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किश्तवाड़ में मुठभेड़, आतंकियों को घेरने में जुटे सुरक्षाबल, कुलगाम ऑपरेशन में दो जवान शहीद, दो घायल

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जम्मू :  जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के दुल क्षेत्र में रविवार सुबह आतंकवादियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ छिड़ गई। सेना और पुलिस के संयुक्त अभियान में आतंकियों को इलाके में घेर लिया गया है और गोलीबारी लगातार जारी है।

भारतीय सेना की व्हाइट नाइट कोर ने जानकारी दी कि आतंकवाद विरोधी अभियान में सेना के जवान मोर्चा संभाले हुए हैं और आतंकियों को दबाव में लाने के लिए चारों ओर से घेराबंदी की गई है। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, मुठभेड़ स्थल से लगातार गोलियों की आवाज आ रही है।

इसी बीच, दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले में चल रहा ऑपरेशन अखल लगातार नौवें दिन भी जारी है। शनिवार रात आतंकियों के साथ मुठभेड़ में सेना के लांस नायक प्रीतपाल सिंह और सिपाही हरमिंदर सिंह शहीद हो गए, जबकि दो अन्य जवान घायल हो गए।

सेना की चिनार कोर ने एक्स पर पोस्ट करते हुए दोनों जवानों के सर्वोच्च बलिदान को सलाम किया और कहा, “उनका साहस और समर्पण हमेशा हमें प्रेरित करेगा।” सेना ने शोक संतप्त परिवारों के साथ एकजुटता व्यक्त की है।

घना जंगल, खड़ी चढ़ाई और स्नाइपर की चुनौती

पुलिस सूत्रों के अनुसार, अखल वन क्षेत्र में आतंकियों ने स्नाइपर का इस्तेमाल करते हुए सुरक्षाबलों को निशाना बनाया, जिसके चलते यह क्षति हुई। घना जंगल और खड़ी चढ़ाई जवानों की आगे बढ़ने की गति धीमी कर रही है। इस चुनौतीपूर्ण इलाके में आतंकियों को ढूंढने और दबोचने के लिए सेना ड्रोन, क्वाडकॉप्टर, हेलीकॉप्टर और खोजी कुत्तों का इस्तेमाल कर रही है।

चौबीसों घंटे निगरानी

अभियान की निगरानी जम्मू-कश्मीर पुलिस प्रमुख नलिन प्रभात, सेना के उत्तरी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा और कश्मीर ज़ोन के आईजीपी वीके बिरदी व्यक्तिगत रूप से कर रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि तब तक ऑपरेशन जारी रहेगा जब तक आतंकियों का सफाया नहीं हो जाता।

दीपक की BJP में एंट्री के बाद ऐसे बदल गए उत्तरकाशी के राजनीतिक समीकरण

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  • प्रदीप रावत ‘रवांल्टा’ 

उत्तराखंड की राजनीति में हमेशा से ही अप्रत्याशित घटनाक्रम होते रहे हैं। उत्तरकाशी जिले की यमुनोत्री विधानसभा सीट इसका नया उदाहरण है। दीपक बिजल्वाण के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने से इस सीट के राजनीतिक समीकरणों में भारी फेरबदल हुआ है, जिसने न केवल भाजपा के भीतर हलचल मचा दी है, बल्कि कांग्रेस और अन्य संभावित उम्मीदवारों के लिए भी नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। यह घटनाक्रम केवल एक दल-बदल से कहीं अधिक है। यह 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए एक बड़ी राजनीतिक बिसात की शुरुआत मानी जा रही है।

भाजपा की रणनीति और आंतरिक विरोध:

दीपक बिजल्वाण के भाजपा में शामिल होने को एक सोची-समझी रणनीति के तहत देखा जा रहा है। उत्तरकाशी जिला पंचायत की कुर्सी को हासिल करने और यमुनोत्री सीट पर पकड़ मजबूत करने और 2027 में ‘तीनों विधायक भाजपा के’ होने के लक्ष्य को साधने के लिए यह कदम उठाया गया है।

