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दाभोलकर हत्या मामले में पहली गिरफ्तारी से खुलेंगे कलबुर्गी-पनसारे हत्या के राज़

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अंधविश्वास के खिलाफ अभियान चलाने वाले तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के सिलसिले में सीबीआई को पहली सफलता हाथ लगी है। सीबीआई ने इस हत्या के सिलसिले में पहली गिरफ़्तारी करते हुए वीरेन्द्र सिंह तावड़े नाम के एक शख्स को गिरफ्तार किया है। तावड़े को हिंदू जनजागृति समिति नामक संगठन का सदस्य बताया जा रहा है। तावड़े की गिरफ्तारी को कन्नड़ लेखक कलबुर्गी और वामपंथी नेता गोविंद पनसारे की हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए भी काफी अहम् माना जा रहा है।
गौरतलब है कि तावड़े को पनवेल से कल देर रात गिरफ्तार किया गया और उसे आज पुणे की एक विशेष अदालत में पेश किया जाएगा। सीबीआई के प्रवक्ता देवप्रीत सिंह ने बताया कि सीबीआई टीम ने दाभोलकर की हत्या के मामले की जांच के संबंध में वीरेन्द्र सिंह तावड़े को गिरफ्तार किया है। बता दें कि जनजागृति समिति का संबंध गोवा की सनातन संस्था से है। सनातन संस्था पहले ही पनसारे की हत्या की जांच के दायरे में है।
तावड़े की गिरफ़्तारी के बाद सीबीआई कलबुर्गी और पनसारे की हत्या की गुत्थी के सुलझने की भी उम्मीद जता रही है। बता दें कि फोरेंसिक जांच में पहले ही सामने आ चुका है कि कलबुर्गी, पनसारे और दाभोलकर की हत्या में जिन कारतूसों का इस्तेमाल किया गया था वे आपस में मेल खाते हैं। इन तीनों की हत्या में 7.65 एमएम के कारतूसों का इस्तेमाल किया गया था।
कन्नड लेखक कलबुर्गी की हत्या के बाद महाराष्ट्र एटीएस द्वारा गिरफ्तार सनातन संस्था के सदस्य समीर गायकवाड़ से कर्नाटक पुलिस ने सांगली में पूछताछ की थी। पुलिस को उम्मीद थी कि कलबुर्गी और सामाजिक कार्यकर्ता दाभोलकर की हत्या में भी इसी गिरोह का हाथ हो सकता है, हालांकि इससे सम्बंधित कोई ठोस सबूत बरामद नहीं हुआ। समीर को ही पनसारे हत्याकांड में भी गिरफ्तार किया गया था। समीर से मिली जानकारी के आधार पर कर्नाटक पुलिस ने एक महिला समेत 4 लोगों को हिरासत में लिया था।
आरोपी तावड़े मुंबई के एक हॉस्पिटल में बतौर ईएनटी स्पेशलिस्ट 15 साल से काम कर रहा है। तावड़े ने दाभोलकर के खिलाफ एक प्रोटेस्ट मार्च में भी हिस्सा लिया था। सीबीआई को सनातन संस्था के सदस्य सारंग अकोलकर के घर छापेमारी के दौरान तावड़े के शामिल होने की जानकारी मिली थी। ये दोनों ईमेल के जरिए एक दूसरे से कॉन्टैक्ट में थे। 2009 में गोवा में हुए ब्लास्ट मामले में सारंग का नाम सामने आया था। सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में तीन और संदिग्धों को सीबीआई जल्द ही गिरफ्तार कर सकती है।
बता दें कि दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को दिनदिहाड़े गोली मारकर की गई हत्या के मामले की जांच मुंबई हाईकोर्ट ने मई 2014 में सीबीआई को सौंप दी थी। इस हत्या पर कई जानेमाने लोगों ने रोष व्यक्त किया था साथ ही कई लेखकों और अन्य हस्तियों ने कथित असहिष्णुता के विरोध में अपने पुरस्कार भी लौटा दिए थे।

मंदिर में दलितों के रोक पर हाईकोर्ट ने मांगा डीएम दून से जवाब

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विकासनगर के एक मंदिर में दलितों के प्रवेश पर पिछले दिनों हुए भेदभाव का मामला जनहित याचिका के जरिए हाईकोर्ट पहुंच गया है। याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने डीएम देहरादून को दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है। साथ ही कोर्ट ने याची व उसके परिवार को सुरक्षा देने के निर्देश एसएसपी देहरादून को दिए हैं।

विकासनगर, देहरादून निवासी दौलत कुंवर ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा कि जौनसार भाबर में पिछले दिनों दलितों के मंदिर में प्रवेश करने पर सवर्ण जाति के लोगों ने आपत्ति जताई तथा मारपीट की। पथराव में याचिकाकर्ता व उसके साथी घायल हो गए थे। उस दौरान सांसद तरुण विजय पर भी हमला किया गया था।

