EXCLUSIVE : विकल्प खुले तो फिर CBI जांच से परहेज क्यों?

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  • प्रदीप रावत (रवांल्टा)

उततराखंड अधीनस्त चयन सेवा आयोग (UKSSSC) स्नातक स्तरीय परीक्षा पेपर लीक मामला केवल उत्तराखंड ही नहीं। बल्कि, देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब तक इस मामले में 23 गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। नकल माफिया की संपत्ति इतनी है कि लोग उसके बारे में जानकर हैरान रह गए। यह खेल किसी एक का तो नहीं, लेकिन इसका सबसे बड़ा खिलाड़ी BJP से निकाला जा चुका जिला पंचायत सदस्य हाकम सिंह रावत ही माना जा रहा है। हालांकि, रामनगर के चंदन मनराल की संपत्ति भी हाकम से कुछ कम नहीं है। मामले में नकल के खेल से करोड़पति बने धनपशुओं का खुलासा होना बाकी है।

स्नातक सतरीय पेपर (VPDO) लीक मामले के अलावा एक और भर्ती सचिवालय रक्षक में भी पेपर लीक का खुलासा हो चुका है। इस मामले में भी कई लोगों की गिरफ्तारी की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। पेपर लीक मामला केवल उत्तराखंड से ही नहीं, बल्कि यूपी से भी जुड़ा हुआ है।

BJP के नेता और मंत्री बार-बार कह रहे है कि अगर इस मामले में दूसरे राज्यों का कनेक्शन मिला तो CBI जांच कराई जाएगी। सवाल इस बात पर है कि यूपी का कनेक्शन पहले दिन से ही इस मामले में साफ है। अधीनस्त चयन सेवा आयोग के लिए जो प्रिटिंग प्रैस पेपर छापती थी, वह यूपी की है और उसके कर्मचारी पहले ही मामले में गिरफ्तार हो चुके हैं। फिर सीबीआई जांच से सरकार क्यों कतरा रही है?

बेराजगार संगठन से जुड़े युवा बार-बार सीबीआई जाचं की मांग कर रहे हैं। प्रदेशभर से भी लगातार यही मांग उठ रही है। यूकेडी से लेकर कांग्रेस तक सभी सीबीबाई जांच की मांग कर रहे हैं, फिर सरकार पीछे क्यों हट रही है? क्यों सीएम पुष्कर सिंह धामी बार-बार कह रहे हैं कि सभी विकल्प खुले हैं। अगर विकल्प खुले हैं, तो फिर उस विकल्प को क्यों नहीं चुना जा रहा है, जिसकी लोग डिमांड कर रहे हैं?

सीबीआई जांच से बचने के पीछे क्या कारण हो सकते हें? पहला कारण वह लगता है, जिसको लेकर बेरोजगार युवा बार-बार सवाल कर रहे हैं। युवाओं का कहना है कि यूकेएसएसएससी स्नातक स्तरीय परीक्षा में भाजपा युवा मोर्चा के पदाधिकारियों का भी चयन हुआ है, उनको एसटीएफ ने अब तक क्यों नहीं उठाया? क्यों नहीं उनसे पूछताछ की गई? बेरोजगारों का बार-बार यही सवाल है कि बड़ी मछलियों को कौन बचा रहा है? क्यों उनको बचाने का प्रयास किया जा रहा है?

हालांकि, एक बात तो तय है कि देर-सबेर इस मामले में सरकार को सीबीआई जांच का रुख तो करना ही पड़ेगा, जिस तरह से मामला तूल पकड़ रहा है। उससे एक बात तो साफ है कि आने वाले दिनों में एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो सकता है। अगर आंदोलन खड़ा हुआ तो सरकार को सीबीआई जांच जैसा कदम उठाना पड़ सकता है। सवाल कुछ और भी हैं। दरअसल, अब पेपर लीक मामले में एफआईआर केवल 120 और 420 में दर्ज है। अगर मामले ठंडा पड़ता है, तो सभी आरोपियों को तत्काल जमानत मिल जाएगी। सीएम धामी दो बार कह चुके हैं कि आरोपियों पर गैंगस्टर एक्ट लगाने के निर्देश दे चुके हैं।

एसटीएफ पहले ही यह जानकारी दे चुकी है कि ईडी के साथ सीभी जानकारियां साझा की जा रही हैं। सीएम धामी भी कह चुके हैं कि प्रिवेंशन ऑफ मनि लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत कार्रवाई करें। लेकिन, अब तक दोनों ही मामलों में कार्रवाई नहीं हुई है। फिर वही सवाल खड़ा होता है कि आखिर इतना सब होने के बाद भी क्यों बड़ा एक्शन नहीं लिया जा रहा है?

सीएम धामी ने यहां तक कहा कि आरोपियों की संपत्ति जफ्त की जाएगी। लेकिन, सवाल यह है कि फिलहाल जो मुकदमा दर्ज है, जो धाराएं लगी हैं, उनके तहत तो यह संभव नजर नहीं आता है। कानून के जानकार भी यही मानते हैं। फिर कैसे एक्शन लिया जाएगा? जानकारों की मानें तो संपत्ति जब्त करने के लिए आरोपियों के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के तहत मुकदमा इर्ज किया जाना चाहिए।

तमाम दावों, बातों, बयानों और सवालों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सीबीआई जांच से सरकार को परहेज क्यों है? सरकार को किसी बात का डर सता रहा है? क्यों सरकार लोगों की मांग पर अमल नहीं कर रही? जब विकल्प खुले तो फिर उस विकल्प को कब लॉक किया जाएगा?