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बागी सांसदों को संजय राउत की चेतावनी, कहा- पहले इस्तीफा दें फिर जाएं

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मुंबई। शिवसेना (यूबीटी) में संभावित टूट और सांसदों की बगावत की अटकलों के बीच पार्टी नेता संजय राउत ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने पार्टी छोड़कर एकनाथ शिंदे गुट में जाने की चर्चाओं के बीच सांसदों को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि यदि किसी को पार्टी छोड़नी है तो पहले अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए।

बुधवार को आयोजित प्रेस वार्ता में संजय राउत ने कहा कि जिन सांसदों को उद्धव ठाकरे ने टिकट देकर चुनाव लड़ाया और हर स्तर पर सहयोग किया, यदि वही अब पार्टी छोड़ने का फैसला करते हैं तो उन्हें पहले सांसद पद से इस्तीफा देना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे कदमों को महाराष्ट्र की जनता स्वीकार नहीं करेगी।

राउत ने कहा, “इन सांसदों को उद्धव ठाकरे ने मौका दिया, चुनाव लड़ने के लिए संसाधन उपलब्ध कराए और हर तरह से उनका साथ दिया। इसके बावजूद यदि वे बगावती रास्ता अपनाते हैं तो जनता उन्हें जवाब देगी।”

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के संपर्क में हैं। हालांकि संबंधित सांसदों की ओर से अब तक इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

उधर, पार्टी के भीतर जारी राजनीतिक घटनाक्रम पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में शिवसेना (यूबीटी) की रणनीति और सांसदों की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

विशेष रिपोर्ट: सौहार्द की ‘देवभूमि’ में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की दस्तक, पुरोला से बैरागीवाला तक की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता

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विशेष रिपोर्ट: देहरादून । उत्तराखंड को लंबे समय तक देश के उन गिने-चुने राज्यों में शुमार किया जाता रहा है, जहां की आबोहवा में सांप्रदायिक सौहार्द बेहद मजबूत और अटूट रहा। शांत पहाड़ी संस्कृति, सीमित जनसंख्या, गहरी धार्मिक आस्था और आपसी मेलजोल ने यहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच कभी बड़े टकराव की स्थिति पैदा नहीं होने दी। सामाजिक सद्भाव की मिसाल ऐसी थी कि चार धामों के साथ-साथ रुड़की स्थित पिरान कलियर शरीफ को ‘पांचवें धाम’ के रूप में सम्मान दिया जाने लगा।

लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अचानक तेजी से उभरे घटनाक्रमों ने सरकार, खुफिया एजेंसियों, राजनीतिक दलों और सामाजिक चिंतकों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। हरिद्वार धर्म संसद से लेकर पुरोला विवाद, हल्द्वानी की बनभूलपुरा हिंसा और हाल ही में देहरादून के बैरागीवाला में हुआ उपद्रव इस बात का स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि देवभूमि की पारंपरिक सामाजिक संरचना में बदलाव आ रहा है और अब स्थानीय या छोटे विवाद भी बेहद तेजी से सांप्रदायिक रंग अख्तियार कर रहे हैं।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बहस के केंद्र में आई घटनाएं

उत्तराखंड की शांत वादियों में सामाजिक ध्रुवीकरण की शुरुआत और उसके बाद बढ़े तनाव की कहानी को इन चार प्रमुख घटनाक्रमों के जरिए समझा जा सकता है:

1. हरिद्वार धर्म संसद (दिसंबर 2021)

दिसंबर 2021 में धर्मनगरी हरिद्वार में आयोजित ‘धर्म संसद’ ने उत्तराखंड को अचानक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया था। इस आयोजन में कुछ वक्ताओं द्वारा एक विशेष समुदाय को लेकर दिए गए विवादित बयानों के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिसके बाद देशव्यापी बहस छिड़ गई। मानवाधिकार समूहों ने इसे सौहार्द के लिए बड़ा खतरा बताया। हालांकि, इस दौरान कोई प्रत्यक्ष हिंसा नहीं हुई, लेकिन इस घटना ने राज्य में सांप्रदायिक मुद्दों पर सार्वजनिक और राजनीतिक बयानबाजी को पहले की तुलना में कहीं अधिक आक्रामक बना दिया।

2. पुरोला विवाद (मई 2023)

उत्तरकाशी जिले के पुरोला कस्बे में एक नाबालिग लड़की को कथित रूप से बहला-फुसलाकर ले जाने के मामले ने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों का माहौल पूरी तरह बदल दिया। शुरुआत में यह एक सामान्य आपराधिक मामला था, लेकिन स्थानीय संगठनों ने इसे ‘लव जिहाद’ से जोड़कर बड़ा आंदोलन शुरू कर दिया।

  • असर: बाजार हफ्तों बंद रहे, बाहरी व्यापारियों (विशेषकर एक समुदाय के लोगों) को क्षेत्र छोड़ने की चेतावनी देने वाले पोस्टर दुकानों पर चस्पा किए गए।

  • प्रशासनिक कदम: हालात बेकाबू होते देख प्रशासन को धारा 144 लगानी पड़ी और भारी पुलिस बल की तैनाती कर प्रस्तावित महापंचायत को रोकना पड़ा। इस विवाद की तपिश श्रीनगर, कीर्तिनगर, चौरास और टिहरी तक महसूस की गई, जिससे पहाड़ों में सदियों पुराना आपसी अविश्वास गहरा गया।

3. हल्द्वानी बनभूलपुरा हिंसा (फरवरी 2024)

8 फरवरी 2024 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा में जो कुछ हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। नगर निगम और प्रशासनिक अमला जब रेलवे/सरकारी भूमि से कथित अवैध मदरसा और नमाज स्थल हटाने पहुंचा, तो स्थानीय आबादी ने उग्र विरोध शुरू कर दिया। देखते ही देखते पूरा इलाका युद्ध मैदान में तब्दील हो गया।

  • नुकसान: पुलिस बल पर भारी पथराव हुआ, पेट्रोल बम फेंके गए, पुलिस चौकी समेत दर्जनों सरकारी वाहनों को फूंक दिया गया। इस हिंसा में कई लोगों की जान गई और सैकड़ों पुलिसकर्मी घायल हुए।