याची ने कोर्ट से अनुरोध किया कि जौनसार भाबर के मंदिरों में दलितों के जाने पर सवर्णों द्वारा रोकने से बचाने के लिए प्रशासन से कहा जाए और उनके मंदिरों में प्रवेश को सुनिश्चित करवाया जाए। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता आयुष नेगी की ओर से बताया गया कि जनहित याचिका दायर करने के बाद याचिकाकर्ता व उसके परिवार को जान का खतरा हो गया है।

शुक्रवार को पक्षों की सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ एवं न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता व उसके परिवार को सुरक्षा मुहैया कराने के निर्देश एसएसपी देहरादून को दिए। न्यायालय ने डीएम देहरादून को इस संबंध में दो सप्ताह के भीतर विस्तृत शपथपत्र देने को कहा है।

वहीं याचिकाकर्ता दौलत कुंवर की ओर से मीडिया को बताया गया कि वह पिछले 13 वर्षों से उत्तराखंड में दलितों पर होने वाले अत्याचारों का विरोध करते हुए उनके हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने पिछले साल जौनसार भाबर के परशुराम मंदिर में दलितों और औरतों के प्रवेश कराने में जीत हासिल की है।

देश की निगहबानी को IMA ने सौंपे 565 जाबांज अफसर

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देहरादून स्थित देश की प्रतिष्ठित भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) में शनिवार को पासिंग आउट परेड के साथ ही देश की सेनाओं 565 जांबाज अफसर मिल गए। 45 विदेशी कैडेट्स भी आईएमए से पास आउट होकर अपने देश की सेनाओं में सेवा देंगे। इसके साथ ही आईएमए से निकले अफसरों की संख्या 58983 पर पहुंच गई।
शनिवार को सुबह आईएमए की ऐतिहासिक चेटवुड बिल्डिंग के सामने मैदान में ड्रिल स्क्वायर में पासिंग आउट परेड की गई। जनरल ऑफिसर इन कमांडिंग चीफ ले. जन. सरथ चंद्र परेड की सलामी ली।

यहां 610 जेंटलमैन कैडेट्स अंतिम पग पार कर अफसर बन गए। इनमें 45 विदेशी जीसी भी शामिल हैं। इसी के साथ आईएमए के साथ एक और उपलब्धि हासिल की। जेंटलमैन कैडेट्स के अंतिम पग पार करते ही आईएमए के इतिहास में देश को 58983 अफसर देने का रिकॉर्ड जुड़ गया।

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इसमें 1908 फॉरेन जीसी भी शामिल हैं। 425 जीसी 138-रेगुलर कोर्स के होंगे, जिनमें से 107 डायरेक्ट एंट्री, 279 एक्स एनडीए और 39 एक्स एसीसी वाले कैडेट्स शामिल हैं।
इसके साथ ही 140 कैडेट्स 121-टेक्निकल ग्रेजुएट कोर्स के पासआउट होंगे। 45 विदेशी कैडेट्स भी 138-रेगुलर कोर्स के पासआउट हुए।

आईएमए से इस बार उत्तराखंड के 52 जाबांज अफसर पास आउट हुए। जनसंख्या के लिहाज से छोटे राज्यों में शुमार उत्तराखंड का इतनी बड़ी संख्या में ऑफिसर देना मिसाल है। जनसंख्या घनत्व के हिसाब से उत्तराखंड देश को सबसे ज्यादा जांबाज देने वाले राज्यों के शीर्ष पर दस वर्षों से जमा हुआ है।

वहीं इस बार यूपी के सर्वाधिक 98 जेंटलमैन कैडेट्स पासआउट होंगे। बिहार और हरियाण से 60-60 जांबाज ऑफिसर सेना का हिस्सा बनेंगे।

पुलिस ने रामवृक्ष समेत 27 लोगों को जिंदा पकड़ा और उसके बाद…

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जवाहर बाग कांड को लेकर अब मथुरा में लोग जुबान खोलने लगे हैं। एक सिपाही की बात पर अगर यकीन किया जाए तो वह दो जांबाजों की शहादत के बाद भी अपने विभाग को ही कठघरे में खड़ा कर रहा है। वह खुद सीबीआई जांच को जरूरी बताकर पुलिस के किए पर गंभीर सवाल उठा रहा है। इतना ही नहीं, उसका दावा यह भी है कि पुलिस ने रामवृक्ष को परिवार समेत जिंदा पकड़ लिया था, बाद में उसे मारा गया।

मथुरा पुलिस लाइन पर एक सिपाही ने जवाहर बाग कांड पर बमुश्किल बात की। सिपाही (जिसकी बातचीत रिकार्ड है) की बातें पुलिस कार्रवाई को सवालों के घेरे में खड़ा कर रही हैं। हालांकि उसकी बातों में कितनी सच्चाई है यह दीगर बात है। उसका कहना है कि पुलिस अफसरों ने कार्रवाई को छिपाया। कार्रवाई सुबह करनी चाहिए थी, भीड़ की तादाद का अंदाजा आसानी से लग जाता। उसने दावा किया कि अफसरों की मौत के बाद पुलिस ने रामवृक्ष समेत 27 लोगों को पकड़ लिया था।

