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अयोध्या राम मंदिर चंदा घोटाला: दानपात्रों से ‘करोड़ों के गबन’ की जांच के लिए SIT गठित, शीर्ष अधिकारियों पर भी आंच!

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अयोध्या/लखनऊ : अयोध्या के भव्य राम मंदिर परिसर में श्रद्धा के चढ़ावे के साथ हुए एक कथित महाघोटाले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। मंदिर के दानपात्रों से कथित रूप से करोड़ों रुपये की नकदी, सोने-चांदी के आभूषण, यहां तक कि दान में मिली ‘दो किलो की सोने की गदा’ और बहुमूल्य चरण-पादुका गायब होने का गंभीर मामला सामने आया है। इस चंदा चोरी के उजागर होने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए विशेष जांच दल (SIT) का गठन कर दिया है, जिसने अयोध्या पहुंचकर 2021 से लेकर अब तक का पूरा वित्तीय रिकॉर्ड खंगालना शुरू कर दिया है।

सवा साल तक चलता रहा ‘चोरी का खेल’

शुरुआती जांच और सूत्रों के मुताबिक, दान की राशि में गबन का यह खेल पिछले करीब सवा साल से बेरोकटोक चल रहा था। हद तो तब हो गई जब पिछले साल प्रयागराज महाकुंभ और इस साल माघ मेले के दौरान अयोध्या में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा। इस दौरान चढ़ावे में भारी बढ़ोतरी हुई, जिसका फायदा उठाकर चंदा गिनने वाले कर्मचारियों ने एक-एक दिन में 10 से 15 लाख रुपये तक पार किए।

पकड़े जाने के डर से आरोपियों ने आखिरी के कुछ महीनों में सबसे बड़ी रकम साफ की। सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इस गबन की राशि 200 करोड़ रुपये तक होने की चर्चा है, हालांकि आधिकारिक तौर पर अभी 8 करोड़ से अधिक के हेरफेर के सीधे संकेत मिले हैं।

कैसे अंजाम दिया गया इतना बड़ा गबन? (मोडस ऑपेरंडी)

जांच में सामने आया है कि यह गबन किसी एक व्यक्ति की कारस्तानी नहीं, बल्कि सुरक्षा और ऑडिट तंत्र की विफलता का फायदा उठाकर किया गया एक सुनियोजित खेल था:

  • ‘टिन्नू’ का नेटवर्क और भाई-भतीजावाद: मंदिर में चंदे की गिनती का जिम्मा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की एक आउटसोर्सिंग कंपनी के पास था। आरोप है कि ट्रस्ट के एक बड़े पदाधिकारी के करीबी ‘टिन्नू’ नाम के व्यक्ति ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर करीब 35 से 40 रिश्तेदारों और परिचितों को इस काम में रखवा दिया।

  • गिनती से पहले ही रकम पार: दानपात्रों को खोलने के बाद पूरी रकम पहले एक जगह इकट्ठा की जाती थी। कुल राशि का कोई शुरुआती रिकॉर्ड न होने के कारण, कर्मचारी गिनती के दौरान ही बड़ी रकम गायब कर देते थे और अंत में बचे हुए पैसों का ही विवरण दर्ज किया जाता था।

  • बिना तलाशी और वेरिफिकेशन के आवाजाही: ट्रस्ट के ‘अपने लोग’ होने के कारण इन कर्मचारियों का न तो कोई पुलिस वेरिफिकेशन हुआ था और न ही परिसर में आते-जाते समय इनकी कोई तलाशी ली जाती थी।

  • कम वेतन, बड़ी जिम्मेदारी: महज 12 से 18 हजार रुपये के मासिक वेतन पर काम करने वाले ये कर्मचारी दिन-रात लंबी ड्यूटी करते थे, क्योंकि उनका असल मुनाफा वेतन नहीं, बल्कि चढ़ावे की चोरी थी।

  • CCTV की लाइव मॉनिटरिंग फेल: परिसर में सीसीटीवी कैमरे तो लगे थे, लेकिन उनकी रियल-टाइम (तुरंत) मॉनिटरिंग न होने की वजह से चोरों के हौसले बुलंद रहे।

अखिलेश यादव के ट्वीट के बाद मचा हड़कंप

इस पूरे मामले को शुरुआत में ट्रस्ट द्वारा बेहद गोपनीय तरीके से दबाए रखने की कोशिश की जा रही थी। लेकिन इस विवाद ने तब राजनीतिक और सार्वजनिक तूल पकड़ा, जब समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया (X) पर पोस्ट कर करोड़ों रुपये गायब होने का खुला आरोप लगाया और सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की मांग की। विपक्ष के हमलावर होने के बाद ट्रस्ट ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर जांच की मांग की, जिसके बाद आनन-फानन में SIT का गठन हुआ।

जांच के घेरे में कौन-कौन?

  1. पांच मुख्य आरोपी कर्मचारी: लवकुश मिश्रा, अवनीश, अनुकल्प, करुण और रमाशंकर को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। लवकुश के घर से 10-12 लाख रुपये और अवनीश के खाते से 5 लाख रुपये बरामद भी हो चुके हैं।

  2. ‘टिन्नू’ और पदाधिकारी की तिकड़ी: टिन्नू, उसका बेटा और भतीजा जांच के मुख्य केंद्र हैं। टिन्नू का भतीजा पहले ही दिन पकड़ा गया था।

  3. ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारी: श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव जैसे बड़े पदाधिकारी भी निगरानी और लापरवाही के चलते संदेह के घेरे में हैं। घटना के बाद से ही शीर्ष स्तर पर चुप्पी छाई हुई है।

  4. बैंक अधिकारी: SBI के उन अधिकारियों से भी पूछताछ की जा रही है जिन्होंने बिना किसी ऑडिट या चेकिंग के इन सिफारिशी कर्मचारियों को खुली छूट दे रखी थी।

SIT को 15 दिन का अल्टीमेटम

मुख्यमंत्री के निर्देश पर गठित इस हाई-लेवल SIT में लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, आईजी रेंज किरन एस और विशेष वित्त सचिव नील रतन शामिल हैं। टीम ने ट्रस्ट के कार्यालय से लेकर दानपात्र कक्ष और पिछले 5 सालों के सीसीटीवी फुटेज को अपने कब्जे में ले लिया है। सरकार ने एसआईटी को 7 दिन में प्रारंभिक और 15 दिन में फाइनल रिपोर्ट सौंपने का सख्त आदेश दिया है।

राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने इस संबंध में स्पष्ट किया है कि “इस जांच के दो मुख्य पहलू हैं—पहला, इस घिनौने आपराधिक कृत्य की तह तक जाकर दोषियों को सजा दिलाना और दूसरा, भविष्य में मंदिर की दान व्यवस्था को पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए एक अभेद्य तंत्र स्थापित करना।” सूत्रों के मुताबिक, यदि जांच में ट्रस्ट के किसी भी सदस्य की संलिप्तता या गंभीर प्रशासनिक लापरवाही पाई जाती है, तो सरकार उनके अधिकारों को सीमित करने जैसा बड़ा कदम भी उठा सकती है।

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