वहीं, पार्टी ने तुरंत जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए रमेश चौहान का नाम घोषित कर इस नए समीकरण को मजबूती दी है। हालांकि, इस ‘डील’ की कीमत भाजपा को अपने ही घर में विरोध के रूप में चुकानी पड़ रही है।

पूर्व विधायक केदार सिंह रावत और 2022 में भाजपा से टिकट के प्रबल दावेदार रहे मनवीर चौहान के लिए यह एक बड़ा झटका माना जा रहा है। दोनों ही नेता 2027 में विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे थे, लेकिन अब उनके रास्ते में एक बड़ा रोड़ा आ गया है। बिजल्वाण की एंट्री ने उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। पार्टी के भीतर से उठे विरोध के स्वर, जिन्होंने प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को पत्र लिखे, यह दर्शाते हैं कि यह फैसला आसानी से स्वीकार्य नहीं है।

वहीं, महेंद्र भट्ट का यह स्पष्ट संदेश कि विरोध करने वाले नेता खुद के लिए ही मुसीबत खड़ी कर रहे हैं, यह साफ करता है कि पार्टी आलाकमान इस फैसले पर अडिग है और दीपक बिजल्वाण को पूरा समर्थन दे रही है। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 2027 में बिजल्वाण को यमुनोत्री सीट से टिकट मिल सकता है।

दीपक बिजल्वाण के भाजपा में जाने से कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका लगा है। यमुनोत्री में कांग्रेस के पास एक मजबूत और लोकप्रिय चेहरा था, जो अब भाजपा के पाले में है। इससे 2027 में कांग्रेस की चुनौतियां बढ़ गई हैं, क्योंकि उसे अब एक नए चेहरे की तलाश करनी होगी जो भाजपा के इस नए समीकरण का मुकाबला कर सके।

इस घटनाक्रम ने यमुनोत्री के निर्दलीय विधायक संजय डोभाल की राजनीतिक स्थिति को भी प्रभावित किया है। यह अटकलें थीं कि अगर बिजल्वाण कांग्रेस या निर्दलीय चुनाव लड़ते तो डोभाल भाजपा में शामिल हो सकते थे और उन्हें टिकट भी मिल सकता था। हालांकि, यह केवल अटकलें और चर्चाएं थीं। वैसे राजनीति संभावनाओं का खेल है।

लेकिन, अब जब बिजल्वाण के भाजपा में आ गए हैं, तो इन संभावनाओं पर विराम लगना तय माना जा रहा है। डोभाल के लिए अब अपनी सीट को बरकरार रखने की चुनौती और भी जटिल हो गई है, क्योंकि उन्हें भाजपा के नए उम्मीदवार (संभावित रूप से बिजल्वाण) का सामना करना होगा।

दीपक बिजल्वाण का राजनीतिक कौशल: दीपक बिजल्वाण ने इस कदम से अपने राजनीतिक कौशल का परिचय दिया है। 2022 का चुनाव हारने के बावजूद, उन्होंने लगातार सक्रिय रहकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। लोगों के बीच रहना और उनकी समस्याओं का समाधान करना उनकी रणनीति का हिस्सा रहा है। भाजपा में शामिल होकर उन्होंने एक ‘तीर से कई निशाने’ साधे हैं:

अपने लिए सुरक्षित भविष्य: उन्होंने एक ऐसी पार्टी में प्रवेश किया है, जिसके पास सत्ता में आने की प्रबल संभावना है, और जहां उन्हें 2027 में टिकट का आश्वासन मिलने की उम्मीद है।

विरोधी खेमों को कमजोर करना: उन्होंने कांग्रेस को एक मजबूत चेहरे से वंचित कर दिया है और संजय डोभाल के भाजपा में शामिल होने की संभावनाओं को खत्म कर दिया है।

