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स्पेक्ट्रम को फिर से व्यवस्थित करके मोदी सरकार ने एक तीर से दो शिकार किए हैं

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रक्षा और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होने वाले स्पेक्ट्रम को फिर से व्यवस्थित करके सरकार ने लंबे समय से अटका पड़ा एक जरूरी काम किया है. इससे 1800 मेगाहर्ट्ज के बैंड में 200 मेगाहर्ट्ज का अतिरिक्त स्पेक्ट्रम उपलब्ध होगा. अतीत में स्पेक्ट्रम का आवंटन जिस तरह से हुआ उसका नतीजा यह रहा कि रक्षा विभाग और व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए इस्तेमाल होने वाले स्पेक्ट्रम के बैंड या कहें कि पट्टी में कई छोटे-छोटे हिस्से खाली रह गए. इनका इस्तेमाल न तो रक्षा विभाग कर पा रहा था और न ही कारोबारी कंपनियां. इससे एक तरफ देश का एक अहम संसाधन बेकार हो रहा था तो दूसरी ओर स्पेक्ट्रम की कमी से जूझ रहा दूरसंचार क्षेत्र भी प्रभावित हो रहा था.
स्पेक्ट्रम के इस पुनर्संयोजन के परिणाम दूरगामी होंगे. तरंगों की गतिशीलता के लिहाज से देखें तो 1800 मेगाहर्ट्ज बैंड की ठीक-ठाक उपयोगिता बनती है. हालांकि इस मामले में कम फ्रीक्वेंसी के बैंड बेहतर साबित होते हैं. ऊंची फ्रीक्वेंसी वाले बैंड्स की तुलना में 700 या 800 मेगाहर्ट्ज बैंड पर भेजे गए सिग्नल दीवारों और दूसरी बाधाओं को ज्यादा अच्छी तरह भेदते हैं और साथ ही कम बिजली भी खाते हैं. डिजिटल इंडिया और उसके साथ होने वाले डेटा के विस्फोट को देखते हुए यह तथ्य बहुत अहम है. दूसरे शब्दों में कहें तो हम कौन सी फ्रीक्वेंसी का बैंड चुनते हैं इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा खपत और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उसके द्वारा किए गए वादों पर पड़ेगा.
इसलिए सरकार का लक्ष्य यह होना चाहिए कि वह जितना हो सके कम फ्रीक्वेंसी के बैंड्स को उपलब्ध करवाए. यह काम कई तरीकों से हो सकता है. उदाहरण के लिए क्षेत्रीय प्रसारण के लिए एनॉलॉग सिग्नल की जो व्यवस्था इस्तेमाल होती है वह अब पुरानी पड़ चुकी है. इसे खत्म करके काफी स्पेक्ट्रम हासिल किया जा सकता है. कोशिश यह भी होनी चाहिए कि इस तरह मिले स्पेक्ट्रम को दूरसंचार कंपनियों को ऐसे मूल्य पर उपलब्ध करवाया जाए जिसे देश की जनता वहन कर सके. कम फ्रीक्वेंसी के बैंड्स के लिए सरकार जो ऊंची कीमत वसूलती है उसका जेब दूरसंचार कंपनियों के बजाय आखिर में उपभोक्ता की जेब पर ही पड़ता है.