कोई भी कितनी भी और कैसी भी घोषणाएं करता रहे, नियम बनाता रहे, धमकियां देता रहे, परंतु आजकल के हर उम्र के भारतवासियों ने नियम, कानून की धज्जियां उडाने का संकल्प ही ले रखा है । यह एक बहुत बडी चुनौती है प्रशासन और पुलिस के लिये, और इसका कोई उत्तर या समाधान किसी के भी पास नज़र नहीं आता है । हर क्षण, हर व्यक्ति केवल अपनी सुविधा देखकर, अपना महत्व दर्शाने का ही प्रयास करता नज़र आता है।
किसी ने टोक दिया तो तुरंत, “जानता नहीं मैं कौन हूं” या “तू कौन है और क्या है” जैसे वाक्य गरजते हुए बोलते रहते हैं, अधिकांश लोग। छोटी छोटी बातें भी आजकल लोग न सुनते हैं और न मानते हैं । हर क्षण नियम-कानून की धज्जियां उडाने में ही सबको आनंद आता रहता हसि और अपना अलग महत्व दिखाने का भी सुख मिलता रहता है । किसी एक वर्ग को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है । यह बीमारी हर व्यक्ति को लग चुकी है । अनेक बडे बडे मंत्रियों और नेताओं को कहीं भी थूकते हुए मैंने देखा है ।
पान, तम्बाखू या गुटका खाने के शौकीन ये लोग, चलती हुई कार का दरवाज़ा खोल कर कभी भी और कहीं भी ढेर सारा पीक उगल देते हैं । सामान्य नागरिक फ़िर पीछे क्यों रहेंगे । वे भी थूकते रहने के आदी हो गये हैं । कहीं भी पेशाब करना, खुले में शौच करना और कचरा कहीं भी फ़ेंक देना भारतीयों की आदत बन चुका है । रेलगाडी में गंदगी भरी रहती है और यात्रीगण उसमें बढोत्तरी ही करते रहते हैं । शौचालयों में न केवल गंदगी का साम्राज्य रहता है, बल्कि कमोड में कुछ भी गिरा देने की आदत भी बन गई है अनेक लोगों की, जिससे वह अवरुद्ध हो जाता है ।
खाना खाने के बाद प्लेट आदि कहीं भी ऐसे ही छोड देते हैं, और चाय के कागज़ या प्लास्टिक के कप तो हर तरफ़ बिखरे पडे रहते हैं । हवाई जहाज़ में भी शौचालय गंदे ही छोड देते हैं अनेक यात्री । यातायात नियम तो बनाये ही इसी लिये जाते हैं कि लोग उन्हें तोडते रहें । उल्टी दिशा में वाहन चलाना, फ़ुटपाथ पर वाहन चलाना, रुकने का सिग्नल होने पर भी नहीं रुकना, हेल्मेट नहीं पहन कर दोपहिया वाहन चलाना, दोपहिया वाहन पर कम से कम तीन लोगों को बैठाना, कार में सीट बैल्ट का उपयोग नहीं करना, वाहन चलाते हुए मोबाइल फ़ोन पर बात करते रहना.
औटो रिक्षा में दस तक सवारी बैठाना, बस और औटो रिक्षा कहीं भी रोक कर यात्रियों को उतारना या बैठाना, कहीं भी और कैसे भी वाहन खडा कर देना आदि सभी लोगों की आदत में शामिल हो गया है, और वे प्रशासन और पुलिस को चुनौती देते रहते हैं कि “हिम्मत है तो हमें सुधार कर दिखाओ” । रिश्वत अब आवश्यक हो गई है । किसी भी तरह का काम हो, पहले “कुछ” दो, फ़िर बात करो । पहले ऐसा सोचा जाता था कि महिलाएं न रिश्वत लेती हैं और न नियम-कानून ही तोडती हैं;
परंतु यह एक निर्विवाद सत्य बन गया है कि आजकल सबसे अधिक नियम-कानून की अवहेलना महिलाओं द्वारा ही की जाने लगी है और रिश्वत लेने में भी वो बहुत अधिक सक्रिय होती जा रही हैं । सडकों को खोदने वाले कभी भी उन्हें वापस ठीक नहीं करते । सडकों पर मवेशियों की भीड बढती ही जा रही है, लेकिन किसी को कोई चिंता ही नहीं है । अब तो अनेक अदालतों में भी खुलेआम रिश्वत लेने का क्रम चल पडा है । हम भारतवासियों की यह विशेषता है कि अपने देश में हम किसी की परवाह नहीं करते, परंतु विदेश जाते ही वहां के सभी नियम-कानून तुरंत मानने लगते हैं ।
आजकल तो प्रेम प्रदर्शन भी निडर होकर किया जाने लगा है । पूरे चेहरे को कपडे से ढंककर लडके-लडकियां निकलते हैं ताकि कोई पहचान ही न सके और नि:संकोच एक दूसरे से लिपटते रहते हैं, चुंबन करते रहते हैं । आजकल शब्दों और भाषा की तो किसी को परवाह ही नहीं रह गई है । मैं जब भी लोगों को नियम- कानून की अवहेलना करते देखता हूं, तो मेरा खून खौल जाता है, परंतु फ़िर यह सोचकर चुप रह जाता हूं कि “मैं कौन हूं” । अशिष्ट व्यवहार, अनादरपूर्ण व्यवहार, छल-कपट भरा व्यवहार, आजकल की प्रमुख विशेषताएं बन गये हैं । आज की वास्तविकता यही है कि हम सब इस कदर बिगड गये हैं कि अब कितने भी प्रयास करने से कुछ भी नहीं हो पाएगा । अधिकांश भारतीयों ने यह निश्चय ही कर लिया है कि कुछ भी हो जाये, परंतु “हम नहीं सुधरेंगे” ।
(किशन शर्मा, 901, केदार, यशोधाम एन्क्लेव, प्रशांत नगर, नागपुर-440015; मोबाइल – 8805001042)