आंतरिक विरोध को साधने की चुनौती: अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा के भीतर उठे विरोध को शांत करना और अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना है। प्रदेश अध्यक्ष का स्पष्ट संदेश उनके पक्ष में है, लेकिन वास्तविक लड़ाई उन्हें ही लड़नी होगी।

एक नया राजनीतिक अध्याय

यमुनोत्री विधानसभा सीट पर दीपक बिजल्वाण की एंट्री ने एक नया राजनीतिक अध्याय शुरू किया है। यह केवल एक दल-बदल नहीं, बल्कि 2027 के चुनावों के लिए एक बड़ी बिसात है। भाजपा ने यमुनोत्री में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए एक जोखिम भरा, लेकिन संभावित रूप से फायदेमंद कदम उठाया है। वहीं, कांग्रेस और संजय डोभाल जैसे नेताओं के लिए यह एक नई चुनौती है।

‘बिजल्वाण फैक्टर’ सबसे महत्वपूर्ण

यह देखना दिलचस्प होगा कि अगले डेढ़ साल में दीपक बिजल्वाण भाजपा के भीतर के विरोध को कैसे साधते हैं और क्या उनका यह ‘मास्टरस्ट्रोक’ 2027 में उनके और भाजपा के पक्ष में जाता है। फिलहाल, यमुनोत्री की राजनीति में ‘बिजल्वाण फैक्टर’ सबसे महत्वपूर्ण हो गया है, और इसका परिणाम जानने के लिए हमें 2027 तक का इंतजार करना होगा।

दीपक के बहाने राजेंद्र भंडारी की चर्चा

दीपक बिजल्वाण के भाजपा में शामिल होने के बाद, सोशल मीडिया पर एक बार फिर कांग्रेस के पूर्व मंत्री राजेंद्र भंडारी की वर्तमान स्थिति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। कई लोगों का कहना है कि भाजपा, दीपक बिजल्वाण को भी उसी तरह राजनीतिक रूप से कमजोर कर देगी, जैसे राजेंद्र भंडारी के साथ किया, जहां न उनकी पत्नी को जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जितने दिया गया और न ही खुद भंडारी को राजनीति में मजबूती मिल पाई।

विरोधियों की योजना

राजनीतिक जानकारों का दावा है कि उत्तरकाशी जिले, खासकर यमुनोत्री और पुरोला विधानसभा के कुछ नेता, भीतर ही भीतर संगठन के जरिए दीपक को कमजोर करने की योजना पहले ही बना चुके हैं। यह प्लान धीरे-धीरे जमीन पर उतारा जाएगा, ताकि 2027 के विधानसभा चुनाव में उन्हें रोकने के लिए हर संभव दांव खेला जा सके। भले ही वे खुलकर विरोध न करें, लेकिन पर्दे के पीछे से उन्हें गिराने की पूरी कोशिश जरूर करेंगे।

भाजपा पर उठा रहे सवाल

भाजपा की नीतियों को लेकर भी लोग सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि भाजपा अपने फायदे के लिए नेताओं का राजनीतिक करियर खत्म करने में माहिर है, और इसके कई उदाहरण लगातार सामने आते रहे हैं।

एक तस्वीर यह भी

हालांकि, एक दूसरी तस्वीर भी है, कांग्रेस से भाजपा में आए कई नेता आज सरकार में कैबिनेट मंत्री पद तक पहुंच चुके हैं और सत्ता में मजबूत स्थिति में हैं। यही वजह है कि राजनीतिक हलकों में इस बहस का कोई आसान निष्कर्ष नहीं निकल पा रहा है।

राजनीति के माहिर खिलाड़ी

लेकिन, अब एक और पहलू भी चर्चा में है, वह है दीपक बिजल्वाण का अब तक का ट्रैक रिकॉर्ड। जानकारों का कहना है कि उनके राजनीतिक सफर को देखते हुए वह भाजपा के भीतर अपने लिए मजबूत जगह बना लेंगे। इतना ही नहीं, विरोधियों को भी अपने पक्ष में करने में वह माहिर हैं। कम उम्र में ही उन्हें राजनीति का चतुर और माहिर खिलाड़ी माना जाने लगा है।

