंड के धनबाद जिले के वासेपुर कस्बे के लोगों ने इसके विरोध का फैसला किया है। लोगों का मानना है कि फिल्म पहले के दोनों पार्ट में वासेपुर की गलत छवि दिखाई गई है जिसके कारण वहां के लोगों की बदनामी हुई है।
वार्ड काउंसलर निसार आलम का कहना है कि 2012 में इस फिल्म के पहले पार्ट के आने के बाद वासेपुर में अपराध का ग्राफ बढ गया। वो बताते हैं कि अब लोग वासेपुर में अपनी बेटियों की शादी करने से कतरा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वासेपुर के ही जीशान कादरी अपने स्वार्थ के लिए यहां की गलत तस्वीर पेश कर रहे हैं, जबकि वासेपुर के सामाजिक ताना बाना में कौमी एकता की मिठास है। वो कहते हैं कि कई दूसरी अच्छी बातें भी हैं, जिन्हें शोकेस किया जा सकता था। कादरी फिल्म के सह पटकथा लेखक हैं।
बकौल निसार आलम, “इस कस्बे के लोग आईएएस, आईआईटी इंजीनियर, डॉक्टर और पुलिस में बडे अधिकारी हैं। फिल्म तो इन खूबियों पर भी बनाई जा सकती है।”
वासेपुर की आरा मोड कालोनी के निवासी रुस्तम अंसारी ने बताया कि कोलकाता में उन्हें होटल वालों ने सिर्फ इसलिए कमरा नहीं दिया क्योंकि वे वासेपुर से हैं। ऐसा अनुभव दूसरे ग्रामीणों का भी है। लोगों ने बताया कि होटल वाले रेसिडेंशल प्रूफ देखते ही कमरों के बुक्ड होने का बहाना बना देते हैं।
भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के धनबाद जिलाध्यक्ष बबलू फरीदी मानते हैं कि इस फिल्म के कारण वासेपुर के युवाओं पर गलत असर पड रहा है और इसलिए फिल्म के पार्ट-3 का विरोध होगा।
उन्होंने कहा कि इसके लिए कानूनी लडाई भी लडी जाएगी।
पिछले दिनों जीशान कादरी वासेपुर में बढ रहे क्राइम ग्राफ का अध्ययन करने यहां आए थे।
उन्होंने मीडिया को कहा, “हमने गैंग्स ऑफ वासेपुर के पहले दो पार्ट में साल 2002 तक की कहानी बताई थी। तीसरे पार्ट में हम 2003 से 2015 की कहानी बताने वाले हैं। फिल्म की स्क्रीप्टिंग का काम पूरा हो चुका है। शूटिंग भी चल रही है। हम इसे अक्टूबर तक पूरी कर लेंगे। इस साल के अंत तक फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज कर दी जाएगी।”
जीशान ने कहा कि फिल्म को फिल्म की तरह ही लेना चाहिए और इसका विरोध करने वाले लोग सस्ती लोकप्रियता के फेर में ऐसा कर रहे हैं।

लेखक विचारधाराओं के दुर्गों का प्रहरी नहीं, उनकी दरारें खोजने वाला सेंधमार होता है

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आलोचना अब एक ख़तरनाक काम है. इसका एहसास मुझे हाल में तब हुआ जब मैंने मैसूर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्राध्यापक बीपी महेशचंद्र गुरु की गिरफ़्तारी की आलोचना की. इस आलोचना के तत्काल बाद कई लोग यह बताने वाले निकल आए कि इस गिरफ़्तारी के लिए मोदी सरकार ज़िम्मेदार नहीं है, क्योंकि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है. हालांकि वे यह छुपा गए कि पुलिस में उनकी शिकायत एक अल्पज्ञात हिंदू संगठन ने की थी. कुछ लोगों ने इस बात के लिए भी मेरी भर्त्सना की कि मैंने अपनी संक्षिप्त टिप्पणी में गुरु के दलित होने का उल्लेख किया और इसे भी उनकी गिरफ़्तारी की एक वजह के तौर पर रेखांकित किया.
