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विधायक बिशन सिंह चुफाल से पूछी 30 साल की उपलब्धियां, भाजपा कार्यकर्ता योगी कन्याल ने जमकर सुनाई खरी-खोटी

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पिथौरागढ़ : भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कार्यकर्ता योगी कन्याल ने विधायक बिशन सिंह चुफाल को उनकी 30 साल की राजनीतिक उपलब्धियों पर सवाल उठाकर चर्चा का केंद्र बना दिया। केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा की मौजूदगी में हुई इस तीखी नोकझोंक ने स्थानीय राजनीति में हलचल मचा दी।

योगी कन्याल ने विधायक से तीखे अंदाज में सवाल किया, “जहां आपकी गाड़ी खड़ी रहती है, वहां एक बड़ा गड्ढा बना हुआ है। अगर आपको वो नहीं दिखा, तो और क्या नजर आएगा?” उन्होंने आगे कहा, “मैं 2017 से आपके साथ हूं। आपने इन सालों में क्या किया? उस वक्त जो वादे किए थे, आज भी वही बातें दोहरा रहे हैं।”

कन्याल के इस सवाल ने न केवल विधायक की उपलब्धियों पर सवाल खड़े किए, बल्कि क्षेत्र में विकास कार्यों की गति पर भी चर्चा को जन्म दिया। इस घटना ने स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं के बीच नेताओं की जवाबदेही को लेकर बहस छेड़ दी है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की खुली बहस से नेताओं पर जनता की समस्याओं को गंभीरता से लेने का दबाव बढ़ेगा। हालांकि, इस मामले में विधायक की ओर से कोई आधिकारिक बयान अभी तक नहीं आया है।

उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बयान के बाद चर्चाओं में ‘अर्बन नक्सल’, चेतावनी भी दी

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देहरादून: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य में ‘शहरी नक्सल गिरोहों’ को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि ये गिरोह जिहादी मानसिकता को बढ़ावा देकर जनकल्याणकारी योजनाओं को बाधित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह बयान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 14 अक्टूबर को देहरादून दिया। इस दौरान उन्होंने युवाओं के भविष्य की रक्षा का वादा भी किया।

सीएम धामी ने कहा, “हमारी सरकार युवाओं के भविष्य की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्प के साथ काम कर रही है। मैं उन शहरी नक्सल गिरोहों को चेतावनी देता हूं जो राज्य में जिहादी मानसिकता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं और हमारी सरकार के जनकल्याणकारी फैसलों के खिलाफ साजिश रच रहे हैं।

उत्तराखंड में इनकी मंशा कामयाब नहीं होने दी जाएगी। यह बयान हाल ही में हरिद्वार में परीक्षा पेपर लीक की घटना के संदर्भ में आया है, जहां सरकार ने त्वरित कार्रवाई की थी। इससे पहले, सीएम ने ‘नकल जिहाद’ का जिक्र करते हुए नकल माफियाओं को कुचलने की बात कही थी

विपक्ष ने इस बयान की आलोचना की है और इसे असहमति को दबाने का बहाना बताया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि ‘अर्बन नक्सल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। हालांकि, भाजपा समर्थक इसे राज्य की सुरक्षा और स्थिरता से जोड़कर देखते हैं।

‘अर्बन नक्सल’ क्या है?

‘अर्बन नक्सल’ एक विवादास्पद शब्द है, जो मुख्य रूप से भारत के राजनीतिक संदर्भ में इस्तेमाल होता है। यह उन शहरी बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, वकीलों, प्रोफेसरों या एनजीओ सदस्यों को संदर्भित करता है, जिन्हें नक्सली (माओवादी या वामपंथी उग्रवादी) विचारधारा का अप्रत्यक्ष समर्थक माना जाता है। इन पर आरोप लगता है कि ये लोग ग्रामीण नक्सलियों को प्रचार, कानूनी सहायता या वैचारिक समर्थन देकर राज्य विरोधी गतिविधियों में मदद करते हैं।

