शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने बताई भगवान और भक्ति की महिमा

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ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती 1008 ने चातुर्मास्य प्रवचन के अन्तर्गत आयोजित श्रीमदभागवत ज्ञानयज्ञ के अवसर पर चतुःश्लोकी कथा सुनाई। इस दौरान उन्होंने कहा कि ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। ज्ञान वैराग्ययोश्चौव षण्णां भग इतीरिणा। अर्थात् समग्र ऐश्वर्य, समग्र धर्म, समग्र यश, समग्र श्रीः, समग्र ज्ञान, समग्र वैराग्य, इन छः चीजों को ही भग कहा जाता है। ये छः जिनमें हों वही भगवान हैं।

उन्होंने कहा कि जब बालक जन्म लेता है, तो उसके पास कुछ भी नहीं होता पर आस-पास के सभी लोग उस नवजात की सेवा में लग जाते हैं। उसे आवश्यकता की सभी वस्तुएं उपलब्ध कराते हैं। यह भगवान की ही कृपा से सम्भव होता है। भगवान का ही ऐश्वर्य कृपा से हम सबको प्राप्त होता है।

आगे कहा कि यह संसार तीन गुणों से मिलकर बना है- सत्व, रज और तम। देवता भी तीन ही हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश। इन्हीं तीनों गुणों का विक्षोभ ही प्रकृति है।

पूज्य शङ्कराचार्य जी ने कहा कि ब्रह्म के साकार और निराकार दो रूप हैं। निराकार ब्रह्म को हम देख नहीं पाते परन्तु यदि भक्त चाहे तो निराकार ब्रह्म को अपनी भक्ति से प्रकट भी कर सकता है।

कथा के मुख्य यजमान, मोहन साधुखा, रुपाली साधुखा और पंडित कमलेश तिवारीत, सुनीता तिवारी, अमित तिवारी और पूनम तिवारी देवनगर पुराना रहे। इन्होंने पादुका पूजन भी किया।