गरीव सवर्णों को आरक्षण गुजरात सरकार के गले की हड्डी बना

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गरीब सवर्णों को आरक्षण देने के मसले पर गुजरात सरकार बुरी तरह से उलझती दिख रही है. वह न तो इससे पीछे हट पा रही है और न ही आगे बढ़ पा रही है. द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार सरकार ने शुक्रवार को पहले यह नोटिफिकेशन जारी किया कि गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण देने वाले अध्यादेश को लागू नहीं किया जाएगा. लेकिन, कुछ ही घंटे भीतर यह नोटिफिकेशन वापस ले लिया गया. देर रात को सरकार का बयान आया कि उसने पुनर्विचार करते हुए दिन में जारी नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया है. यह अध्यादेश एक मई को आया था. इसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए शिक्षा और नौकरियों में दस फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया था. माना जा रहा था कि यह कवायद राज्य सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण की मांग कर रहे पाटीदार समुदाय को शांत करने के लिए की है.
हालांकि, अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. गुजरात सरकार ने गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है जिसे सुनवाई के लिए पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के सुपुर्द कर दिया गया है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि अध्यादेश पर रोक के चलते इसके तहत आठ अगस्त तक शैक्षणिक संस्थानों में हुए दाखिलों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. चार अगस्त को गुजरात हाईकोर्ट ने गरीब सवर्णों को आरक्षण देने वाले अध्यादेश को असंवैधानिक बताकर खारिज कर दिया था. हाईकोर्ट ने कहा था कि इससे आरक्षण की अधिकतम 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन हो रहा है. गुजरात में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए शिक्षा व नौकरियों में 49 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू है.
पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल ने सरकार के पहले फैसले को तीन करोड़ सवर्णों को मूर्ख बनाने की चाल बताया है. उन्होंने कहा कि भाजपा को आने वाले चुनाव में इसका जवाब मिलेगा. हार्दिक पटेल ने अध्यादेश का पहले भी विरोध किया था. उधर कांग्रेस नेता शंकर सिंह वाघेला ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी थी. उन्होंने कहा था कि सरकार ने संवैधानिक जटिलताओं को जानने के बावजूद जानबूझकर लोगों को धोखा दिया है.