  • कार्रवाई: क्षेत्र में हफ्तों तक कर्फ्यू लगाना पड़ा, इंटरनेट बंद रहा और अर्धसैनिक बलों ने मोर्चा संभाला। उत्तराखंड के इतिहास में यह सबसे भीषण सांप्रदायिक कानून-व्यवस्था का संकट था, जिसमें आज भी कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारियों का दौर जारी है।

4. बैरागीवाला विवाद: सिंचाई के पानी से शुरू हुआ खूनी संघर्ष

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सबसे ताजा और चिंताजनक उदाहरण देहरादून के सहसपुर स्थित बैरागीवाला गांव में देखने को मिला। यहाँ एक खेत में सिंचाई के पानी को लेकर दो पक्षों में शुरू हुआ मामूली विवाद देखते ही देखते दो समुदायों के बीच खूनी संघर्ष में बदल गया। इस हिंसक झड़प में भाजपा कार्यकर्ता विनोद की हत्या कर दी गई और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बाद इलाके में मकानों में आगजनी और पुलिस पर पथराव की घटनाएं हुईं। सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों को रोकने के लिए पुलिस को विशेष साइबर मॉनिटरिंग करनी पड़ी और पूरे पछवादून क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा।

बदलते हालात पर मुख्यमंत्री धामी की दोटूक चेतावनी

इन लगातार होते घटनाक्रमों को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि देवभूमि की जनसांख्यिकी (Demography) को बिगाड़ने और यहां के शांत माहौल में जहर घोलने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सीएम धामी ने सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने वाले उपद्रवियों और कानून हाथ में लेने वाले तत्वों को सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) और सख्त धाराओं के तहत कार्रवाई की जा रही है।

सामाजिक ताने-बाने को बचाने की चुनौती

इन घटनाओं का गहरा विश्लेषण करने वाले समाजशास्त्रियों का मानना है कि उत्तराखंड के दूरदराज के इलाकों में बाहरी आबादी का बढ़ता दखल, स्थानीय युवाओं में रोजगार का अभाव और सोशल मीडिया पर परोसी जा रही नफरत इस ध्रुवीकरण को हवा दे रही है। शासन और पुलिस के स्तर पर सख्त कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन देवभूमि के इस बदलते मिजाज को थामने और पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अब प्रशासनिक कार्रवाई से आगे बढ़कर दोनों समुदायों के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक संगठनों को मिलकर संवाद की मेज पर आना होगा।

उत्तराखंड में ST प्रमाण पत्रों की जांच की मांग, राज्य गठन के बाद बने सभी प्रमाण पत्रों की हो समीक्षा

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देहरादून। उत्तराखंड में अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाण पत्रों के जारी होने और उनके आधार पर प्राप्त सरकारी लाभों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने राज्य गठन के बाद जारी सभी एसटी प्रमाण पत्रों की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग उठाई है।

विकेश सिंह नेगी ने मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन को पत्र भेजकर कहा है कि 28 नवंबर 2000 को राज्य गठन के बाद अब तक जारी किए गए सभी अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्रों की निष्पक्ष और व्यापक जांच कराई जानी चाहिए। उनका कहना है कि यदि किसी भी प्रमाण पत्र को संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के विपरीत जारी किया गया है, तो उसके आधार पर प्राप्त सरकारी नौकरियों, पदोन्नतियों, छात्रवृत्तियों, मुआवजों, भूमि आवंटन तथा अन्य आरक्षण संबंधी लाभों की भी समीक्षा की जानी चाहिए।

नेगी ने अपने पत्र में भारतीय संविधान के अनुच्छेद-342 का उल्लेख करते हुए कहा है कि अनुसूचित जनजातियों की सूची निर्धारित करने का अधिकार केवल राष्ट्रपति को प्राप्त है, जबकि उसमें किसी भी प्रकार का संशोधन या नई जाति को शामिल करने का अधिकार संसद के पास सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकरण को इस सूची में बदलाव करने का अधिकार नहीं है।

उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम मिलिंद (2000) मामले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत ने स्पष्ट किया था कि अनुसूचित जनजाति सूची को उसी स्वरूप में स्वीकार किया जाएगा, जैसा राष्ट्रपति की अधिसूचना में उल्लेखित है। किसी जाति, उपजाति अथवा स्थानीय पहचान को तब तक अनुसूचित जनजाति नहीं माना जा सकता, जब तक उसका स्पष्ट उल्लेख अधिसूचित सूची में न हो।

विकेश नेगी का आरोप है कि देहरादून जनपद के विकासनगर, कालसी, त्यूनी, चकराता सहित अन्य क्षेत्रों में वर्षों से एसटी प्रमाण पत्रों के जारी होने को लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई है। उनका कहना है कि यह मामला केवल देहरादून तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य के सभी 13 जनपदों में जारी एसटी प्रमाण पत्रों की प्रक्रिया की समीक्षा की जानी चाहिए।

उन्होंने दावा किया कि कई मामलों में राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित सूची से इतर नामों अथवा उपजातियों के आधार पर भी प्रमाण पत्र जारी किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। यदि जांच में ऐसे मामले सही पाए जाते हैं, तो यह संवैधानिक व्यवस्था और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के विपरीत माना जाएगा।

नेगी ने सर्वोच्च न्यायालय की सात न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह (2024) फैसले का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया है कि राज्य सरकारें सामाजिक न्याय के उद्देश्य से उप-वर्गीकरण कर सकती हैं, लेकिन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की मूल सूची में नई जाति जोड़ने अथवा नाम परिवर्तन करने का अधिकार केवल संसद के पास है।

उन्होंने बताया कि इस विषय पर केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय से भी पत्राचार किया गया था। मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जनजातियों से संबंधित विषय संविधान के अनुच्छेद-342 के अंतर्गत आता है और इस संबंध में अंतिम निर्णय संसद के माध्यम से ही संभव है।

मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में नेगी ने मांग की है कि वर्ष 2000 के बाद जारी सभी विवादित एसटी प्रमाण पत्रों की जांच कराई जाए तथा जो प्रमाण पत्र संवैधानिक और कानूनी मानकों के अनुरूप नहीं पाए जाते हैं, उन्हें निरस्त किया जाए। साथ ही उनके आधार पर प्राप्त सरकारी लाभों की विधिक समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

