गलत परम्पराएं

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किशन शर्मा

फ़ेसबुक, व्हाट्सएप आदि सभी प्रकार के संदेश प्रसारित करने वाले साधनों का आजकल अलग अलग ढंग से उपयोग होने लगा है । मैं तो व्हाट्सएप आदि उपयोग में नहीं लाता हूं, परंतु फ़ेसबुक पर लोगों के संदेश अवश्य देखता और पढता रहता हूं । फ़ेसबुक पर पहले ऐसा नहीं होता था, परंतु आजकल बहुत अधिक लोग इसका गलत उपयोग करने लग गये हैं । मैं इसे दुरुपयोग तो नहीं कह सकता, लेकिन गलत उपयोग अवश्य कह सकता हूं । अभी जब भारत के वायु सैनिकों ने सीमा पार बम गिराये, तो मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि कुछ लोगों ने अलग अलग तीन महिला वायु सैनिकों के चित्र फ़ेसबुक पर प्रसारित कर दिये और प्रत्येक के लिये यह लिख दिया कि “ यह है भारत की वो जांबाज़ महिला लडाकू विमान पायलेट, जिसने पाकिस्तान में बम बारी की ” ।

सरकार ने या वायुसेना ने तो अभी तक किसी भी पायलेट के नाम का उल्लेख नहीं किया है, लेकिन कुछ लोगों ने उन तीन महिला वायुसैनिकों के बिना कारण चित्र छाप कर उनको खतरे में डाल दिया । यह गलत उपयोग ही है, सूचना साधनों का । आजकल एक और गलत परम्परा बहुत अधिक चल पडी है, जिसमें अनेक लोग प्रधान मंत्री के पक्ष में या विरोध में कुछ भी अशोभनीय शब्द लिखने लगे हैं । मेरे विचार से यह नहीं किया जाना चाहिये । किसी भी कार्य, वक्तव्य, या निर्णय का समर्थन या विरोध करने का अधिकार हर नागरिक को अवश्य है, परंतु उसकी अभिव्यक्ति में निम्नस्तरीय शब्दों का प्रयोग किया जाना गलत है । केवल प्रधान मंत्री ही नहीं, बल्कि उनके विरोधियों के लिये भी निम्नस्तरीय शब्दों का प्रयोग अनुचित और अस्वीकार्य माना जाना चाहिये ।

मेरा तो मत यह है कि ऐसे लोगों के विरुद्ध कडी कार्रवाई की जानी चाहिये ताकि अन्य लोग कभी भी ऐसा करने से डरें । विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह कभी भी नहीं होना चाहिये कि निम्नस्तरीय और अशोभनीय शब्दों के प्रयोग की अनुमति दे दी जाए । “फ़ेंकू”, “पप्पू” जैसे शब्दों का प्रयोग करके सम्बन्धित व्यक्ति अपने ही निम्नस्तर को प्रदर्शित करता है । कम से कम मैं ऐसी परम्परा के विरोध में हूं । एक अन्य गलत परम्परा फ़ेसबुक पर शुरू कर दी गई है । कोई भी व्यक्ति अपने आप को गायक के रूप में प्रस्तुत करने के लिये, अपनी आवाज़ में कोई गीत रिकौर्ड और शूट करके प्रसारित कर देता है ।

अनगिनत बेसुरे और बेताले महिला-पुरुषों के ऐसे “पोस्ट” फ़ेसबुक पर हरदिन डाल दिये जाते हैं । मुझे सबसे अधिक दुखद आश्चर्य यह देखकर होता है कि कुछ लोग उनके “पोस्ट” पर “बहुत सुन्दर”, “लाजवाब”, “अद्वितीय”, “कमाल कर दिया” जैसी प्रतिक्रियाएं लिख देते हैं । कुछ लोग तो मंच संचालन के अंश भी फ़ेसबुक पर पोस्ट कर देते हैं । वे ऐसा क्यों करते हैं, यह मैं तो नहीं जानता । मेरे काल में ऐसी कोई सुविधा भी नहीं थी और ऐसा करने की कोई इच्छा भी नहीं होती थी, क्योंकि जो कुछ कहा, गाया, पढा जा रहा होता है, उसका विशेष महत्व उस मंच पर ही होता है और वहां उपस्थित श्रोता ही उस पर अपनी प्रतिक्रिया देते रहते हैं । बाद में न तो उसका महत्व रह जाता है और न संदर्भ ही रह जाता है । हास्य कलाकार अगर अपनी किसी प्रस्तुति को फ़ेसबुक पर डालता रहे तो उसे वास्तव में बाद में कोई सुनना नहीं चाहेगा, क्योंकि अगर चुटकुला या गुदगुदाने वाली बात एक बार सुन ली जाये तो शायद ही कोई व्यक्ति दूसरी बार उसे सुनना और उसपर हंसना पसंद करेगा ।

आजकल हर दिन कुछ लोग कविता के नाम पर कुछ भी लिखकर फ़ेसबुक पर प्रस्तुत कर देते हैं । हर रचना कविता नहीं कही जा सकती और हर कविता की प्रशंसा भी नहीं की जा सकती । फ़िर भी ऐसा लगातार होने लगा है । फ़ेसबुक या ऐसे ही दूसरे साधन शायद ऐसी परम्पराओं के लिये नहीं बने हैं । इसके द्वारा साहित्यिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विचारों का आदान-प्रदान किया जाना चाहिये, ऐसा मैं मानता हूं । इस बारे में सभी लोग स्वयं विचार करें और कुछ नियम बनायें तथा उनका पालन भी करें तभी फ़ेसबुक जैसे “सोशिअल मीडिया” का उचित उपयोग किया जा सकेगा । मेरा तो स्पष्ट मत है कि देश के, समाज के, और अपने हित में यही उचित है कि तुरंत रोका जाये ऐसी गलत परम्पराओं को ।

किशन शर्मा, 901, केदार, यशोधाम एन्क्लेव,
प्रशांत नगर, नागपुर – 440015; मोबाइल – 8805001042