इस्लामाबाद। वाशिंगटन में तैनात पाकिस्तानी राजदूत जलील अब्बास जिलानी ने अपनी हरकत से अमेरिका को नाराज कर दिया है। प्रथम महिला मिशेल ओबामा के साथ अपनी फोटो ट्वीट करने के लिए उन्हें अमेरिका ने फटकार लगाई है। हालांकि पाकिस्तान ने इससे इन्कार किया है।
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को सफाई देते हुए इस संबंध में मीडिया में आई खबरों को झूठा और आधारहीन बताया है। मंत्रालय ने कहा है कि व्हाइट हाउस की ओर से इस घटना पर नाखुशी जताने वाला कोई पत्र न तो उन्हें मिला है और न ही वाशिंगटन स्थित दूतावास को। मंत्रालय ने कहा है कि हकीकत की पड़ताल किए बिना अपनी कल्पना से खबर लिखना अनैतिक है।
पाकिस्तानी अखबार “द न्यूज इंटरनेशनल” में व्हाइट हाउस से जिलानी को पत्र भेजे जाने का दावा किए जाने के बाद यह सफाई दी गई है। अखबार ने बताया था कि जिलानी ने 27 मई को एक फोटो ट्वीट की थी। इसमें वह, उनकी पत्नी और मिशेल ओबामा साथ थीं।
अमेरिका ने उनकी इस हरकत को गैर राजनयिक और भरोसा तोड़ने वाला बताया है। यह तस्वीर उस वक्त ली गई थी जब जिलानी के बेटे की ग्रेजुएशन पार्टी में शामिल होने मिशेल पाकिस्तानी दूतावास पहुंचीं थी। जिलानी का सबसे छोटा बेटा उसी स्कूल में पढ़ता था जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की बेटियां मालिया और साशा पढ़ी हैं।
अखबार के अनुसार यह तस्वीर ट्वीट कर जिलानी ने यह संकेत देने की कोशिश की थी कि उनकी अमेरिका के प्रथम परिवार से बेहद नजदीकियां हैं। इसके बाद मीडिया में मिशेल और उनके बीच द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की रिपोर्टें भी आईं।
इससे नाराज व्हाइट हाउस ने निजी कार्यक्रम में मिशेल की मौजूदगी का सियासी फायदा उठाने के इस तरीके को गैर पेशेवर करार दिया है। उल्लेखनीय है कि ट्वीट करने के कुछ घंटे बाद ही जिलानी ने यह फोटो हटा ली थी, लेकिन तब तक यह सोशल मीडिया में शेयर हो चुका था।
मिशेल के साथ फोटो शेयर करने पर अमेरिका ने पाकिस्तानी राजदूत को लगाई फटकार
अब्दाली के वंशज ने भूमि लीज जारी रखने की मांग की
लाहौर। अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली के वंशज ने पाकिस्तानी पंजाब सरकार के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की है। पंजाब सरकार ने ब्रिटिश शासनकाल में अब्दाली के परिवार को बरकी के नजदीक मिली 182 एकड़ जमीन की लीज रद कर दी है।
याचिकाकर्ता और अब्दाली के वंशज शाहपुर दुर्रानी ने कहा कि पाकिस्तान के गठन के बाद संघीय सरकार ने जमीन की लीज को सम्मान देते हुए इसे न बदलने का फैसला किया था। पंजाब सरकार ने हाल ही में लीज रद करते हुए जमीन को अपने कब्जे में ले लिया। सरकार यहां आइटी यूनिवर्सिटी बनाना चाहती है।
दुर्रानी ने कहा कि ब्रिटिश शासकों ने मुस्लिम समुदाय की सेवा के पुरस्कारस्वरूप उनके पूर्वजों को यह जमीन दी थी। अदालत को पंजाब सरकार का फैसला रोकते हुए जमीन की लीज पुनः उनके परिवार को देने का आदेश सुनाना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि अब्दाली (1722-1772) का मूल नाम अहमद शाह दुर्रानी था और वह प्रसिद्ध दुर्रानी साम्राज्य के संस्थापक थे। उन्हें वर्तमान अफगानिस्तान का निर्माता माना जाता है।
भारत-अमेरिका रक्षा करार को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहा चीन
बीजिंग। भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग समझौते को चीन ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहा है। मंगलवार को उसने इस करार को दोनों देशों के बीच सामान्य सहयोग बताया। हालांकि इसको लेकर चीन की मीडिया भारत से बेहद खफा है।
उसने चेताया है कि अमेरिकी खेमे में जाने की भारत की कोशिश से चीन, पाकिस्तान और रुस की नाराजगी बढ़ सकती है। इससे भारत के लिए सामरिक मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनईंग ने कहा, “करार संबंधी रिपोर्ट पर गौर किया। उम्मीद है कि भारत-अमेरिका के बीच हुआ यह समझौता क्षेत्रीय स्थिरता और विकास को बढ़ाने का काम करेगा।”
उनके अनुसार, “दोनों पक्षों के बीच इस तरह के सामान्य सहयोग को वास्तविकता में तब्दील होते देखने में हमें खुशी होगी।” इस करार के तहत भारत और अमेरिका एक-दूसरे के सैन्य अड्डों का इस्तेमाल, ईंधन की आपूर्ति और सामरिक सेवाएं प्रदान कर सकते हैं।
अमेरिका के साथ भारत के समझौते को लेकर चीन सरकार भले ही ऊपर से चिंतित नहीं दिख रही हो, लेकिन लेकिन अंदर से वह भी हिली हुई प्रतीत हो रही है। उसकी बौखलाहट सरकारी अखबार “ग्लोबल टाइम्स” के संपादकीय के जरिये उजागर हुई है।
अखबार ने चेताया है कि अगर भारत, अमेरिका की ओर झुका तो इससे उसकी सामरिक स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी। उसका कहना है, “निश्चित रूप से यह भारत और अमेरिका के बीच सैन्य सहयोग के क्षेत्र में एक लंबी छलांग है। अमेरिकी मीडिया इससे खुश है।
फोर्ब्स ने इसको “वॉर पैक्ट यानी युद्ध समझौता” करार दिया है। हम मानते हैं कि भारत अपने शीत युद्ध के दौर के सहयोगी रूस को छोड़कर नए दोस्त अमेरिका की तरफ जा रहा है।” ग्लोबल टाइम्स का प्रकाशन चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी करती है।
समाचार पत्र ने करार को लेकर भारत को सीधे धमकी दी है। उसने संपादकीय में लिखा है, “अगर भारत हड़बड़ी में अमेरिकी खेमा ज्वाइन करता है तो इससे चीन और पाकिस्तान सहित रूस भी नाराज हो सकते हैं।
इससे भारत खुद को सुरक्षित नहीं महसूस करेगा। उसके लिए सामरिक समस्याएं बढ़ेंगी। खुद को वह शत्रुओं से घिरा महसूस करेगा।”
भारत क्या है? भारत भावना क्या है? भाषा क्या है?