उन्होंने यह भी मांग उठाई कि यदि जांच में किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके विरुद्ध विभागीय, दंडात्मक एवं आपराधिक कार्रवाई की जाए। इसके अलावा सभी विभागों, विश्वविद्यालयों, आयोगों, निगमों, शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, पंचायत और स्थानीय निकायों से ऐसे लाभार्थियों का विवरण सार्वजनिक किया जाए, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बन सके।

विकेश सिंह नेगी ने कहा कि यह विषय लाखों युवाओं के भविष्य और वास्तविक जनजातीय समुदायों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार इस मामले में समयबद्ध और प्रभावी कार्रवाई नहीं करती है, तो इस मुद्दे को न्यायालय तथा राष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया जाएगा।

उत्तराखंड में बड़ा हादसा: बंजी जंपिंग के बाद युवक की बिगड़ी तबीयत, मौत

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देहरादून : उत्तराखंड के पौड़ी जिले से एक बेहद दुखद और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। श्रीनगर स्थित प्रसिद्ध मां धारी देवी के दर्शन कर अपने परिजनों के साथ देहरादून लौट रहे एक 21 वर्षीय युवक की बंजी जंपिंग (Bungee Jumping) करने के कुछ ही देर बाद संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। रोमांचक खेल के तुरंत बाद युवक को पेट और सीने में असहनीय दर्द के साथ सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी। अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों ने प्राथमिक तौर पर मौत की वजह सिंकोप अटैक (Syncope Attack) या कार्डियक स्ट्रोक होने की आशंका जताई है।

धारी देवी के दर्शन कर लौट रहा था परिवार

मिली जानकारी के अनुसार, देहरादून के शांति विहार (कालागढ़) निवासी संजीव रस्तोगी का 21 वर्षीय पुत्र लक्ष्य रस्तोगी अपने परिवार के साथ धारी देवी मंदिर में दर्शन करने गया था। दर्शन कर वापस लौटते समय मूल्यगांव के पास स्थित एक एडवेंचर स्पोर्ट्स पॉइंट पर अलकनंदा नदी के ऊपर हो रही बंजी जंपिंग को देख लक्ष्य ने भी इसे करने की इच्छा जताई। परिजनों की सहमति मिलने के बाद वह बंजी जंपिंग के लिए चला गया।

जंपिंग के तुरंत बाद बिगड़ी तबीयत

परिजनों के मुताबिक, अलकनंदा नदी के ऊपर बंजी जंपिंग का रोमांच पूरा कर जब लक्ष्य वापस ऊपर आया, तो उसने अचानक पेट और सीने में तेज दर्द की शिकायत की। उसे सांस लेने में भी भारी दिक्कत होने लगी। बेटे की तबीयत बिगड़ती देख घबराए परिजनों ने तुरंत पास में ही स्थित ‘रामकुंड लॉज’ में एक कमरा किराए पर लिया ताकि लक्ष्य थोड़ा आराम कर सके। लेकिन कुछ ही देर में दर्द इतना असहनीय हो गया कि लक्ष्य कमरे में ही बेहोश हो गया। परिजनों ने बिना समय गंवाए रात करीब नौ बजे उसे आनन-फानन में पास के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) बागी (पाली) पहुंचाया।

डॉक्टरों ने दिया CPR, लेकिन नहीं बची जान

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ. आकाश दीप ने बताया कि “रात करीब नौ बजे जब परिजन युवक को अस्पताल लेकर आए, तो डॉक्टरों की टीम ने तुरंत उसका आपातकालीन परीक्षण किया। शुरुआती जांच में ही युवक की पल्स (नब्ज) गायब थी और दिल काम नहीं कर रहा था।” डॉक्टरों ने युवक को पुनर्जीवित करने का प्रयास करते हुए तुरंत सीपीआर (CPR) भी दिया, लेकिन उसके शरीर में कोई हरकत नहीं हुई और डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

क्या होता है सिंकोप अटैक, जिससे गई जान?

अस्पताल के डॉ. अमर दीप ने परिजनों से मिली जानकारी और लक्षणों के आधार पर बताया कि बंजी जंपिंग के दौरान अत्यधिक रोमांच, डर या अचानक बढ़े एड्रेनालाईन रश (Adrenaline Rush) के कारण युवक का ब्लड प्रेशर अचानक क्रैश हो गया होगा। चिकित्सकों के अनुसार, अचानक बेहोश होना या दिल की धड़कन रुक जाना ‘सिंकोप अटैक’ या ‘कार्डियक स्ट्रोक’ का संकेत है। बंजी जंपिंग के तुरंत बाद पेट-सीने में दर्द और सांस की तकलीफ इसी ओर इशारा करती है। बहरहाल, मौत के सटीक कारणों का पता लगाने के लिए शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। इस दर्दनाक घटना के बाद से मृतक के परिवार में कोहराम मचा हुआ है, और एडवेंचर स्पोर्ट्स के मानकों व सुरक्षा जांच पर भी सवाल उठने लगे हैं।

महाराष्ट्र में फिर बड़ा सियासी भूचाल: शिवसेना (UBT) में बड़ी बगावत की आहट, शिंदे गुट के संपर्क में 7 सांसद!

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मुंबई/नई दिल्ली : हाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल आने के संकेत मिल रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस (TMC) में मची रार के बीच अब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) पर टूटने का खतरा मंडरा रहा है। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के कुल 9 लोकसभा सांसदों में से 6 से 7 सांसद पाला बदलकर सत्ताधारी शिवसेना (शिंदे गुट) में शामिल होने के इच्छुक हैं और उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में डेरा डाल दिया है। इस बीच, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के भी मंगलवार देर रात अचानक दिल्ली रवाना होने से इन अटकलों को और हवा मिल गई है। दूसरी ओर, इस संकट पर प्रतिक्रिया देते हुए उद्धव ठाकरे ने कड़ा रुख अपनाया है और कहा है कि “जो पार्टी छोड़कर जाना चाहते हैं, वे खुशी-खुशी जा सकते हैं।”

‘आदित्य ठाकरे का बढ़ता कद’ बनी बगावत की वजह!

