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अमजद जकारिया खान: नायकों से बेहतर एक फिल्मी खलनायक [पुण्यतिथि पर विशेष]

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वो गझिन कांटेदार दाढ़ी और उससे टपकती क्रूरता. न दिखने वाली गर्दन में फंसा ताबीज, कंधे पर लटकी कारतूस की पेटी, कमर के बजाय हाथ में झूलती बेल्ट, वो ‘अरे ओ सांभा! कितने आदमी थे’ वाला सवाल, वो खूंखार हंसी और बात-बात के बाद आ..थू!
सही समझे हैं (ऐसा शायद ही कोई हो जो इसे न समझे). बात गब्बर सिंह की ही हो रही है. वही गब्बर जो धधकते ‘शोले’ से तपकर निकला था. वही गब्बर जिसके लिए अमजद खान पहली पसंद नहीं थे. (पहली पसंद डैनी थे, जो उन दिनों फिल्म धर्मात्मा की शूटिंग में व्यस्त थे) वही अमजद जिनकी आवाज को जावेद अख्तर ने यह कहकर नकार दिया था कि इस रोल के लिए यह कमजोर है. आज 24 बरस बीत गए अमजद जकारिया खान के निधन को, लेकिन उनकी वो अलहदा आवाज और जुदा अंदाज 100 साल से ऊपर के भारतीय सिनेमा में अमर है. अमजद रंगमंच के आदमी थे. उनके बारे में विकीपीडिया लिखता है कि ‘नाजनीन’ उनकी पहली फिल्म थी. लेकिन नहीं, उन्होंने चार साल की उम्र में बाल कलाकार के रूप में पहला रोल अपने चाचा की ‘चार पैसा’ में किया था. कह सकते हैं कि खलनायकी अमजद को विरासत में मिली थी. अमजद ने जन्म ही 50-60 के दशक के टॉप विलेन जयंत खान के घर में लिया था. वो 1940 के 11वें महीने की 12 तारीख थी.
कुछ साल पहले जब हिंदुस्तानी सिनेमा के 100 साल का जश्न मनाया जा रहा था तो इस एक सदी के टॉप 10 डायलॉग्स में गब्बर रूपी अमजद खान का ‘कितने आदमी थे’ भी शुमार था. इस डायलॉग के बारे में आज भी उसी अंदाज में पूछा जाता है- कितने रीटेक थे? जवाब है- 40 सरदार.
अमजद दर्शन शास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट थे. शायद तभी वे यह डायलॉग इतने परफेक्शन से बोल पाये कि जो ‘डर गया, समझो मर गया.’ शोले फिल्म का उनका एक और डायलॉग तो खुद उस दौर का दर्शन था. वही डायलॉग जब गब्बर जय और वीरू से मात खाकर लौटे अपने आदमियों पर मारता है- ‘यहां से पचास-पचास कोस दूर जब बच्चा रात में रोता है तो मां कहती है, बेटा सो जा. सो जा नहीं तो गब्बर सिंह आ जाएगा. और ये तीन हरामजादे गब्बर सिंह का नाम पूरा मिट्टी में मिलाय दिए.’ यह डायलॉग तब के चंबल का आईना है. जाहिर है कि इस संवाद को लिखने वाले सलीम-जावेद का योगदान इसमें बहुत बड़ा है. लेकिन अमजद खान अगर इसे न बोलते तो?
शोले अगर सिनेमैटिक मास्टरपीस कही गई तो अमजद खान की ही वजह से. नसीरुद्दीन शाह ने अपनी किताब आत्मकथा ‘एंड देन वन डेः अ मेमॉयर’ में लिखा है- ‘मेरे हिसाब से अमजद खान गब्बर के रोल में अद्भुत थे. लेकिन पूरी इंडस्ट्री फिल्म की शुरुआती नाकामी की वजह उन्हें ही मान रही थी. उनकी पर्सनैलिटी, उनकी आवाज सभी आलोचनाओं के घेरे में थी.’ डैनी ने भी बाद में एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि ‘यदि मैंने शोले की होती तो भारतीय सिनेमा अमजद खान जैसे एक अद्भुत कलाकार को खो देता.’