भारत (संज्ञा-मानवनाम) : जड़ भरत, चक्रवर्ती सम्राट भरत, विशिष्टगुण संपन्न व्यक्ति, दुरूह भार-वहन क्षमतावान व्यक्ति, अर्जुन;
(देश-स्थाननाम) : आयावर्त, आर्यावर्त-उपमहाद्वीप, जम्बूद्वीप के अंतर्गत भरतखंड, इंदुदेश, इंडिया, कर्मभूमि, पुण्यभूमि, गणराज्य भारत, भारतमाता, भारतवर्ष, यज्ञियदेश, सोने की चिड़िया, स्वदेश, हिंद, हिंदोस्तान, हिंदोस्ताँ, हिंदुस्तान, हिंदुस्थान, भारतीय संघ, भारत गणराज्य, इंडिया दैट इ़ज भारत।
इतने सारे नामों में सन १९४७ में हुए विभाजन के बाद क्या वह भारत नाम से पहचाना जानेवाला जमीन का एक टुकड़ा-भर है? आखिर वह भारत है क्या जिस पर हम गर्व करते हैं? क्या हमारे गर्व का स्रोत पौराणिक कथा का जड़ भरत है, या चक्रवर्ती सम्राट दुष्यंत तथा इंद्र के दरबार की अप्सरा मेनका और ऋषि विश्वमित्र की पुत्री शकुंतला का पुत्र भारत है, जिसका कण्व ऋषि के शिवालिक पर्वत की गोद में मालिनी नदी के तट पर स्थित आश्रम में लालन-पालन हुआ था। या भागवत पुराण के महाभारत-खंड में वर्णित पांडु-पुत्र अर्जुन है, जिसे द्वापरयुग के अस्ति-काल में भगवान श्रीकृष्ण ने गीता-ज्ञान देते हुए इसी नाम से संबोधित किया था –
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत! –हे भारत! जब-जब धर्म का ह्रास होता है,
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।” (और) अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं जन्म लेता हूँ।
या वह भारत जिसका विदेशी ब्रिटिश गुलामी की बेड़ियाँ काटने और परतंत्र देश की अस्मिता को जगाने के लिए राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने, जिनका यह १२८वाँ जयंती वर्ष भी है, अपनी कालजयी रचना `भारत भारती’ खंडकाव्य में इस प्रकार मंगलाचरण किया है–
मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती,
भगवान! भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।
हो भद्रभावोद्भाविनी वह भारती हे भगवते।
सीतापते! सीतापते!! गीतामते! गीतामते!!” ।१।
हाँ, लेखनी हृत्पत्र पर लिखनी तुझे है यह कथा,
दृक्कालिमा में डूबकर तैयार होकर सर्वथा।
स्वच्छंदता से कर, तुझे करने पड़ें प्रस्ताव जो,
जग जायें तेरी नोंक से सोये हुए हों भाव जो।२।
‘मानस भवन में’ और `सोये हुए हों भाव’ जो निश्चित ही उस भारत को इंगित करते हैं, जो कोई एक व्यक्ति नहीं है। न किन्हीं सीमाओं से बँधा कोई भूभाग ही। फिर भी यह भारतवर्ष, भारत नामक देश है जो अन्य देशों से कई मानों में भिन्न है। यह इसलिए कि जिस प्रकार देशों की सीमाएं परिभाषित होती रही हैं, और समय-समय पर पुनर्परिभाषित होती जाती हैं, उस प्रकार भारत आसेतु हिमालय तक फैला धरती का एक विस्तार और उस विस्तार का एक खंड मात्र नहीं है।
हमने इस लेख के प्रारंभ में भारत शब्द के शब्दकोशीय अर्थ प्रस्तुत करते हुए कुछ शब्द दिये हैं। भारत उनमें से केवल कोई एक शब्द नहीं है। वह एक विशिष्ठ भावना है। वह एक विशिष्ठ चरित्र है। गुणधर्म है। जो उपरोक्त सभी शब्दों में विद्यमान है। व्यक्ति और स्थान सभी में अंतर्निहित संस्कार है। वह उपरोक्त तथा अन्य कई भूखंडों का अविभक्त भाव है और विभक्त भूखंडों का समुच्चय है। जो भारत भाव है, वह किसी एक का नहीं यहाँ के हर रहिवासी का है। भारत भाव कोई एक पंथ-पांत नहीं है, एक नस्ल-रंग नहीं है, एक भाषा-बोली नहीं है, वह इन कई मनुष्यों की इन सभी विभिन्नताओं का समुच्चय है। जिसमें बार-बार कुछ जुड़ता-टूटता चला आ रहा है। यह वह है जिसमें जुड़ाव भी है और घटाव भी। यह एक पूर्णांश (एंटिटी) है, जिसके नाम में घट-बढ़ होती रही हैं मगर जिसकी आत्मा नहीं बदल पायी है।
ऋग्वेद (मंडल २ से ७ तक) के अनुसार वेदकालीन भारत, उस समय के पूर्वजों और उनकी संततियों का नाम था। किसी एक का नहीं, कई का नाम था। उस समय `भारत’ कुल-गोत्र नाम था। सब भारत थे। उसके बाद पौराणिक युग में, विष्णु, वायु, लिंग, ब्रह्मांड, अग्नि, स्कन्द, मार्कण्डेय पुराणों में बताया गया है कि चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम से यह देश भारतवर्ष कहलाया। विष्णु पुराण में वर्णित है :
ऋषभो मरुदेव्याश्च ऋषभात भरतो भवेत्
भरताद भारतं वर्षं, भरतात सुमतिस्त्वभूत्। –विष्णु पुराण (२,१,३१)।
–मरुदेवी का पुत्र ऋषभ और ऋषभ का पुत्र भरत हुआ; भरत से भारतवर्ष का उदय हुआ और भरत से सुमति का। –विष्णु पुराण (२,१,३१)।
ततश्च भारतं वर्षमेतल्लोकेषुगीयते
