समलैंगिक विवाह को मिलेगी कानूनी मान्यता?

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सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का मामला 5 जजों की संविधान पीठ को सौंप दिया. कोर्ट ने कहा कि इस पर अगली सुनवाई 18 अप्रैल को होगी. केंद्र ने कोर्ट में दलील दी कि यह भारत की पारिवारिक व्यवस्था के खिलाफ है. इसमें कानूनी अड़चनें भी है.

कोर्ट ने कहा कि समलैंगिक विवाह से संबंधित मुद्दा अहम महत्व का है और इस पर पांच-न्यायाधीशों की पीठ के विचार किए जाने की आवश्यकता है. कोर्ट ने बताया कि कि इसका सीधा प्रसारण (लाइव-स्ट्रीम) किया जाएगा. वहीं केंद्र सरकार ने मामले में दोनों पक्षों की दलीलों में कटौती नहीं करने का अदालत से आग्रह किया; कहा कि इस फैसले का पूरे समाज पर प्रभाव पड़ेगा. बता दें याचिका में स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत समलैंगिक विवाह के रजिस्ट्रेशन की मांग की गई है.

कोर्ट में रविवार (12 मार्च) को भी केंद्र सरकार ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने के अनुरोध से संबंधित याचिकाओं का यह कहते हुए विरोध किया था कि इससे व्यक्तिगत कानूनों और स्वीकार्य सामाजिक मूल्यों में संतुलन प्रभावित होगा. हाई कोर्ट में दाखिल हलफनामे में रविवार (12 मार्च) को केंद्र सरकार ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 के जरिये इसे वैध करार दिये जाने के बावजूद, याचिकाकर्ता देश के कानूनों के तहत समलैंगिक विवाह के लिए मौलिक अधिकार का दावा नहीं कर सकते हैं.

केंद्र सरकार ने एफिडेविट में कहा कि विवाह, कानून की एक संस्था के रूप में, विभिन्न विधायी अधिनियमों के तहत कई वैधानिक परिणाम हैं. इसलिए, ऐसे मानवीय संबंधों की किसी भी औपचारिक मान्यता को दो वयस्कों के बीच केवल गोपनीयता का मुद्दा नहीं माना जा सकता है. हलफनामे में आगे कहा गया कि भारतीय लोकाचार के आधार पर ऐसी सामाजिक नैतिकता और सार्वजनिक स्वीकृति का न्याय करना और उसे लागू करना विधायिका का काम है.