 

 

उत्तराखंड में भी कांग्रेस रोकेगी वोटों की हेराफेरी, 70 विधानसभा क्षेत्रों की वोटर लिस्ट की करेंगे स्क्रूटनी

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देहरादून: उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस ने ऐलान किया है कि आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले राज्य की सभी 70 विधानसभा सीटों की मतदाता सूचियों की गहन जांच की जाएगी। इस दौरान नकली वोटरों की पहचान कर उनके नाम हटाने की मांग चुनाव आयोग से की जाएगी।

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष (संगठन) सूर्यकांत धस्माना ने गुरुवार को प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में पत्रकारों से बातचीत में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की ओर से कर्नाटक की एक लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी और चुनाव आयोग की कथित मिलीभगत से वोटों में हेराफेरी का खुलासा चौंकाने वाला है।

धस्माना ने आरोप लगाया कि इसी तरह का “खेल” भाजपा ने उत्तराखंड में 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी किया। उन्होंने कहा कि अब जबकि राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की “पोल खोल” दी है, तो कांग्रेस राज्य में किसी भी तरह की चुनावी धांधली को रोकने के लिए मतदाता सूचियों की स्वयं जांच करेगी।

उन्होंने कहा, “आज देश का चुनाव आयोग हो या राज्यों के अधिकारी सभी भाजपा के साथ मिलकर चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी कर रहे हैं। ऐसे में लोकतंत्र को बचाने के लिए कांग्रेस जनता को साथ लेकर एक नई लड़ाई शुरू करेगी।”

उत्तराखंड: दीपक बिजल्वाण की भाजपा में एंट्री से BJP नेताओं में खलबली

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उत्तरकाशी :  उत्तरकाशी जिले की राजनीति में ज़ोरदार उबाल देखने को मिल रहा है। राज्य निर्वाचन आयोग ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के बाद ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव की घोषणा कर दी है। 14 अगस्त को हरिद्वार को छोड़कर राज्य के 12 जिलों में ये चुनाव होंगे। लेकिन इस बीच जिला पंचायत अध्यक्ष दीपक बिजल्वाण को लेकर उत्तरकाशी की राजनीति में हलचल मच गई है।

दीपक बिजल्वाण, जो पहले से ही दोबारा जिला पंचायत अध्यक्ष पद के सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे थे, अब भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की संभावनाओं के चलते पार्टी के भीतर विरोध के केंद्र में आ गए हैं।

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भाजपा नेताओं की खुली नाराजगी

जैसे ही बिजल्वाण के भाजपा में शामिल होने की खबरें तैरने लगीं, यमुनोत्री-गंगोत्री विधानसभा क्षेत्र के नेताओं में बेचैनी बढ़ गई। गंगोत्री विधायक सुरेश चौहान, पूर्व विधायक विजयपाल सजवाण, पुरोला विधायक दुर्गेश्वर लाल, भाजपा के पूर्व ज़िला अध्यक्ष सत्येंद्र राणा, वर्तमान ज़िला अध्यक्ष नागेंद्र चौहान, और खुद यमुनोत्री से टिकट की दावेदारी कर रहे मनवीर चौहान और पूर्व विधायक केदार सिंह रावत सभी ने पार्टी नेतृत्व को पत्र लिखकर अपनी नाराज़गी जताई है। इन नेताओं ने दीपक बिजल्वाण पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें पार्टी में शामिल न करने की मांग की है।

दोहरी राजनीति पर उठे सवाल

दिलचस्प यह है कि हाल ही में हुए नगर निकाय चुनावों में यही भाजपा नेता दीपक बिजल्वाण के रुख को लेकर सकारात्मक नजर आ रहे थे। मगर पंचायत चुनाव आते ही जैसे हवा पलटी, भाजपा के भीतर उनके खिलाफ विरोध की झड़ी लग गई। क्षेत्रीय राजनीति में यह परिवर्तन कई सवाल खड़े कर रहा है, क्या यह विरोध सैद्धांतिक है, या केवल सीट की सियासत?

