Home Blog Page 152

नेपाल में शांति की बहाली, अंतरिम सरकार में कैबिनेट विस्तार की तैयारी

0

काठमांडू: नेपाल में सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार के गठन के बाद राजनीतिक स्थिरता धीरे-धीरे लौट रही है। देश भर से कर्फ्यू हटा लिया गया है, और जनजीवन सामान्य होने लगा है। इस बीच, नवनियुक्त अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की आज अपनी कैबिनेट का विस्तार कर सकती हैं।

प्रधानमंत्री कार्की ने शुक्रवार रात को शपथ ग्रहण करने के बाद रविवार सुबह 11 बजे सिंह दरबार में अपना कार्यभार संभाला। उनके सहयोगी बताते हैं कि वह मंत्रिमंडल विस्तार को अंतिम रूप देने के लिए जेन-जी आंदोलन के सलाहकारों और प्रमुख हस्तियों से लगातार परामर्श कर रही हैं। यह भी कहा जा रहा है कि मंत्रिमंडल छोटा और सुव्यवस्थित होगा, जिसमें 15 से अधिक मंत्री नहीं होंगे।

मंत्रिमंडल के लिए संभावित नाम

काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले संभावित नामों में कानूनी विशेषज्ञ ओम प्रकाश आर्यल, पूर्व सेना अधिकारी बालानंद शर्मा, सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति आनंद मोहन भट्टाराई और माधव सुंदर खड़का शामिल हैं। चिकित्सा क्षेत्र से डॉ. भगवान कोइराला और डॉ. संदुक रुइत जैसे प्रमुख नामों पर भी विचार किया जा रहा है।

ऑनलाइन वोटिंग का सहारा

एक अनोखी पहल के तहत, जेन-जी आंदोलन के सदस्य भी इन नामों पर ऑनलाइन वोटिंग के जरिए आम सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर सहमति बनती है तो मंत्रिमंडल को आज शाम तक शपथ दिलाई जा सकती है, हालांकि इसमें सोमवार तक की देरी भी हो सकती है। फिलहाल, प्रधानमंत्री कार्की ने गृह, विदेश और रक्षा सहित लगभग दो दर्जन मंत्रालय अपने पास रखे हैं।

संसद भंग, 5 मार्च 2026 को चुनाव

राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री कार्की की सिफारिश पर संसद (प्रतिनिधि सभा) को भंग कर दिया। अब देश में नए सिरे से संसदीय चुनाव 5 मार्च 2026 को होंगे।

जनजीवन हुआ सामान्य, सोमवार से स्कूल खुलेंगे

कई दिनों की अशांति के बाद, काठमांडू घाटी समेत पूरे देश में जनजीवन पटरी पर लौट रहा है। शनिवार को कर्फ्यू हटा लिया गया, जिसके बाद दुकानें और बाजार फिर से खुल गए हैं। सड़कों पर वाहनों की आवाजाही भी सामान्य हो गई है। अधिकारियों ने घोषणा की है कि काठमांडू महानगरपालिका क्षेत्र में सोमवार से स्कूल खुलेंगे, जो 8 सितंबर से बंद थे।

अशांति और आंदोलन का कारण

यह पूरा घटनाक्रम केपी शर्मा ओली सरकार के खिलाफ शुरू हुए जेन-जी आंदोलन का परिणाम है। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के विरोध में शुरू हुए इस आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया था, जिसमें कम से कम 51 लोगों की जान गई। हिंसक प्रदर्शनों के कारण ओली को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और सुरक्षा व्यवस्था को संभालने के लिए सेना को हस्तक्षेप करना पड़ा था।

सीएम धामी ने दून अस्पताल में भर्ती पत्रकार मोहन भुलानी का जाना हाल

0

देहरादून: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शनिवार को दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचकर वरिष्ठ पत्रकार मोहन भुलानी का हालचाल जाना। भुलानी पिछले कुछ दिनों से अस्पताल में भर्ती हैं।

मुख्यमंत्री ने डॉक्टरों से उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली और उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की। उन्होंने भुलानी के परिजनों से भी भेंट कर उन्हें हरसंभव मदद का आश्वासन दिया।

इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार पत्रकारों के योगदान का सम्मान करती है और संकट की घड़ी में उनके साथ खड़ी है। उन्होंने अस्पताल प्रशासन को निर्देश दिए कि भुलानी के इलाज में कोई कसर न छोड़ी जाए। इस अवसर पर अपर सचिव बंशीधर तिवारी और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी उपस्थित रहे।