सिपाही का दावा है कि सभी को पुलिस लाइन के सभागार में लाया गया। लखनऊ के एक अफसर को यह सब बताया भी गया। बकौल सिपाही उसके बाद सभी को मारकर आग में फेंका गया। रामवृक्ष को मारने के बाद भी शिनाख्त नहीं की। उसको साजिश के तहत दो दिन लापता दिखाया। पांच हजार का इनाम घोषित करने के बाद मरा हुआ दिखा दिया। सिपाही का कहना है कि जवाहर बाग में काफी लोगों की जान ली गई। कुछ को शवदाह गृह में जला दिया गया।

जवाहर बाग के नजदीक मवई कालोनी के एक दुकानदार का कहना है कि पुलिस ने कार्रवाई के दौरान अंदर किसी को नहीं जाने दिया। पर अब काफी तादाद में लोगों के मरने की चर्चा है। लेकिन सच्चाई तो पुलिस वाले ही बता सकते हैं। इसी कालोनी के बीटेक कर रहे एक छात्र का कहना था कि पुलिस के साथ भीड़ भी थी। भीड़ ने भी मारा। इसी कालोनी के एक बुजुर्ग का कहना था कि जितने मुंह उतनी बात। मरने वालों की तादाद ज्यादा हो सकती है। अगर मरने वाले मथुरा के होते तो सच का पता चल जाता लेकिन सभी दूसरे प्रदेश के थे। उनका कोई अब यहां है नहीं।
कब्जेधारी बड़ी तादाद में घायल हुए। उनको पकड़कर जेल भेजा गया। अस्पतालों में भर्ती कराया गया। लेकिन घायलों से मिलने पर पुलिस का पहरा है। हालांकि बातचीत में लोग अब कहने लगे हैं कि बाग के भीतर का सच पुलिस और कब्जेधारी ही जानते है। अगर घायलों से बात करा दी जाए तब सारी असलियत सामने आ जाएगी।

जवाहर बाग की घटना के बाद ड्यूटी पर तैनात एक पुलिस अफसर ने माना कि अफसरों की मौत के बाद फायरिंग की गई। हालांकि उनका कहना था कि गोली पैरों में मारने के निर्देश दिए गए थे। भीड़ को निकालने के लिए पुलिस ने दो जगह से बाउंड्री तोड़ी। ताकि पुलिस के दबाव बनाने पर वह भाग सके, लेकिन लोग नहीं भागे। वहां तैनात एक दारोगा का तर्क था कि भीड़ ने झोपड़ियों में आग लगाई ताकि पुलिस उससे डरकर भागे। दारोगा का कहना था कि पुलिस पर हमले के बाद जवाबी कार्रवाई की गई।

मायावती और सोनिया गांधी की नज़दीकियों से बिगड़ सकते हैं अन्य दलों के समीकरण

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भाजपा का खौफ बसपा प्रमुख मायावती और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीच दूरियां घटा रहा है। बसपा और कांग्रेस के बीच नया दोस्ताना संबंध विकसित हो रहा है। राज्यसभा चुनाव में यह केमेस्ट्री भाजपा का खेल बिगाड़ रही है। भाजपा ने निर्दलीय और दूसरे दलों के बागियों के बूते कांग्रेसी दिग्गजों की राह पथरीली बनाने की रणनीति बनाई थी। लेकिन मायावती की बदली सियासत से भाजपाई चक्रव्यूह टूटता नजर आ रहा है। राज्यसभा चुनाव में राजस्थान और उत्तर प्रदेश में मायावती कांग्रेस के तारणहार की भूमिका में उभर रही है। मध्य प्रदेश में बसपा के समर्थन ने कांग्रेस के विवेक तन्खा की राह आसान कर दी है।

मायावती ने उत्तराखंड में समर्थन देकर संकट से उबारा था। दोनों दलों की निकटता से उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए नए समीकरण की बुनियाद रखी जा रही है। हांलाकि बसपा प्रमुख ने उत्तर प्रदेश में अकेले चुनाव लडने का ऐलान किया है लेकिन नई दोस्ती सीटों पर दोस्ताना संघर्ष के समझौते का रूप ले सकती है। आपसी समझदारी से चुनाव के लिए सेनाएं सजाने की रणनीति संभव है। मायावती अब सपा और भाजपा पर ज्यादा आक्रामक हैं और कांग्रेस के प्रति अपेक्षाकृत नरमी दिखा रही हैं। भाजपा ने उप्र में सपा से अपना मुकाबला बताकर बसपा को अपरोक्ष तरीके से घेरने की योजना बनाई है लेकिन मायावती से दांव से भाजपा का गणित गड़बड़ हो रहा है।