क्या यह बात महत्त्वपूर्ण है कि महेशचंद्र गुरु की गिरफ़्तारी मोदी सरकार ने नहीं, किसी और सरकार ने की है? अभिव्यक्ति के ख़तरों के प्रति संवेदनशील हम लोग यह जानते हैं कि कोई भी सरकार किसी भी तरह के वैचारिक प्रतिरोध, या असहमति या किसी असुविधाजनक विचार को सहने को तैयार नहीं होती. वह ऐसे विचारों को भी रोकती है जिनसे उसके अलोकप्रिय होने का खतरा हो- चाहे वे विचार कितने भी सही हों. इस मायने में कांग्रेसी सरकारों का अनुभव भाजपा सरकारों के अनुभव से कहीं बेहतर नहीं रहा है. कांग्रेस ने भी कई किताबों को प्रतिबंधित किया है- कई लेखकों को उत्पीड़ित किया है. बौद्धिक दमन का मार्क्सवादियों का इतिहास तो कहीं ज्यादा रक्ताक्त रहा है. नक्सलियों के ख़िलाफ ग्रीन हंट जैसे ऑपरेशन चलाने में चिदंबरम-मनमोहन या मोदी-राजनाथ में कोई अंतर नहीं है.
जब मार्क्सवादियों ने नक्सलबाड़ी से उठे आंदोलन को कुचला तो उसकी बड़ी तीखी आलोचना हुई. भारतीय साहित्य में एक पूरी पीढ़ी नक्सलवाद की वैचारिक सहानुभूति के बीच बड़ी हुई और उसने पिट रहे, मारे जा रहे लोगों का साथ दिया. कांग्रेस ने जब किताबों को प्रतिबंधित किया या लेखकों को तंग किया, तब भी उसकी आलोचना हुई. इमरजेंसी के दौरान कांग्रेस का चाबुक सिर्फ राजनीतिक नेतृत्व पर ही नहीं, लेखकों-पत्रकारों पर भी चला और कई ने 19 महीने की पूरी जेल काटी. राजीव गांधी ने जब प्रेस बिल लाने की कोशिश की तो उसका इतना तीखा विरोध हुआ कि राजीव गांधी ने क़दम पीछे खींच लिए. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या भी कांग्रेस के समय ही हुई और उस समय भी उसके प्रति पूरा बौद्धिक आक्रोश फूटा. मनमोहन सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो उसकी भी भरपूर खिल्ली उड़ाई गई. सिंगुर और नंदीग्राम में सीपीएम के दमन के ख़िलाफ़ लेखक और संस्कृतिकर्मी सड़क पर उतरे.
मगर यह पहली बार है जब लेखक की गिरफ़्तारी का विरोध करने पर आप पर हमला हो सकता है. यह कहा जा सकता है कि इसके लिए अमुक सरकार ज़िम्मेदार है और अमुक सरकार नहीं. याद कर सकते हैं कि कर्नाटक के लेखक एमएम कलबुर्गी की हत्या का विरोध कर रहे लोगों को बार-बार याद दिलाया गया कि यह हत्या तो कर्नाटक में हुई है, जहां कांग्रेस की ही सरकार है. यही नहीं, इस दौर में, विचार-विमर्श और तर्क के नाम पर एक नई तरह की छींटाकशी भी दिख रही है. लगभग हर मुद्दे पर कोई पूछने चला आता है कि किसी लेखक ने अपने पुरस्कार वापस किए या नहीं. जिन लेखकों को आप पढ़ने तक की जहमत नहीं उठाते, जिनके बारे में आपकी कोई राय नहीं है, जिनकी किताबें बिकती नहीं, उन मामूली से लोगों की पुरस्कार वापसी के उद्यम पर आप इतने नाराज़ हैं कि इसके पीछे संगठन की ताकत और साज़िश की नीयत देख रहे हैं. यह मानने को तैयार नहीं हैं कि लेखकों ने अपने प्रतिरोध का बहुत ही लोकतांत्रिक तरीक़ा चुना था जिससे किसी के अधिकारों की हानि नहीं होती थी. बेशक, इस प्रवृत्ति में कुछ भेड़चाल रही होगी, और संभव है, कुछ के भीतर इससे हासिल यशकामना भी हो, लेकिन सच यह है कि अंततः इसके पीछे भी लेखकीय स्वाभिमान की भावना ही थी. वरना इस दौर में चापलूसी और समर्थन से पुरस्कार, यश, और पद तीनों हासिल हो रहे हैं- पुणे फिल्म और टीवी इंस्टीट्यूट से लेकर निफ्ट और दूसरी संस्थाओं में हो रही भर्तियां यही बताती हैं. हालांकि खतरा फिर यही है- लोग पूछने लगेंगे कि कांग्रेस के समय कैसे लोगों की भर्ती होती थी? उन्हें कौन याद दिलाए कि कांग्रेस के समय भी ऐसे लोगों की आलोचना होती थी.
