Home विशेष खबर हनुमत साधना से सहज ही मिल जाती हैं अष्ट सिद्धियाँ

हनुमत साधना से सहज ही मिल जाती हैं अष्ट सिद्धियाँ

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हमारे ऋषि-मुनि, साधु-संत, महात्माओं तथा भक्तों ने ज्ञान प्राप्ति तथा लौकिक सिद्धियों की प्राप्ति हेतु अनेक प्रकार की साधनाओं का मार्ग प्रशस्त किया है। हनुमत साधना भी उन्हीं में से एक है। हनुमत साधना से अनेक लौकिक सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं, क्योंकि इन सभी आठों सिद्धियों के स्वामी हनुमानजी ही हैं। आइये जानते हैं इन आठों सिद्धियों के बारे में और यह भी जानते हैं की कब-कब हनुमानजी ने अपनी इन सिद्धियों का प्रयोग किया।
हमारे ऋषि-मुनि, साधु-संत, महात्माओं तथा भक्तों ने ज्ञान प्राप्ति तथा लौकिक सिद्धियों की प्राप्ति हेतु अनेक प्रकार की साधनाओं का मार्ग प्रशस्त किया है। हनुमत साधना भी उन्हीं में से एक है। हनुमत साधना से अनेक लौकिक सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं, क्योंकि इन सभी आठों सिद्धियों के स्वामी हनुमानजी ही हैं। आइये जानते हैं इन आठों सिद्धियों के बारे में और यह भी जानते हैं की कब-कब हनुमानजी ने अपनी इन सिद्धियों का प्रयोग किया।
अष्टसिद्धि के बारे में कहा गया है –
अणिमा महिमा चैव गरिमा लघिमा तथा
प्राप्ति प्राकाम्य ईशित्वं वशित्वं चाष्टासिद्धयः

1. अणिमा – इस सिद्धि का स्वामी अति सूक्ष्म अर्थात अणु के बराबर रूप धारण कर सकता है। हनुमान जी ने लंका में प्रवेश करने के समय इसका प्रयोग किया था।
2. लघिमा – इस सिद्धि का स्वामी लघु बहुत छोटा या हल्का बन सकता है। हनुमान जी ने इसका प्रयोग सुरसा के सम्मुख किया था।
3. महिमा – हनुमानजी की महिमा का वर्णन जामवंत ने समुद्र लंघन के समय किया। तब हनुमानजी ने अपनी शक्ति का प्रयोग कर समुद्र पार किया।
4. गरिमा – इस सिद्धि के बल पर योगी अपना गुरुत्व बढ़ा सकता है। वह अत्यंत ही भारी हो सकता है। इस सिद्धि का प्रदर्शन हनुमानजी ने द्वापर युग में महाबली भीम के सम्मुख तब किया था, जब भीम पुष्प लेने गंधमादन पर्वत की ओर जा रहे थे और हनुमानजी वृद्ध वानर का रूप धारण कर राह में बैठे थे। 10 हजार हाथियों के बल वाले भीम से वृद्ध वानर रुपी हनुमानजी की पूँछ भी नहीं हिली।
5. प्राप्ति – इस सिद्धि के प्रतिष्ठित होने पर साधक को वांछित फल प्राप्त होता है। सीता की खोज में अनेक वानर निकले लेकिन एक-अकेले हनुमानजी ही सीतान्वेषक बने।
6. प्राकाम्य – प्राकाम्य वह सिद्धि है जिससे साधक की कामना पूर्ण होती है। राम के राज्याभिषेक के अवसर पर हनुमानजी ने अपनी छाती फाड़कर सीता-राम को अपने हृदय में विद्यमान होना दिखा दिया था।
7. वशित्व – वह सिद्धि है जिससे साधक सबको अपने वश में कर लेता है। सर्व सुख-दुःख हनुमानजी के वश में हैं। इसका वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान चालीसा में किया है।
8. ईशित्व – इस सिद्धि के प्रतिष्ठित हो जाने पर साधक ईश्वरत्व को प्राप्त हो जाता है। हनुमानजी आज सर्वत्र गाँव, नगर यहाँ तक कि घर-घर पूजे जाते हैं। इस प्रकार हनुमानजी के चरित्र में अष्टसिद्धि के प्रतिष्ठित स्वरूपों का स्पष्ट प्रमाण मिलता है।
के बारे में कहा गया है –
अणिमा महिमा चैव गरिमा लघिमा तथा
प्राप्ति प्राकाम्य ईशित्वं वशित्वं चाष्टासिद्धयः

1. अणिमा – इस सिद्धि का स्वामी अति सूक्ष्म अर्थात अणु के बराबर रूप धारण कर सकता है। हनुमान जी ने लंका में प्रवेश करने के समय इसका प्रयोग किया था।
2. लघिमा – इस सिद्धि का स्वामी लघु बहुत छोटा या हल्का बन सकता है। हनुमान जी ने इसका प्रयोग सुरसा के सम्मुख किया था।
3. महिमा – हनुमानजी की महिमा का वर्णन जामवंत ने समुद्र लंघन के समय किया। तब हनुमानजी ने अपनी शक्ति का प्रयोग कर समुद्र पार किया।
4. गरिमा – इस सिद्धि के बल पर योगी अपना गुरुत्व बढ़ा सकता है। वह अत्यंत ही भारी हो सकता है। इस सिद्धि का प्रदर्शन हनुमानजी ने द्वापर युग में महाबली भीम के सम्मुख तब किया था, जब भीम पुष्प लेने गंधमादन पर्वत की ओर जा रहे थे और हनुमानजी वृद्ध वानर का रूप धारण कर राह में बैठे थे। 10 हजार हाथियों के बल वाले भीम से वृद्ध वानर रुपी हनुमानजी की पूँछ भी नहीं हिली।
5. प्राप्ति – इस सिद्धि के प्रतिष्ठित होने पर साधक को वांछित फल प्राप्त होता है। सीता की खोज में अनेक वानर निकले लेकिन एक-अकेले हनुमानजी ही सीतान्वेषक बने।
6. प्राकाम्य – प्राकाम्य वह सिद्धि है जिससे साधक की कामना पूर्ण होती है। राम के राज्याभिषेक के अवसर पर हनुमानजी ने अपनी छाती फाड़कर सीता-राम को अपने हृदय में विद्यमान होना दिखा दिया था।
7. वशित्व – वह सिद्धि है जिससे साधक सबको अपने वश में कर लेता है। सर्व सुख-दुःख हनुमानजी के वश में हैं। इसका वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान चालीसा में किया है।
8. ईशित्व – इस सिद्धि के प्रतिष्ठित हो जाने पर साधक ईश्वरत्व को प्राप्त हो जाता है। हनुमानजी आज सर्वत्र गाँव, नगर यहाँ तक कि घर-घर पूजे जाते हैं। इस प्रकार हनुमानजी के चरित्र में अष्टसिद्धि के प्रतिष्ठित स्वरूपों का स्पष्ट प्रमाण मिलता है।