इतालवी मरीन केस: सुप्रीम को’र्ट ने केंद्र सरकार की अर्ज़ी पर फ़ैसले से किया इन’कार

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इटली के मरीन के ज़रिए हुई दो मछुआरों की ह’त्या के मामले पर सुप्रीम को’र्ट द्वारा फिलहाल केंद्र सरकार के केस को बंद करने की अर्जी पर आदेश जारी करने से इनकार कर दिया गया। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) एस ए बोबडे द्वारा कहा गया कि, पी’डित परिवारों को सुने बिना कोई आदेश जारी नहीं करेंगे। सीजेआई द्वारा कहा गया कि, “पीड़ि’तों को पर्याप्त मुआवजा मिलना चाहिए। पी’ड़ित परिवार ट्रायल को’र्ट में भी पक्षकार हैं। उन्हें भी जवाब देने का मौका मिलना चाहिए।” सीजेआई(CJI) ने कहा कि, अदालत में मुआवजे के चेक और पीड़ि’त परिवारों को लेकर आएं, उनको पर्याप्त मुआवजा मिलेगा तो ही केस बंद करने की इजाजत होगी। वहीं इटली की ओर से पेश किए गए वकील से सुप्रीम को’र्ट ने कहा कि, उन्हें पर्याप्त मुआवजा देना होगा। इस पर वकील ने कहा- वाजिब मुआवजा दिया जाएगा। इस पर सीजेआई ने कहा- “वाजिब नहीं पर्याप्त मुआवजा।”

इसके साथ ही सुप्रीम को’र्ट द्वारा सॉलिसिटर जनरल मेहता को एक सप्ताह के भीतर पी’ड़ितों के परिवारों को केस में शामिल करने के लिए आवेदन दायर करने के लिए कहा गया है। सुप्रीम को’र्ट (supreme court) द्वारा कहा गया कि, केंद्र केस वापसी के लिए ट्रायल कोर्ट में एक आवेदन दायर करने के बजाय भारत में मामले को बंद करने के लिए सुप्रीम को’र्ट कैसे आ सकता हैं? पी’ड़ित परिवार सुप्रीम को’र्ट के समक्ष पक्षकार नहीं हैं। सीजेआई द्वारा केंद्र से पूछा गया कि, आपने अवार्ड को मान लिया है और उसको चुनौ’ती नहीं दी है? याचिकाकर्ता मरीन के वकील द्वारा शीर्ष अदालत को बताया गया कि, दो मछुआरों के परिवारों को भी 1 करोड़ और 50 लाख मुआवजे का भुगतान किया जा रहा है। सुप्रीम को’र्ट में केंद्र सरकार द्वारा अर्ज़ी दाखिल कर मामले की सुनवाई को बंद करने का अनु’रोध किया गया है।

अदालत से केंद्र सरकार द्वारा कहा गया कि, भारत ने यूएन कन्वेंशन ऑन लॉ ऑफ द् सी (UNCLOS) के फैसले को मानने का फैसला किया है, क्योंकि इसके बाद कोई अपील नहीं हो सकती और ये अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता नियमों के मुताबिक बाध्यकारी है। लिहाजा अदालत इस मामले में लंबित सुनवाई को बंद कर दे। 2017 में सुप्रीम को’र्ट द्वारा केंद्र सकरकर को UNCLOS के फैसले को रिकॉर्ड पर रखने को कहा था। केंद्र सरकार ने इस फैसले को दाखिल करते हुए कहा कि, अदालत को केस का निपटारा कर देना चाहिए।

सुप्रीम को’र्ट द्वारा ही दोनों मरीन को शर्तों के आधार पर इटली जाने की अनुमति दी थी। UNCLOS के ट्रायब्यूनल द्वारा कहा गया है कि, UNCLOS के नियमों के तहत भारतीय अधिकारियों की कार्यवाई सही था। इटालियन सैन्य अधिकारियों यानि इटली UNCLOS Article 87(1)(a) और 90 के मुताबिक भारत के नेविगेशन के अधिकार को रो’क रहा था। इस घ’टना की कार्रवाई का अधिकार भारत और इटली दोनों को ही था और का’नूनी अधिकार भी कि इटालियन नाविकों के खिला’फ आपराधिक मामला दर्ज करें। इटली के दोनों नाविकों को ट्रायब्यूनल द्वारा हिरासत में रखने के लिए भारत से मुआवज़े की मांग को खा’रिज कर दिया। लेकिन माना ये जा रहा है कि, इन नाविकों को देश के लिए काम करने के कारण भारतीय अदालतों की का’र्यवाई से इम्युनिटी थी। लेकिन भारत को जान माल के नु’कसान के लिए हर्जाना बनता है। ट्रायब्यूनल द्वारा कहा गया कि, भारत और इटली आपस में विचार कर हर्जाने की रकम तय कर सकते हैं।