शोले से पहले अमजद दो फिल्मों में असिस्ट कर चुके थे. ‘हिंदुस्तान की कसम’ में काम भी कर चुके थे. लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली थी. इसके बाद ही रमेश सिप्पी ने अमजद खान को शोले में लॉन्च किया था. यह लॉन्चिंग ऐसी रही कि शोले और गब्बर एक दूसरे के पर्याय बन गए. डाकू गब्बर सिंह की कल्पना उस खाकी वर्दी के बिना नहीं की जा सकती. वो खाकी वर्दी किसी कॉस्ट्यूम डिजाइनर ने नहीं, बल्कि खुद अमजद खान ने सुझाई थी जिसे वे मुंबई के चोर बाजार से खरीदकर लाए थे.
गब्बर हिंदी सिनेमा का पहला खलनायक था जिसने नायक-सी लोकप्रियता हासिल की. तभी तो ब्रिटैनिया ने गब्बर को अपने ग्लूकोज बिस्किट के विज्ञापन के लिए चुना. यह विज्ञापन ‘गब्बर की असली पसंद’ की पंचलाइन के साथ लोकप्रिय हुआ था. भारतीय समाज में यह पहली बार था जब किसी कंपनी ने अपने प्रोडक्ट के प्रचार के लिए किसी खलनायक को चुना था. हालांकि कई मानते हैं कि शोले का असली खलनायक तो ठाकुर था. जिसने अपने आदमी खड़े किए और अंत में गब्बर को मरवा दिया.
अमजद ने ‘चोर सिपाही’ और ‘अमीर गरीब आदमी’ नाम की दो फिल्मों का निर्देशन भी किया. लेकिन दूसरी फिल्म नहीं चली तो दोबारा निर्देशन में हाथ नहीं डाला. जब तक जिये गब्बर बनकर ही जिये और इस किरदार को इस कदर अमर कर गए कि गब्बर की चमक आज भी कायम है. तभी तो चार दशक बाद ‘गब्बर’ (अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म) वैसी ही दाढ़ी के साथ लौटता है और उस दौर के खलनायक का नाम इस दौर के नायक को दे दिया जाता है. गोया उस दौर का वह नायक ही हो.
फिल्मी पर्दे का यह दुर्दांत खलनायक असल जिंदगी में कैसा था, इसे शायद यह किस्सा सबसे अच्छी तरह बयां करता है. यह 1980 के दशक की बात है. शोले हिट हो चुकी थी और अमजद खान शिखर पर थे. उसी दौर में उन्होंने एक ऐसी फिल्म साइन की जिसमें उस वक्त के तमाम बड़े स्टार थे. फिल्म एक बड़े प्रोड्यूसर की थी. लेकिन डायरेक्टर की यह पहली फिल्म थी तो जिसका अंदेशा था वही हो रहा था. सारे स्टार सेट घंटों लेट आते. अपने डॉयलॉग खुद लिखने लगते और कई बार तो स्क्रिप्ट को अंगूठा दिखाते हुए अपने लिए नए सीन भी. मतलब कुल जमा ये कि डायरेक्टर को कोई कुछ समझ ही नहीं रहा था. एक दिन उसका सब्र जवाब दे गया. वह एक कोने में बैठकर सुबकने लगा.
संयोग से अमजद खान की नजर उस पर पड़ गई. उन्होंने माजरा पूछा. डायरेक्टर का कहना था कि बहुत हुआ, उसे नहीं करनी यह फिल्म. अमजद ने उसे ढांढस बंधाया और फिर एक फॉर्मूला सुझाया. उन्होंने कहा कि अगले दिन वे सबसे लेट आएंगे और जैसे ही वे सेट पर पहुंचें, वह उन्हें लेट होने के लिए सबके सामने, बिना हिचके ऊंची आवाज में डांट लगाए. प्लान यह था कि इसके बाद अमजद माफी मांग लेंगे.
यही हुआ. अगले दिन वे बाकी स्टारों के आने के बाद सेट पर पहुंचे. डायरेक्टर भी पूरी तैयारी करके बैठा था. कुछ समय पहले यह किस्सा सुनाते हुए अमजद खान के बेटे शादाब का कहना था कि इसके बाद तो न कोई स्टार लेट हुआ और न ही किसी की स्क्रिप्ट में कोई बदलाव करने की हिम्मत हुई. फिल्म सुपरहिट हुई. वह डायरेक्टर भी बड़ा नाम बना और अमजद खान की दरियादिली उसे हमेशा याद रही.