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2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी या सियासी डर?

यह साफ है कि दीपक बिजल्वाण यमुनोत्री विधानसभा सीट से 2027 में विधानसभा चुनाव लड़ने की ठोस तैयारी कर रहे हैं। यह वही सीट है, जहां से वह पहले भी चुनाव लड़ चुके हैं। वहीं, भाजपा के मनवीर चौहान और पूर्व विधायक केदार सिंह रावत भी इस सीट से अपनी दावेदारी ठोक चुके हैं। ऐसे में इन दोनों नेताओं को बिजल्वाण की भाजपा में एंट्री से अपने सियासी समीकरण बिगड़ते नजर आ रहे हैं। यही वजह मानी जा रही है कि पंचायत अध्यक्ष चुनाव से पहले ही भाजपा नेताओं का एक वर्ग बिजल्वाण के खिलाफ लामबंद हो गया है।

निकाय चुनाव में सुस्त, अब हुए सक्रिय

राजनीतिक विश्लेषक इस विरोध को लेकर भाजपा नेताओं की रणनीतिक चाल मान रहे हैं। नगर निकाय चुनाव में मनवीर चौहान को नाराज़ जनता का सामना करना पड़ा, जबकि केदार सिंह रावत चुनावी मैदान में ज्यादा सक्रिय नहीं दिखे। वहीं, पुरोला नगर पंचायत की सीट भाजपा हार गई, जिससे दुर्गेश्वर लाल की पकड़ पर भी सवाल खड़े हुए। इतना ही नहीं भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष सत्येंद्र राणा भी दीपक के मुकाबले रामा वार्ड से जिला पंचायत का चुनाव हार गए। जहां विधायक दुर्गेश्वर लाल, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र भट्ट और भाजपा प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर चौहान प्राचर करने पहुंचे थे।

अब जब पंचायत चुनाव और आगामी विधानसभा चुनाव का समीकरण तैयार हो रहा है, तो भाजपा नेताओं की यह ‘सक्रियता’ कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे रही है। कुल मिलाकर कहा जाए तो दीपक बिजल्वाण एक बड़े राजनीतिक खिलाड़ी साबित हो रहे हैं, यही वजह है कि भविष्य की अपनी दावेदारी को देखते भाजपा के नेता एकजुट होकर विरोध कर रहे हैं।

धराली आपदा : अंतिम फोन कॉल, पापा…हम बचेंगे नहीं

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उत्तरकाशी: उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में धराली आपदा ने कई परिवारों को बिखेर दिया है। 5 अगस्त को दोपहर में अपने बेटे से आखिरी बार बात होने के बाद से नेपाल के रहने वाले विजय और उनकी पत्नी काली देवी अपने छह बच्चों और 26 अन्य साथियों की तलाश में बेचैन हैं।

उनके बेटे ने फोन पर कहा था, “पापा, हम बचेंगे नहीं, नाले में बहुत पानी आ गया है।” इसके बाद से उनका कोई संपर्क नहीं हो पाया है।

विजय और काली देवी भटवाड़ी हेलीपैड पर अधिकारियों से लगातार गुहार लगा रहे हैं कि उन्हें हेलिकॉप्टर से धराली ले जाया जाए ताकि वे अपने लापता बच्चों की तलाश कर सकें।

आमने-सामने चुनाव आयोग और राहुल गांधी, ECI ने कहा-शपथ-पत्र दो या देश से माफ़ी मांगो

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नई दिल्ली : विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के आरोपों पर चुनाव आयोग ने तीखा पलटवार किया है। बीते दिनों राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर “वोट चोरी” और “भाजपा से मिलीभगत” का आरोप लगाया था। इन आरोपों को लेकर चुनाव आयोग अब सख़्त तेवर में आ गया है।