भरताय यत पित्रा दत्तं प्रतिष्ठिता वनम। –विष्णु पुराण (२,१,३२)।
–यह देश तब से भारतवर्ष कहलाता है, जब भरत के पिता अपने पुत्र को राजपाट सौंपकर तपस्या करने वन प्रस्थान कर गये। –विष्णु पुराण (२,१,३२)
विष्णु पुराण के ही अनुसार–
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रैश्चैव दक्षिणम् ।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः।। –विष्णु पुराण (२,३,१)
–सागर के उत्तर में और हिमाच्छादित पर्वतमाला के दक्षिण में जो देश (वर्ष) स्थित है वह भारत कहलाता है, जहाँ भारत की संतति वास करती है। –विष्णु पुराण (२,३,१)
इस क्षेत्र के अंतर्गत अ़फ़गानिस्तान, आज का पाकिस्तान, भारत, नेपाल, बाँग्लादेश आ जाते हैं। लगभग यही चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के साम्राज्य की सीमाएं थीं। मु़गल साम्राज्य (१७वीं सदी) और मराठा साम्राज्य (१८वीं सदी) दोनों की तथा ब्रिटिश राज (१९-२०वीं सदी) की भी लगभग यही सीमाएं रहीं। इस प्रकार समय की दृष्टि से देखें तो भारत के इतिहास के वैदिक काल, पौराणिक काल, मध्यकाल और अब स्वराज के फलस्वरूप आधुनिक काल ये चार पाये हो जाते हैंैं।
राष्ट्र के रूप में भारत-भावना पश्चिम की बनती-बिगड़ती राष्ट्र-राज्य अवधारणा के विपरीत तथा बहुत पहले की है। यह सनातन भावना है। इन अर्थों में भारत सनातन राष्ट्र है, वह मानव सभ्यता का पहला राष्ट्र है। श्रीमद्भागवत (पंचम स्कन्ध) में राष्ट्र-रूप भारत की उत्पत्ति का वर्णन आता है कि सृष्टि की उत्पत्ति के बाद ब्रह्मा के मानस-पुत्र स्वायंभुव मनु ने विश्व की व्यवस्था सँभाली। उन्होंने अपने दो पुत्रों प्रियव्रत और उत्तानपाद में से ज्येष्ठ प्रियव्रत को संपूर्ण जगत (पृथ्वी) का भार सौंप दिया। (यह भारत की `वसुधैव कुटुम्कम्’ अवधारणा का आदि स्रोत है)। जिस प्रियव्रत को उसके पिता प्रथम मनु ने समूची पृथ्वी का भार सौंपा था, उसके दस पुत्र हुए जिनमें से तीन विरक्त थे। अतः उसने पृथ्वी को सात भागों में स्थित करके एक-एक भाग का अधिभार अपने शेष सात पुत्रों को सौंप दिया। इनमें से एक आग्नीध्र को जंबूद्वीप का शासनभार सौंपा गया। जब आग्नीध्र वृद्ध हो गये तो उन्होंने जंबूद्वीप को नौ भागों में विभाजित करके अपने नौ पुत्रों को सौंप दिया। इनमें ज्येष्ठ पुत्र नाभि को `हिमवर्ष’ का भूभाग मिला। इस नाभि ने अपने नाम `नाभि’ के साथ `अज’ उपसर्ग जोड़कर हिमवर्ष को `अज-नाभवर्ष’ नाम दे दिया। इन सम्राट नाभि के पुत्र ऋषभदेव के सौ पुत्रों में सबसे गुणवान और ज्येष्ठ थे भरत, जिन्हें अजनाभवर्ष का राजपाट सौंपकर ऋषभदेव ने वाणप्रस्थ ग्रहण कर लिया। उसके बाद से हिमवर्ष से अजनाभवर्ष बना राष्ट्र भरत के नाम से `भारतवर्ष’ कहलाने लगा।
यों शासक के बदलने पर शासितक्षेत्र के नाम भले बदलते चले गये, किन्तु क्या भारत अलग-अलग समयों में अलग-अलग व़क्तों के बदलते हुए राजनीतिक भूगोल का नाम है? जी हाँ, है भी और नहीं भी। है, क्योंकि जब-जब भूगोल बदला है भारत नामक सीमाक्षेत्र बदला है। मगर इन बदलावों के बावजूद वह भावना नहीं बदली है जो भारत-भावना है। वैदिक भारत, पौराणिक भारत, हिंदू भारत, मु़गलकालीन हिंदोस्तान, ब्रिटिश उपनिवेश इंडिया, गणराज्य भारत ये सब भारत हैं। अलग-अलग कालखंड के भारत हैं, अलग-अलग नाम से हैं। मगर इन सब में वह कुछ है जो हर काल के भारत में अंतर्निहित है। वह कुछ एक भारत धारणा है, एक भावना है, एक विचार,एक आस्था है! जिसे हम भारत-भावना समझते हैं। जो एक अंदरूनी कालजयी भावनात्मक निरंतरता है। संप्रदायों की परिधियों से ऊपर उठकर भारत की यह भावनात्मक निरंतरता अपने आप में एक सनातन संस्कार है। एक मॉडल है, जैसा मानवीय मूल्यों से मंडित आदर्श विश्व का मॉडल होना चाहिये।
अब अल्लामा इ़कबाल की मशहूर ऩज्म `सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तान हमारा’ को देखिये जो स्वराज के आंदोलन में गलीगली प्रभातफेरियों में गायी जाती थी :
“सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा,
हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसिताँ हमारा।टेक।
घुर्बत (परदेस) में हों अगर हम रहता है दिल वतन में,
समझो वहीं हमें भी दिल है जहाँ हमारा।१।
परबत वो सबसे ऊँचा हमसाया आस्माँ का,
वो संतरी हमारा वो पासबाँ हमारा।२।
गोदी में खेलती हैं इसकी ह़जारों नदियाँ,
गुलशन है जिनके दम से रश्क-ए-जना हमारा।३।