भाजपा ने राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के कपिल सिब्बल की राह रोकने के लिए निर्दलीय प्रीति महापात्रा को समर्थन दिया है लेकिन बसपा के बदले रुख से सिब्बल को राहत मिलती दिख रही है। बसपा के पास दो प्रत्याशियों को जिताने की क्षमता के बाद भी 12 अतिरिक्त वोट हैं। ये मत अगर सिब्बल को मिलते हैं तो उनकी नैया पार हो सकती है। रालोद के अजित सिंह ने पहले ही सपा और कांग्रेस दोनों को समर्थन का एलान कर रखा है। जीत के लिए 34 वोट चाहिए जबकि कांग्रेस के 29 विधायक हैं। एक-दो विधायक क्रास वोटिंग भी कर सकते हैं। ऐसे में कांग्रेस की उम्मीदें मायावती पर ही टिकी हैं। सपा अपने सभी सात प्रत्याशियों की जीत के प्रति आश्वस्त है।

राजस्थान में बसपा के तीन विधायक कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार कमल मोरारका को समर्थन दे रहे हैं। हांलाकि मोरारका की राह कठिन हो गई है लेकिन बसपा और कांग्रेस की दोस्ती राजस्थान में कायम है। सूत्रों के मुताबिक भाजपा ने जरूरी वोटों का इंतजाम कर लिया है। भाजपा के वैंकेया नायडू, ओम माथुर, हर्षवर्धन ंसिंह और आर के वर्मा की राह आसान दिख रही है। हरियाणा में भाजपा समर्थित सुभाष चंद्रा के लिए मुश्किलें पैदा हुई हैं।

26/11 हमले के वक्त PAK में मजे कर रहे थे भारतीय अफसर

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साल 2008 में भारत और पाकिस्तान के गृह सचिव स्तर की वार्ता के तुरंत बाद मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था. नए खुलासे में पता चला है कि पाकिस्तान के आग्रह पर भारतीय गृह सचिव को एक दिन और वहां रोक लिया गया था. दोनों देशों के बीच 26 नवंबर को ही वार्ता खत्म हुई थी और उसी दिन भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई पर आतंकी हमला किया गया था.
मुंबई हमले के दौरान देश के तत्कालीन गृह सचिव मधुकर गुप्ता और कुछ वरिष्ठ अधिकारी पाकिस्तान के खूबसूरत हिल स्टेशन मरी में रुके हुए थे. हमले के साढ़े सात साल बाद यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. गुप्ता के साथ अतिरिक्त सचिव (बॉर्डर मैनेजमेंट) अनवर अहसन अहमद और आखिरी वक्त में शामिल किए गए संयुक्त सचिव (आंतरिक सुरक्षा) दीप्ति विलास और दूसरे अधिकारी भी थे.

पाकिस्तानी अधिकारियों ने दलील दी थी कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल को वहां के गृह मंत्री से मिलना चाहिए, जो उस वक्त यात्रा पर थे. गृह मंत्रालय के अक तत्तकालीन अधिकारी ने कहा कि गृह सचिव स्तर की वार्ता खत्म होने के बाद भी पाक अधिकारियों ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल को एक और दिन रुकने के लिए कहा. उनके ऐसा करने की नीयत पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं.
बताया जा रहा है कि गुप्ता को 26 नवंबर को कहा गया था कि वह 27 नवंबर से पहले गृह मंत्री से बात नहीं कर सकते, क्योंकि वह यात्रा पर हैं. मुंबई में आतंकी हमला अगले दिन यानी 27 नवंबर को भी जारी रहा था. ऐसे हालात में पाक अधिकारियों का भारतीय समकक्षों को एक और दिन रुकने के लिए कहना और साथ ही भारतीय अफसरों का तैयार हो जाना चौंकाने वाला है.
एक पूर्व नौकरशाह ने बताया कि हालांकि हम इस्लामाबाद में दो दिन तक रुके थे. पाकिस्तान ने हमें मरी में एक हिल रिजॉर्ट में ठहराने की योजना बनाई थी. अब सोचें तो शक होता है कि क्या उनका असली मकसद भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का मुंबई हमले पर रिस्पॉन्स को कमजोर करना या इसमें देरी करना तो नहीं था.

भारतीय अफसरों का पाकिस्तान में तय वक्त से ज्यादा ठहरने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना भी सवाल खड़े करता है. क्योंकि हमले में शामिल लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI में कार्यरत अधिकारी भी हैंडल कर रहे थे. गृह मंत्रालय के एक पूर्व अधिकारी ने अब कहा है कि फोन के सिगनल कमजोर थे.

गुप्ता ने बताया है कि उन्हें हमले के बारे में पता चलने पर उन्होंने गृह मंत्रालय में विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) एम.एल. कुमावत से बात की थी. जो उस वक्त हमले पर शुरुआती प्रतिक्रियाएं दे रहे थे. संयुक्त सचिव (पूर्वोत्तर) नवीन वर्मा और उप सचिव (आतंरिक सचिव) आर.वी.एस. मणि उस रात गृह मंत्रालय के कंट्रोल रूम में रुके थे.