नरसिंह के 'रियो' की उम्मीद पर आज 'नाडा' देगा अहम फैसला

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नई दिल्ली: राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी (नाडा) ने डोपिंग के दोषी पाए गए भारतीय पहलवान नरसिंह यादव के मामले की सुनवाई गुरुवार तक टाल दी है. बुधवार को नई घटनाओं से नरसिंह डोपिंग मामले में आए नए मोड़ को देखते हुए नाडा ने सुनवाई के दौरान कोई फैसला नहीं सुनाया. तीन घंटे तक चली सुनवाई में नरसिंह के वकील ने दलील दिया कि खिलाड़ी हालात का पीड़ित है. उन्होंने साथ ही नरसिंह पर रियो ओलम्पिक-2016 में जाने पर प्रतिबंध न लगाने की अपील भी की है.
नरसिंह के अगले महीने से शुरू होने वाले रियो ओलम्पिक-2016 में जाने पर तब से काले बादल मंडरा रहे हैं जब से उनका डोप परीक्षण का परिणाम सकारात्मक पाया गया है. नरसिंह के डोप टेस्ट में फेल होने के बाद उन पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया गया है.
नरसिंह को बुधवार को तब और बड़ा झटका लगा जब पांच जुलाई को एकत्रित उनके दूसरे नमूने का डोप टेस्ट भी सकारात्मक आया.
इसी बीच ‘युनाइटेड विश्व रेसलिंग’ के दबाव में भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) ने मंगलवार को प्रावीण राणा को रियो में नरसिंह का प्रतिस्थापन खिलाड़ी घोषित कर दिया, ताकि ओलम्पिक की 74 किलोग्राम भारवर्ग में भारत का कोटा बचा रहे.
डब्ल्यूएफआई के अध्यक्ष ब्रजभूषण शरण सिंह ने बुधवार को कहा कि राणा का नाम 25 जुलाई को भेजा जा चुका था जो प्रतिस्थापन खिलाड़ी का नाम भेजने की अंतिम तारीख थी.

मुंबई से दिल्ली का सफर अब 13 घंटे से भी कम समय में होगा पूरा

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नयी दिल्ली : देश की राजधानी दिल्‍ली और आर्थिक राजधानी मुंबई के बीच अब ट्रेन का सफर महज तेरह घंटे से भी कम समय में पूरा किया जा सकेगा. यानी मौजूदा 17 घंटों की जगह अब इस दूरी को लगभग 13 घंटों में पूरी किया जा सकेगा. इस ट्रैक पर भारतीय रेल की जगह स्‍पेन में बनी हल्‍की और तेज रफ्तार ताल्गो ट्रेन एक से पांच अगस्त के बीच दौड़ेगी.
वेस्टर्न रेलवे के सूत्रों की मानें तो एक अगस्त को रात 7:55 बजे यह ट्रेन नयी दिल्ली से मुंबई के लिए रवाना होगी. जो 130 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार को मेंटेन करते हुए अपनी पूरी यात्रा को समाप्त करते हुए दूसरे दिन सुबह मुंबई पहुंचेगी. मालूम हो कि दिल्ली से मुंबई के बीच की दूरी 1,384 किमी है और यह ट्रेन चौदह घंटे और पांच मिनट में पूरी कर लेगी. वर्तमान में इस दूरी को राजधानी ट्रेन 130 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से सोलह घंटे में पूरा करती है.
मुंबई से दिल्ली रूट पर इस ट्रेन को टेस्ट ड्राइव के लिए तीन अगस्त को रवाना किया जायेगा. तीन अगस्त को सुबह में तीन बजे इसे मुंबई से रवाना किया जायेगा. जिसके दिल्ली में उसी दिन शाम में पहुंचने की उम्मीद जतायी गयी है. पांच अगस्त को इस ट्रेन को 150 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलाने का प्रस्ताव है और उम्मीद जतायी जा रही है कि दिल्ली से मुंबई के बीच की दूरी को महज 12 घंटे एवं 55 मिनट में पूरा कर लिया जायेगा. रेल मंत्रालय की ओर से उम्मीद जतायी जा रही है कि इन तीन टेस्ट रनों को पूरा कर लिये जाने के बाद ताल्गो ट्रेन की सेवायें इस रूट पर सामान्य तौर से शुरू कर दिया जायेगा.
वर्तमान में दिल्ली से आगरा के बीच गतिमान एक्सप्रेस भारतीय रेल में सबसे तेज रफ्तार से चलनी वाली ट्रेन है. जिसकी गति 160 किमी प्रतिघंटे की बतायी जाती है. बताया जाता है कि ताल्गो ट्रेन 180 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से चल सकती है. सूत्रों की माने तो टेस्ट रन के दौरान ताल्गो ट्रेन की रफ्तार बढ़ाने पर विचार किया जायेगा.
ट्रेन में नौ बोगियां लगी होगी. जिसमें दो एक्जयूटिव क्लास, चार चेयरकार, एक कैफेटेरिया, एक पावर कार और एक टेल एंड कोच जो उपकरणों के लिए लगायी जाएगी. कुछ दिनों पूर्व इसका मथुरा-पलवल के बीच 180 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से टेस्ट रन कराया गया था.