बहरहाल, आलोचना के प्रति इस उद्धत और आक्रामक रुख़ की वजह क्या है? एक वजह तो उस अनपढ़ता और स्मृतिविपन्नता में छुपी है जो हमारे समाज में लगातार बढ़ रही है. लोग न इतिहास से परिचित हैं न परंपरा से. न समाज को समझते हैं न संवाद को. वे अपने आसपास के हालात भी देखने को तैयार नहीं हैं. बेशक, इस बढ़ते हुए सतहीपन को, इस लगातार छिछले होते समय को हमारी संसदीय राजनीति के विद्रूप ने भी बढ़ावा दिया है, और इस विद्रूप की वजह से ख़ुद वह संसदीय लोकतंत्र संदिग्ध हुआ है जिसमें सामाजिक न्याय और बराबरी की कहीं ज़्यादा गुंजाइश होती है. लेकिन जो लोग इस विद्रूप के सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं, वही विकास की भाषा बोलते एक फासीवाद की अभ्यर्थना में खड़े हैं. उन्हें यह मंज़ूर नहीं कि कोई न्याय का प्रश्न उठाए, कोई याद दिलाए कि विकास के इस दावे में छेद हैं, कोई बताए कि इस देश में बोलने की आज़ादी वह चीज़ है जो इसके लोकतंत्र को उसकी बहुत सारी कमियों के बावजूद अद्वितीय और संभावनापूर्ण बनाती है, कोई कहे कि धर्म और राष्ट्र के नाम पर झूठ नहीं बोने जाने चाहिए, उन्माद नहीं फैलाया जाना चाहिए, कोई सोचे कि विचार के दायरे में धर्म और राष्ट्र की नई व्याख्याएं भी आती हैं जो जनोन्मुख चेतना के पोषण में सहायक होती हैं.
उल्टे ये लोग यह भरोसा दिलाने की कोशिश करते हैं कि गरीबी भले बनी रहे, बेरोज़गारी भले बची रहे, औरतें भले उत्पीड़ित होती रहें, दलित और आदिवासी भले पिटते रहें, धर्म और राष्ट्र का अभिमान सबसे बड़ी चीज़ है और इसी में उनका स्वप्न, उनकी मुक्ति निहित है. कहने की ज़रूरत नहीं कि ऐसे लोगों को सरकार की आलोचना राष्ट्र की आलोचना लगती है, प्रधानमंत्री को प्रश्नांकित करना देशद्रोह लगता है और धर्म की पुनर्व्याख्या की कोशिश करना पूरी सभ्यता के लिए ख़तरनाक लगता है. वे देश और समाज को जीवंत वाद-विवाद और संवाद की हलचल से बनते देखना नहीं चाहते, वे ऐसे लेखक, कलाकार और बौद्धिक नहीं चाहते जो किसी को प्रश्नांकित करें.
लेकिन हमें यह करते रहना होगा. अपनी आलोचना पर छींटाकशी झेलते हुए भी, अपने तुच्छ लेखन और तुच्छतम पुरस्कारों को ग्रहण करते या छोड़ते हुए भी, हमें याद दिलाना होगा कि किसी भी जीवित समाज में उसका लेखक, संस्कृतिकर्मी या बौद्धिक सिर्फ एक विपक्ष की भूमिका में ही रह सकता है. लेखक विचारधाराओं के दुर्गों का प्रहरी नहीं होता, वह उनकी दरारें खोजने वाला सेंधमार होता है- ग्राहम ग्रीन ने कहा था कि उसे चोर और तस्कर की तरह दबे पांव इन दुर्गों में दाखिल होना पड़ता है.
