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स्वातंत्र्योत्तर भारतीय विदेश नीति और विदेशों के साथ संबंध पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित त्रिनेत्र जोशी   

विदेश नीति आखिर क्या है? वह स्वदेशी नीतियों का ही अंतरराष्ट्रीय विस्तार है। जैसे देश के हालात होंगे, वैसे ही विदेश नीति के सरोकार भी होंगे। पिछले विदेश नीति सरोकार क्या रहे हैं, वह भी इसी से तय होगा कि हमारा अतीत कैसा रहा है। यह तो सर्वविदित ही है कि हमारा अतीत एक लंबे समय तक विदेशी ग़ुलामी का रहा है। इसलिए तत्कालीन विदेश नीति का तात्विक परिचालन भी वैसा ही होता रहा। चाहे वह मौर्य काल हो या गुप्त काल या फिर कोई और काल। देश के हालात ने विदेशों के प्रति संबंधों और सरोकार की आकृति तय की, पर यहां हम उन संबंधों पर अधिक विचार नहीं कर पायेंगे, क्योंकि हमारा ध्यान फिलहाल स्वातंत्र्योत्तर विदेश नीति और परराष्ट्रों के साथ हमारे तदनुसार संबंधों पर प्रमुख रूप से विचार करना है।

यह जगजाहिर है कि अंगरेज़ों की ग़ुलामी से हम १९४७ में मुक्त हुए। अंगरेज़ों की विदेश नीति ने तत्कालीन भारत के टुकड़े किये और आज़ादी या स्वशासन चलाने की जल्दबाजी में हमने न केवल उनके सुझावों को स्वीकार किया, बल्कि विभाजन और खूनखराबे की त्रासदी भी झेली और आज तक झेल रहे हैं। पंचशील के सिद्धांत हमारी विदेश नीति के आधारभूत सिद्धांत बने और १९५५ की बांडुंग कांफ्रेंस में इन सिद्धांतों को अन्य नव स्वतंत्र राष्ट्रों की शिरकत से एक सांगठनिक रूप मिला और तथ्यात्मक तौर पर कहा जाये, तो उसे निर्गुट या गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नाम दिया गया। हम सभी जानते हैं कि इस आंदोलन का क्या हश्र हुआ। अभी इन सिद्धांतों के प्रारूप की स्याही भी नहीं सूखी थी कि कई प्रकार के युद्ध और झड़पें आसपास के इलाकों में देखने को मिलीं। कारण कि हमने स्वतंत्र विदेश नीति का आगाज़ करने की कोशिश तो की, लेकिन पिछले औपनिवेशिक शासन की नीतियों की छाया उन पर पड़ी रही। नतीजा यह रहा कि हम आज तक उस पचड़े में फंसे हुए हैं और उससे निज़ात पाने के लिए हमें वार्ता और तलवार दोनों का सहारा लेना पड़ रहा है। कह सकते हैं कि हमने आज़ादी तो पा ली, लेकिन हमारी विदेश नीति औपनिवेशिक असरात का ही मुंह जोहती रही और अब भी वह उस घेरे में फंसी हुई है। न तो हम अंगरेज़ों के छोड़े गये इन विवादों से मुक्त हो पाये हैं और न ही उस विदेश नीति के कुपरिणामों से छुटकारा पा सके हैं, बल्कि इनसे निज़ात पाने के चक्कर में हम विदेशों की रणनीतिक दासता के ही शिकार हो चले हैं। उम्मीद थी कि हम अंगरेज़ परिचालित विभाजन को स्वीकार कर लेने के बाद कम से कम आसपास के देशों से एक शांतिपूर्ण दोस्ताना रिश्ता कायम कर पायेंगे, लेकिन हुआ ठीक उसका उल्टा है। भारत के आसपास आतंकवाद का ऐसा घेरा बन गया है कि बजाय दोस्ती को मज़बूत करने के हम उनसे लड़ने के लिए अपनी सैनिक परियोजनाओं में उलझ गये हैं और एक बहुत बड़ी रक़म जो हम अपने और आसपास के इलाकों के विकास के लिए जुटा सकते थे, वह विकास के बजाय सैनिक तैयारियों में जाया हो रही है और कोई भी विवाद सुलटने के बजाय और भी उलझता जा रहा है। पंचशील के सिद्धांतों की अब कोई बात करता नज़र नहीं आता। बेशक समझौतों में उनका जिक्र होता है, लेकिन व्यवहार में वे एक बाधा ही साबित हुए हैं।

और अब जो विदेश नीति और परराष्ट्र संंघों की इबारत है, वह भी देशी हितों के कम अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हितों की गिरफ्त में अधिक है। उन पर भी बाज़ारवाद या ग्लोबल विलेज का नशा तारी है। अमरीका के साथ हमारे संबंधों में इसके परिणाम हम देख सकते हैं। एक तरफ तो हम साम्राज्यवादियों को घेरने के लिए ठोस मोर्चा बनाने का शोर मचाते हैं और दूसरी ओर उनके रणनीतिक हितों के पहरेदार बन जाते हैं। तो विदेश नीति का यह दोगलापन अपनी कोई ठोस विदेश नीति होने का संकेत नहीं देता। नि:संदेह गुटनिरपेक्ष आंदोलन के दौर में इससे मुक्त होने की ललक दिखायी पड़ती थी और विभिन्न देशों में चल रहे मुक्ति संग्रामों या जद्दोजहद में शक्तिमान के विरोध में एक खास प्रकार का एका उभर रहा था। तीसरी दुनिया के देशों के साथ आपसी विवादों के मौजूद रहने के बावजूद भारत के रिश्ते न्याय और साम्राज्यवादी-उपनिवेशवादी नियत से निज़ात पाने की उम्मीद जगाते थे, लेकिन अब वह सरूर भी जाता रहा है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय शक्ति दबाव उनसे एक प्रकार का संघर्ष करने को प्रेरित करते रहते हैं। इसलिए अगर भारत सरकार दूसरी बात कहती है तो यह संशयग्रस्त विदेश नीति का एक और नमूना है। आज़ाद होने के बावजूद भारतीय विदेश नीति यह नहीं दिखा पायी है कि वह एक प्रकार की स्वतंत्र विदेश नीति है, बल्कि सच्चाई यह है कि वह उपनिवेशवादियों और साम्राज्यवादियों के छोड़े गये बवालों या विवादों से दो टूक लड़ने का कोई इरादा बांच तक नहीं पाती, उसे व्यवहार में लाने की तो बात ही क्या करें। इस विदेश नीति को हम चरैवेति-चरैवेति विदेश नीति कह सकते हैं। किसी आमूलचूल स्वतंत्र विदेश नीति से हम काफी दूर हैं और वह तब तक नहीं बन सकती, जब तक औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त नहीं हो जाते। आसपास के साथ और दूरस्थ के साथ हमारे संबंधों का भी ढांचा इसी मानसिकता पर निर्भर है।

स्वातंत्र्योत्तर विदेश नीति का ढांचा अब भी स्वतंत्रतापूर्व ढांचे की गिरफ्त में है। बेशक उससे छुटकारा पाने के प्रयास भी स्पष्ट हैं, लेकिन उनका अस्तित्व नक्कारखाने में तूती की आवाज़ की तरह है। फिर भी दबी आवाज़ में ही सही भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और विदेशों के प्रति उसके संबंधों में स्वतंत्रता के बीज हैं और वह है औपनिवेशिक मानसिकता से आज़ाद होना।
 


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