यह शब्द फिल्ममेकर विवेक अग्निहोत्री के 2017 के स्वराज्य मैगजीन लेख से लोकप्रिय हुआ, जहां इसे ‘भारत के अदृश्य दुश्मन’ कहा गया। उनकी 2018 की किताब Urban Naxals: The Making of Buddha in a Traffic Jam और 2016 की फिल्म Buddha in a Traffic Jam ने इसे मुख्यधारा में लाया। 2018 के बाद, भाजपा और दक्षिणपंथी समूहों ने इसे अपनाया। महाराष्ट्र के एलगार परिषद मामले में कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज और वरवर राव जैसे लोगों को ‘अर्बन नक्सल’ कहा गया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने जांच की। इतिहासकार रोमिला थापर ने इसे अस्पष्ट और सामाजिक न्याय के लिए काम करने वालों को बदनाम करने का माध्यम बताया।

2024 में महाराष्ट्र सरकार ने ‘महाराष्ट्र स्पेशल पब्लिक सेफ्टी बिल’ पेश किया, जो ऐसे तत्वों को लक्षित करता है। आलोचक इसे राजनीतिक हथियार मानते हैं, जो मानवाधिकार, पर्यावरण आंदोलनों या असहमति को दबाने के लिए इस्तेमाल होता है। भारत में नक्सलवाद UAPA (अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट) के तहत प्रतिबंधित है, लेकिन ‘अर्बन नक्सल’ की कोई स्पष्ट कानूनी परिभाषा नहीं है।

उत्तराखंड में यह मुद्दा लैंड जिहाद, नकल जिहाद विरोध प्रदर्शनों और हालिया घटनाओं से जुड़कर चर्चा में है। सरकार का दावा है कि ये तत्व राज्य को अस्थिर करने की साजिश रच रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक दबाव का हिस्सा बताता है।

उत्तरकाशी : यमुनोत्री हाईवे पर रोडवेज बस की स्कूल वाहन से भिड़ंत, 14 बच्चे घायल

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उत्तरकाशी : उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर दोबाटा के पास मंगलवार को एक दर्दनाक हादसा हो गया। एक रोडवेज बस ने स्कूली बच्चों से भरे वाहन को पीछे से जोरदार टक्कर मार दी, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई। इस हादसे में स्कूल वाहन में सवार 14 बच्चों और रोडवेज बस में सवार दो व्यक्तियों को चोटें आईं। सभी घायलों को तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बड़कोट में भर्ती कराया गया, जहां उनका उपचार चल रहा है।

प्रत्यक्षदर्शी और स्थानीय होटल व्यवसायी गुरुदेव सिंह रावत ने बताया कि घटना उस समय हुई जब स्कूल बस दोबाटा के पास बच्चों को बैठा रही थी। तभी यमुनोत्री जानकीचट्टी से देहरादून-दिल्ली जा रही रोडवेज बस अनियंत्रित होकर स्कूल वाहन से टकरा गई। स्कूल बस में कुल 30 बच्चे सवार थे, जिनमें से 14 को हल्की-फुल्की चोटें आईं। रोडवेज बस में सवार दो यात्री भी सामान्य रूप से घायल हुए हैं।

हादसे की सूचना मिलते ही 108 आपातकालीन सेवा और पुलिस टीमें तुरंत मौके पर पहुंचीं। घायलों को तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बड़कोट ले जाया गया। अस्पताल के डॉ. अंगद सिंह राणा ने बताया कि दो-तीन बच्चों को अपेक्षाकृत गंभीर चोटें आई हैं, जबकि बाकी बच्चों की स्थिति सामान्य है। सभी का प्राथमिक उपचार किया जा रहा है और गंभीर रूप से घायल बच्चों की स्थिति पर नजर रखी जा रही है।

पुलिस ने प्रारंभिक जांच में रोडवेज बस चालक की लापरवाही को हादसे का कारण बताया है। थाना प्रभारी ने कहा, “मामले की जांच की जा रही है और दोषी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।” स्थानीय लोगों ने रोडवेज बसों की तेज रफ्तार और लापरवाही पर सवाल उठाए हैं, साथ ही हाईवे पर सुरक्षा उपायों को और सख्त करने की मांग की है। जिला प्रशासन ने घायल बच्चों और अन्य प्रभावितों के लिए हर संभव सहायता का आश्वासन दिया है। यह हादसा स्कूल वाहनों की सुरक्षा और सड़क परिवहन के नियमों की अनदेखी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