शिंदे खेमे के एक वरिष्ठ नेता ने दावा किया है कि 6 से 7 सांसद पाला बदलने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। इस असंतोष की मुख्य वजह पार्टी के भीतर आदित्य ठाकरे की भूमिका और उनका कद बढ़ाया जाना है। सूत्रों के मुताबिक, आगामी 19 जून को अविभाजित शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस पर पार्टी आदित्य ठाकरे को लेकर एक बड़ी घोषणा करने वाली थी। नाराज सांसदों को संगठन में आदित्य का और अधिक वरिष्ठ होना स्वीकार्य नहीं है।

संजय राउत का सनसनीखेज आरोप

पार्टी में संभावित टूट को रोकने के लिए शिवसेना (UBT) के रणनीतिकार और सांसद संजय राउत अचानक दिल्ली पहुंच गए हैं। मंगलवार देर रात उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक बेहद सनसनीखेज पोस्ट कर राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी। राउत ने लिखा कि “अपना सपना मनी… मनी। ऐसी सूचना है कि महाराष्ट्र के सांसदों को खरीदने के लिए आज रात 15 करोड़ का एडवांस दिया जाएगा। यह चौंकाने वाला और घृणित है।” हालांकि, बुधवार को मीडिया से बात करते हुए राउत ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश भी की और कहा कि बाजार में गलत तस्वीर पेश की जा रही है, सभी सांसद उद्धव जी के साथ मजबूती से खड़े हैं।

अध्यक्ष ओम बिरला के द्वार पहुंचे अरविंद सावंत

इस संभावित टूट को कानूनी रूप से विफल करने के लिए शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ सांसद अरविंद सावंत ने देर रात लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक आधिकारिक पत्र भेजा है।

पत्र के मुख्य बिंदु:

  • लोकसभा में शिवसेना (उबाठा) अपने विधिवत अधिकृत नेता और मुख्य सचेतक (व्हिप) के माध्यम से प्रतिनिधित्व करने वाली एकमात्र मान्यता प्राप्त पार्टी है।

  • यदि कोई अलग हुआ समूह या कथित गुट पार्टी पर दावा ठोकता है, तो उसे कोई अलग मान्यता, दर्जा या विशेषाधिकार न दिया जाए।

  • ऐसा कोई भी फैसला लेने से पहले लोकसभा अध्यक्ष मूल पार्टी (UBT) को अपना पक्ष रखने का अवसर दें।

  • पार्टी दल-बदल विरोधी कानून (संविधान की दसवीं अनुसूची) के तहत उपलब्ध सभी कानूनी और संवैधानिक उपायों का सहारा लेने का अधिकार सुरक्षित रखती है।

बैठक से गायब रहे थे 5 सांसद

इस बगावत की पटकथा रविवार को ही लिख गई थी, जब उद्धव ठाकरे द्वारा बुलाई गई एक महत्वपूर्ण बैठक में 9 में से केवल 4 सांसद (अरविंद सावंत, अनिल देसाई, राजाभाऊ वाजे और संजय पाटिल) ही व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए थे। हालांकि, तब दावा किया गया था कि बाकी 5 सांसदों ने ऑनलाइन या फोन के जरिए शिरकत की थी।

अब स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उद्धव गुट ने बुधवार को दिल्ली में अपने संसदीय दल की एक आपात बैठक बुलाई है। नाराज और संपर्क से बाहर चल रहे सांसदों के फोन अचानक बंद आ रहे हैं, जिन्हें मनाने और उनसे तालमेल बिठाने की कमान खुद उद्धव ठाकरे और उनके शीर्ष नेताओं ने संभाल ली है।

सत्तारूढ़ खेमे ने दिए स्वागत के संकेत

सत्तारूढ़ शिवसेना के नेता प्रताप सरनाईक ने भी इस मामले पर बयान देकर आग में घी डालने का काम किया है। उन्होंने संकेत दिया है कि यदि उद्धव गुट के असंतुष्ट सांसद उनके साथ आना चाहते हैं, तो उनका स्वागत किया जाएगा और उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। ‘ऑपरेशन टाइगर’ के दावों के बीच अब देखना यह होगा कि क्या उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी को दोबारा बिखरने से बचा पाते हैं या महाराष्ट्र में 2022 का इतिहास एक बार फिर दोहराया जाएगा।

अयोध्या राम मंदिर चंदा घोटाला: दानपात्रों से ‘करोड़ों के गबन’ की जांच के लिए SIT गठित, शीर्ष अधिकारियों पर भी आंच!

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अयोध्या/लखनऊ : अयोध्या के भव्य राम मंदिर परिसर में श्रद्धा के चढ़ावे के साथ हुए एक कथित महाघोटाले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। मंदिर के दानपात्रों से कथित रूप से करोड़ों रुपये की नकदी, सोने-चांदी के आभूषण, यहां तक कि दान में मिली ‘दो किलो की सोने की गदा’ और बहुमूल्य चरण-पादुका गायब होने का गंभीर मामला सामने आया है। इस चंदा चोरी के उजागर होने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए विशेष जांच दल (SIT) का गठन कर दिया है, जिसने अयोध्या पहुंचकर 2021 से लेकर अब तक का पूरा वित्तीय रिकॉर्ड खंगालना शुरू कर दिया है।

सवा साल तक चलता रहा ‘चोरी का खेल’

शुरुआती जांच और सूत्रों के मुताबिक, दान की राशि में गबन का यह खेल पिछले करीब सवा साल से बेरोकटोक चल रहा था। हद तो तब हो गई जब पिछले साल प्रयागराज महाकुंभ और इस साल माघ मेले के दौरान अयोध्या में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा। इस दौरान चढ़ावे में भारी बढ़ोतरी हुई, जिसका फायदा उठाकर चंदा गिनने वाले कर्मचारियों ने एक-एक दिन में 10 से 15 लाख रुपये तक पार किए।

