SC का फैसला, सार्वजनिक पद पर बैठे हुए लोगों के बोलने पर पाबंदी की जरूरत नहीं

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नई दिल्ली: सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर पाबंदी लगाने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार किया है। जस्टिस एसए नजीर की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस पर अपना फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जनप्रतिनिधियों की अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई पाबंदी लगाने की जरूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत निर्धारित प्रतिबंधों के अलावा कोई भी अतिरिक्त प्रतिबंध नागरिक पर नहीं लगाया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि किसी मंत्री द्वारा दिए गए बयान को सरकार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। अदालत ने अपने फैसले में ये भी कहा कि बयान के लिए मंत्री खुद जिम्मेदार हैं।

जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अलग फैसला लिखा है। उन्होंने कहा कि बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक बहुत आवश्यक अधिकार है, ताकि नागरिकों को शासन के बारे में अच्छी तरह से शिक्षित किया जा सके। उन्होंने कहा कि अभद्र भाषा समाज को असमान बनाकर मूलभूत मूल्यों पर प्रहार करती है।

शीर्ष अदालत ने 15 नवंबर को अपना फैसला सुरक्षित रखा था। अदालत ने कहा था कि सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए, जो अन्य देशवासियों के लिए अपमानजनक हों। शीर्ष अदालत ने कहा था कि यह व्यवहार हमारी संवैधानिक संस्कृति का हिस्सा है और इसके लिए सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों के लिहाज से आचार संहिता बनाना जरूरी नहीं है।