राजनीति में वंशवाद: देश में राजनीतिक परिवारों से हैं 21% सांसद, विधायक और MLC

0

नई दिल्ली: एक नए विश्लेषण के अनुसार, भारत में अभी भी वंशवाद की राजनीति गहरी जड़ें जमाए हुए है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और नेशनल इलेक्शन वॉच (न्यू) की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत के मौजूदा 5204 सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों (एमएलसी) में से 1107 (21%) का संबंध राजनीतिक परिवारों से है। यह प्रवृत्ति स्वतंत्रता के बाद से चली आ रही है और पार्टी स्थिरता, ऐतिहासिक नेतृत्व तथा मतदाताओं की नाम-परिचितता पर टिकी हुई है। हालांकि, यह योग्यता, जवाबदेही और समान प्रतिनिधित्व पर सवाल खड़े करती है।

रिपोर्ट में वंशवादी राजनीति को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि यह वह प्रथा है जहां राजनीतिक शक्ति परिवारों में केंद्रित रहती है। परिवार के सदस्य निर्वाचित पदों या प्रभावशाली भूमिकाओं पर काबिज होते हैं, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता का हस्तांतरण होता है। इसके लिए पारिवारिक नाम, धन और नेटवर्क का फायदा उठाया जाता है। ADR ने यह विश्लेषण चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामों, ऐतिहासिक अभिलेखों, मीडिया रिपोर्टों और सार्वजनिक जानकारी पर आधारित किया है। वंशवादी माने जाने के लिए, सदस्य के परिवार (माता-पिता, भाई-बहन, पति/पत्नी, बच्चे या रिश्तेदार) में कोई पूर्व या वर्तमान निर्वाचित अधिकारी या पार्टी नेता होना चाहिए। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि यह पूर्ण अध्ययन नहीं है, क्योंकि कई वंशवादी राजनेता चुनाव हारकर भी सक्रिय हैं या सरकारी भूमिकाओं में हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर वंशवाद का पैटर्न

रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा में वंशवाद सबसे अधिक (31%) है, जबकि राज्य विधानसभाओं में सबसे कम (20%)। नीचे दी गई तालिका में विधानमंडल के प्रकार के अनुसार आंकड़े दिए गए हैं:

विधानमंडल का प्रकार कुल सदस्य वंशवादी सदस्य वंशवादी प्रतिशत (%)
राज्य विधानसभा (विधायक) 4,091 816 20
लोकसभा (सांसद) 543 167 31
राज्यसभा (सांसद) 224 47 21
राज्य विधान परिषद (एमएलसी) 346 77 22
कुल 5,204 1,107 21

राज्यवार स्थिति: आंध्र प्रदेश टॉप पर

राज्यों में वंशवाद की दर अलग-अलग है। कुल संख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश सबसे आगे है, जहां 604 सदस्यों में से 141 (23%) वंशवादी हैं। महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर है, जहां 403 में से 129 (32%)। बिहार में 360 में से 96 (27%) और कर्नाटक में 326 में से 94 (29%)। अनुपात के हिसाब से आंध्र प्रदेश सबसे ऊपर है, जहां 255 में से 86 (34%) वंशवादी हैं। क्षेत्रीय पैटर्न में उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश: 23%, राजस्थान: 18%) और दक्षिण भारत (कर्नाटक: 29%, आंध्र प्रदेश: 34%) में उच्च दर है। पूर्व/पूर्वोत्तर में बिहार (27%) ऊंचा है, लेकिन असम (9%) कम।

पार्टीवार वंशवाद: कांग्रेस में सबसे अधिक

राष्ट्रीय दलों में 3,214 सदस्यों में से 657 (20%) वंशवादी हैं। कांग्रेस में यह दर 32% है, भाजपा में 18% और माकपा में मात्र 8%। राज्य स्तरीय दलों में 1,809 में से 406 (22%) वंशवादी हैं। एनसीपी-शरदचंद्र पवार और जेकेएनसी में 42%, वाईएसआरसीपी में 38%, टीडीपी में 36%। वहीं एआईटीसी (10%) और एआईएडीएमके (4%) में कम। गैर-मान्यता प्राप्त दलों में 87 में से 21 (24%) और स्वतंत्रों में 94 में से 23 (24%) वंशवादी हैं। नौ छोटे दलों में सभी सदस्य वंशवादी हैं।