घर में भीषण विस्फोट, 12 से अधिक घायल, आतिशबाजी के अवैध कारोबार पर सवाल

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सुल्तानपुर : उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के जयसिंहपुर इलाके में बुधवार तड़के एक घर में हुए जोरदार विस्फोट ने पूरे क्षेत्र में दहशत फैला दी। कोतवाली से महज 500 मीटर दूर मियागंज बाजार के बगियागांव चौराहे पर नजीर के घर में सुबह करीब 4:40 बजे हुए इस धमाके में 12 से अधिक लोग घायल हो गए। विस्फोट इतना भयंकर था कि नजीर के घर की छत उड़ गई और पड़ोसी मकानों को भी भारी नुकसान पहुंचा।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, धमाके की तेज आवाज से लोग नींद से जागकर घरों से बाहर निकल आए। नजीर के घर से बार-बार छोटे-छोटे धमाकों की आवाजें आती रहीं, जिससे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। सूचना मिलते ही पुलिस और दमकल विभाग मौके पर पहुंचा। 108 और 102 की चार एम्बुलेंस ने घायलों को तुरंत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जयसिंहपुर पहुंचाया, जहां सभी का इलाज चल रहा है। कुछ गंभीर रूप से घायल मरीजों को जिला अस्पताल रेफर किया गया है।

नजीर के बेटे यासीन ने बताया कि घायलों में उनके पिता नजीर (65), मां जमातुल निशा (62), भाई नूर मोहम्मद (25), सुहैल (17), सदा (12), खुशी (15), सहाना (20), और पड़ोसी अब्दुल हमीद के परिवार के फैजान (8), कैफ (22) सहित अन्य लोग शामिल हैं। धमाके की तीव्रता से नजीर का घर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, और पड़ोसी अब्दुल हमीद के मकान की दीवारें भी दरक गईं।

पुलिस की प्रारंभिक जांच में सामने आया कि नजीर पहले शादी-ब्याह में आतिशबाजी (गोला बनाने) का काम करता था, लेकिन उसका लाइसेंस पहले ही निरस्त हो चुका था। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नजीर के घर में अवैध रूप से आतिशबाजी का सामान रखा हुआ था, जिसके कारण यह हादसा हुआ। पुलिस ने बताया कि विस्फोट की वजह का पता लगाने के लिए फॉरेंसिक टीम और बम निरोधक दस्ते की मदद ली जा रही है।

जयसिंहपुर के थाना प्रभारी ने कहा, “घटना की जांच शुरू कर दी गई है। प्रथम दृष्टया यह आतिशबाजी के सामान से जुड़ा मामला प्रतीत होता है। दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।” जिला प्रशासन ने घायलों के इलाज के लिए हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया है।

जैसलमेर बस हादसा : चलती बस में भीषण आग से 20 यात्रियों की मौत

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जैसलमेर : राजस्थान के जैसलमेर जिले में मंगलवार दोपहर एक दिल दहला देने वाले सड़क हादसे ने पूरे राज्य को स्तब्ध कर दिया। जैसलमेर-जोधपुर हाईवे पर थैयत गांव के पास दोपहर करीब 3:30 बजे एक एसी स्लीपर बस में अचानक भीषण आग लग गई, जिसमें एक ही परिवार समेत 20 यात्रियों की जिंदा जलने से दर्दनाक मौत हो गई। घटना के समय बस में लगभग 57 यात्री सवार थे, जिनमें से 16 गंभीर रूप से झुलसकर जोधपुर के अस्पतालों में भर्ती हैं। हादसे की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई शव बस की चपेट में चिपक गए, जबकि कुछ इतने जल गए कि उनकी पहचान भी मुश्किल हो गई। मृतकों के 19 शवों को पोस्टमॉर्टम के लिए जोधपुर भेजा गया है, जहां कलेक्टर प्रताप सिंह के निर्देश पर परिजनों के डीएनए सैंपल लिए जा रहे हैं।