उत्तराखंड में चीन की घुसपैठः हरीश रावत

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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्य के चमोली ज़िले में चीनी सेना की गतिविधियां देखे जाने की जानकारी दी है. हरीश रावत के मुताबिक राज्य के राजस्व अधिकारियों ने सीमा पर चीनी सैनिकों की गतिविधियां देखी हैं.
समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत करते हुए चीन की घुसपैठ पर पूछे गए सवाल पर रावत ने कहा, “ये चिंताजनक है, हम शुरू से ही कहते रहे हैं कि यहां निगरानी बढ़ाइये. सूचना बिलकुल सही है.” उन्होंने कहा, “भारत सरकार और केंद्रीय एजेंसियों को भी इसके बारे में जानकारी है. अब जो ज़रूरी कार्रवाई होगी वो करेंगे.” रावत ने कहा, “हमारे राजस्व अधिकारी भूमि मापने गए थे, उन्होंने वहां चीनी सैनिकों की गतिविधियां देखी हैं.”
चीन और भारत के बीच सीमा पर कई इलाक़ों में विवाद है. भारत, चीन पर अरुणाचल और लेह-लद्दाख सीमा पर चीनी सैनिकों की घुसपैठ के आरोप लगाता रहा है.

कुपवाड़ा में पकडे़ गए आतंकी ने कबूला, 'मुझे ISI ने भेजा, मैं पाकिस्तानी हूं'

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नई दिल्‍ली : जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में बीते दिनों नौगाम में मुठभेड़ के दौरान जिंदा पकड़े गए आतंकी के ताजा कबूलनामे से पाकिस्‍तान एक बार फिर बेनकाब हो गया है। उसने माना है कि वह पाकिस्‍तान का रहने वाला है। आतंकी सैफुल्‍लाह बहादुर अली का पकड़ा जाना देश और सुरक्षाबलों के लिए एक ‘बड़ी सफलता’ है क्‍योंकि इससे पाकिस्तान की साजिश का खुलासा हुआ है। गौर हो कि कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में नियंत्रण रेखा के नजदीक नौगाम सेक्टर में बीते दिनों मुठभेड़ के दौरान सुरक्षा बलों ने चार आतंकवादियों को ढेर कर दिया था और एक अन्य आतंकी को पकड़ लिया।
जानकारी के अनुसार, कश्‍मीर में पकड़े गए इस पाकिस्‍तानी आतंकी सैफुल्‍लाह को विशेष विमान से दिल्‍ली लाया गया। सूत्रों के अनुसार, सैफुल्‍लाह से एनआईए की पूछताछ अभी जारी है। इस पूछताछ में सैफुल्‍लाह ने कबूला है कि वह पाकिस्‍तान के लाहौर का रहने वाला है और उसका नाम बहादुर अली है। उसे आईएसआई ने यहां भेजा है। हथियारों की ट्रेनिंग लिए जाने को लेकर उसने खुलासा किया कि उसे मुजफ्फराबाद कैंप में इसका प्रशिक्षण दिया गया। 22 साल के बहादुर अली को आतंकी संगठन लश्कर-ए-तोएबा ने ट्रेनिंग दी है।
सुरक्षाबलों को इस आतंकी के पास से भारतीय मुद्रा, तीन एके-47 रायफल और दो पिस्टल मिले थे। जानकारी के अनुसार इस आतंकी ने पूछताछ के दौरान सुरक्षा एजेंसियों को कई अहम जानकारी दी है। सूत्रों के अनुसार, भारत अब सैफुल्‍लाह पर पाकिस्‍तान को डोजियर देगा। इससे पूछताछ की पूरी प्रक्रिया खत्‍म होने के बाद पाकिस्‍तान को डोजियर सौंपा जाएगा।