ऐ आबरूद गंगा वो दिन है याद तुझको,
उतरा तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा।४।
म़जहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिंदवी हैं हम वतन है हिंदोस्तान हमारा।५।
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गये जहान से,
अब तक मगर है बा़की नामो-निशाँ हमारा।६।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-़जमाँ हमारा।७।
इ़कबाल कोई मेहरम अपना नहीं जहाँ में,
मालूम क्या किसी को दर्द-ए- निहाँ हमारा।८।
अतः वेदों से लेकर शायर इ़कबाल, जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान के कौमी शायर कहलाये और मैथिलीशरण गुप्त, जिन्हें भारत की जनता ने राष्ट्रकवि अंगीकार किया, तक शाश्वत सत्य यही है कि भारत एक ऐसी प्रबल भावना, गहरा संस्कार है जो मिटाये नहीं मिट सकता।
कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने `भारतेर इतिहास’ शीर्षक अपने बाँग्ला लेख में भारत का पश्चिमीकरण करनेवालो को फटकारते हुए लिखा है, “जो यह कहते हैं कि भारत का केवल राजनीतिक इतिहास है, उसका कोई (सांस्कृतिक) इतिहास नहीं है, वे धान के खेत में अंडे उगाने की बात कर रहे हैं। सभी खेतों में एक ही उपज नहीं होती। जो इस बात को समझते हैं वे समझदार हैं।”
भारत एक ऐसी धरती है जिसकी अपनी अलग सांस्कृतिक उपज है, लगातार परिवर्द्धित-परिसंस्कारित होती रहती उपज, मगर है एक अनवरत सभ्यता और संस्कृति का अग्रसरण और यही उसके अपने अनोखे मूल्य हैं जो लाख मिटाये, मिटाये न जा सके। जिसके बारे में शायर इ़कबाल ने लिखा “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-़जमाँ हमारा” और राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने “भगवान! भारतवर्ष में गूँजे हमारी भद्रभावोद्भाविनी वह भारती हे भगवते” कहा।
भारतवर्ष का इतिहास लगभग ५००० साल पुराना माना जाता है। इसमें कोई विशेष मतभेद नहीं है। हालाँकि भारतीय इतिहासकार पुराणों में व्याख्यायित काल गणना और खगोलीय घटनाओं और राजवंशों के समय के आधार पर भारतीय इतिहास का समय अति प्राचीन मानते हैं। प्रसिद्द साहित्यकार आचार्य चतुरसेन रामायण-काल को ईसापूर्व ७५०० वर्ष मानते हैं। पाश्चात्य विद्वान सिंधु घाटी-सभ्यता को ईसापूर्व ३३०० वर्ष पहले की बताते हैं कि आर्य लोग मध्य एशिया से आकर सिंधु नदी के तटवर्ती पंजाब और सिंध में आकर बस गये थे और उन्होंने उत्तर तथा मध्य भारत में वैदिक सभ्यता का निर्माण किया। उनकी भाषा संस्कृत और प्राकृत थी और धर्म वैदिक धर्म अथवा सनातन धर्म था, जिसे बाद में हिंदू धर्म कहा जाने लगा। किन्तु आर्यों के बाहर से आने के पुरातात्विक प्रमाण कोई नहीं हैं। वस्तुतः हाल में मिले पुराउत्खननों में तथा सरस्वती नदी की खोज से वैदिक सभ्यता के कुछ ऐसे अवशेष मिले हैं जिनसे प्रमाणित होता है कि आर्यों की उत्पत्ति यहीं हुई।
इस बात से पश्चिम के विद्वान और सभी इतिहासज्ञ सहमत हैं कि वैदिक सभ्यता संसार की सबसे पुरानी सभ्यता है और ऋगवेद सबसे प्राचीन ग्रंथ। वे ऋगवेद का रचनाकाल ३००० वर्ष ई.पू. स्थापित करते हैं। `भारतीय पुरातत्व परिषद’ ने हाल ही में सरस्वती नदी की जो खोज की है उसने इस विषय पर नयी रोशनी डाली है कि वैदिक सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता सरस्वती नदी के तटीय क्षेत्र में विकसित हुई, जिसमें आधुनिक भारत के पंजाब और हरियाणा प्रदेश आते हैं। चूँकि हड़प्पा सभ्यता की २६०० बस्तियोेंं में से केवल २६५ बस्तियाँ पाकिस्तान में सिंधु नदी के तट पर मिलती हैं और शेष २३३५ सरस्वती नदी के तट पर अतः हड़प्पा सभ्यता को सिंधु-सरस्वती सभ्यता नाम दिया गया। सरस्वती एक विशाल नदी होती थी, जो पहाड़ों के सीनों को तोड़ती और मैदानों को रौंदती हुई समुद्र में जा मिलती थी। ऋगवेद में सरस्वती नदी का उल्लेख बारबार आया है, जो बाद के भूगर्भीय बदलाव के कारण भूमिगत हो गयी।
इसलिए यह स्थापना सही लगती है कि आर्य भारतीय मूल के ही थे और वैदिक सभ्यता का प्रारंभ भारत में ही हुआ। सनातन अथवा वैदिक धर्म उनका धर्म था। उसके अलावा ढाई ह़जार वर्ष पूर्व से यहाँ जैन और बौद्ध संप्रदाय भी लोकप्रिय हुए। ईसा पूर्व २६५-२४१ में, सम्राट अशोक का साम्राज्य अ़फ़गानिस्तान से मणिपुर और तक्षशिला से कर्नाटक तक फैल गया था। दक्षिण में चोल शक्तिशाली थे। भगवान बुद्ध के जीवनकाल में कपिलवस्तु के शाक्य तथा वैशाली के लिच्छवी गणराज्य फलफूल रहे थे। इस दौरान भारत में गणराज्य और राजतंत्र मिलाकर सोलह महाजनपद थे – काशी, कोशल, अंग, मगध, वज्जी, मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पंचाल, मत्स्य, शूरसेन, अक्ष, अवंती, गंधार, कम्बोज – जो अ़फ़गानिस्तान से लेकर बंगाल और महाराष्ट्र तक फैले हुए थे।