हादसे का शिकार हुई केके ट्रैवल्स की यह बस मात्र 1 अक्टूबर 2025 को पंजीकृत हुई थी और 9 अक्टूबर को ही ऑल इंडिया परमिट प्राप्त कर चुकी थी। चौथे फेरे पर ही यह बस आग का गोला बन गई, जो सुरक्षा मानकों पर कई सवाल खड़े करता है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बस मॉडिफाइड थी, लेकिन इसमें इमरजेंसी एग्जिट गेट या विंडो तोड़ने के लिए हथौड़े जैसी कोई सुविधा नहीं थी। इसी लापरवाही के चलते यात्री बाहर नहीं निकल पाए और आग की चपेट में फंसकर भयानक यातनाओं में प्राण त्याग बैठे। कुछ शव एक-दूसरे से चिपके हुए मिले, जो दृश्य देखकर रोंगटे खड़े कर देने वाला था।

एम्बुलेंस की खस्ता हालत ने बढ़ाई परिजनों की चिंता

हादसे के बाद घायलों को ग्रीन कॉरिडोर बनाकर जोधपुर पहुंचाया गया, लेकिन परिवहन व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे हैं। घायल यात्रियों के परिजनों ने एम्बुलेंस की बदतर स्थिति पर नाराजगी जताई। एक घायल यात्री मगन के परिजन ने बताया, “सेना, प्रशासन और पुलिस ने भरपूर सहयोग किया, हर चप्पे पर फोर्स तैनात थी, लेकिन एम्बुलेंस की हालत देखकर निराशा हुई।

घायल कंडक्टर रफीक के भाई ने खुलासा किया कि मरीज को एम्बुलेंस में लादने के बाद पहले डीजल भरवाया गया, फिर ओटीपी आने का इंतजार किया। इसके बावजूद एम्बुलेंस की रफ्तार धीमी रही और उसमें लाइट तक नहीं थी। उन्होंने अपनी निजी कार की टेललाइट से एम्बुलेंस को रास्ता दिखाया, ताकि मरीज सुरक्षित पहुंच सकें। परिजनों ने मांग की है कि एम्बुलेंस सेवाओं की गुणवत्ता में तत्काल सुधार हो, वरना भविष्य में ऐसी लापरवाही किसी की जान ले सकती है। इस 275 किलोमीटर लंबे ग्रीन कॉरिडोर के दौरान एक बुजुर्ग यात्री की रास्ते में ही मौत हो गई।

आग लगने की वजह पर सस्पेंस

हादसे के कारणों को लेकर अब तक स्पष्टता नहीं आई है। प्रारंभिक जांच में शॉर्ट सर्किट या एसी के कम्प्रेशर फटने को जिम्मेदार ठहराया गया, लेकिन स्थानीय लोगों का दावा है कि बस की डिक्की में पटाखे रखे थे, जिसके विस्फोट से आग भड़क गई। पुलिस और फॉरेंसिक टीम जांच में जुटी है। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि बस के पिछले हिस्से से धुआं निकलते ही चालक ने वाहन रोका, लेकिन आग इतनी तेज थी कि कुछ ही मिनटों में पूरी बस लपटों में घिर गई। आसपास के ग्रामीणों और राहगीरों ने पानी और रेत से आग बुझाने की कोशिश की, लेकिन फायर ब्रिगेड पहुंचने तक बस जलकर खाक हो चुकी थी।

हादसे में घायल एक युवक आशीष दवे अपनी मंगेतर के साथ जैसलमेर प्री-वेडिंग शूट के लिए गए थे। उनकी शादी 11 नवंबर को तय थी। बस के आगे की सीट पर बैठे होने के कारण वे समय रहते बाहर निकल पाए, लेकिन आशीष की आंखों की रोशनी बुरी तरह प्रभावित हो गई। मंगेतर ने बताया, “हम खुशियों के पल बिताने जा रहे थे, लेकिन यह हादसा सब कुछ बदल गया।”

पीएम मोदी ने की मुआवजे की घोषणा

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने बुधवार सुबह जैसलमेर पहुंचकर जली हुई बस का जायजा लिया और घायलों से मुलाकात की। उन्होंने ट्वीट कर संवेदना व्यक्त की और अधिकारियों को त्वरित राहत के निर्देश दिए। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी हादसे पर शोक जताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “जैसलमेर हादसे से मन व्यथित है।” उन्होंने प्रधानमंत्री राहत कोष से मृतकों के परिजनों को 2 लाख रुपये और घायलों को 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता की घोषणा की। राज्य सरकार ने भी मृतकों के परिवारों को 5 लाख रुपये की सहायता देने का ऐलान किया है।