कोच्चि‍ जा रही इंडिगो की फ्लाइट में लगे ISIS के नारे, दो यात्री हिरासत में

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दुबई से कोच्चि जा रही इंडिगो की एक फ्लाइट में गुरुवार को दो यात्रियों ने आईएसआईएस के नारे लगाए, जिसके बाद उसे मुंबई डाइवर्ट कर दिया गया है. इसे सुबह 9.15 बजे मुंबई में लैंड किया गया.
इन दोनों यात्रियों को फ्लाइट से उतारने के बाद हिरासत में ले लिया गया.
मुंबई पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि दोनों यात्रियों को हिरासत में लिया गया है. फ्लाइट के अन्य यात्रियों और क्रू मेंबर्स के बयान के आधार पर दोनों के खिलाफ केस भी दर्ज कर लिया गया है.
पुलिस के सूत्रों से जानकारी मिली है कि एक शख्स ने कुछ लोगों के साथ मारपीट की और कॉकपिट में घुसने की कोशिश की. इस बीच उसके भाई ने उसे रोकने की कोशिश भी की. बताया जा रहा है कि हंगामा करने वाला शख्स का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है.
इस घटना के बाद पायलट ने इमरजेंसी लैंडिंग करने का फैसला किया. लैंडिंग के बाद दोनों भाईयों को पुलिस के हवाले कर दिया गया. मानसिक तौर पर असंतुलित शख्स आईएसआईएस के नारे लगा रहा था. पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि क्या इस व्यक्ति का मानसिक संतुलन वाकई खराब है.

सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने PAK जाएंगे राजनाथ, अब होगी आमने-सामने बात

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केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह सार्क (SAARC) के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तान जाएंगे. उनकी यह यात्रा 3 और 4 अगस्त के बीच होगी. सूत्रों के मुताबिक, गृह मंत्री इस सम्मेलन में सीमा पार से बढ़ते आतंक का मुद्दा भी उठाएंगे.
गृह मंत्री का पाकिस्तान दौरा इस लिहाज से भी अहम है कि कश्मीर में जारी हिंसा और गतिरोध को लेकर दोनों देश एक दूसरे के आमने-सामने हैं. कश्मीर में हाल ही में भड़की हिंसा के पीछे पाकिस्तान का कनेक्शन भी सामने आया है.
नवंबर 2015 में ढाका में हुई सार्क की बैठक में सभी देशों के प्रमुखों ने इस बात पर सहमति जताई थी कि उनके गृह मंत्री हर साल आपसी सहयोग बढ़ाने और संबंधों को सुधारने की दिशा में प्रयास के लिए मुलाकात करेंगे. इसके पहले गृह सचिव स्तर की वार्ता भी होगी. इसके बाद सार्क की गृह मंत्री स्तर की पहली बैठक 11 मई 2006 को ढाका में हुई थी और 2007 में यह बैठक दिल्ली में हुई.

आतंकी हाफिज सईद ने किया कबूल- कश्मीर में हिंसा की अगुवाई कर रहा था लश्कर का कमांडर

