Home Uncategorized बच्चों के हक के नाम पर बना यह कानून उसी हक के...

बच्चों के हक के नाम पर बना यह कानून उसी हक के खिलाफ जाता है

0
351

हमारे देश में मानवाधिकार अक्सर आर्थिक चिंताओं से टकराते हैं. ऐसी स्थिति में कइयों के लिए बाल श्रम के मुद्दे पर एक स्पष्ट रूख जाहिर करना मुश्किल हो जाता है. उन्हें इस सवाल का जवाब देने में दिक्कत होती है कि खाना ज्यादा जरूरी है या शिक्षा. दुर्भाग्य की बात है कि भारतीयों की एक बड़ी आबादी को रोज इन दो विकल्पों में से किसी एक का चुनाव करना पड़ता है और उनमें से कई परिवार की आय बढ़ाने के लिए अपने बच्चों को काम पर भेजने में कोई बुराई नहीं देखते.
ऐसे चुनौती भरे हालात में यह सरकार का कर्तव्य है कि वह सामाजिक सुरक्षा का दायरा फैलाए ताकि माता-पिता को अपने बच्चों को काम पर भेजने के लिए मजबूर न होना पड़े. बल्कि लोगों की तरह सरकार के पास इस मामले में कोई चुनाव करने का विकल्प नहीं है. उसे तो बाल श्रम पर चल रही बहस में सही तरफ ही होना चाहिए. लेकिन 30 साल बाद मंगलवार को संसद द्वारा पारित नया बालश्रम कानून भ्रम के सिवा कुछ नहीं.
चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन) एमेंडमेंट बिल के तहत पुराने बाल श्रम कानून में सुधार किया गया है. इसके तहत किसी भी क्षेत्र में 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम कराना प्रतिबंधित कर दिया गया है. लेकिन बच्चे पारिवारिक व्यवसाय में काम कर सकते हैं. इसके अलावा टैनिंग, चूड़ी निर्माण, जरी का काम और ई वेस्ट जैसे जो कई काम हाल तक खतरनाक श्रेणी में आते थे उनमें अब बच्चों को काम करने की इजाजत दे दी गई है. यह न सिर्फ बाल श्रम को कानूनी जामा पहनाता है (बिल में परिवार की परिभाषा बहुत व्यापक है) बल्कि इससे जाति आधारित रोजगार का चलन मजबूत होता भी दिखता है. भारत में पारिवारिक काम धंधे ज्यादातर जाति आधारित ही हैं इसलिए ऐसे काम धंधों में बच्चों से काम करवाने की इजाजत देकर यह कानून जाति व्यवस्था को अक्षुण रखने का काम कर रहा है. जाति आधारित समाज की सबसे ज्यादा मार दलितों और हाशिये पर पड़े लोगों पर पड़ती है जैसा कि गुजरात और बिहार में दलितों की पिटाई और उनके अपमान के हालिया उदाहरणों से समझा जा सकता है.
नए कानून के मुताबिक अब किसी भी उम्र के बच्चे से खतरनाक श्रेणी में आने वाले व्यवसायों में काम नहीं करवाया जा सकता. लेकिन, 1986 में बने पहले वाले कानून में अगर 16 व्यवसाय और 65 प्रक्रियाएं खतरनाक श्रेणी में आते थे तो नए कानून में यह आंकड़ा तीन और 29 हो गया है और यह भी सिर्फ संगठित क्षेत्र के लिए है. सवाल यह है कि असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे बच्चों का क्या होगा.
श्रम और रोजगार मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने संसद को बताया है कि इस तरह की छूट से सरकार को कानून को व्यावहारिक रूप से लागू करने में मदद मिलेगी. सरकार का कर्तव्य कानून को लागू करना है. इस काम में अपनी अक्षमता को वह अधकचरे कानून बनाने के लिए बहाने के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकती. इससे भारत के बच्चों का भविष्य अंधकारमय ही होगा.