लिंग के आधार पर असमानता: महिलाओं में दोगुना वंशवाद

रिपोर्ट में लैंगिक असमानता पर जोर दिया गया है। कुल 4,665 पुरुष सदस्यों में से 856 (18%) वंशवादी हैं, जबकि 539 महिलाओं में से 251 (47%)। यानी महिलाओं में वंशवाद की दर पुरुषों से दोगुनी से अधिक है। राज्यवार देखें तो महाराष्ट्र (महिला: 69%, पुरुष: 28%), आंध्र प्रदेश (69% vs 29%), बिहार (57% vs 22%) और तेलंगाना (64% vs 21%) में महिलाओं में उच्च दर है। गोवा, पुडुचेरी और दादरा नगर हवेली में 100% महिलाएं वंशवादी हैं। सबसे अधिक वंशवादी महिलाएं उत्तर प्रदेश (29), महाराष्ट्र (27), बिहार (25) और आंध्र प्रदेश (20) में हैं।

पार्टीवार भी यही ट्रेंड: कांग्रेस (महिला: 53%, पुरुष: 29%), भाजपा (41% vs 15%)। एनसीपी, असम गण परिषद आदि में 100% महिलाएं वंशवादी हैं। रिपोर्ट कहती है कि महिलाओं का राजनीतिक प्रवेश पारिवारिक नेटवर्क पर ज्यादा निर्भर है, जो पहली पीढ़ी की महिलाओं के लिए बाधा बनता है। कुल मिलाकर महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 10% है, लेकिन उनमें वंशवाद अधिक।

वंशवाद के कारण और प्रभाव

रिपोर्ट में वंशवाद के कारणों पर चर्चा की गई है: मजबूत पारिवारिक परंपराएं, पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी, टिकट वितरण में भेदभाव, चुनावों में धन-बाहुबल का बोलबाला और मतदाताओं की ‘जीतने की क्षमता’ पर फोकस। दलबदल विरोधी कानून भी कभी-कभी वफादारी को मजबूत करता है। वंशवाद समाज को जन्म-आधारित वर्ग में बांटता है, समान अवसरों को प्रभावित करता है और पार्टियों को कमजोर करता है।

हालांकि, कैडर-आधारित पार्टियां (जैसे माकपा, आप, टीएमसी) में वंशवाद कम है। लोकसभा में उच्च दर (31%) दर्शाती है कि राष्ट्रीय स्तर पर परिवारों का कड़ा नियंत्रण है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि वंशवाद राजनीतिक प्रवेश का तंत्र बन गया है, जो लोकतंत्र की बुनियाद को चुनौती देता है। ADR ने पार्टियों में पारदर्शिता और RTI के दायरे में लाने की मांग की है। यह रिपोर्ट भारतीय राजनीति में सुधार की जरूरत पर रोशनी डालती है, जहां वंशवाद स्थिरता देता है लेकिन न्याय को प्रभावित करता है।

तालिका: वंशवादी प्रतिनिधित्व का राष्ट्रीय अवलोकन

सदन का प्रकार विश्लेषण किए गए कुल सदस्य वंशवादी पृष्ठभूमि वाले सदस्य वंशवादी %
राज्य विधानसभा (विधायक) 4091 816 20%
लोकसभा (सांसद) 543 167 31%
राज्यसभा (सांसद) 224 47 21%
विधान परिषद (एमएलसी) 346 77 22%
कुल 5204 1107 21%

पार्टीवार विश्लेषण: राष्ट्रीय दल

पार्टी विश्लेषण किए गए सदस्य वंशवादी पृष्ठभूमि वाले सदस्य वंशवादी %
कांग्रेस 32%
भाजपा 18%
माकपा 8%
अन्य 20%

कांग्रेस ने जॉर्ज एवरेस्ट पार्क घोटाले पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला, प्रदेशभर में बड़े आंदोलन की तैयारी

0

देहरादून: कांग्रेस ने मसूरी स्थित जॉर्ज एवरेस्ट पार्क को योग गुरु बाबा रामदेव के करीबी बालकृष्ण को कौड़ियों के भाव लीज पर दिए जाने के मामले में प्रदेश सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपना लिया है। पार्टी ने इस मामले को प्रदेश का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला बताते हुए आगामी रविवार को प्रदेशव्यापी पुतला दहन कार्यक्रम की घोषणा की है।

 

आज प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए, कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने आरोप लगाया कि 142 एकड़ की बेशकीमती जमीन मात्र 1 करोड़ रुपये के किराए पर 15 साल की लीज पर दी गई है, जिसमें इसे और 15 साल के लिए नवीनीकृत करने का प्रावधान भी है।

 