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मुंबई आतंकी हमलों के गुनहगार आतंकी हाफिज सईद ने कश्मीर में भड़की हिंसा को लेकर बड़ा बयान दिया है. हाफिज ने कहा कि कश्मीर में हुए विरोध मार्च की अगुवाई लश्कर का एक कमांडर कर रहा था. हमेशा खुद को लश्कर-ए-तैयबा से अलग बताने वाले हाफिज ने 26/11 हमलों के बाद पहली बार आतंकी संगठन के बारे में सार्वजनिक तौर पर कुछ कहा है.
पाकिस्तान समेत दुनिया भर में लश्कर के बैन होने की वजह से हाफिज सईद हमेशा जमात-उद-दावा को खुद का संगठन बताते हुए खुले तौर पर लश्कर से कनेक्शन होने की बात से इनकार करता रहा.
बीते दो दिनों से पाकिस्तान सरकार ने कश्मीर में भड़की हिंसा को और बढ़ाने की कोशिश की है और इसे सिविल राइट से जोड़कर फायदा उठाने की भी कोशिश कर रही है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने यूएन से संपर्क साधा तो वहीं, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कश्मीर में मारे गए हिजबुल आतंकी बुरहान वानी को शहीद करार दिया था. कई पाकिस्तानी एनजीओ और मीडिया ने कश्मीर में भड़की हिंसा को भारत के खिलाफ विद्रोह की तरह पेश करते हुए इसे पाकिस्तान में शामिल होने की आवाज बताया है.
बुधवार को पाकिस्तान के फैसलाबाद में जमात-उद-दावा के कार्यकर्ताओं की बैठक में हाफिज सईद ने कहा, ‘हिजबुल कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में हुए विरोध-प्रदर्शनों की अगुवाई लश्कर का एक कमांडर कर रहा था.’ हाफिज ने उस शख्स का नाम अमीर बताया है. यह प्रदर्शन पाकिस्तान के समर्थन में कश्मीरियों को एकजुट करने के लिहाज से शुरू किए गए थे.

हिलेरी मुझसे और बिल क्लिंटन से ज्यादा योग्य: ओबामा

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फिलाडेल्फिया: अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की जमकर सराहना की है और उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार बताया है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बुधवार को फिलाडेल्फिया में पार्टी डेलिगेट्स को सम्बोधित किया। अपने भाषण में उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई भी महिला या पुरुष अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए हिलरी क्लिंटन से ज्यादा योग्य नहीं है।
ओबामा ने राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की खूब सराहना की और उन्हें राष्ट्रपति चुने जाने की वकालत की। डेमोक्रेटिक नेशनल कन्वेंशन में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने यहां तक कह डाला कि अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए हिलरी क्लिंटन से ज्यादा योग्य कोई नहीं है। ओबामा ने कहा कि हिलेरी शांत रहती है और सभी के साथ आदर से पेश आती है और मुसीबत के समय सभी की बातों को ध्यान से सुनती हैं। हिलेरी कठिन से कठिन मुसीबतों में भी पीछे नहीं हटती। हिलेरी मुश्किल हालात में भी फैसला लेना जानती है। वह एक मां है और देशभक्त होने के साथ फाइटर भी हैं। हिलेरी अमेरिका की नई कमांडर-इन-चीफ बनने के लिए तैयार है।
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा आज रात डेमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति पद के लिए प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन का समर्थन करेंगे और उन्होंने कहा है कि अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए किसी और की तुलना में वह ज्यादा योग्य हैं। व्हाइट हाउस द्वारा जारी किए गए भाषण के अंशों के अनुसार यहां डेमोक्रेटिक नेशनल कन्वेंशन में राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में ओबामा कहेंगे, ‘मैं यह विश्वास के साथ कह सकता हूं कि अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए किसी अन्य स्त्री-पुरष की तुलना में हिलेरी क्लिंटन ज्यादा योग्य हैं।’ वर्ष 2008 में राष्ट्रपति पद के चुनाव के दौरान हिलेरी ओबामा की कड़ी प्रतिद्वंद्वी रही थीं । हिलेरी ने ओबामा के पहले कार्यकाल 2009 से 2012 के बीच विदेश मंत्री के रूप में काम किया था ।
नवंबर में होने वाले आम चुनाव के लिए मंगलवार को हिलेरी को औपचारिक रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी चुना गया । इसके साथ ही वह किसी बड़े राजनीतिक दल से राष्ट्रपति पद की प्रत्याशी बनने वाली पहली महिला बन गयी हैं। भाषण के अंशों के मुताबिक ओबामा ने कहा कि अमेरिका जानता है कि हिलेरी साहस, आशावाद और प्रतिभा से लबरेज हैं। व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने बताया कि अक्तूबर में ओबामा की योजना पूरे देश में हिलेरी के समर्थन में प्रचार करने की है।
गौर हो कि अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी जीतकर हिलेरी क्लिंटन ने इतिहास रच दिया है। वे अमेरिका की किसी प्रमुख पार्टी की राष्ट्रपति पद के लिए पहली महिला उम्मीदवार बन गई हैं। अब रिपब्लिक पार्टी के उम्मीदवार और प्रतिद्वंदी डोनाल्ड ट्रंप के साथ उनकी चुनावी टक्कर तय है। विदेश मंत्री, प्रथम महिला एवं न्यूयॉर्क से सीनेटर रह चुकीं हिलेरी ने डेमोक्रेटिक नेशनल कन्वेंशन में पार्टी के कुल 4,764 डेलीगेट्स का बहुमत हासिल कर उम्मीदवारी जीती। यदि हिलेरी को आठ नवंबर को होने वाले चुनाव में चुन लिया जाता है तो वह अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति एवं पहली महिला कमांडर इन चीफ बनेंगी।

