CRPF के DIG को कर दिया था जबरन रिटायर, कोर्ट ने जारी किया नोटिस

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केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल, ‘CRPF’ के DIG को उसके तय रिटायरमेंट से कई वर्ष पहले ही सेवा से हटाने का आदेश जारी किया गया था। उस आदेश के खिलाफ डीआईजी रविंद्र सिंह रौतेला हाई कोर्ट में चले गए। हालांकि ऐसे मामले में राहत की गुंजाइश काफी कम रहती है। केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों में भी समय से पूर्व अधिकारियों और कर्मियों को जबरन रिटायरमेंट दी जाती रही है।

CRPF में आपसी तालमेल के अभाव के कारण सरकारी वकील को तय समय पर केस से जुड़े तमाम तथ्यों से अवगत नहीं कराया गया। इसके चलते कोर्ट को वस्तुस्थिति की जानकारी नहीं दी जा सकी। नतीजा, मणिपुर उच्च न्यायालय ने इस मामले में विभाग यानी सीआरपीएफ को नोटिस जारी कर दिया है। बल को अब काउंटर शपथ पत्र जमा कराना है।

जुलाई में DIG रेंज ‘इंफाल’ आरएस रौतेला को जबरन रिटायरमेंट देने के आदेश जारी किए गए थे। आरोप थे कि रौतेला ने कई जगहों पर अपनी मनमानी की है। उन्होंने फोर्स के नियमों का कथित तौर से उल्लंघन किया है। रौतेला को कई बार चेताया गया, लेकिन वे अपनी मनमर्जी से काम करते रहे। नतीजा, बल मुख्यालय ने उन्हें तीन माह का नोटिस देकर घर भेजने के आदेश जारी कर दिए।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसे बल की एक सामान्य प्रक्रिया बताया था। अगर कोई अधिकारी या जवान, तय नियमों के मुताबिक काम नहीं करेगा तो उसे समय पूर्व सेवानिवृति दे दी जाती है। डीआईजी पर आरोप है कि उन्होंने कभी भी टीम भावना से काम नहीं किया। सीआरपीएफ में केवल एक जगह पर नहीं, बल्कि उनकी तैनाती वाले कई स्थानों से नकारात्मक रिपोर्ट मिली थी।

CRPF द्वारा जबरन रिटायरमेंट का आदेश जारी करने के बाद डीआईजी रौतेला ने हाई कोर्ट की शरण ली। उन्होंने अपना प्रतिवेदन दिया और बल की कार्रवाई पर सवाल उठाया। विभाग को प्रतिवेदन पर जवाब देना चाहिए था, जो समय पर नहीं दिया गया। सरकारी वकील DSGY समरजीत सिंह, बल की तरफ से कोर्ट में पेश हुए। वहां बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो गई। प्रतिवेदन को लेकर बल ने क्या किया, क्या नहीं किया, ये सब जानकारी कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत नहीं हो सकी। कोर्ट में यह भी नहीं बताया जा सका कि आखिर प्रतिवेदन में क्या हुआ है।

केस से जुड़े सभी तथ्य कोर्ट के सामने नहीं आ सके। इसके कई कारण हो सकते हैं। संभव है कि DIG को बचाने के लिए डीएसजीआई को समय रहते जानकारी नहीं प्रदान की गई हो। जब उन्हें कुछ नहीं मालूम तो वे अदालत में विभाग का मजबूत पक्ष कैसे रख सकते थे। हाई कोर्ट ने रौतेला की याचिका स्वीकार करते हुए अंतरिम आर्डर पास कर दिया है। अब विभाग को काउंटर शपथ पत्र के माध्यम से अपना जवाब देना है।