आयोग के सूत्रों का कहना है, “अगर राहुल गांधी अपने विश्लेषण और आरोपों पर यक़ीन रखते हैं, तो उन्हें शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर करने से क्या आपत्ति हो सकती है? यदि वे ऐसा नहीं करते, तो यह माना जाएगा कि उन्हें अपने ही आरोपों पर भरोसा नहीं। ऐसी स्थिति में उन्हें देश से माफ़ी मांगनी चाहिए। चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि अब कांग्रेस नेता के पास केवल दो रास्ते हैं या तो घोषणापत्र पर दस्तख़त करें, या फिर देश से माफ़ी मांगें।

कर्नाटक से लेकर महाराष्ट्र तक उठे सवाल

गौरतलब है कि इससे पहले कर्नाटक विधानसभा क्षेत्र में मतदाता सूची में कथित हेराफेरी के मुद्दे पर राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल खड़े किए थे। इस पर राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने राहुल से शपथ-पत्र देकर सबूत पेश करने को कहा।

इसी तरह महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 में मतदाता सूची में गड़बड़ियों के आरोपों पर भी राहुल गांधी से राज्य निर्वाचन अधिकारी ने ठोस प्रमाणों के साथ शपथ-पत्र की मांग की है। राहुल ने आरोप लगाए थे कि “चुनाव आयोग जानबूझकर भाजपा के पक्ष में मतदाता सूची में फेरबदल करवा रहा है।”

अब बड़ा सवाल ये है कि क्या राहुल गांधी अपने आरोपों पर कायम रहते हुए शपथ-पत्र देंगे? या फिर देश की जनता के सामने अपने बयानों के लिए माफ़ी मांगेंगे? क्या विपक्ष के ये आरोप सिर्फ़ चुनावी रणनीति का हिस्सा हैं या वाकई कोई ठोस सबूत उनके पास हैं?

 

 

‘जुझारू और कर्मठ’ से बने ‘बिकाऊ’, ‘आपका बेटा-आपका भाई’ लाखों में नीलाम!

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  • प्रदीप रावत ‘रवांल्टा’

आपके कानों में अब भी गूंजते होंगे वो नारे “आपका बेटा,” “आपका भाई,” “जुझारू और कर्मठ।” आपके घरों के पास वो चुनावी पोस्टर अभी भी लटके होंगे, जिन पर मुस्कुराते हुए चेहरों ने जनता की सेवा का वादा किया था। लेकिन, सवाल यह है कि चुनाव जीतने के बाद ये ‘जुझारू-कर्मठ’ प्रजाति कहां गुम हो गई है?

दरअसल, वे आपको दिया हुआ वोट लाखों और करोड़ों में नीलाम करने गए हैं। पहले तो उन्होंने आपको मुर्गा, बकरा, और दारू देकर ‘खरीदा’ और अब आपकी उम्मीदों और विश्वास को ‘बेच’ रहे हैं। तो बताइए, क्या आपका वोट बिका या नहीं? उत्तरकाशी के धराली में लोग मलबे में दबे हैं। प्रदेश का हर कोना बारिश और बाढ़ से त्रस्त है। जनता अपने ‘सुख-दुख के साथी’ की तलाश में है, लेकिन ये ‘साथी’ कहां हैं?

उनकी खोज में आपको Google Maps का सहारा लेना पड़ेगा, क्योंकि ये क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के माननीय तो ‘लुप्तप्राय प्रजाति’ बन चुके हैं। वे अपनी खुद की ‘मंडी’ में भाव तय कर रहे हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष और क्षेत्र पंचायत प्रमुखों के रेट तय हो रहे हैं। कौन कितने में बिकेगा, किसकी बोली कहां पहुंचेगी यही असली बहस है।

जनता को क्या? जनता तो बस वोट देने का ‘औजार’ है। चुनाव के बाद जनता को तो फूलों का हार तक चढ़ाने का मौका नहीं मिला, दावत की तो बात ही क्या! अब ये प्रतिनिधि शायद उसी दारू से अपनी थकान उतार रहे हैं जो उन्होंने आपको पिलाई थी।