पकड़े जाने के डर से आरोपियों ने आखिरी के कुछ महीनों में सबसे बड़ी रकम साफ की। सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इस गबन की राशि 200 करोड़ रुपये तक होने की चर्चा है, हालांकि आधिकारिक तौर पर अभी 8 करोड़ से अधिक के हेरफेर के सीधे संकेत मिले हैं।

कैसे अंजाम दिया गया इतना बड़ा गबन? (मोडस ऑपेरंडी)

जांच में सामने आया है कि यह गबन किसी एक व्यक्ति की कारस्तानी नहीं, बल्कि सुरक्षा और ऑडिट तंत्र की विफलता का फायदा उठाकर किया गया एक सुनियोजित खेल था:

  • ‘टिन्नू’ का नेटवर्क और भाई-भतीजावाद: मंदिर में चंदे की गिनती का जिम्मा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की एक आउटसोर्सिंग कंपनी के पास था। आरोप है कि ट्रस्ट के एक बड़े पदाधिकारी के करीबी ‘टिन्नू’ नाम के व्यक्ति ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर करीब 35 से 40 रिश्तेदारों और परिचितों को इस काम में रखवा दिया।

  • गिनती से पहले ही रकम पार: दानपात्रों को खोलने के बाद पूरी रकम पहले एक जगह इकट्ठा की जाती थी। कुल राशि का कोई शुरुआती रिकॉर्ड न होने के कारण, कर्मचारी गिनती के दौरान ही बड़ी रकम गायब कर देते थे और अंत में बचे हुए पैसों का ही विवरण दर्ज किया जाता था।

  • बिना तलाशी और वेरिफिकेशन के आवाजाही: ट्रस्ट के ‘अपने लोग’ होने के कारण इन कर्मचारियों का न तो कोई पुलिस वेरिफिकेशन हुआ था और न ही परिसर में आते-जाते समय इनकी कोई तलाशी ली जाती थी।

  • कम वेतन, बड़ी जिम्मेदारी: महज 12 से 18 हजार रुपये के मासिक वेतन पर काम करने वाले ये कर्मचारी दिन-रात लंबी ड्यूटी करते थे, क्योंकि उनका असल मुनाफा वेतन नहीं, बल्कि चढ़ावे की चोरी थी।

  • CCTV की लाइव मॉनिटरिंग फेल: परिसर में सीसीटीवी कैमरे तो लगे थे, लेकिन उनकी रियल-टाइम (तुरंत) मॉनिटरिंग न होने की वजह से चोरों के हौसले बुलंद रहे।

अखिलेश यादव के ट्वीट के बाद मचा हड़कंप

इस पूरे मामले को शुरुआत में ट्रस्ट द्वारा बेहद गोपनीय तरीके से दबाए रखने की कोशिश की जा रही थी। लेकिन इस विवाद ने तब राजनीतिक और सार्वजनिक तूल पकड़ा, जब समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया (X) पर पोस्ट कर करोड़ों रुपये गायब होने का खुला आरोप लगाया और सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की मांग की। विपक्ष के हमलावर होने के बाद ट्रस्ट ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर जांच की मांग की, जिसके बाद आनन-फानन में SIT का गठन हुआ।

जांच के घेरे में कौन-कौन?

  1. पांच मुख्य आरोपी कर्मचारी: लवकुश मिश्रा, अवनीश, अनुकल्प, करुण और रमाशंकर को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। लवकुश के घर से 10-12 लाख रुपये और अवनीश के खाते से 5 लाख रुपये बरामद भी हो चुके हैं।

  2. ‘टिन्नू’ और पदाधिकारी की तिकड़ी: टिन्नू, उसका बेटा और भतीजा जांच के मुख्य केंद्र हैं। टिन्नू का भतीजा पहले ही दिन पकड़ा गया था।

  3. ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारी: श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव जैसे बड़े पदाधिकारी भी निगरानी और लापरवाही के चलते संदेह के घेरे में हैं। घटना के बाद से ही शीर्ष स्तर पर चुप्पी छाई हुई है।

  4. बैंक अधिकारी: SBI के उन अधिकारियों से भी पूछताछ की जा रही है जिन्होंने बिना किसी ऑडिट या चेकिंग के इन सिफारिशी कर्मचारियों को खुली छूट दे रखी थी।

SIT को 15 दिन का अल्टीमेटम

मुख्यमंत्री के निर्देश पर गठित इस हाई-लेवल SIT में लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, आईजी रेंज किरन एस और विशेष वित्त सचिव नील रतन शामिल हैं। टीम ने ट्रस्ट के कार्यालय से लेकर दानपात्र कक्ष और पिछले 5 सालों के सीसीटीवी फुटेज को अपने कब्जे में ले लिया है। सरकार ने एसआईटी को 7 दिन में प्रारंभिक और 15 दिन में फाइनल रिपोर्ट सौंपने का सख्त आदेश दिया है।

राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने इस संबंध में स्पष्ट किया है कि “इस जांच के दो मुख्य पहलू हैं—पहला, इस घिनौने आपराधिक कृत्य की तह तक जाकर दोषियों को सजा दिलाना और दूसरा, भविष्य में मंदिर की दान व्यवस्था को पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए एक अभेद्य तंत्र स्थापित करना।” सूत्रों के मुताबिक, यदि जांच में ट्रस्ट के किसी भी सदस्य की संलिप्तता या गंभीर प्रशासनिक लापरवाही पाई जाती है, तो सरकार उनके अधिकारों को सीमित करने जैसा बड़ा कदम भी उठा सकती है।

देशबंधु चित्तरंजन दास की 101वीं पुण्यतिथि पर राष्ट्र ने किया नमन

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी, प्रख्यात अधिवक्ता, राष्ट्रवादी नेता, कवि और समाज सुधारक देशबंधु चित्तरंजन दास की 101वीं पुण्यतिथि पर देशभर में उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया गया। स्वतंत्रता आंदोलन में उनके अतुलनीय योगदान और राष्ट्र के प्रति समर्पण को स्मरण करते हुए विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संगठनों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

चित्तरंजन दास का जन्म 5 नवंबर 1870 को हुआ था। उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की तथा बाद में इंग्लैंड जाकर कानून की पढ़ाई की। भारत लौटने के बाद वे देश के अग्रणी वकीलों में शामिल हुए, लेकिन राष्ट्रसेवा को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने अपना जीवन स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित कर दिया।