जब 1998 में वाजपेयी सरकार ने ऐटमी परीक्षण किए थे, तब हमने उनकी निंदा की थी, जब मनमोहन सिंह ने अमेरिका से ऐटमी करार किया तब हमने उनकी आलोचना की और अब जब नरेंद्र मोदी एनएसजी की सदस्यता के लिए बाल हठ लगाए दुनिया भर का निष्फल भ्रमण कर रहे थे, तब हम उसे उपहास से देखने को स्वतंत्र हैं. जब नरसिंह राव सरकार के समय बाज़ार खोले गए, तब भी बहुत सारे लेखकों और बुद्धिजीवियों ने उसे गलत बताया, जब कांग्रेस के समय ख़ुदरा कारोबार में सौ फीसदी निवेश का प्रस्ताव आया तब भी इसकी जमकर आलोचना हुई और जब नरेंद्र मोदी की सरकार सारे क्षेत्रों में विदेशी पूंजी को बढ़ावा दे रही है तो दरअसल यह भाजपा है जो अपनी वैचारिकी से विश्वासघात कर रही है, लेखक और पत्रकार नहीं हैं जो अपना पक्ष भूल रहे हैं.
साठ, सत्तर और अस्सी के दशकों में रांची, मेरठ, मलियाना, जमशेदपुर, बिहार शरीफ़, भागलपुर या दूसरी जगहों पर हुए दंगे हों, 1984 की हिंसा हो, बाबरी मस्जिद ध्वंस के पहले और बाद के उन्माद में हुई हिंसा हो, 2002 की गुजरात की प्रायोजित हिंसा हो, मुजफ़्फ़रनगर और बरेली के दंगे हों या संगीतकारों की भूमि कैराना को सांप्रदायिक जहर से सींचने की साज़िश हो- लेखक और पत्रकार हमेशा से इन सबके ख़िलाफ़ लिखते और बोलते रहे हैं- राजनीतिक दलों ने बेशक इन सब पर पाले बदले हों. तो अपने ऊपर हो रही छींटाकशी के बावजूद हमें बोलते रहना होगा. ये हम तय करेंगे कि कब लिखेंगे, कब जुलूस निकालेंगे, कब पुरस्कार लौटाएंगे और कब विरोध का कोई और तरीका चुनेंगे. बेशक ऐसी काली भेड़ें हर दौर में रही हैं जो सत्ता प्रतिष्ठानों के साथ चलती रही हैं. अभी वे कुछ बढ़ गई हैं और बिल्कुल राजनीतिक प्रवक्ताओं में बदल गई हैं. इन पर बस तरस खाया जा सकता है.
और जहां तक किसी की गिरफ्तारी को जाति से जोड़ कर देखने का सवाल है, कृपया भारतीय जेलों में बंद विचाराधीन और सज़ायाफ्ता कैदियों का एक समाजशास्त्रीय अध्ययन कर लें- सच्चाई सामने आ जाएगी. हमारी जेलों में बंद आधे से ज़्यादा लोग मुस्लिम, दलित और आदिवासी हैं. या तो ये मान लें कि ये अपराधी लोग हैं या फिर यह समझने की कोशिश करें कि हमारी व्यवस्था इन वर्गों के साथ एक अन्याय कर रही है. अगर इतना सब्र न हो तो यहां भी छींटाकशी कर लें. आखिर लोकतंत्र में बोलने की आज़ादी छींटाकशी करने वालों को भी मिलनी चाहिए. खतरनाक बात बस इतनी है कि यह छींटाकशी करने वाले लोग अंततः उन गिरोहों के साथ खड़े नज़र आते हैं जो कभी किसी को गोली मारते हैं, कभी किसी के चेहरे पर कालिख पोतते हैं, कभी किसी के ख़िलाफ पुलिस स्टेशन जाकर झूठी शिकायत दर्ज कराते हैं और कुल मिलाकर भय का वह माहौल बनाना चाहते हैं जिसमें कोई भी असहमति जताते हुए डरे.