यह हादसा न केवल सड़क सुरक्षा पर सवाल खड़े करता है, बल्कि सार्वजनिक परिवहन और आपातकालीन सेवाओं की तैयारियों पर भी गंभीर चिंता जताता है। अधिकारियों ने जांच पूरी होने तक बस ऑपरेटर के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया है।

जमीन घोटाले में जिला पंचायत अध्यक्ष, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष के पुत्र समेत सात के खिलाफ मुकदमा

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हल्द्वानी: भूमि विनियमितीकरण में धोखाधड़ी और लाखों रुपये के राजस्व नुकसान के नौ साल पुराने मामले में जिला पंचायत अध्यक्ष दीपा दरम्वाल, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष के पुत्र हरेंद्र कुंजवाल समेत सात लोगों के खिलाफ काठगोदाम थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है। आईजी कुमाऊं के निर्देश पर दर्ज इस मामले में बसंतपुर किशनपुर निवासी रविशंकर जोशी ने शिकायत की है।

 

शिकायत के अनुसार, गौलापार के ग्राम देवला तल्ला पजाया में 53 बीघा जमीन को 2016 में बलवंत सिंह के नाम वर्ग-एक ख से वर्ग-एक क में परिवर्तित किया गया। इस प्रक्रिया में राजनैतिक रसूख वाले भूमाफियाओं और राजस्व अधिकारियों ने मिलकर फर्जी शपथ-पत्र प्रस्तुत किए और तथ्यों को छिपाया। बलवंत सिंह ने नजराना राशि जमा करने का झूठा शपथ-पत्र दिया, जिसे अधिकारियों ने स्वीकार कर लिया। बाद में डीएम कार्यालय के निर्देश पर जमा राशि के साक्ष्य मांगे गए, लेकिन कोई सबूत नहीं दिया गया।

 

आरोप है कि बलवंत सिंह के पास गौलापार के जगतपुर में कई हेक्टेयर वर्ग-एक क कृषि भूमि पहले से दर्ज थी, फिर भी फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सीलिंग सीमा (12.5 एकड़) से अधिक जमीन का विनियमितीकरण कर लिया गया। 10 मार्च 2016 को बलवंत ने 3.107 हेक्टेयर जमीन कमलुवागांजा गौड़ निवासी रविकांत फुलारा को दान कर दी, जबकि उनके दो पुत्र जीवित थे। रविकांत ने इस दाननामे के लिए 19 लाख रुपये स्टांप शुल्क जमा किया।

 

इसके बाद 9 मई 2016 को यह जमीन दीपा दरम्वाल, हरेंद्र कुंजवाल, उद्योगपति की पत्नी मीनाक्षी अग्रवाल, अरविंद सिंह मेहरा, अजय कुमार गुप्ता, चेतन गुप्ता और अनीता गुप्ता को बेच दी गई। आरोप है कि इन लोगों ने राजस्व अधिकारियों के साथ मिलकर बेशकीमती सरकारी जमीन को गलत तरीके से बलवंत के नाम दर्ज करवाया।

 

चार साल पहले उजागर हुआ था मामला

 

रविशंकर जोशी ने 2021 में इस घोटाले को उजागर किया था। मामला लैंड फ्रॉड कमेटी के समक्ष भी उठा, जिसके बाद मुकदमा दर्ज हुआ। शिकायतकर्ता का दावा है कि इस खरीद-फरोख्त में करोड़ों रुपये का काला धन खपाया गया। रविकांत फुलारा को धमकाकर बैनामा करवाया गया और 3.25 करोड़ रुपये वापस ले लिए गए, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई।

2024 में तत्कालीन जिलाधिकारी धीराज गर्ब्याल ने 7.68 एकड़ विवादित जमीन को सरकारी स्वामित्व में लेने और कब्जा लेने के निर्देश दिए थे, लेकिन एसडीएम ने इन आदेशों का पालन नहीं किया। कार्रवाई में देरी से भूमाफियाओं और प्रभावशाली नेताओं की प्रशासन पर पकड़ का अंदाजा लगता है। पुलिस जांच की निष्पक्षता और प्रभावशीलता सरकार की मंशा पर निर्भर करेगी।

