सांस्कृतिक पहचान के लिए लड़ेंगे आर-पार की लड़ाई

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  • मूल निवास और सशक्त भू-कानून के लिए आंदोलन की रणनीति पर चर्चा.

  • संयुक्त संघर्ष समिति बनाने पर बनी सहमति.

देहरादून। मूल निवास 1950, सशक्त भू-कानून और खत्म होती सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए विभिन्न संगठनों की एक बैठक देहरादून के शहीद स्मारक (कचहरी) में आयोजित की गई। बैठक में तय किया गया कि इस लड़ाई को लड़ने के लिये जल्द संयुक्त संघर्ष समिति का गठन किया जाएगा और आंदोलन की रूपरेखा तय की जाएगी।

बैठक में वक्ताओं ने विचार रखते हुए कहा कि आज हमारे सामने सांस्कृतिक पहचान का संकट खड़ा हो गया है। हमारे संसाधनों पर ताकतवर लोग कब्जा कर रहे हैं। मूल निवास न होने से स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं मिल पा रहा है। बाहरी माफिया प्रदेश के संसाधनों को लूट रहे हैं।

वक्ताओं ने यह भी कहा कि मूल निवास और सशक्त भू कानून के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ने का समय आ गया है। अपनी जमीन और स्वाभिमान बचाने के लिए सभी को एकजुट होकर लड़ाई लड़नी होगी।

वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत ने भी इस बात पर जोर दिया कि राज्य बनने के बाद भी प्रदेश की तस्वीर नहीं बदल पाई। इसके पीछे कहीं न कहीं सशक्त भू कानून और मूल निवास न होना है। उन्होंने आंदोलन को गति देने के लिए संयोजक मंडल बनाने का सुझाव दिया। बैठक में तय किया गया कि जल्द ही एक अन्य बैठक बुलाई जाएगी। जिसमें अग्रिम रणनीति पर चर्चा की जाएगी।

बैठक में उत्तराखंड आंदोलनकारी मंच, पहाड़ी स्वाभिमान सेना, महिला मंच, उत्तराखंड स्टूडेंट्स फेडरेशन, उत्तराखंड आन्दोलनकारी संयुक्त परिषद, उत्तराखंड चिन्हित आंदोलनकारी समिति, संयुक्त उत्तराखंड आन्दोलनकारी मंच सहित अन्य संगठन मौजूद थे।

बैठक में वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत, आन्दोलनकारी विशम्बर दत्त बौठियाल, अम्बुज शर्मा, निर्मला बिष्ट, लुशुन टोडरिया, पंकज उनियाल, प्रमोद काला, प्रशांत कांडपाल, देव चंद उत्तराखंडी, नवनीत गुसाईं, अम्बुज शर्मा, पंकज पोखरियाल, मीनाक्षी घिल्डियाल, आशीष कुकरेती, समीर सजवाण, मोहित डिमरी, सुशील गुरमानी, बालेश बवानिया, प्रभात डंडरियाल, जबर सिंह पावेल, गणेश डंगवाल सहित अन्य लोग मौजूद थे।