धस्माना ने निविदा प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें भाग लेने वाली तीनों कंपनियां बालकृष्ण की ही हैं, जो निविदा की शर्तों का सीधा-सीधा उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि एक तरफ जहाँ राज्य के युवा प्रभावी भू-कानून की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार पहाड़ों की जमीन बाहरी लोगों को सस्ते किराए पर दे रही है।

 

कांग्रेस ने इस घोटाले की जांच हाई कोर्ट के सेटिंग जज की निगरानी में सीबीआई से कराने की मांग की है। पार्टी ने इस मुद्दे पर एक व्यापक जन आंदोलन चलाने की घोषणा की है।

 

कांग्रेस 15 सितंबर से ‘वोट चोरी’ के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाएगी

 

देहरादून: कांग्रेस पार्टी ने देशव्यापी ‘वोट चोरी’ के खिलाफ चलाए जा रहे जन आंदोलन के दूसरे चरण के तहत, 15 सितंबर से उत्तराखंड में हस्ताक्षर अभियान शुरू करने की घोषणा की है। इस अभियान का लक्ष्य पूरे देश में 5 करोड़ लोगों से हस्ताक्षर कराना है, जिन्हें बाद में भारत निर्वाचन आयोग को सौंपा जाएगा।

 

कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने बताया कि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में 15 सितंबर को यह अभियान शुरू होगा और प्रदेश की सभी 70 विधानसभाओं में व्यापक रूप से चलाया जाएगा। इस अभियान के तहत राज्य से 5 लाख हस्ताक्षर एकत्र किए जाएंगे, जिन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी को सौंपा जाएगा।

 

राष्ट्रीय नेतृत्व इन हस्ताक्षरों को देश भर से एकत्र किए गए हस्ताक्षरों के साथ निर्वाचन आयोग को सौंपकर ‘वोट चोरी’ को रोकने की मांग करेगा।

 

संगठन सृजन कार्यक्रम प्रगति पर

 

कांग्रेस के ‘संगठन सृजन कार्यक्रम’ के बारे में जानकारी देते हुए धस्माना ने बताया कि राज्य के 9 प्रशासनिक जिलों में पर्यवेक्षकों ने रायशुमारी का काम पूरा कर लिया है। बाकी बचे 4 जिलों में भी यह काम इसी महीने पूरा हो जाएगा। उन्होंने कहा कि रायशुमारी की रिपोर्ट राष्ट्रीय नेतृत्व को सौंप दी जाएगी, जिसके बाद नए अध्यक्षों की घोषणा की जाएगी।

 

प्रेस कॉन्फ्रेंस में कर्नल राम रतन नेगी, जगदीश धीमान, सरदार अमरजीत सिंह और कमर सिद्दीकी सहित अन्य वरिष्ठ नेता भी मौजूद थे।

सीएम के हॉट एयर बैलून में लगी आग, टला बड़ा हादसा

0

मंदसौर: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव आज एक बड़े हादसे का शिकार होने से बाल-बाल बचे। मंदसौर के गांधीसागर फॉरेस्ट रिट्रीट में हॉट एयर बैलून की सवारी के दौरान अचानक बैलून के निचले हिस्से में आग लग गई। हालांकि, मौके पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से मुख्यमंत्री को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया और एक बड़ा हादसा टल गया। इस घटना में किसी के घायल होने की सूचना नहीं है।

घटना का विवरण

यह घटना शनिवार सुबह की है, जब मुख्यमंत्री मोहन यादव गांधीसागर में नए उद्घाटित हुए फॉरेस्ट रिट्रीट में पर्यटन गतिविधियों का जायजा ले रहे थे। उन्होंने हॉट एयर बैलून की सवारी करने का फैसला किया। बैलून के उड़ान भरने से पहले ही, अनुकूल हवा न होने के कारण वह ऊपर नहीं उठ सका और अचानक उसके निचले हिस्से में आग लग गई।

आग की लपटें देख मौके पर हड़कंप मच गया। तुरंत ही सुरक्षाकर्मियों ने मुख्यमंत्री को बैलून से सुरक्षित बाहर निकाला। आग पर तुरंत काबू पा लिया गया, जिससे कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ।

सुरक्षा पर उठे सवाल

इस घटना ने मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ऐसे कार्यक्रम में, जहाँ मुख्यमंत्री स्वयं मौजूद थे, इस तरह की चूक चिंता का विषय है। घटना के कारणों की जांच शुरू कर दी गई है।