जमीन घोटाले में जिला पंचायत अध्यक्ष, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष के पुत्र समेत सात के खिलाफ मुकदमा

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हल्द्वानी: भूमि विनियमितीकरण में धोखाधड़ी और लाखों रुपये के राजस्व नुकसान के नौ साल पुराने मामले में जिला पंचायत अध्यक्ष दीपा दरम्वाल, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष के पुत्र हरेंद्र कुंजवाल समेत सात लोगों के खिलाफ काठगोदाम थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है। आईजी कुमाऊं के निर्देश पर दर्ज इस मामले में बसंतपुर किशनपुर निवासी रविशंकर जोशी ने शिकायत की है।

शिकायत के अनुसार, गौलापार के ग्राम देवला तल्ला पजाया में 53 बीघा जमीन को 2016 में बलवंत सिंह के नाम वर्ग-एक ख से वर्ग-एक क में परिवर्तित किया गया। इस प्रक्रिया में राजनैतिक रसूख वाले भूमाफियाओं और राजस्व अधिकारियों ने मिलकर फर्जी शपथ-पत्र प्रस्तुत किए और तथ्यों को छिपाया। बलवंत सिंह ने नजराना राशि जमा करने का झूठा शपथ-पत्र दिया, जिसे अधिकारियों ने स्वीकार कर लिया। बाद में डीएम कार्यालय के निर्देश पर जमा राशि के साक्ष्य मांगे गए, लेकिन कोई सबूत नहीं दिया गया।

आरोप है कि बलवंत सिंह के पास गौलापार के जगतपुर में कई हेक्टेयर वर्ग-एक क कृषि भूमि पहले से दर्ज थी, फिर भी फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सीलिंग सीमा (12.5 एकड़) से अधिक जमीन का विनियमितीकरण कर लिया गया। 10 मार्च 2016 को बलवंत ने 3.107 हेक्टेयर जमीन कमलुवागांजा गौड़ निवासी रविकांत फुलारा को दान कर दी, जबकि उनके दो पुत्र जीवित थे। रविकांत ने इस दाननामे के लिए 19 लाख रुपये स्टांप शुल्क जमा किया।

इसके बाद 9 मई 2016 को यह जमीन दीपा दरम्वाल, हरेंद्र कुंजवाल, उद्योगपति की पत्नी मीनाक्षी अग्रवाल, अरविंद सिंह मेहरा, अजय कुमार गुप्ता, चेतन गुप्ता और अनीता गुप्ता को बेच दी गई। आरोप है कि इन लोगों ने राजस्व अधिकारियों के साथ मिलकर बेशकीमती सरकारी जमीन को गलत तरीके से बलवंत के नाम दर्ज करवाया।

चार साल पहले उजागर हुआ था मामला

रविशंकर जोशी ने 2021 में इस घोटाले को उजागर किया था। मामला लैंड फ्रॉड कमेटी के समक्ष भी उठा, जिसके बाद मुकदमा दर्ज हुआ। शिकायतकर्ता का दावा है कि इस खरीद-फरोख्त में करोड़ों रुपये का काला धन खपाया गया। रविकांत फुलारा को धमकाकर बैनामा करवाया गया और 3.25 करोड़ रुपये वापस ले लिए गए, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई।

2024 में तत्कालीन जिलाधिकारी धीराज गर्ब्याल ने 7.68 एकड़ विवादित जमीन को सरकारी स्वामित्व में लेने और कब्जा लेने के निर्देश दिए थे, लेकिन एसडीएम ने इन आदेशों का पालन नहीं किया। कार्रवाई में देरी से भूमाफियाओं और प्रभावशाली नेताओं की प्रशासन पर पकड़ का अंदाजा लगता है। पुलिस जांच की निष्पक्षता और प्रभावशीलता सरकार की मंशा पर निर्भर करेगी।

उत्तराखंड कैबिनेट बैठक में 8 महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित, यहां पढ़ें पूरी खबर

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देहरादून: उत्तराखंड कैबिनेट की बैठक सोमवार को समाप्त हुई, जिसमें 8 अहम प्रस्तावों पर मुहर लगाई गई। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य, शिक्षा और विधानसभा से संबंधित कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए।

महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा:

बाल विकास विभाग के तहत मिनी आंगनबाड़ी केंद्रों को पूर्ण आंगनबाड़ी केंद्रों में परिवर्तित करने के लिए केंद्र सरकार ने सहमति प्रदान की है। साथ ही, सुपरवाइजर नियमावली में संशोधन किया गया है, जिसके तहत अब 50% सुपरवाइजर पद आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से ही भरे जाएंगे। इससे आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को करियर में उन्नति के नए अवसर मिलेंगे।

रायपुर विधानसभा क्षेत्र में राहत:

रायपुर में प्रस्तावित विधानसभा भवन के लिए फ्री जोन में छूट दी गई है। अब इस क्षेत्र में मकान और छोटी दुकानें बनाने की अनुमति प्रदान की गई है, जिससे स्थानीय लोगों को लाभ होगा।

चिकित्सा शिक्षा में सुधार:

चिकित्सा शिक्षा विभाग के अंतर्गत स्वास्थ्य कार्यकर्ता और स्वास्थ्य पर्यवेक्षक नियमावली में संशोधन किया गया। इस संशोधन के तहत स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को एक बार तबादले में विशेष छूट दी गई है, जिससे उनके कार्यस्थल में लचीलापन आएगा।

UCC नियमावली में आंशिक बदलाव:

यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) नियमावली में आंशिक संशोधन को मंजूरी दी गई। अब नेपाली और भूटानी नागरिकों के लिए शादी के बाद UCC पोर्टल पर पंजीकरण आधार कार्ड या विदेशी पंजीकरण के आधार पर भी हो सकेगा। यह कदम विदेशी नागरिकों के लिए पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बनाएगा।

राज्य स्थापना दिवस के लिए विशेष सत्र:

उत्तराखंड के राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित होने वाले विधानसभा सत्र की तिथि तय करने का अधिकार मुख्यमंत्री को सौंपा गया है। यह सत्र राज्य के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा का मंच प्रदान करेगा।

भारत में मोबाइल नंबर 10 अंकों के ही क्यों? जानें इसके पीछे का गणित और इतिहास

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नई दिल्ली: हम रोजाना अपने मोबाइल फोन से नंबर डायल करते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि भारत में मोबाइल नंबर हमेशा 10 अंकों का ही क्यों होता है? अगर इसमें एक अंक कम या ज्यादा हो जाए, तो नंबर अवैध हो जाता है। आखिर 8, 9 या 11 अंकों के नंबर क्यों नहीं? आइए, इसके पीछे के गणित और इतिहास को समझते हैं।

10 अंकों का गणित

मोबाइल नंबर की लंबाई किसी भी देश की आबादी और जरूरतों के आधार पर तय की जाती है। 10 अंकों के नंबर सिस्टम में कुल 10 अरब नंबर संभव हैं। यह संख्या भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए पर्याप्त है। अगर नंबर 9 अंकों का होता, तो केवल 100 करोड़ नंबर उपलब्ध होते, जो भारत की जरूरतों के लिए कम पड़ जाते। वहीं, 11 अंकों के नंबर से 100 अरब संभावनाएं बनतीं, जो जरूरत से ज्यादा होतीं और डायल करने में समय भी अधिक लगता। इसलिए, 10 अंकों का सिस्टम भारत के लिए सबसे उपयुक्त माना गया।

10 अंकों का मतलब

मोबाइल नंबर केवल एक पहचान नहीं, बल्कि एक ‘पता’ भी है, जो टेलीकॉम नेटवर्क को कॉल को सही दिशा में भेजने में मदद करता है। भारत में मोबाइल नंबर की संरचना इस प्रकार है:

पहले 4 या 5 अंक: ये ‘कंवर्टर कोड’ होते हैं, जो मोबाइल नेटवर्क ऑपरेटर (जैसे Jio, Airtel) और टेलीकॉम सर्कल (जैसे दिल्ली, मुंबई) की पहचान करते हैं।

बाकी 5 या 6 अंक: ये ग्राहक का यूनिक नंबर होता है, जो हर व्यक्ति के लिए अलग होता है।

क्या हमेशा से 10 अंक थे?