मणि ने उस रात को याद करते हुए बताया कि वह और वर्मा 10 घंटे तक कंट्रोल रूम में रुके थे. 27 नवंबर की सुबह NSA के एमके नारायणन ने चार्ज संभाल लिया था. जानकारी के मुताबिक गुप्ता भी 27 नवंबर की दोपहर दिल्ली पहुंच गए थे.

चीन ने NSG में भारत की सदस्यता को लेकर किया विरोध

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विएना: परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की विएना में हुई दो दिवसीय बैठक में इस मुद्दे पर किसी निष्कर्ष पर न पहुंच पाने के बाद एनएसजी में सदस्यता के लिए भारत की अर्जी पर दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में इस महीने के अंत में होने वाले एनएसजी के पूर्ण अधिवेशन में विचार किए जाने की संभावना है।

इससे पहले अमेरिकी समर्थन से मिले बल के बीच एनएसजी की सदस्यता के भारत के दावे को ज्यादातर सदस्य देशों से सकारात्मक संकेत मिले थे, लेकिन चीन इसके विरोध पर अड़ा था। चीन, भारत की सदस्यता का विरोध करने वाले देशों की अगुआई कर रहा था, वहीं तुर्की, न्यूजीलैंड, आयरलैंड, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रिया चीनी रुख के साथ थे।

चीन हमेशा से एनएसजी में भारत की सदस्यता का विरोध करता रहा है। वियना में हुई बैठक में चीन ने सीधे तौर पर तो भारत की सदस्यता का विरोध नहीं किया, लेकिन इसे एनपीटी पर दस्तखत न करने से जोड़ा।

चीन की दलील है कि सिर्फ परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत करने वाले देशों को ही इसमें एनएसजी की सदस्यता मिलनी चाहिए। चीन का यह भी कहना है कि यदि किसी तरह की रियायत देकर भारत को एनएसजी की सदस्यता दी जाती है तो पाकिस्तान को भी इस संगठन की सदस्यता दी जानी चाहिए।

अमेरिका भारत की सदस्यता का पुरजोर समर्थन कर रहा है और ज्यादातर सदस्य देश भी समर्थन कर रहे हैं, लेकिन इसका विरोध कर रहे चीन की दलील है कि एनएसजी को नए आवेदकों के लिए विशिष्ट शर्तों में ढील नहीं देनी चाहिए। एनएसजी संवेदनशील परमाणु प्रौद्योगिकी तक पहुंच को नियंत्रित करता है।

एनएसजी आम राय के आधार पर काम करती है और भारत के खिलाफ किसी एक देश का वोट भी उसकी दावेदारी में रोड़े अटका सकता है। 48 देशों के समूह एनएसजी में चीन के अलावा न्यूजीलैंड, आयरलैंड, तुर्की, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रिया भी भारत की दावेदारी के विरोध में हैं। सियोल में 24 जून को एनएसजी का पूर्ण अधिवेशन होने वाला है।

वहीं चीन ने माना है कि भारत और अमरीका के सम्बंध अभूतपूर्व मुकाम पर हैं। चीन ने सरकार नियंत्रित समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स के माध्यम से कहा है कि चीन भारत के विकास में सहयोग देने को तैयार है। चीन के बगैर भारत के सपने साकार नहीं होंगे।

चीन ने जहां अमरीका पर एशिया-प्रशांत क्षेत्र को अस्थिर करने का आरोप लगाया है, वहीं भारत को समझाने की कोशिश की है कि वह अपनी गुट निरपेक्ष नीति से न हटे। यह उसकी विरासत है।

प्यारे-मोहन संवाद

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प्यारे – ”मोहन कुछ सुना?”
मोहन – ”नहीं तो क्या हुआ?”
प्यारे – ”पूरी दुनिया में तहलका मच हुआ है.”
मोहन – ”क्यों ? आईएसआईएस वालों ने कहीं परमाणु बम गिर दिया क्या?”
प्यारे – ”उससे भी खतरनाक बम फटा है पनामा पेपर नाम का. दुनिया में जितने महान लोग हैं, सबने अपने-अपने देश से टैक्स चोरी करके अरबों रुपये फ़र्ज़ी कंपनी बनाकर जमा कर रखे थे.”
मोहन – ”यानी महान लोगों के महान कार्य.”
प्यारे – ”अब बेशर्मों की तरह कह रहे हैं कि हमने कोई चोरी नहीं की है.”
मोहन – ”महान लोगों की महान बातें. कुछ भी कहो, ये महान लोग हैं इनके इस महान कार्य को चोरी नहीं कहा जा सकता. चोरी उसे कहते हैं जो पेट भरने के लिए की जाये. और यह गरीब आदमी करता है जो इनके इन्हीं महान कार्यों की वजह से और गरीब होता जा रहा है.”
प्यारे – ”हाँ, यह तो सोचने वाली बात है.”