जनता ने तो सिर्फ इस उम्मीद में उन्हें वोट दिया था कि वे संकट में काम आएंगे। लेकिन चुने जाने के बाद, इन प्रतिनिधियों को जनता की सेवा से ज़्यादा अपनी जेबें भरने की चिंता है। उन्हें तो बस कुर्सी चाहिए, चाहे वह खरीदकर मिले या बिककर। जनता मरे या बचे, उन्हें तो बस अपनी तिजोरियां भरनी हैं।

उत्तराशी धराली आपदा : राहत-बचाव अभियान का चौथा दिन, अब तक 300 से अधिक लोगों का रेस्क्यू

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उत्तरकाशी: उत्तरकाशी जिले में धराली गांव में आई भीषण आपदा के बाद राहत और बचाव कार्य चौथे दिन भी जारी है। सेना, आईटीबीपी, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर काम कर रही हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार तीन दिनों से मौके पर डटे हुए हैं।

उन्होंने आज सुबह भी राहत कार्यों की समीक्षा की और अधिकारियों को निर्देश दिए कि बचाव कार्य में तेजी लाई जाए। उन्होंने खुद भी आपदा पीड़ितों की मदद के लिए अपना एक माह का वेतन मुख्यमंत्री राहत कोष में देने की घोषणा की है।

उत्तराखंड आईएएस एसोसिएशन ने भी आपदा पीड़ितों की मदद के लिए हाथ बढ़ाया है। एसोसिएशन के सचिव दिलीप जावलकर ने बताया कि सभी आईएएस अधिकारी स्वेच्छा से अपना एक दिन का वेतन मुख्यमंत्री राहत कोष में देंगे। यह कदम आपदा प्रभावितों के प्रति मानवीय संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी को दर्शाता है।

देहरादून घाटी में केदारनाथ-धराली जैसी आपदाओं की तैयारी कर रही है सरकार: धस्माना

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  • 1989 के दून घाटी अधिसूचना को खत्म कर उद्योगपतियों के लिए खोला गया रास्ता, एनजीटी ने केंद्र व राज्य को भेजा नोटिस।

देहरादून। राज्य सरकार द्वारा देहरादून घाटी की सुरक्षा में सेंध लगाते हुए केंद्र सरकार से दून वैली नोटिफिकेशन 1989 को रद्द करवा कर नया अधिसूचना 13 मई 2025 को जारी करवाने पर विवाद गहराता जा रहा है।

इस अधिसूचना के तहत अब रेड और ऑरेंज श्रेणी के प्रदूषणकारी उद्योगों को लगाने के लिए केंद्र सरकार की अनापत्ति की जरूरत नहीं रहेगी। इसके खिलाफ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं देवभूमि मानव संसाधन विकास समिति एवं ट्रस्ट के अध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में याचिका दाखिल कर दी है।

NGT ने याचिका को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और उत्तराखंड के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर 19 सितंबर 2025 को जवाब तलब किया है।

उद्योगपतियों के लिए बनाई गई नीति

देहरादून स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में धस्माना ने कहा कि “राज्य सरकार अपने मित्र उद्योगपतियों को प्रदूषणकारी उद्योग लगाने की छूट देने के लिए ‘ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी’ की नीति पर चल रही है। 1989 की अधिसूचना आड़े आ रही थी, इसलिए अधूरी व भ्रामक जानकारियों के आधार पर नया नोटिफिकेशन केंद्र से जारी करवाया गया।”

धस्माना ने चेतावनी दी कि इस नीति से देहरादून की जलवायु, पारिस्थितिकी, नदियां, खाल, जंगल, जल स्रोत और कृषि योग्य भूमि पर सीधा खतरा मंडरा रहा है। अगर यह नोटिफिकेशन वापस नहीं लिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका भयावह खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