८वीं सदी में जब सिंध पर अरबी कब़्जा हुआ तो भारत में इस्लाम का भी प्रवेश हो गया और १२वीं सदी के अंत तक तुर्क दासों ने दिल्ली के सिंहासन पर आधिपत्य जमा लिया। दक्षिण में विजयनगर और गोलकुंडा हिंदू शासन थे, मगर १५५६ में विजयनगर पर मुस्लिम शासन आ गया। उधर १५२६ में मध्य एशिया (आज के उ़ज्बेकिस्तान) से खदेड़े गये राजकुमार बाबर ने, जो तैमूर और चंगे़ज खान के वंशज थे, काबुल में जाकर पनाह ली, ता़कत बटोरी और भारत पर हमला करके यहाँ मु़गल सल्तनत की नींव डाली और यहीं बस गये। वापस नहीं लौटे। न यहाँ की धन-संपदा वहाँ ले गये। मु़गलों के अट्ठारह उत्तराधिकारियों का – बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंग़जेब से लेकर बहादुर शाह तक ३०० वर्षों तक शासन रहा, जो लगातार कम़जोर पड़ता चला गया था। उसी दौरान मध्य और दक्षिण भारत में छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व में मराठे शक्तिशाली हुए और दक्षिण-पूर्वी तट पर पुर्तगाली व्यापारी आने लगे थे। औरंग़जेब दक्षिण को काबू करने चला तो उत्तर में सिखों का उदय हो गया। १७०७ ईस्वी में दक्षिण में ही औरंग़जेब की मृत्यु हो गयी और उसी के साथ मु़गल सल्तनत का बिखराव शुरू हो गया।
कम़जोर केंद्रीय सत्ता का फायदा उठाकर विदेशी ब्रिटिश, पुर्तगाली, डच और फ्रांसीसी व्यापारियों ने, जिनकी आपस में प्रतिस्पर्धा थी, व्यापार की आड़ में अपने-अपने कब़्जे जमाने शुरू कर दिये। किन्तु अंगरे़जों ने पुर्तगाली, डच और फ्रांसीसी व्यापारियों को मुख्य भूमि से खदेड़कर भारत पर एकछत्र व्यापारिक अधिकार जमा लिया। १७५७ में सिरा़जुद्दौला को हराने और १८५७ के विद्रोह को, जिसे स्वतंत्रता का पहला संग्राम माना गया है, कुचलने के बाद अंगरे़ज भारत की राजनीतिक सत्ता पर भी काबि़ज हो गये। अंगरे़जी औपनिवेशिकता के साथ भारत में ईसाइयत का भी प्रवेश हो गया।
यह तो ता़जा स्मृति है कि स्वतंत्रता के एक लंबे गरम और नरम दलीय संघर्ष और महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चले अहिंसा के अनूठे आंदोलन के बाद अंगरे़जों की औपनिवेशिक दासता से भारत १९४७ में आ़जाद हुआ। हालाँकि इसी के साथ देश का विभाजन भी हो गया। अखंड भारतवर्ष में से एक नया देश पाकिस्तान अस्तित्व में आ गया। इसी के साथ भारत पर पाश्चात्य भौतिक समृद्धि और आधुनिकता के आकर्षण का दबाव भी बढ़ गया, किन्तु भारत भावना को न अरब का इस्लामीकरण निगल पाया, न योरप का ईसाईकरण। भारत भावना ने इस्लाम को भी अपने में समो लिया और क्रिस्तान को भी। यहूदी को भी समा लिया और पारसी को भी। तात्पर्य यह कि हमलावर या शरणागत बनके आये जो-जो लोग यहाँ रहने लगे यहीं के हो गये। ध्यान देने की बात है कि जो यहाँ के नहीं हुए, जिन्होंने भारत को अपना देश नहीं माना वे यहाँ से चले गये।
आज संसार का शायद ही कोई धर्म या संप्रदाय हो जो भारत में न हो, जिसके माननेवाले अपने को यहाँ सुरक्षित न समझते हों। ऐसा केवल इसीलिए है कि भारत एक ऐसा संस्कार है, आस्था है, भावना है जो मानवता में विश्वास रखती है।
भारत `वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा का उद्गम है। भारत के पास विश्व को देने के लिए उसकी मानवीयता की उदात्त भावना है, तो विश्व से ग्रहण करने की अजस्र शक्ति भी। सनातन के साथ अधुनातन को ग्रहण करना ही भारतीयता है। स्वामी विवेकानंद ने अपने एक भाषण में कहा था, “दो और लो (सृष्टि का) नियम है, और अगर भारत पुनः ऊँचा उठना चाहता है तो यह अत्यंत आवश्यक है कि वह अपना ख़जाना विश्व के लोगों के लिए खोल दे, और बदले में वे लोग जो दे सकते हैं उसे लेने के लिए तैयार रहे। विस्तार जीवन है और संकुचन मृत्यु। प्रेम जीवन है, घृणा मृत्यु। हमने जिस दिन दूसरी नस्लों से घृणा करना शुरू कर दिया उस दिन मरना शुरू कर दिया, और हमारी मृत्यु को तब तक कोई नहीं रोक सकता है, जब तक कि हम अपना पुनर्विस्तार, जो जीवन है, शुरू न कर दें।…