स्वदेशी आंदोलन (1905-1911) के दौरान उन्होंने भारतीय उद्योगों और स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा ब्रिटिश उत्पादों के बहिष्कार का समर्थन किया। वर्ष 1908 में चर्चित अलीपुर बम षड्यंत्र मामले में उन्होंने महान क्रांतिकारी एवं दार्शनिक श्री अरबिंदो का सफलतापूर्वक बचाव किया, जिससे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान मिली।

महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए गए असहयोग आंदोलन (1920-22) में चित्तरंजन दास ने बंगाल में जनजागरण का नेतृत्व किया। उन्होंने लोगों से ब्रिटिश शासन और उसकी संस्थाओं के बहिष्कार का आह्वान किया तथा स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल चित्तरंजन दास वर्ष 1921 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने। बाद में उन्होंने मोतीलाल नेहरू, हकीम अजमल खान और एन.सी. केलकर जैसे नेताओं के साथ मिलकर स्वराज पार्टी की स्थापना की, जिसने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी।

देशबंधु दास ने अपने विधिक जीवन में अनेक राजनीतिक कार्यकर्ताओं, क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों का बचाव किया। वे क्रांतिकारी आंदोलन के उद्देश्यों के प्रति सहानुभूति रखते थे, जबकि स्वयं लोकतांत्रिक और संवैधानिक संघर्ष के समर्थक थे।

राजनीति और कानून के साथ-साथ उन्होंने राष्ट्रवादी पत्रकारिता, शिक्षा के प्रसार तथा महिलाओं के अधिकारों के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किए। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत का निर्माण सामाजिक सुधारों और जनजागरण के बिना संभव नहीं है।

उनके जीवन और विचारों ने स्वतंत्रता आंदोलन की कई पीढ़ियों को प्रेरित किया। राष्ट्र के प्रति उनकी निष्ठा, त्याग और संघर्ष आज भी भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय साहित्य में उनके योगदान को सदैव सम्मान के साथ याद किया जाएगा।

इस अवसर पर स्वतंत्रता आंदोलन स्मारक समिति (एफएमएमसी) से जुड़े वरिष्ठ सदस्य एवं छायाकार प्रशांत सी. बाजपेयी ने कहा कि देशबंधु चित्तरंजन दास का जीवन राष्ट्रसेवा, त्याग और लोकतांत्रिक मूल्यों का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी को उनके आदर्शों से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना चाहिए। देशबंधु चित्तरंजन दास की 101वीं पुण्यतिथि पर राष्ट्र उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

उत्तराखंड: गैस पाइप लाइन बनी सीवर जाम की वजह, जल संस्थान ने गेल गैस को थमाया 23.48 लाख का नोटिस

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देहरादून। हरिद्वार रोड स्थित सारथी विहार और सरस्वती विहार क्षेत्र में पिछले कई वर्षों से सीवर ओवरफ्लो की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए राहत की खबर के साथ बड़ा खुलासा सामने आया है। उत्तराखंड जल संस्थान की जांच में पता चला है कि क्षेत्र में बार-बार सीवर जाम होने और सड़कों पर गंदा पानी बहने के पीछे गेल गैस लिमिटेड द्वारा बिछाई गई गैस पाइप लाइन प्रमुख कारण है।

जल संस्थान ने मामले को गंभीरता से लेते हुए गेल गैस लिमिटेड को करीब 23.48 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति वसूली का नोटिस जारी किया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित समय के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।

जांच में सामने आई तकनीकी खामी

उत्तराखंड जल संस्थान, रायपुर के अधिशासी अभियंता सतीश चंद्र नौटियाल द्वारा जारी नोटिस के अनुसार वर्ष 2022 में सरस्वती विहार क्षेत्र में गेल गैस लिमिटेड ने गैस पाइप लाइन बिछाने का कार्य किया था। जांच के दौरान पाया गया कि गैस पाइप लाइन मुख्य सीवर लाइन और मैनहोल के बीच से निकाली गई, जिससे सीवर नेटवर्क बाधित हो गया।

विभागीय अधिकारियों के अनुसार पाइप लाइन बिछाने के दौरान सीवर लाइन को क्षति पहुंची और इसके बाद से सीवर का प्रवाह लगातार प्रभावित होता रहा। परिणामस्वरूप मुख्य सीवर लाइन बार-बार अवरुद्ध होने लगी और गंदा पानी सड़कों पर बहने लगा।

चार वर्षों से परेशान हैं स्थानीय लोग

क्षेत्र के निवासी लंबे समय से सीवर ओवरफ्लो, जलभराव और दुर्गंध की समस्या से जूझ रहे हैं। हरिद्वार रोड के व्यस्त मार्ग और आसपास की कॉलोनियों में सीवर का गंदा पानी बहने से लोगों को दैनिक जीवन में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि सड़कों पर गंदगी और बदबू के कारण ग्राहकों की आवाजाही प्रभावित होती है। वहीं निवासियों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा भी बना हुआ है। बरसात के मौसम में स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है, जब जलभराव के साथ सीवर का पानी घरों और गलियों तक पहुंच जाता है।

अस्थायी उपायों से नहीं निकला समाधान

जल संस्थान का कहना है कि समस्या को दूर करने के लिए पिछले चार वर्षों में कई बार जेटिंग मशीन, सक्शन मशीन और श्रमिकों की मदद से सीवर लाइन की सफाई कराई गई। हालांकि तकनीकी बाधा बने रहने के कारण यह प्रयास केवल अस्थायी राहत तक सीमित रहे।

अधिकारियों के अनुसार जब भी सीवर लाइन की सफाई की जाती थी, कुछ समय बाद समस्या दोबारा उत्पन्न हो जाती थी। इसके बाद विभाग ने पूरी लाइन की तकनीकी जांच कराई, जिसमें वास्तविक कारण सामने आया।