'भाभी जी घर पर हैं' को लेकर नर्वस थीं नई अंगूरी भाभी शुभांगी

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लोकप्रिय टेलीविजन धारावाहिक ‘भाभी जी घर पर हैं’ में शिल्पा शिंदे की जगह अंगूरी भाभी का किरदार निभा रहीं अभिनेत्री शुभांगी अत्रे ने बताया कि वह घर-घर में पहचानी जाने वाली अंगूरी भाभी का किरदार निभाने से पहले उत्साहित होने के साथ-साथ नर्वस भी थीं.

शुभांगी ने कहा, ‘टेलीविजन पर इस खूबसूरत किरदार को निभाने का विकल्प चुनने पर काफी उत्साहित होने के साथ-साथ मैं नर्वस भी थी. अंगूरी का किरदार निभाना चुनौतीपूर्ण है.’
छोटे पर्दे की ‘भाभी जी’ शिल्पा शिंदे का टीवी प्रोडक्शन हाउस एडिट-2 संपादित द्वितीय के साथ कुछ मतभेद हो गया था. उन्हें कानूनी नोटिस भेजा गया था. इसके बाद वह शो से निकल गईं.
‘कसौटी जिंदगी की’, ‘कस्तूरी’ और ‘चिड़ियाघर’ जैसे धारावाहिकों में नजर आ चुकीं शुभांगी को उम्मीद है कि किरदार की लोकप्रियता बनी रहेगी और उन्हें भी वही प्यार मिलेगा, जो पहले वाली ‘भाभी जी’ को मिला था. उन्होंने कहा, ‘अब मेरा काम निर्देशक के नजरिए को समझना है और इसके साथ पूरी तरह न्याय करना है. मुझे आशा है कि इस शो के प्रशंसक मुझे भी वहीं प्यार देंगे जो उन्होंने पहले इस किरदार को दिया.’

शुभांगी ने कहा कि धारावाहिक की पूरी टीम ने उन्हें सहज महसूस कराया. उन्होंने कहा, ‘शूटिंग के दौरान मैं पहले ही घबरा गई लेकिन सभी इतने मिलनसार थे कि उन्होंने मुझे सहज महसूस कराया.’

पुस्‍तक समीक्षा : ज़िन्दगी के ज़ज्बातों से खनकती एक अनूठी गुल्लक

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आज जब हिंदी में साहित्य का अर्थ निरपवाद रूप से केवल कहानी, कविता और बहुत हुआ तो उपन्यास रचना ही रह गया है, ऐसे में मनीषा श्री की किताब ‘जिंदगी की गुल्लक’ इतना संतोष जरूर देती है कि हिंदी साहित्य के इस बासी से हो रहे माहौल में भी कुछ नया व ताज़ा करने की कोशिश पूरी तरह से मरी नहीं है। मनीषा की इस किताब का सबसे प्रमुख नयापन है, इसमे मौजूद ‘विधागत प्रयोग’।

ये किताब न तो पूरी तरह गद्य है और न ही पूरी पद्य। यह न तो कोई कहानी, कविता, निबंध आदि का संग्रह है और न ही उपन्यास, नाटक आदि की रचना; इसकी रचावट-बनावट कुछ यूं है कि इसमे कविता भी है और कहानी भी। यूं कह सकते हैं कि कहानियों की कविताएं या कविताओं की कहानियों का संग्रह है ये किताब। चूंकि कोई भी कविता पढ़ते समय पाठक उसके प्रति मन में अपने अनुसार एक कल्पना-चित्र बना लेता है कि ये कविता इस भाव को प्रदर्शित कर रही है। लेकिन, यह कत्तई जरूरी नहीं कि रचनाकार ने उस कविता की रचना उसी भाव में की हो। अब जैसे कि एक पेड़ पर यदि पांच लोग कविता लिखें तो यह तय है कि सबकी नहीं तो कईयों की कविताएं अलग होंगी। निष्कर्ष यह कि पेड़ एक ही है, पर उसके प्रति सबका नजरिया अलग-अलग है।
इसी तरह कोई रचनाकार रचना अपनी दृष्टि से करता है और पाठक उसे अपनी दृष्टि से समझता है, दोनों की दृष्टि एक भी हो सकती है और अलग भी, लेकिन मनीषा की इस किताब में कविताओं की कहानियां देकर इस समस्या को ही समाप्त कर दिया गया है, यानी कि अमुक कविता किस कारण से और किस भाव व मनोस्थिति में लिखी गई है, ये पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया गया है। पुस्तक का जो गद्य है, उसे संस्मरण और डायरी जैसी श्रेणियों में रखा जा सकता है। बाकी तो छंदमुक्त-अतुकांत कविता है ही।

यूं तो इस किताब का प्रत्येक अध्याय अपने आप में स्वतंत्र है, लेकिन जरा गहराई से अगर गौर करें तो यह स्पष्ट होता है कि स्वतंत्र से दिखने वाले ये अध्याय कहीं न कहीं एक दूसरे से क्रमवार ढंग से न केवल जुड़े हैं, बल्कि लेखिका को अपने अब तक के जीवन में मिले अनुभवों का क्रमवार विश्लेषण भी हैं।