मुंबई के वर्ली थाने में शराबी युवती ने मचाया कोहराम

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मुंबई। शहर के वर्ली थाने में एक 21 वर्षीय युवती गौरी भिड़े के हंगामे का वीडियो सामने आया है। इसमें यह युवती नशे में टल्‍ली होकर पूरे पुलिस स्‍टेशन में ना सिर्फ कोहराम मचा रही है बल्कि उसने कुछ पुलिसवालों की कॉलर पकड़कर उन्‍हें थप्‍पड़ तक रसीद कर दिए।
मामला 16 जून का है जब इस युवती ने तेज रफ्तार गाड़ी को डिवाइडर पर चढ़ा दिया। इसके बाद पुलिस वाले उसे और उसके दोस्‍तों को थाने लेकर आए। थाने आते ही लड़की आक्रामक हो गई औ पूरे पुलिस थाने में हंगामा मचा दिया। इस दौरान उसने पुलिसवालों को ना सिर्फ गालियां दी बल्कि उनकी कॉलर पकड़कर थप्‍पड़ भी जड़ दिए।
उसके साथ पकड़े गए तीन दोस्‍त उसे रोकने की कोशिश करते रहे लेकिन गौरी ने पूरा पुलिस थाना अस्‍त-व्‍यस्‍त कर दिया। 10‍ मिनट तक चले इस हंगामे के दौरान युवती ने पुलिस स्‍टेशन की खिड़की का कांच तोड़ने के अलावा वायर उखाड़ दिए और कम्‍प्‍यूटर भी तोड़ दिया।
जब आखिरकार पुलिस और उसके दोस्‍तों ने युवती का दिमाग ठंडा किया तो उसे जेजे अस्‍पताल ले जाया गया जहां उसका मेडिकल टेस्‍ट करवाया। युवती को आईपीसी की धारा 279, 332, 353, 427 और 34 के तहत मामला दर्ज कर एक रात के लिए पुलिस हिरासत में रखा गया।

उत्तराखंड में कई नामी कंपनियों के खाद्य पदार्थों के नमूने फेल

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तीर्थनगरी में नामीगिरामी कंपनियां फूड सेफ्टी मानकों की अनदेखी कर खाद्य पदार्थों की बिक्री कर रही हैं। यह खुलासा एक माह पहले खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा लिए गए सैंपलों के जांच में फेल होने के बाद हुआ है।
विभाग ने कंपनियों को कारण बताओ नोटिस भेजकर बीस दिन में जवाब मांगा है। इन कंपनियों में मदर डेयरी, अमूल जैसी कंपनियां शामिल है। खाद्य सुरक्षा अधिकारी पीसी जोशी ने बताया कि एक महीने पहले शहर में खाद्य पदार्थों में मिलावट की शिकायत पर ब्रांडेड कंपनियों के दूध, घी, एनर्जी ड्रिंक, ब्रेड टोस्ट के सैंपल लिए थे, जिन्हें जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा गया था, जिनकी रिपोर्ट मंगलवार को मिली है।
उन्होंने बताया कि मदर डेयरी का डबल टोन मिल्क, अनिक ब्रांड का घी, अमूल फूल क्रीम मिल्क, रेडवूल का एनर्जी ड्रिंक और स्वादिष्ट कंपनी ब्रेड टोस्ट फूड सेफ्टी के मानक के अनुसार नहीं है। मिस लेबल में भी कमी है। गुणवत्ता कमी पर संबंधित निर्माता कंपनियों को नोटिस जारी कर 20 दिन के अंदर जवाब मांगा गया है। उसके बाद अग्रिम कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
खाद्य सुरक्षा विभाग ने चारधाम में मिलावटी और दूषित खाद्य पदार्थ की बिक्री रोकने के लिए विभिन्न प्रतिष्ठानों में छापेमारी की कार्रवाई की। विभागीय टीम ने आशंका पर डेयरी से दूध और कनफेक्शनरी से कोल्ड ड्रिंक का नमूना लिया। खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि होटल और ढाबा संचालकों को साफ सफाई रखने की हिदायत दी गई है।