50 मीटर सीवर मरम्मत का दावा भी सवालों के घेरे में

जल संस्थान ने अपने नोटिस में यह भी उल्लेख किया है कि गेल गैस की ओर से विभाग को बताया गया था कि प्रभावित क्षेत्र में लगभग 50 मीटर सीवर लाइन का पुनर्निर्माण और मरम्मत कार्य कराया जाएगा। लेकिन विभागीय निरीक्षण और उपलब्ध वीडियोग्राफी के विश्लेषण में इस दावे की पुष्टि नहीं हो सकी।

अधिकारियों का कहना है कि मौके पर किए गए निरीक्षण में ऐसी कोई स्थिति नहीं मिली, जिससे यह साबित हो सके कि व्यापक स्तर पर सीवर लाइन का पुनर्निर्माण किया गया है। यही कारण है कि विभाग ने कंपनी के दावों पर आपत्ति जताई है।

विभाग ने मांगा नुकसान का हर्जाना

जल संस्थान का कहना है कि बार-बार सफाई, मशीनरी के उपयोग, श्रम व्यय और सीवर नेटवर्क को हुए नुकसान के कारण विभाग को आर्थिक क्षति उठानी पड़ी है। इसी आधार पर लगभग 23.48 लाख रुपये की वसूली का नोटिस जारी किया गया है।

विभागीय अधिकारियों के अनुसार यदि कंपनी की ओर से संतोषजनक जवाब या समाधान प्रस्तुत नहीं किया गया तो नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।

स्थायी समाधान की उम्मीद

मामले के उजागर होने के बाद क्षेत्रीय निवासियों को उम्मीद है कि वर्षों पुरानी सीवर समस्या का स्थायी समाधान निकल सकेगा। लोगों का कहना है कि यदि तकनीकी बाधा को दूर कर दिया जाए तो क्षेत्र में सीवर ओवरफ्लो और गंदे पानी की समस्या समाप्त हो सकती है।

फिलहाल पूरे मामले पर निगाहें गेल गैस लिमिटेड की प्रतिक्रिया और जल संस्थान की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। यह मामला न केवल विभागीय समन्वय की कमी को उजागर करता है, बल्कि शहरी क्षेत्रों में आधारभूत ढांचा परियोजनाओं के दौरान तकनीकी मानकों के पालन की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।

NEET री-एग्जाम से पहले बड़ा फैसला: भारत में टेलीग्राम पर अस्थायी रोक, मैसेज एडिट फीचर भी होगा बंद

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नई दिल्ली। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) 2026 की पुनर्परीक्षा से पहले केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A के तहत यह आदेश जारी किया है। यह प्रतिबंध 22 जून 2026 तक प्रभावी रहेगा।

एनटीए के मुताबिक 21 जून को आयोजित होने वाली NEET-UG पुनर्परीक्षा की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है। इसके अलावा सरकार ने टेलीग्राम को भारत में अपने मैसेज एडिट फीचर को भी 30 जून तक निष्क्रिय रखने के निर्देश दिए हैं। इसका अर्थ है कि पहले से भेजे गए संदेशों में किसी प्रकार का संशोधन या नई फाइल जोड़ने की सुविधा निर्धारित अवधि तक उपलब्ध नहीं होगी।

फर्जी पेपर लीक दावों पर रोक लगाने की कोशिश

एनटीए का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में टेलीग्राम पर कई ऐसे चैनल, ग्रुप और बॉट सक्रिय पाए गए, जो NEET परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के झूठे दावे कर रहे थे। कुछ लोग परीक्षा के बाद प्रश्नपत्रों को पुराने संदेशों में जोड़कर यह दिखाने की कोशिश करते थे कि पेपर पहले ही लीक हो चुका था।

एजेंसी के अनुसार टेलीग्राम का एडिट फीचर इस प्रकार की गतिविधियों को आसान बना रहा था। इसी वजह से सरकार ने परीक्षा समाप्त होने के बाद भी कुछ समय तक इस सुविधा को बंद रखने का निर्णय लिया है।

कई फर्जी चैनलों पर कार्रवाई

इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने हाल के दिनों में टेलीग्राम पर संचालित कई संदिग्ध चैनलों और समूहों को हटवाया है। इनमें “Paper Leaked NEET”, “Re-NEET 2026” और “NEET Mafia” जैसे नामों से चल रहे चैनल शामिल थे।

एनटीए के अनुसार ये चैनल अभ्यर्थियों और उनके अभिभावकों को गुमराह कर रहे थे और कथित प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने के नाम पर लाखों रुपये की मांग कर रहे थे। एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि ऐसे सभी दावे पूरी तरह फर्जी पाए गए हैं।

साइबर ठगी गिरोह का भी खुलासा

गुजरात की अहमदाबाद साइबर क्राइम ब्रांच ने हाल ही में ऐसे एक अंतरराज्यीय गिरोह का भंडाफोड़ किया है, जो टेलीग्राम के माध्यम से छात्रों को पेपर उपलब्ध कराने का झांसा देकर ठगी कर रहा था।

जांच में सामने आया कि गिरोह ने फर्जी बैंक खातों के जरिए लगभग 1.5 करोड़ रुपये का लेनदेन किया। पुलिस के अनुसार एक महीने के भीतर करीब एक हजार छात्रों और अभिभावकों से संपर्क कर उन्हें परीक्षा में सफलता दिलाने और प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने के नाम पर ठगा गया।

इस मामले में राजस्थान और बिहार से तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। जांच एजेंसियां गिरोह से जुड़े अन्य लोगों की तलाश कर रही हैं।

बिहार और अन्य राज्यों ने भी जारी की चेतावनी

परीक्षा से पहले विभिन्न राज्यों की पुलिस एजेंसियों ने भी अभ्यर्थियों को सतर्क रहने की सलाह दी है। बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई ने 9 जून को सार्वजनिक चेतावनी जारी कर कहा था कि सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर पेपर लीक के नाम पर फैलाए जा रहे दुष्प्रचार से सावधान रहें।

पुलिस का कहना है कि अधिकांश मामलों में छात्रों को ठगी का शिकार बनाया जाता है और कोई वास्तविक प्रश्नपत्र उपलब्ध नहीं कराया जाता।