मुख्यमंत्री ने शुक्रवार को ही गांधीसागर फॉरेस्ट रिट्रीट का उद्घाटन किया था, जिसमें हॉट एयर बैलून जैसी साहसिक गतिविधियाँ भी शामिल हैं। यह घटना पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशों के बीच एक झटका मानी जा रही है।

स्थानीय लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों ने मुख्यमंत्री के सुरक्षित होने पर राहत की सांस ली है। प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए सुरक्षा मानकों की गहन समीक्षा की जाएगी।

उत्तराखंड: ग्रामीणों की धमकी, वन विभाग नहीं माना तो खुद उठाएंगे बंदूक…चाहे जेल क्यों ना जाना पड़े

0

पौड़ी: पौड़ी जिले के पोखड़ा रेंज में गुलदार के हमले में चार साल की मासूम रिया की मौत के बाद ग्रामीणों में भारी गुस्सा है। इस दर्दनाक घटना से पूरा श्रीकोट गांव सदमे में है। गुस्साए ग्रामीणों ने अब वन विभाग को सीधी चेतावनी दी है कि अगर तत्काल ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वे खुद अपनी सुरक्षा के लिए बंदूक उठा लेंगे, भले ही इसके लिए उन्हें जेल क्यों न जाना पड़े।

कांग्रेस प्रदेश सचिव कवींद्र इष्टवाल ने वन विभाग पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि ग्रामीणों द्वारा बार-बार गुलदार के खतरे को लेकर अवगत कराने के बावजूद विभाग ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए। इष्टवाल ने कहा, “हम ज्ञापन देते-देते थक गए हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती। अब हम ज्ञापन नहीं देंगे, बल्कि अपनी सुरक्षा के लिए खुद कार्रवाई करेंगे। अगर इसके लिए जेल भी जाना पड़े, तो हम तैयार हैं।

यह दिल दहला देने वाली घटना शुक्रवार रात करीब 8 बजे हुई। जितेंद्र रावत की बेटी रिया घर के आंगन में खेल रही थी, तभी अचानक झाड़ियों से एक गुलदार निकला और उस पर झपट पड़ा। इससे पहले कि परिवार के लोग कुछ समझ पाते, गुलदार बच्ची को घसीटता हुआ जंगल की ओर ले गया। परिवार में हड़कंप मच गया और तुरंत ही ग्रामीणों के साथ मिलकर बच्ची की तलाश शुरू की गई। काफी खोजबीन के बाद रिया का क्षत-विक्षत शव घर से कुछ ही दूरी पर बरामद हुआ, जिससे पूरे गांव में मातम छा गया।

घटना की सूचना मिलते ही गढ़वाल वन प्रभाग के रेंजर नक्षत्र शाह अपनी टीम के साथ तुरंत मौके पर पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों से घटना की जानकारी ली और उन्हें सतर्क रहने की सलाह दी। वन विभाग ने गुलदार को पकड़ने के लिए जल्द ही पिंजरा लगाने की बात कही है, लेकिन ग्रामीणों का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। यह घटना उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में वन्यजीवों के बढ़ते हमलों की एक और दुखद मिसाल है, जिसने स्थानीय लोगों के जीवन को खतरे में डाल दिया है।

नेपाल में अंतरिम सरकार का गठन, सुशीला कार्की बनीं पहली महिला PM

0

नई दिल्ली: नेपाल में ‘जेन-जी आंदोलन’ के बाद देश में एक नई अंतरिम सरकार का गठन हो गया है। पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की ने शुक्रवार रात देश की अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली है, जिसके साथ ही वह नेपाल की पहली महिला राष्ट्राध्यक्ष बन गई हैं। इस ऐतिहासिक कदम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें शुभकामनाएं दी हैं।

पीएम मोदी ने दी बधाई पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में सुशीला कार्की को बधाई दी। उन्होंने लिखा, “नेपाल की अंतरिम सरकार की पीएम के रूप में पद ग्रहण करने पर माननीय सुशीला कार्की जी को शुभकामनाएं। नेपाल के भाई-बहनों की शांति, प्रगति और समृद्धि के लिए भारत पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।”

विदेश मंत्रालय का बयान भारत के विदेश मंत्रालय ने भी इस घटनाक्रम पर एक बयान जारी किया। मंत्रालय ने कहा, “एक करीबी पड़ोसी, एक लोकतांत्रिक देश और दीर्घकालिक विकास के साझेदार के रूप में, भारत दोनों देशों के लोगों और उनकी खुशहाली के लिए नेपाल के साथ मिलकर काम करना जारी रखेगा।”