इसी क्रम में किताब के कुछ प्रमुख अध्यायों पर एक संक्षिप्त नज़र डालें, तो इसका पहला अध्याय ‘शब्द’ किताब की वास्तविक भूमिका है। इसमें जीवन की आपा-धापी से कुछ समय मिलने पर लेखिका में लेखन की अन्तःप्रेरणा उत्पन्न होती है, और वो अपनी सबसे प्यारी सहेली यानी अपनी डायरी की तरफ मुड़ती है। दूसरे अध्याय में चीजें फ्लैशबैक में चली जाती हैं और एक बच्चे को जन्म देने जा रही लेखिका काफी पीछे शादी से पहले की आईआईटी में ऑल इण्डिया 20 रैंक लाने वाली एक छात्रा हो जाती है, जिसे तब उसके नाना समझाते हैं कि कामयाबियां कितनी भी बड़ी हों, कदम हमेशा जमीन पर ही रहने चाहिए और नाना की यही सीख लेखिका के इस अध्याय की कविता है – कदम जमीन पर रहें।

तीसरे अध्याय ‘जिंदगी’ में लेखिका आइआइटी मे अंतिम वर्ष में है, लेकिन आर्थिक मंदी के कारण प्लेसमेंट करने कोई कंपनी नहीं आ रही, जिस कारण बेहद हताश और परेशान है। वो काबिल है, लेकिन किस्मत के कारण उसे नौकरी नहीं मिल पा रही। तिस पर घर वालों की उम्मीदों का दबाव अलग है। इन तनावों में उलझा उसका दिमाग एक बारगी आत्महत्या जैसी चीज तक सोच लेता है। हताशा की इस हालत में जब फोन पर उसके पापा यह कहते हैं कि ‘पापा इज ऑलवेज विथ यू’ तो जैसे उसे ‘लाइफ टॉनिक’ मिल जाती है और जिंदगी फिर खूबसूरत लगने लगती है।
कुल मिलाकर ज़िन्दगी के उत्साह-उम्मीद-निराशा-तनाव आदि विविध गाढ़े-फीके रंगों और उन पर मनुष्य की प्रतिक्रियाओं का बाखूबी चित्रण इस अध्याय में हुआ है। ऐसे ही, 13वे अध्याय ‘कोशिश’ में दुर्घटना से पैर में फ्रैक्चर के बावजूद लेखिका अकेले ही खुद को और अपने छोटे-से बेटे को अपनी कोशिशों से संभालने की घटना का जिक्र कर कोशिश के महत्व और उसके बाद होने वाले संतोष को बाखूबी बयां की है, तो वही 14वें अध्याय ‘सपने’ में लेखिका ने अपने मां बनने के सपने और उसके पूरे होने में हुई जद्दोजहद का वर्णन करते हुए यही कहने की कामयाब कोशिश की है कि सपना कोई भी हो, उसके पूरा होने का एक सही वक़्त होता है और उसे तभी पूरा होना चाहिए।

इसी तरह आगे के कुछ अध्यायों जैसे ‘दहेज़’, ‘बेटी की मां’, ‘मां हूं, भगवान् नहीं’, आदि में लेखिका द्वारा बेटी या कि स्त्री के प्रति समाज के संकुचित दृष्टिकोण पर बेबाकी और तार्किकता के साथ अपनी बात कहने की काफी हद तक कामयाब कोशिश की गई है। ‘मां’ और ‘मेरे पापा’ जैसे अध्याय तो शीर्षक से ही स्पष्ट हैं कि लेखिका के अपने माता-पिता से समबन्ध के वर्णन को समर्पित हैं। फिर अन्धविश्वास, वक़्त, टुकड़े, असमंजस, नदी की कहानी, आदि में भी जीवन के विविध पहलुओं की मौजूदगी है।

इन सब में किताब का 12वां अध्याय ‘मै चुप थी’ सबसे बेहतरीन है। इसमें काम से थकी-हारी लेखिका जब अपने पति के पास जाती है तो वो खुद अपनी परेशानियों में उलझा है और लेखिका पर चिल्ला पड़ता है तथा गुस्से में उसके सभी पारिवारिक योगदानों को नकार देता है। लेखिका इन बातों का जवाब देने में पूर्णतः समर्थ है, लेकिन वो अपने रिश्ते को इस क्षणिक आवेश की भेंट नहीं चढ़ने देना चाहती, इसलिए चुप रहती है और अगली सुबह सबकुछ ठीक हो जाता है। लेकिन उसका यह भी कहना है कि आज तो मै चुप रही…“बस एक गुज़ारिश है कि समय पड़ने पर तुम भी मुझको सुनना, मेरे गुस्से को झेलना क्योंकि मेरे पास सिवा तुम्हारे कोई नहीं है जिसके सामने अपना दिल खोल सकूं।”