“अगर इस धरती पर कोई देश `पुण्य भूमि’ होने का दावा कर सकता है तो वह भारत है, वह देश जहाँ इस धरती के तमाम जीवों को अपने कर्मों का हिसाब देने आना होगा, वह देश जहाँ हर उस प्राणी को मोक्ष के लिए आना होगा जो परमात्मा की प्राप्ति की ओर अग्रसर है, वह देश जहाँ मानवता भद्रता, उदारता, वचन की पवित्रता, शांति और सर्वोपरि आत्मशुद्धि तथा आध्यात्मिकता के चरम पर पहुँच चुकी है।”
स्वामी विवेकानंद जिस भारत भावना का वर्णन कर रहे हैं, वह भारत का राजनीतिक इतिहास नहीं है, वह भारत-मूल्यों का इतिहास है। वह भारतीय भौतिकता का नहीं उसकी आध्यात्मिक उत्कृष्टता का इतिहास है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता का इतिहास है, जिसके कारण भारत विश्वगुरु कहलाता था। क्या वह सभ्यता और संस्कृति आज बा़की है, जिसे मैथिलीशरण गुप्त ने “भद्रभावोद्भाविनी” कहा और इ़कबाल “अब तक मगर है बा़की नामो-निशाँ हमारा” कह गये? अगर इस प्रश्न का उत्तर `हाँ’ में है तो वह भावनात्मक ही है, व्यावहारिक नहीं है। संस्कार में है, जो सोया पड़ा है।
गाँधी ने इस सच्चाई को समझा था। “ईश्वर अल्लाह तेरे नाम सबको सन्मति दे भगवान” उनकी प्रार्थना होती थी। मनुष्य मात्र को जोड़ने की भावना। भारतीयता जोड़ना है। सत्य, अहिंसा, प्रेमभाव जोड़ते हैं; असत्य, हिंसा, घृणाभाव तोड़ते हैं। जुड़ना जीवन है, टूटना मृत्यु! और यह उपलब्धि केवल आध्यात्मिकता से ही हासिल की जा सकती है। भौतिक प्रलोभन तोड़ता है। पहले जोड़ने की भारत भावना का ह्रास हुआ, फिर भारत अपने विश्वगुरु होने के पद से च्युत होता चला गया। गिरते-गिरते गुलाम बन गया।
आ़जाद भारत ने आध्यात्मिक उन्नति की अपरिहार्यता को पश्चिमी प्रभाव में भुलाकर भौतिक प्रगति की ओर दौड़ लगानी शुरू कर दी, जिसका नतीजा है चौतरफा भ्रष्टाचार, अनाचार और मूल्यहीनता। राज पाते ही हमारे कई नेताओं ने, शासकों-प्रशासकों और कई धर्मगुरुओं ने आ़जादी की बंदरबाँट शुरू कर दी। बुद्धि का अपराधीकरण हो गया।
गाँधी के बाद अगर किसी राजनीतिज्ञ ने भारत-भावना को समझा था तो वह डॉ. राममनोहर लोहिया थे। वह प्राचीन भारतज्ञान और भारतीय मनीषा के आधुनिक मनीषी थे। राम, कृष्ण और शिव के बारे में उनके एक लेख के अनुसार “हो सकता है कि मिथकीय चरित्र राम, कृष्ण और शिव ऐतिहासिक चरित्र रहे हों… वे उन लोगों के सपनों, संघर्षों और दुःखों के प्रतीक रहे हैं जिन्होंने उनकी संकल्पना की… इतिहास के चरित्रों को तो कुछ ही लोग जानते हैं मगर मिथिकीय चरित्र जनजन की भावना के अभिन्न अंग बन गये हैं।” अपनी इस समझ को व्यावहारिक रूप देने के लिए उन्होंने अयोध्या के निकटवर्ती फैज़ाबाद (अपने गृहनगर) में प्रथम `रामायण मेला’ का आयोजन किया, जो कड़ी आज तक चल रही है।
संक्षेप में भारत भावना मनुष्य बनाने की भावना है। मनुष्य को वस्तु अथवा मशीन बनाने की भावना नहीं है। मनुष्यता की भावना सबको सुखी देखने की भावना है। अगर हमारे कर्णधारों ने इस दिशा में काम किया होता तो कुछ असंभव नहीं था कि हम फिर से आसेतु हिमालय एक महा-देश होते जो कभी हिमवर्ष तो कभी अजनाभवर्ष तो कभी भारतवर्ष कहलाता था। हमारे इस उपमहाद्वीप की यह सुप्त भारत-भावना जाग्रत हो सकती है। जरूरत है इस दिशा में काम करने की। कौन करेगा यह काम? इतिहास साक्षी है कि मनुष्य बनाने का काम शासक ने कभी नहीं किया है। यह कार्य मनीषियों ने किया है।
माना कि भारत-भावना इस देश के करोड़ों लोगों के मन में सोयी हुई ऊर्जा की तरह मौजूद है, लेकिन जब तक सुप्त ऊर्जा को जाग्रत न किया जाये तब तक वह किस काम की। बात इतनी सी नहीं है कि उसे जगाया नहीं जा रहा है। असल में उसे तो और और गहरे द़फनाया जा रहा है। भौतिक विकास के लिए हम न सिर्फ नैतिक मूल्यों की बलि दे रहे हैं, बल्कि हम अपने रहन-सहन, खानपान और पहनावे को भी छोड़ रहे हैं। हम अपनी मातृभाषा-बोलियों और राष्ट्रभाषा की जगह विदेशी भाषा अंगरे़जी को अपने कामकाज और बोलचाल का माध्यम बनाने में शान समझ रहे हैं। हमारा समूचा सिस्टम अंगरे़जीपरस्त हो गया है। हमें विदेशी अंगरे़जी की दासता मंजूर है, मगर स्वदेशी हिंदी की दोस्ती मंजूर नहीं। हम राष्ट्र होते हुए भी हमारी कोई राष्ट्रभाषा नहीं! भारत पर अंगरे़जी जबान को थोपने का श्रेय जिस मैकाले को जाता है उसका कहना था कि “अगर किसी राष्ट्र को, उसकी संस्कृति को मिटाना हो तो पहले उसकी भाषा को मिटाना जरूरी है।” मैकाले और ब्रिटिश चले गये मगर मैकाले की `भारतीय संस्कृति मिटाओ’ नीति बरकरार है!