नेपाल के राष्ट्रपति ने शुक्रवार रात करीब 9 बजे सुशीला कार्की को शपथ दिलाई। उनका प्रधानमंत्री बनना उन लोगों के लिए एक आशा की किरण माना जा रहा है जो भ्रष्टाचार मुक्त शासन की उम्मीद कर रहे थे।

मार्च 2026 में होंगे आम चुनाव यह अंतरिम सरकार नेपाल में 5 मार्च, 2026 को होने वाले आम चुनावों तक कार्य करेगी। इन चुनावों के बाद एक नई स्थायी सरकार का गठन होगा।

Uttarakhand : गुलदार का खूनी हमला, चार साल की मासूम को मार डाला

0

कोटद्वार : कोटद्वार के पोखड़ा रेंज अंतर्गत श्रीकोट गाँव में देर रात एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहाँ एक गुलदार ने घर के पास खेल रही चार साल की बच्ची को अपना शिकार बना लिया। इस हमले में बच्ची की मौत हो गई, जिससे पूरे गाँव में दहशत और मातम का माहौल है।

जानकारी के अनुसार, यह दर्दनाक घटना शुक्रवार रात करीब 8 बजे की है। गाँव के जितेंद्र रावत की बेटी रिया (4) अपने घर के आँगन में खेल रही थी, तभी अचानक झाड़ियों से एक गुलदार निकला और उसने बच्ची पर हमला कर दिया। परिवार के सदस्य जब तक कुछ समझ पाते, गुलदार रिया को घसीटता हुआ जंगल की ओर ले गया।

परिवार और ग्रामीणों ने तुरंत शोर मचाते हुए बच्ची की तलाश शुरू की। काफी खोजबीन के बाद रिया का क्षत-विक्षत शव घर से कुछ ही दूरी पर बरामद हुआ। इस घटना से गाँव में हाहाकार मच गया।

ग्रामीणों ने तुरंत वन विभाग को सूचना दी। सूचना मिलते ही गढ़वाल वन प्रभाग के रेंजर नक्षत्र शाह अपनी टीम के साथ मौके पर पहुँचे और गाँव वालों से घटना की जानकारी ली। वन विभाग ने ग्रामीणों को सतर्क रहने की सलाह दी है और गुलदार को पकड़ने के लिए पिंजरा लगाने की तैयारी शुरू कर दी है।

इस घटना के बाद से स्थानीय लोग गुस्से में हैं और प्रशासन से इस समस्या का स्थायी समाधान निकालने की माँग कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह पहली घटना नहीं है और लगातार हो रहे गुलदार के हमलों से उनका जीवन खतरे में है। वन विभाग ने गाँव वालों से अपील की है कि वे रात के समय अकेले बाहर न निकलें और बच्चों को खासकर घर के अंदर ही रखें।

उत्तराखंड में दरोगा और कांस्टेबल भर्ती के लिए एकीकृत नियमावली लागू, आयु सीमा में भी बदलाव

0

देहरादून: उत्तराखंड में विभिन्न विभागों में वर्दीधारी दरोगा और कांस्टेबल की भर्तियों के लिए अब एकीकृत नियमावली लागू की गई है। गुरुवार को इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी गई। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर लागू इस नई व्यवस्था के तहत भर्ती प्रक्रिया में एकरूपता लाने के साथ-साथ आयु सीमा और अन्य नियमों में भी महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।

नई दरोगा नियमावली के तहत उप निरीक्षक (पुलिस, अभिसूचना), प्लाटून कमांडर, गुल्मनायक (पीएसी, आईआरबी), अग्निशमन द्वितीय अधिकारी, उप कारापाल, होमगार्ड विभाग में प्लाटून कमांडर, वन विभाग में वन दरोगा, आबकारी विभाग में आबकारी उप निरीक्षक, और युवा कल्याण एवं प्रांतीय रक्षक दल में क्षेत्रीय युवा कल्याण अधिकारी के पदों पर भर्ती अब एक ही परीक्षा के माध्यम से होगी। पहले इन पदों के लिए अलग-अलग भर्ती परीक्षाएं आयोजित की जाती थीं।

इसी तरह, कांस्टेबल भर्ती के लिए भी नई नियमावली लागू की गई है। इसके तहत पुलिस कांस्टेबल, पीएसी, आईआरबी, अग्निशामक, बंदीरक्षक, वन आरक्षी, आबकारी सिपाही, प्रवर्तन सिपाही, और सचिवालय-विधानसभा रक्षकों की भर्ती भी अब एक ही परीक्षा से होगी। यह कदम भर्ती प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