1990 के दशक तक भारत में टेलीफोन नंबर 6 या 7 अंकों के हुआ करते थे। लेकिन 2000 के दशक में मोबाइल क्रांति और बढ़ती जनसंख्या के कारण ग्राहकों की संख्या तेजी से बढ़ी। पुराने सिस्टम में नए ग्राहकों के लिए पर्याप्त नंबर उपलब्ध नहीं थे। इस चुनौती से निपटने के लिए भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने नई योजना बनाई और 2003 के आसपास पूरे देश में 10 अंकों के मोबाइल नंबर लागू किए गए।

10 अंकों का मोबाइल नंबर सिस्टम भारत की विशाल आबादी और टेलीकॉम जरूरतों के लिए एकदम सही है। यह न केवल पर्याप्त नंबर प्रदान करता है, बल्कि नेटवर्क को कॉल रूट करने में भी मदद करता है। अगली बार जब आप कोई नंबर डायल करें, तो याद रखें कि इसके पीछे एक सोचा-समझा गणित और सिस्टम काम कर रहा है!

दर्दनाक हादसा: पूर्व ABVP छात्र संघ अध्यक्ष जितेंद्र सिंह बिष्ट की मौत, तेज रफ्तार कार ने मारी टक्कर

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देहरादून : देहरादून के शिमला बाइपास रोड पर सेंट ज्यूड्स स्कूल के पास एक दुखद हादसे में डीएवी कॉलेज के पूर्व ABVP छात्र संघ अध्यक्ष जितेंद्र सिंह बिष्ट की मौत हो गई। एक तेज रफ्तार कार ने उन्हें टक्कर मार दी, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। उनके साथी ऋतिक को भी गंभीर चोटें आईं, जिन्हें उपचार के लिए क्लेमेनटाउन के वेलमेड अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पुलिस ने वर्कशॉप मालिक वसीम को हिरासत में लिया है और मामले की जांच शुरू कर दी है।

शनिवार रात सेंट ज्यूड्स चौक के निकट यह दर्दनाक हादसा हुआ। जितेंद्र सिंह बिष्ट, जो केशव विहार, चंद्रबनी के निवासी थे, का श्री गणेश प्रॉपर्टी के नाम से ऑफिस इसी क्षेत्र में है। उस दिन उनके दोस्त वासू कसाना का जन्मदिन था। जन्मदिन समारोह के लिए जितेंद्र, ऋतिक, ओमी सजवाण और वैभव रावत उनके ऑफिस में एकत्र हुए थे। रात करीब 8 बजे केक काटने के बाद सभी दोस्त ऑफिस का शटर बंद कर घर जाने की तैयारी कर रहे थे।

इसी दौरान, सेंट ज्यूड्स चौक की ओर से ट्रांसपोर्ट नगर की दिशा में आ रही एक तेज रफ्तार निसान माइक्रा कार ने जितेंद्र और ऋतिक को जोरदार टक्कर मार दी। हादसे में जितेंद्र कार के नीचे आ गए, जबकि ऋतिक को भी गंभीर चोटें आईं। अन्य दोस्त ओमी और वैभव बाल-बाल बच गए। टक्कर के बाद कार चालक और उसका साथी मौके से फरार हो गए।

सूचना मिलते ही पटेलनगर कोतवाली पुलिस मौके पर पहुंची और कुछ दूरी पर कार को बरामद कर लिया। हालांकि, कार में सवार दोनों आरोपियों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। पुलिस ने वर्कशॉप मालिक वसीम को हिरासत में लिया था।

प्रत्यक्षदर्शी वैभव ने तुरंत गंभीर रूप से घायल जितेंद्र को अपनी कार से श्री महंत इंदिरेश अस्पताल पहुंचाया। अस्पताल ले जाते समय जितेंद्र की सांसें चल रही थीं, लेकिन आपातकालीन कक्ष में पहुंचते ही उनकी मौत हो गई। वहीं, घायल ऋतिक को दूसरी गाड़ी से वेलमेड अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका इलाज चल रहा है।

पुलिस हादसे के कारणों और फरार आरोपियों की तलाश में जुटी है। स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिए जा रहे हैं। इस दुखद घटना ने जितेंद्र के परिवार, दोस्तों और ABVP से जुड़े लोगों में शोक की लहर पैदा कर दी है।