बच्चों के हक के नाम पर बना यह कानून उसी हक के खिलाफ जाता है

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हमारे देश में मानवाधिकार अक्सर आर्थिक चिंताओं से टकराते हैं. ऐसी स्थिति में कइयों के लिए बाल श्रम के मुद्दे पर एक स्पष्ट रूख जाहिर करना मुश्किल हो जाता है. उन्हें इस सवाल का जवाब देने में दिक्कत होती है कि खाना ज्यादा जरूरी है या शिक्षा. दुर्भाग्य की बात है कि भारतीयों की एक बड़ी आबादी को रोज इन दो विकल्पों में से किसी एक का चुनाव करना पड़ता है और उनमें से कई परिवार की आय बढ़ाने के लिए अपने बच्चों को काम पर भेजने में कोई बुराई नहीं देखते.
ऐसे चुनौती भरे हालात में यह सरकार का कर्तव्य है कि वह सामाजिक सुरक्षा का दायरा फैलाए ताकि माता-पिता को अपने बच्चों को काम पर भेजने के लिए मजबूर न होना पड़े. बल्कि लोगों की तरह सरकार के पास इस मामले में कोई चुनाव करने का विकल्प नहीं है. उसे तो बाल श्रम पर चल रही बहस में सही तरफ ही होना चाहिए. लेकिन 30 साल बाद मंगलवार को संसद द्वारा पारित नया बालश्रम कानून भ्रम के सिवा कुछ नहीं.
चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन) एमेंडमेंट बिल के तहत पुराने बाल श्रम कानून में सुधार किया गया है. इसके तहत किसी भी क्षेत्र में 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम कराना प्रतिबंधित कर दिया गया है. लेकिन बच्चे पारिवारिक व्यवसाय में काम कर सकते हैं. इसके अलावा टैनिंग, चूड़ी निर्माण, जरी का काम और ई वेस्ट जैसे जो कई काम हाल तक खतरनाक श्रेणी में आते थे उनमें अब बच्चों को काम करने की इजाजत दे दी गई है. यह न सिर्फ बाल श्रम को कानूनी जामा पहनाता है (बिल में परिवार की परिभाषा बहुत व्यापक है) बल्कि इससे जाति आधारित रोजगार का चलन मजबूत होता भी दिखता है. भारत में पारिवारिक काम धंधे ज्यादातर जाति आधारित ही हैं इसलिए ऐसे काम धंधों में बच्चों से काम करवाने की इजाजत देकर यह कानून जाति व्यवस्था को अक्षुण रखने का काम कर रहा है. जाति आधारित समाज की सबसे ज्यादा मार दलितों और हाशिये पर पड़े लोगों पर पड़ती है जैसा कि गुजरात और बिहार में दलितों की पिटाई और उनके अपमान के हालिया उदाहरणों से समझा जा सकता है.
नए कानून के मुताबिक अब किसी भी उम्र के बच्चे से खतरनाक श्रेणी में आने वाले व्यवसायों में काम नहीं करवाया जा सकता. लेकिन, 1986 में बने पहले वाले कानून में अगर 16 व्यवसाय और 65 प्रक्रियाएं खतरनाक श्रेणी में आते थे तो नए कानून में यह आंकड़ा तीन और 29 हो गया है और यह भी सिर्फ संगठित क्षेत्र के लिए है. सवाल यह है कि असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे बच्चों का क्या होगा.
श्रम और रोजगार मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने संसद को बताया है कि इस तरह की छूट से सरकार को कानून को व्यावहारिक रूप से लागू करने में मदद मिलेगी. सरकार का कर्तव्य कानून को लागू करना है. इस काम में अपनी अक्षमता को वह अधकचरे कानून बनाने के लिए बहाने के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकती. इससे भारत के बच्चों का भविष्य अंधकारमय ही होगा.