आयु सीमा में बदलाव

नई नियमावली के तहत भर्ती के लिए आयु सीमा में भी बदलाव किया गया है। दरोगा भर्ती के लिए पहले आयु सीमा 18 से 28 वर्ष थी, जिसे अब बढ़ाकर 21 से 35 वर्ष कर दिया गया है। वहीं, कांस्टेबल भर्ती के लिए आयु सीमा 18 से 22 वर्ष से बढ़ाकर 18 से 25 वर्ष कर दी गई है। यह बदलाव राज्य के युवाओं को अधिक अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से किया गया है।

मुख्यमंत्री ने जताई प्रतिबद्धता

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस नई व्यवस्था को राज्य के युवाओं के हित में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा, “वर्दीधारी पदों के लिए एकीकृत भर्ती नियमावली लागू करना सरकार की पारदर्शी और निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह न केवल युवाओं को समान अवसर प्रदान करेगा, बल्कि राज्य की सुरक्षा और सेवा व्यवस्था को भी और सशक्त बनाएगा।”

प्रधानमंत्री का आपदा राहत पैकेज

इस बीच, देहरादून से एक अन्य महत्वपूर्ण खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड के आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लिए 1200 करोड़ रुपये का राहत पैकेज घोषित किया है। इसके अतिरिक्त, आपदा में मृतकों के परिजनों को 2 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी।

नई भर्ती नियमावली और आयु सीमा में बदलाव से उत्तराखंड के युवाओं को सरकारी नौकरियों में अधिक अवसर मिलने की उम्मीद है। यह कदम न केवल भर्ती प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करेगा, बल्कि युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार भी खोलेगा।

टिंचरी माई : द अनटोल्ड स्टोरी : ठगुली से इच्छा गिरी और टिंचरी माई बनने की कहानी

0
  • प्रदीप रावत ‘रवांल्टा’

यह सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि एक महिला के दर्द, संघर्ष और विजय की एक सच्ची गाथा है। टिंचरी माई : द अनटोल्ड स्टोरी, पर्दे पर उत्तराखंड की माटी से निकली उस कहानी को दिखाती है, जिसे देखकर आपकी आंखें नम हो जाएंगी। इस फ़िल्म में जो मेहनत, जज़्बा और जुनून लगा है, वह बेशकीमती है। और वह पर्दे पर भी नज़र आता है।

मैं भी इस फ़िल्म को देखने गया, तो मन में बहुत से सवाल थे। ट्रेलर देखकर मैं खुश नहीं था, पर मन में एक उम्मीद थी कि शायद यह कहानी कुछ और होगी। यह उम्मीद सच साबित हुई। यह फ़िल्म सिर्फ़ देखी नहीं जाती, बल्कि महसूस की जाती है। यह एक ऐसी कहानी है, जो आपको भीतर तक निचोड़ कर रख देती है, और जब आप बाहर निकलते हैं, तो आप पहले से अधिक मज़बूत महसूस करते हैं, जो मैंने भी किया।

ठगुली देवी… एक मासूम बच्ची, जिसकी उम्र महज़ 13 साल थी, लेकिन हालातों ने उसे बचपन जीने का मौका ही नहीं दिया। 24 साल के युवक से उसकी शादी कर दी गई। उस उम्र में, जब गुड़ियों से खेलने और सपने देखने चाहिए थे, ठगुली ने दुनिया की वो कड़वी हकीकतें देखीं, जिनकी कल्पना भी रूह को कंपा देती है। शुरुआत में ठगुली देवी अपने पति के साथ क्वेटा (पाकिस्तान) तक पहुंचती है। पति फौज में था और वही उसके जीवन का सहारा। वहां ठगुली पहली बार खुशियां जीती है। पति उसे बच्ची की तरह मानता, उसके साथ खेलता। ठगुली की दुनिया में कुछ समय के लिए धूप खिली, लेकिन ये उजाला ज्यादा दिन न टिक सका।

विश्व युद्ध छिड़ा और ठगुली का पति शहीद हो गया। उसके जीवन की सारी खुशियां एक झटके में राख हो गईं। घर लौटी तो समाज ने उसे “कुल्टा” और “अपशकुनी” कहकर घर से निकाल दिया। वह ठौर-ठिकाना खोजती रही। एक रिटायर्ड फौजी ने उसे बेटी की तरह अपनाया और उसके बच्चों को भी सहारा दिया। लेकिन नियति को शायद और दर्द लिखना था। हैजे की महामारी में उसके दोनों बेटे और वह सहारा देने वाला इंसान भी चल बसा।