लाखों उपयोगकर्ता होंगे प्रभावित

एनटीए ने स्वीकार किया है कि टेलीग्राम पर अस्थायी रोक से देशभर में लाखों उपयोगकर्ता प्रभावित होंगे। बड़ी संख्या में छात्र, नौकरी की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी, शिक्षण संस्थान, कारोबारी और आम नागरिक संचार एवं अध्ययन सामग्री साझा करने के लिए इस प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं।

एजेंसी ने असुविधा के लिए खेद व्यक्त करते हुए कहा कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और निष्पक्षता बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है।

री-एग्जाम के लिए बदले नियम

इस बीच एनटीए ने NEET-UG पुनर्परीक्षा के लिए कुछ महत्वपूर्ण बदलाव भी किए हैं। नई गाइडलाइंस के अनुसार परीक्षा अवधि 180 मिनट से बढ़ाकर 195 मिनट कर दी गई है। साथ ही अभ्यर्थियों को रफ वर्क के लिए अतिरिक्त शीट उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे प्रश्न हल करने में सुविधा मिल सके।

पेपर लीक विवाद के बाद रद्द हुई थी परीक्षा

गौरतलब है कि NEET-UG 2026 की मूल परीक्षा 3 मई को आयोजित की गई थी। परीक्षा के बाद कई राज्यों से प्रश्नपत्र लीक होने और कुछ अभ्यर्थियों को पहले से पेपर उपलब्ध कराए जाने के आरोप सामने आए थे।

जांच एजेंसियों द्वारा प्रारंभिक जांच में अनियमितताओं के संकेत मिलने के बाद 12 मई को परीक्षा रद्द कर दी गई थी। इसके बाद केंद्र सरकार, एनटीए और संबंधित एजेंसियों की समीक्षा के आधार पर 21 जून को पुनर्परीक्षा आयोजित करने का निर्णय लिया गया।

मेडिकल प्रवेश की सबसे बड़ी परीक्षा

NEET-UG देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा है। इसके माध्यम से एमबीबीएस, बीडीएस, आयुष, नर्सिंग और अन्य चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिया जाता है। देशभर के सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों, साथ ही AIIMS और JIPMER जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिले के लिए इसी परीक्षा का स्कोर मान्य होता है।

हर वर्ष लाखों छात्र इस परीक्षा में शामिल होते हैं और चिकित्सा क्षेत्र में करियर बनाने का सपना देखते हैं। ऐसे में परीक्षा की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखना सरकार और परीक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

अभ्यर्थियों के लिए सलाह

एनटीए ने छात्रों और अभिभावकों से अपील की है कि यदि कोई व्यक्ति प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने, परीक्षा में सहायता दिलाने या किसी अन्य प्रकार का लालच देकर संपर्क करता है तो उसकी सूचना तत्काल राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 या साइबर क्राइम पोर्टल पर दें।

एजेंसी ने दोहराया है कि परीक्षा से जुड़ी किसी भी प्रकार की भ्रामक सूचना पर विश्वास न करें और केवल आधिकारिक स्रोतों से प्राप्त जानकारी को ही सही मानें।

अपनी ही सरकार के अधिकारियों पर बरसे भाजपा प्रदेश प्रवक्ता, बोले- बजट मिल रहा, काम नहीं हो रहा

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पिथौरागढ़। उत्तराखंड में भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष के साथ-साथ अब पार्टी के वरिष्ठ नेता भी सवाल उठाने लगे हैं। भाजपा के मुख्य प्रदेश प्रवक्ता सुरेश जोशी ने पिथौरागढ़ में विभिन्न सरकारी विभागों, विशेष रूप से लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) और राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) के अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि सरकार विकास कार्यों के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध करा रही है, लेकिन धरातल पर उसका लाभ जनता को नहीं मिल रहा है।

जिला मुख्यालय में आयोजित जनता दरबार के दौरान सुरेश जोशी ने जिलाधिकारी आशीष भटगांई के समक्ष सड़क, सीवर लाइन और नगर की अन्य बुनियादी समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि कई जनहित से जुड़े मामले वर्षों से लंबित पड़े हैं और संबंधित विभागों की उदासीनता के कारण जनता परेशान है। जोशी ने ऐंचोली-बड़ाबे सड़क का मुद्दा उठाते हुए कहा कि करीब ढाई वर्ष पहले सड़क निर्माण का टेंडर हो चुका था, लेकिन आज तक कार्य शुरू नहीं हो पाया है। उन्होंने कहा कि पिथौरागढ़ में प्रस्तावित सर्किट हाउस का निर्माण भी ठेकेदारों के आपसी विवाद और न्यायालयी प्रक्रिया के चलते अधर में लटका हुआ है।

उन्होंने नगर में लगभग 100 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित सीवरेज परियोजना पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद आज तक आम जनता को इसका लाभ नहीं मिल सका है, जबकि हर वर्ष इसके रखरखाव के लिए अतिरिक्त बजट की मांग की जा रही है। उन्होंने ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और वेतन कटौती की मांग की।

ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कों की बदहाल स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए सुरेश जोशी ने कहा कि कई मार्गों पर झाड़ियां उग आई हैं और जंगली जानवरों का खतरा बना हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिथौरागढ़ में लोनिवि और राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग पूरी तरह निष्क्रिय बने हुए हैं।

नगर क्षेत्र में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि तिराहों और चौराहों पर कुत्तों के झुंड लोगों के लिए खतरा बन रहे हैं। आए दिन लोगों को काटने की घटनाएं सामने आ रही हैं, लेकिन समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी पालन नहीं हो रहा है। सुरेश जोशी ने नगर के कई वार्डों में खराब रास्तों और मूलभूत सुविधाओं की कमी का मुद्दा भी जिलाधिकारी के समक्ष रखा। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रशासन जल्द ही इन समस्याओं के समाधान की दिशा में प्रभावी कार्रवाई करेगा।

गौरतलब है कि यह पहला अवसर है जब भाजपा के मुख्य प्रदेश प्रवक्ता ने सार्वजनिक रूप से अपनी ही सरकार के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। इससे पहले विधायक अरविंद पांडे, पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत तथा विधायक बिशन सिंह चुफाल भी अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर नाराजगी जता चुके हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा नेताओं की बढ़ती नाराजगी विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का नया अवसर दे सकती है।