इस प्रकार अधिकांश समकालीन स्त्रीवादियों के लिए भी यह अध्याय पठनीय है कि सशक्त स्त्री के नाम पर उनके द्वारा स्त्री को लड़ाकू, हठी या अभिमानिनी बनाने के जो विचार गढ़े जा रहे हैं, वो कत्तई सच्चा स्त्री सशक्तिकरण नहीं है। वे इस अध्याय की स्त्री को देखें जो सशक्त तो है किन्तु समझदार, लचीली और धैर्यवान भी है और अपनी सशक्तता के भौंडे प्रदर्शन के लिए अपने रिश्ते की तिलांजलि नहीं देती क्योंकि, उसमे ये समझ है कि हर बात को सिर्फ स्त्री-पुरुष की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। कुल मिलाकर इस अध्याय को हासिल-ए-किताब भी कहा जा सकता है।
भाषा-शैली की बात करें तो मनीषा की भाषा काफी लचीली है, जिसमे वे बातचीत के अंदाज में अपनी बातें कहती जाती हैं। हालांकि अभी यह मनीषा की पहली किताब है तो इसमें शब्दों के प्रयोग में तनिक असावधानी दिखती है। असावधानी ये कि एक ही वाक्य में चार हल्के और सामान्य शब्दों के साथ दो भारी-भरकम शब्दों जिनका पर्याय आम बोलचाल के शब्दों में भी उपलब्ध है, का इस्तेमाल मनीषा कर गई हैं। जैसे कुछ वाक्य हैं, ‘बेफिक्र होकर अपना कर्म कर’, ‘भले लड़का कितना ही विवेकशील क्यों न हो’, ‘जीत नमक रहित पकवान की भांति’ इन वाक्यों में कर्म, विवेकशील, भांति जैसे भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग हुआ है जिनसे अर्थ पर तो नहीं लेकिन, वाक्य के प्रवाह और सौन्दर्य पर प्रभाव पड़ता है। दूसरे वाक्य में ‘विवेकशील’ की जगह समझदार शब्द रखिये तो भी अर्थ यही रहेगा लेकिन, वाक्य अधिक सहज और ग्राह्य हो जाएगा। यह लेखन का कला-पक्ष है, इसमे मनीषा को अभी जरा और काम करने की आवश्यकता है।

इसी क्रम में अगर कविताओं की बात करें तो मनीषा के पास कथ्य और भाव तो भरपूर हैं जिन्हें उन्होंने अपनी कविताओं में ठीकठाक बयाँ भी किया है। लेकिन अभी इस दिशा में उन्हें और मेहनत करने की जरूरत है। अतुकांत कविता के स्तर को गिराकर आज के रचनाकारों ने उसे जरूरत से ज्यादा आसान बना दिया है, अन्यथा उसका भी एक ढंग होता है।

चूंकि, अतुकांत कविता में लय-तुक नहीं होती, इसलिए अगर आप सावधान नहीं रहे तो वो कब गद्य बन जाएगी आपको पता भी नहीं चलेगा। इसलिए उसकी रचना के समय उसके पदों में एक अलग-सा प्रवाह रखा जाता है ताकि वो गद्य न बने और ये करना पूरी तरह से रचनाकार की सृजन क्षमता पर ही निर्भर करता है। मनीषा ने काफी हद ऐसा करने की कोशिश की है लेकिन, अभी और प्रयास की जरूरत है। साथ ही कविताओं में भी शब्दों को लेकर उन्हें उपर्युक्त प्रकार से ही सावधान रहने की जरूरत है।

बहरहाल, कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि मनीषा की इस गुल्लक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये अपनी बनावट (डिजाईन) में ही एकदम अलग और अनूठी है और हमें यह मानना होगा कि इस गुल्लक ने अपने आप में हिंदी साहित्य को विधागत स्तर पर और समृद्ध करने का ही काम किया है। गुल्लक के अन्दर सबके लिए कुछ न कुछ मौजूद है।

बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक किसीको भी ये गुल्लक निराश नहीं करने वाली। और चूंकि, मनीषा शहरी परिवेश में पली-बढ़ी एक प्रगतिशील लड़की रही हैं, इसलिए उनके अनुभवों से भरी ये गुल्लक कहीं न कहीं शहरी प्रगतिशील लड़कियों के अनुभवों का प्रतिनिधित्व करने की भी विशेष क्षमता रखती हैं।

संभव है कि मनीषा की इस गुल्लक से कहानी-कविता-उपन्यास में डूबे हिंदी साहित्य के समकालीन सूरमाओं को भी कुछ नया रचने की प्रेरणा मिले और वे समझें कि अभी बहुत कुछ है, जिसे रचकर हिंदी साहित्य को न केवल कथ्य के बल्कि कला और शिल्प के स्तर पर भी और समृद्ध किया जा सकता है। आखिर में, इस सुन्दर व सार्थक रचना के लिए मनीषा को ढेरों बधाइयां.!