यह वही पल था जिसने ठगुली को भीतर से तोड़ दिया। मां के हृदय से बच्चों का वियोग उसे पागल बना गया। भटकते-भटकते वह हरिद्वार पहुंची। वहां एक साध्वी ने उसे शरण दी और वही उसकी गुरु मां बनीं। इसी ने उसे “इच्छा गिरी” नाम दिया। परंतु उसकी तकदीर को अब भी चैन नहीं मिला। गुरु मां की मौत और दरिंदों की दरिंदगी ने उसके भीतर की नारी को जला दिया। लेकिन, ठगुली हारने वाली नहीं थी। वह राख से उठी, और धीरे-धीरे “इच्छा गिरी माई” बनकर समाजसेवा में जुट गई। उसने शिक्षा के लिए लड़ाई लड़ी, स्कूल खुलवाए, गरीबों के हक की लड़ाई लड़ी।

गढ़वाल में उस समय “टिंचर” नाम की दवा से शराब बनाई जाती थी। यह लत पूरे समाज को खोखला कर रही थी। लोग बर्बाद हो रहे थे, घर उजड़ रहे थे। इच्छा गिरी माई ने इसके खिलाफ आवाज उठाई, पर सरकार ने अनसुना कर दिया।
एक दिन उन्होंने गुस्से में खुद टिंचरी की दुकान में आग लगा दी। उसी दिन से वह “टिंचरी माई” कहलाने लगीं। यह नाम सिर्फ गुस्से का प्रतीक नहीं था, बल्कि समाज की नशे के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक बन गया।

टिंचरी माई का जीवन, विवाह से पहले भी, एक अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। जब वह अभी घुटनों से उठकर अपने पैरों पर चलना सीख रही थीं, तभी माता-पिता का साया उनके सिर से उठ गया। यहीं से उनके जीवन का संघर्ष शुरू हुआ, जो एक परछाई की तरह उनका पीछा करता रहा, हर मोड़ पर उन्हें गिराने की कोशिश करता रहा।

लेकिन, वह गिरी नहीं। इसके बजाय, उन्होंने समाज की उन कुरीतियों को ही घुटनों पर ला दिया, जिन्होंने उन्हें कमज़ोर करने की कोशिश की थी। उनकी कहानी सिर्फ़ ज़िंदा रहने की नहीं, बल्कि लड़ने और जीतने की कहानी है।

फिल्म का प्रभाव और समीक्षा

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी सच्चाई और भावनात्मक गहराई है। निर्देशक ने कहानी को नाटकीय बनाने की बजाय जीवन की असलियत को दिखाने का साहस किया है। कलाकारों का अभिनय इतना वास्तविक है कि आप भूल जाते हैं कि यह एक फिल्म है, और महसूस करने लगते हैं कि यह सब आपके सामने घट रहा है।

पहला हाफ बहुत तेज़ और बांधे रखने वाला है। दूसरा हाफ थोड़ा धीमा पड़ता है, लेकिन जैसे ही टिंचरी माई का असली संघर्ष सामने आता है, फिल्म फिर से रफ्तार पकड़ लेती है। फिल्म का क्लाइमैक्स ज़रूर और दमदार बनाया जा सकता था। खासकर मॉडर्न टिंचरी माई की भूमिका में कुछ और गहराई दिखाई जाती, तो यह और भी असरदार होती। पत्रकारिता से जुड़े दृश्य थोड़े बनावटी लगे, लेकिन कुल मिलाकर यह छोटी कमजोरियां फिल्म की आत्मा को कमज़ोर नहीं करतीं।
क्यों देखें यह फिल्म?

यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक औरत की अदम्य हिम्मत और समाज के खिलाफ खड़ी उसकी आवाज़ की कहानी है। यह हमें सिखाती है कि चाहे कितनी भी विपत्तियां आएं, इंसान यदि ठान ले तो समाज बदल सकता है। टिंचरी माई : द अनटोल्ड स्टोरी, देखते हुए आप खुद महसूस करेंगे कि आपकी अपनी परेशानियां कितनी छोटी हैं। यह फिल्म दर्द देती है, आंसू लाती है, लेकिन अंत में एक आग भी भर देती है, अन्याय और बुराइयों के खिलाफ खड़े होने की। कुल मिलाकर यह फिल्म उत्तराखंड की धरोहर है और हर उस इंसान को देखनी चाहिए जो यह मानता है कि बदलाव संभव है।