दून घाटी: संवेदनशील और भूकंप संभावित क्षेत्र

उन्होंने याद दिलाया कि 1989 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर केंद्र सरकार ने दून वैली नोटिफिकेशन जारी किया था, जिससे देहरादून घाटी को विशेष दर्जा मिला था। इसका उद्देश्य घाटी की पारिस्थितिकी रक्षा करना था, क्योंकि यह क्षेत्र भूकंपीय क्षेत्र 4 व 5 में आता है और प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से अति संवेदनशील है। उन्होंने चेताया कि “अगर इसे समाप्त कर दिया गया, तो देहरादून भी केदारनाथ और धराली जैसी आपदाओं का गवाह बन सकता है।”

राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष की घोषणा

धस्माना ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं है, बल्कि इसे एक राजनैतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप दिया जाएगा। “यह लड़ाई केवल प्रदूषण की नहीं, बल्कि देहरादून की आत्मा को बचाने की है। यदि यह घाटी उजड़ गई, तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।”

प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके साथ कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा के मीडिया सलाहकार सरदार अमरजीत सिंह, श्रम विभाग के अध्यक्ष दिनेश कौशल, प्रदेश प्रवक्ता गिरिराज किशोर हिंदवाण, अधिवक्ता वेदांत बिजलवान और अभिषेक दरमोड़ा उपस्थित रहे।

ईडी को ‘बदमाश’ नहीं, कानून का रक्षक बनना होगा: सुप्रीम कोर्ट की तीखी फटकार

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नई दिल्ली :  सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के कामकाज पर कड़ी टिप्पणी करते हुए साफ कहा है कि ईडी बदमाशों की तरह काम नहीं कर सकती, उसे कानून के चार कोनों के भीतर रहकर ही काम करना होगा। शीर्ष अदालत ने यह बात पीएमएलए कानून के तहत ईडी को मिली गिरफ्तारी की शक्तियों को बरकरार रखने के 2022 के अपने फैसले की समीक्षा कर रही याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कही।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने ईडी की कार्यप्रणाली और दोषसिद्धि की बेहद कम दर पर गहरी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में ईडी द्वारा दर्ज की गई लगभग 5,000 ईसीआईआर (ECIR) में दोषसिद्धि की दर 10 प्रतिशत से भी कम है।

“व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा मसला है”

जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने तल्ख अंदाज में कहा, “आप बदमाश की तरह काम नहीं कर सकते, आपको कानून के दायरे में रहना होगा। पांच साल की हिरासत के बाद अगर लोग बरी हो जाते हैं, तो इसकी कीमत कौन चुकाएगा? ईडी की छवि भी दांव पर है।”

कानून की आड़ में देरी का खेल?

सरकार और ईडी की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने दोषसिद्धि की कम दर के लिए प्रभावशाली आरोपियों की “विलंब रणनीति” को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि ताकतवर आरोपी सुनवाई में देरी के लिए कई चरणों में याचिकाएं दाखिल करते हैं, जिससे जांच अधिकारी अदालतों के चक्कर काटने में ही उलझ जाते हैं।

“समर्पित अदालतें ही समाधान”

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि सभी समस्याओं का समाधान टाडा और पोटा जैसे विशेष अदालतों की तर्ज पर पीएमएलए की समर्पित अदालतें बनाना हो सकता है।

उन्होंने कहा,“ऐसी अदालतों में दिन-प्रतिदिन सुनवाई हो, जिससे प्रभावशाली आरोपी और उनके वकील भी जानें कि अगला फैसला कल ही आने वाला है। अब उनके साथ नरमी का समय नहीं है।

जस्टिस कांत ने एक मजिस्ट्रेट का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्हें एक ही दिन में 49 याचिकाओं पर 10 से 20 पन्नों के आदेश देने पड़ते हैं, जो कि न्यायिक प्रक्रिया के लिए उचित नहीं है। उन्होंने दो टूक कहा कि ऐसा नहीं चल सकता।