भस्मासुर को पालने वाले उसका ही शिकार हो जाते हैं, तुर्की इसका सबसे नया उदाहरण है

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मंगलवार रात इस्तांबुल हवाई अड्डे पर हुए आत्मघाती बम धमाके ने एक बार फिर याद दिलाया है कि तुर्की किस खतरनाक दौर से गुजर रहा है. इसकी दक्षिणी सीमा सीरिया जाने वाले जिहादियों के लिए आसान रास्ता बन चुकी है जबकि पूर्वी और दक्षिण पूर्वी हिस्से में इसके सुरक्षा बल कुर्दिश चरमपंथियों के साथ लड़ाई में उलझे हुए हुए हैं. 41 लोगों की जान लेने वाला इस्तांबुल में हुआ यह ताजा धमाका इस साल इस शहर पर हुआ चौथा बड़ा हमला है जो बताता है कि तुर्की के शहरों की सुरक्षा व्यवस्था खराब होती जा रही है. अब तक किसी भी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है. लेकिन तुर्की की सरकार और पश्चिमी विश्लेषकों का मानना है कि यह इस्लामिक स्टेट (आईएस) की कार्रवाई है.
अगर ऐसा है तो यह तुर्की के लिए खुद का चलाया तीर वापस लौटकर खुद पर लगने जैसा है. सीरिया को लेकर राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोआन ने जो आक्रामक नीति अख्तियार की उसने पश्चिम एशिया के इस हिस्से में अतिवादियों की फलने-फूलने में खूब मदद की. सीरिया संकट के शुरू होते ही वहां के राष्ट्रपति बशर अल असद के इस्तीफे की मांग का जो अभियान चला उसकी अगुवाई एर्दोआन ने ही की. सीरिया के गृह युद्ध में सरकार विरोधी गुटों की आर्थिक मदद करने के लिए तुर्की ने असद के दूसरे क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों से हाथ मिला लिया जिनमें सऊदी अरब और कतर भी शामिल हैं. इसके अलावा उसने सीरिया के साथ लगती अपनी 800 किमी लंबी सीमा भी खुली रखी ताकि दुनिया भर से आने वाले जिहादी सीरिया में आराम से दाखिल हो सकें. आईएस ने विदेशी लड़ाकों की जो फौज खड़ी कर डाली उसमें तुर्की की इस नीति की अहम भूमिका रही.
लेकिन लघुकालिक लक्ष्य पूरे करने के लिए अतिवादी संगठनों को संरक्षण देना अक्सर दीर्घकालिक हितों के लिए नुकसानदेह होता है. जब तक तुर्की ने आईएस को लेकर अपनी नीति बदलना (जिसमें कुछ हद तक पश्चिमी देशों के दबाव की भी भूमिका थी) शुरू किया तब तक यह एक दुर्दांत आतंकी संगठन में तब्दील होकर अपने हमलावरों का रुख उत्तर की तरफ कर चुका था. पहले इसने तुर्की के सुरुक और अंकारा शहर में हुई वामपंथियों की रैलियों पर हमले किए. यह बीते साल की बात है. अब इसका इस्तांबुल पर हमला करना तुर्की के नेतृत्व के लिए गंभीर चेतावनी है.
एर्दोआन का कहना है कि तुर्की आखिर तक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखेगा. लेकिन सवाल यह है कि उनकी रणनीति क्या है. सुरक्षा से जुड़ी जो मुख्य चुनौतियां तुर्की के मुंह बाये खड़ी हैं उनका लेना देना प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सीरिया में चल रही लड़ाई से ही है. एर्दोआन चाहे मानें या न मानें, सच यह है कि असद को सत्ता से हटाकर सीरिया में तुर्की के असर का दायरा फैलाने की उनकी महत्वाकांक्षी योजना औंधे मुंह गिर गई है. जितनी जल्दी वे अपनी नीति बदल लें सीरिया और तुर्की के लिए उतना ही बेहतर रहेगा.
सबसे पहले तो तुर्की को सीरिया से लगी अपनी सीमा सील करनी चाहिए ताकि आतंकवादियों की सीमा पार आवाजाही रुक सके. इसे असद के खिलाफ अपनी परोक्ष लड़ाई बंद करने की भी जरूरत है. पश्चिमी देश सीरिया की सरकार और विरोधी गुटों में बातचीत करवाने की जिस कोशिश के जरिये शांति स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, तुर्की को उसमें हाथ बंटाना चाहिए. इसके बाद वह आईएस पर ध्यान केंद्रित कर सकता है और इस संगठन पर काबू पाने की साझा क्षेत्रीय कोशिशों में मदद कर सकता है.
हालांकि तुर्की सीरिया में जितना दखल दे चुका है उसके बाद यह बदलाव आसान नहीं होगा. लेकिन उसे यह समझना होगा कि अगर उसके शहर ही अराजकता और हिंसा की चपेट में आ जाएंगे तो कितना भी अहम रणनीतिक दांव उसके लिए किसी काम का नहीं.