स्वामी विवेकानंद ने बाहर से आनेवाली अच्छाइयों को जैसे तकनीकी को अंगीकार करने को कहा। उनके व्यक्तिवादी जीवन-मूल्यों को अपनाने को नहीं। पश्चिम या जापान जैसे पूरब के देशों से उनकी कार्यसंस्कृति और सामाजिक अनुशासन को अपनाना अच्छी बात है। मगर हम विदेशों की अपसंस्कृति और फूहड़पन को अपनाते जा रहे हैं और आधुनिकता के नाम पर अपनी संस्कृति मानवता की संस्कृति को छोड़ते चले जा रहे हैं। सोचना होगा कि खतना करने से मुसलमान, चोटी रख लेने से हिंदू और क्रॉस लटका लेने से ईसाई आदमी से कोई और जीव नहीं बन जाता है, तो धर्म का अर्थ मनुष्य को बाँटने का कैसे हो सकता है! जबकि सृष्टि के नियम और न कोई धर्म आदमी को तोड़ने का हिमायती है तो फिर हम अपने विभिन्न धर्मों को मानव जाति के विखंडन का हथियार क्यों बनाते हैं।
अगर हम सर्वधर्म समभाव, मानव ही नहीं सभी जीवजंतुओं के प्रति समभाव, प्रकृति के प्रति समभाव की भारत भावना से विमुख होते रहेंगे तो भारत विश्व गुरु तो कभी नहीं बनेगा। विश्व का निकृष्टतम राष्ट्र जरूर हो जायेगा। हमें खुश़फहमी में नहीं रहना चाहिये। गलत़फहमी से ज्यादा खतरनाक खुश़फहमी होती है।
दिलशान ने कहा वनडे और टी20 क्रिकेट को अलविदा
श्रीलंका के धुआंधार बल्लेबाज तिलकरत्ने दिलशान ने वनडे और टी20 क्रिकेट से संन्यास लेने की घोषणा कर दी है. गुरुवार को श्रीलंकाई क्रिकेट बोर्ड ने आधिकारिक रूप से घोषणा करते हुए कहा कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ रविवार को दांबुला में होने वाला तीसरा मैच दिलशान का आखिरी वनडे होगा. 9 सितंबर को दिलशान ऑस्ट्रेलिया के ही खिलाफ कोलंबो में अपना आखिरी टी 20 अंतराष्ट्रीय मैच खेलेंगे.
2010 से 2012 तक श्रीलंका की हर फॉरमैट में कप्तानी करने वाले दिलशान ने 1999 में जिम्बाब्वे के खिलाफ अपना पहला वनडे मैच खेला और अब तक 329 मैचों में 10,248 रन बना चुके हैं, जिसमें 22 शतक शामिल हैं.
अपने वनडे करियर में वो चार बार 150 से अधिक रन बना चुकें हैं. और तो और, स्पिन गेंदबाजी करने वाले दिलशान के नाम 106 वनडे विकेट भी हैं. उनका ‘दिलस्कूप’ शॉट पूरे क्रिकेट जगत में प्रसिद्ध है.
श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड ने 28 अगस्त को होने वाला दांबुला वनडे दिलशान के नाम कर दिया है और इसी मैच के दौरान उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा. 39 वर्षीय दिलशान का नाम आज भी विश्व क्रिकेट के बेहतरीन फील्डर्स में लिया जाता है.
मेडल ना जीतने पर तानाशाह किम जोंग कराएगा खदान में काम
उत्तरी कोरिया का तानाशाह किम जोंग उन कुछ भी कर सकता है। रियो ओलंपिक में मेडल नहीं जीतने वाले खिलाड़ियों को उसने अजीब सजा देने की ठान ली है। खबरों की माने तो किम उन सभी खिलाड़ियों से कोयले की खदान में काम करवाएगा जिसने मेडल नहीं जीता।
किम जोंग को अपने खिलाड़ियों से ओलंपिक में 5 गोल्ड मेडल के साथ 17 मेडल्स जीतने की अपेक्षा थी लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। उत्तरी कोरिया ने रियो ओलंपिक में महज 7 मेडल ही अपने नाम करने में सफलता पाई।
उत्तर कोरिया की तरफ से रियो ओलंपिक में कुल 31 खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करने रियो गए थे। इसके खिलाड़ियों ने 2 गोल्ड, 3 सिल्वर और 2 ब्रॉन्ज मेडल जीते। ऐसी भी खबरें हैं कि एक फुटबॉल मैच हारने पर नॉर्थ कोरिया के खिलाड़ियों को लाइव टीवी पर सजा दी गई थी। उन्हें भी खदानों में काम करने के लिए भेज दिया गया था।
रियो ओलंपिक से एक तस्वीर ऐसी भी आई थी जिसे देखकर कहा गया कि उत्तरी कोरिया का तानाशाह किम जोंग सजा-ए-मौत दे सकता है। दरअसल, इसमें उत्तर कोरिया की पहली महिला जिमनास्ट हॉन्ग यूं जूंग ने अपने विरोधी देश दक्षिण कोरिया की एक एथलीट के साथ सेल्फी ली थी। इस वजह से गुस्सा होकर किम जोंग उसे वतन वापसी पर मौत की सजा सुना सकता है।
न्यूज वेबसाइट फाइनेंशियल एक्सप्रेस की मानें तो किम जोंग अपेक्षाओं के मुताबिक मेडल नहीं जीत पाने की वजह से खिलाड़ियों की तमाम तरह की सुख-सुविधाओं को छीन सकता है। वहीं पदक जीतने वालों को सिर आंखों पर बैठाकर उन्हें ईनाम भी दिया जाएगा।
मीरा राजपूत अस्पताल में भर्ती, मिलने पहुंचे शाहिद के माता-पिता
शाहिद कपूर की पूरी फैमिली आजकल शाहिद की पत्नी मीरा राजपूत का पूरा ख्याल रख रही है. आखिर वो ऐसा करें भी क्यों ना. मीरा अगले महीने अपने बच्चे को जन्म जो देने वाली हैं.
हालांकि, मीरा अभी से ही अस्पताल में भर्ती हो गई हैं ताकि उन्हें पूरी तरह आराम मिल सके. शाहिद ने भी अच्छे पति का फर्ज निभाते हुए अपने काम से ब्रेक ले लिया है. लेकिन कुछ तस्वीरें देखकर हमें मीरा की चिंता हो रही है.
