भ्रष्टाचार ख़त्म करने के खोखले दावों से जेबें भरते नेता: किशन शर्मा

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कोई भी बडे से बडा नेता कितना भी चिल्ला चिल्ला कर घोषणा करता रहे कि भ्रष्टाचार को पनपने नहीं दिया जायेगा और उसका सम्पूर्ण विनाश कर दिया जायेगा, परंतु वास्तविकता कुछ अलग ही है । भ्रष्टाचार कहां से और किसके द्वारा प्रारम्भ होता है, यह शोध का विषय है । मैंने स्वयं अलग अलग स्तर पर अलग अलग स्थानों पर अलग अलग तरह से भ्रष्टाचार को पनपते हुए अनगिनत बार देखा है । कोई मंत्री, नेता, सांसद, विधायक, विभागीय सचिव, विभागीय अधिकारी, ज़िलाधिकारी, पुलिस अधिकारी या लेखा विभाग का अधिकारी या कर्मचारी किसी गांव या नगर में चला जाये, तो उसकी और उसके साथ आई भीड की खातिर करने की ज़िम्मेदारी ज्यादातर “पटवारी” को सौंप दी जाती है ।

वह उनके चाय-नाश्ते, भोजन, आदि सहित सभी प्रकार की ज़रूरतों को पूरा करता रहता है । उसे कोई यह भी नहीं पूछता कि इस प्रकार की व्यवस्था पर कितना खर्च हुआ । सब खा-पी कर चले जाते हैं । पटवारी कहां से इतना धन हर बार खर्च कर सकता है । ज़ाहिर है, वह उस प्रकार के सभी सम्भावित खर्चों और उसके साथ अपनी सुख-सुविधा के लिये अपने क्षेत्र के लोगों से धन उगाही करता रहता है । कोई भी काम हो, उसका उचित मूल्य लोग देते रहते हैं । इसे क्या नाम दिया जा सकता है ? देखा गया है कि, ज़मीन-जायदाद की रजिस्ट्री करवाने के लिये रजिस्ट्रार के किसी भी स्तर के कार्यलय में जाना हो, कई जगह चपरासी से लेकर अधिकारी तक सब लोग अपने अपने ड्रॉवर खोल कर रखते हैं ।

मुंह से अनेक लोग कुछ मांगते नहीं, लेकिन ड्रॉवर की तरफ़ इशारा कर देते हैं । कई कार्यालयों में चपरासी या क्लर्क स्वयं बताते रहते हैं कि किस को क्या देना है । जब तक धन का “भोग” नहीं लग जाता, कोई भी कारण बता कर काम रोक दिया जाता है और मनचाहा “भोग” प्राप्त होते ही कोई कागज़ की तरफ़ भी नहीं देखता और हस्ताक्षर हो जाते हैं । कई अदालतें भी इससे अछूती नहीं । कई पुलिस कर्मी तो किसी को पकडने या किसी को न पकडने के लिये, किसी भी मामले को किसी विशेष तरफ़ मोड देने के लिये “चाय-पानी” के नाम पर भरपूर धन ले लेते हैं ।

अस्पतालों में नामी डॉक्टर से लेकर सफ़ाई कर्मचारी तक सभी अपने लिये अलग से “कुछ” भारी रकम मांग लेते हैं अन्यथा मरीज़ को भगवान के भरोसे छोड दिया जाता है । ज्यादातर सरकारी कार्यालयों में और मंत्रालय में पत्र देने से लेकर पत्र लेने तक हर व्यक्ति को कुछ दक्षिणा देनी ही पडती है । स्कूल-कॉलेज में प्रवेश के लिये लाखों रुपये ले लिये जाते हैं, यह किसे मालूम नहीं है, फ़िर भी यह परम्परा नियमित रूप से चलती चली जा रही है । स्कूल की किताबें, ड्रैस और अन्य सामग्री स्कूल से या स्कूल द्वारा बताई गई दुकान से ही लेना अनिवार्य होता है । सम्बन्धित दुकान वाले स्कूल के व्यवस्थापकों और प्रधान आदि को पहले ही दक्षिणा पहुंचा देते हैं ।

यातायात पुलिस के कर्मी कोई कार्रवाई न करें, इसके लिये औटोरिक्षा वाले, बस वाले, ट्रक वाले आदि मुस्कुरा कर उनके हाथ या जेब में कुछ निश्चित राशि रख देते हैं और फ़िर अपनी मनमानी करते रहते हैं । कई आय कर वाले तो अपनी ऐसी ही अतिरिक्त “आय” से अपने “कर” हमेशा भरे रखते हैं । परिवहन विभाग में तो “मलाईदार” स्थान पर नियुक्ति के लिये “मलाई” से बडे बडे ड्रम भर भर कर पेश कर दिये जाते हैं । राजनीति में “मलाईदार” विभाग का बहुत अधिक महत्व होता है । आजतक कोई राजनेता यह स्पष्ट नहीं कर सका है कि इस “मलाईदार” शब्द का वास्तविक अर्थ क्या होता है । मैंने तो मुर्दाघरों में कार्यरत कर्मचारियों को भी मरे हुए लोगों के परिजनों से “चाय-पानी” की मांग करते हुए देखा है ।

श्मशान घाटों में जलती हुई चिता से आधी जली हुई लकडियों को वापस उठाकर दूसरे मुर्दे के लिये रख दिया जाता है । मृत्यु प्रमाणपत्र देने में भी “पत्र-पुष्प” चढाने पडते हैं । रेलगाडियों में अनेक यात्रियों को टी0सी0 के पीछे पीछे भागते हुए कभी भी देखा जा सकता है । उचित राशि मिलने पर “नो रूम” कहने वाले टी0सी0 ही मुस्कुरा कर जगह दे देते हैं । मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि पूरे देश में ऐसा कौन सा एक भी स्थल हो सकता है जहां बिना कुछ दिये, कोई भी कार्य किया या करवाया जा सकता हो । एक एक दिन में हज़ारों-लाखों रुपये इसी प्रकार कमाने वाले लोग, इसे “अन्याय” नहीं, बल्कि “अन्य आय” कहा करते हैं । हर सुख-सुविधा प्राप्त करने की होड लगी रहती है, सभी कर्मचारियों-अधिकारियों में ।

आज तक किसी ने किसी राजनेता या अधिकारी से यह पूछने की हिम्मत नहीं दिखाई है कि कम से कम समय में अधिक से अधिक सुख-सुविधाएं, बडे बडे अनेक वाहन, विशालकाय बंगले, और हर बच्चे-बडे के लिये वाहन और भरपूर जेबखर्च के लिये धन कहां से आ गया । इसे भ्रष्टाचार कहना वास्तव में भ्रष्टाचार का ही अपमान होगा, क्योंकि इसे कोई भ्रष्टाचार मानता ही नहीं है । यह तो “शिष्टाचार” बन गया है । प्रधान मंत्री सहित देश के सभी नेता, अधिकारी और नागरिक मुझे यह बतलाने की कृपा करें कि आखिर इस प्रकार तेज़ रफ़्तार से पनपते हुए भ्रष्टाचार को क्या कभी रोका जा सकेगा ?

(किशन शर्मा – 901, केदार, यशोधाम एन्क्लेव, प्रशांत नगर, नागपुर – 440015; मोबाइल – 8805001042)