दरअसल, शाहिद की मां सुप्रिया पाठक और पिता पकंज कपूर की कुछ तस्वीरें सामने आई हैं, जिसमें वो बहुत जल्दी में हॉस्पिटल के अंदर जाते नजर आ रहे हैं. सुप्रिया के चेहरे पर टेंशन भी साफ नजर आ रही है. सुप्रिया कैमरे को देखकर भी नहीं रुकीं और लगातार अपने टैब में देखते हुए हॉस्पिटल के अंदर चलीं गईं.
बता दें कि मीरा की तबीयत आए दिन नासाज रहती है और वो इसके पहले भी खराब तबीयत के कारण अस्पताल में भर्ती हो चुकी हैं. हम तो यही चाहेंगे कि मीरा स्वस्थ हो और एक हेल्दी बच्चे को जन्म दें.
सलमान खान से डेटिंग पर यूलिया वंतूर का जवाब
रोमानियाई मॉडल और टीवी एक्ट्रेस यूलिया वंतूर ने आखिरकार सलमान खान से अपने रिश्ते को लेकर चुप्पी तोड़ दी है. उन्होंने कहा है कि सलमान खान उनका प्यार नहीं, बल्कि हम लोग सिर्फ दोस्त हैं.
यूलिया ने एक स्पाई मैगजीन को इंटरव्यू दिया है. इंटरव्यू के दौरान, जब यूलिया से पूछा गया कि क्या वह सलमान से प्यार करती हैं, तो जवाब में यूलिया ने कहा, ‘नहीं, हम लोग सिर्फ दोस्त हैं. दोस्त का मतलब सिर्फ दोस्त, प्यार नहीं.’
उन्होंने कहा, ‘सब कुछ अच्छे समय में होता है, न पहले और न बाद में. बाकी सारी अटकलें होती हैं’. बता दें, हाल ही में सलमान और यूलिया की डेटिंग की खबरें तेजी से फैली थी, जब इन दोनों को विभिन्न आयोजनों पर एक साथ देखा गया था, जिसमें सलमान की बहन अर्पिता खान के जन्मदिन की पार्टी और खान की ‘राखी’ समारोह मुख्य रूप से शामिल है.
हाल ही में जब सलमान ने तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा से लद्दाख में मुलाकात की थी, तो वहां भी यूलिया उनके साथ नजर आई थीं. गौरतलब है कि सलमान यहां पर अपनी आने वाली फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ की शूटिंग कर रहे हैं.
अजय के साथ ‘गोलमाल’ करेंगी श्रद्धा कपूर
बॉलीवुड फिल्मकार रोहित शेट्टी सिंघम स्टार अजय देवगन को लेकर फिल्म गोलमाल 4 बना रहे हैं.
फिल्म के लिये अजय के अपोजिट करीना कपूर का चयन किया गया था लेकिन उनके प्रेगनेंट होने के बाद अब रोहित, करीना की जगह अभिनेत्री की तलाश कर रहे हैं. चर्चा थी कि फिल्म में अजय के अपोजिट आलिया भट्ट काम कर सकती हैं लेकिन रोहित ने इसका खंडन किया है.
रोहित ने कहा हां मेरी बहुत इच्छा थी कि मैं आलिया को फिल्म से जोड़ूं और आलिया को भी बहुत मन था कि वह मेरे साथ इस फिल्म से जुड़ें लेकिन दिक्कत यह हुई कि उनके पास डेट्स नहीं हैं उन महीनों में. चर्चा है कि ‘गोलमाल 4’ में रोहित श्रद्धा कपूर को कास्ट करने का मन बना चुके हैं.
हालांकि रोहित फिलहाल इसका खुलासा नहीं करना चाहते. रोहित ने कहा कि सही वक़्त आने पर ही वह इसकी घोषणा करेंगे.
फिर साथ नजर आएगी सलमान और 'बजरंगी भाईजान' की मुन्नी की जोड़ी
‘बजरंगी भाईजान’ में मुन्नी का किरदार निभाकर हर्षाली मल्होत्रा ने अपनी क्यूटनेस और एक्टिंग से सबका दिल जीत लिया था. सलमान और मुन्नी की इस जोड़ी की काफी सराहना हुई थी. अब मुन्नी के फैंस के लिए एक गुड न्यूज है. मुन्नी और सलमान दोनों एक बार फिर साथ नजर आने वाले हैं.
लेकिन इस बार ये दोनों बड़े पर्दे पर नहीं बल्कि छोटे पर्दे पर नजर आएंगे. पिंकविला में छपी खबर के मुताबिक, ‘ये दोनों एक कूकी ब्रांड के ऐड में साथ दिखेंगे. इस ऐड में मेन फोकस सलमान पर रहेगा और हर्षाली अंत में कुछ देर के लिए आएंगी.’
रिपोर्ट्स की मानें तो ‘सेल्फी ले ले रे’ का पैरोडी इस ऐड के बैकड्रॉप में बजेगा. हर्षाली की मां ने बताया, ‘सलमान के साथ काम करना हमेशा से अच्छा रहा है. ‘बजरंगी भाईजान’ की शूटिंग की शुरुआत में हर्षाली, सलमान से शर्माती थी. शूटिंग खत्म होने के बाद ही वो सलमान के साथ कंफर्टेबल हुई. लेकिन इस ऐड की शूटिंग के शुरुआत से ही वो सलमान से घुल-मिल गई. दोनों ने एक-दूसरे से आधे घंटे बातचीत की.’
हर्षाली की मां ने आगे कहा, ‘हर्षाली ने सलमान से कहा कि मेरे फ्रैंड्स मुझसे रिक्वेस्ट करते हैं कि मैं उन्हें आपसे मिलवाऊं. हर्षाली, सलमान को अपने स्कूल के अनुभवों के बारे में बता रही थी और सलमान बड़े धैर्य से उसकी बातें सुन रहे थे.’ खबर है कि यह ऐड 10-12 दिनों में ऑन एयर हो जाएगा.







