
टिहरी। जिला स्तरीय विकास प्राधिकरण टिहरी में मानचित्र स्वीकृति और निर्गमन से जुड़े एक प्रकरण में सहायक अभियंता पंकज पाठक ने अपने विरुद्ध जारी कारण बताओ नोटिस के जवाब में विस्तृत स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपने जवाब में कहा है कि उनके स्तर से किसी प्रकार का कूटरचित दस्तावेज तैयार नहीं किया गया और न ही प्राधिकरण को कोई वित्तीय नुकसान पहुंचाया गया। उनका दावा है कि मानचित्र जारी करने से पहले पूर्व स्वीकृत मानचित्र में पाई गई तकनीकी त्रुटि को सुधारते हुए भवन उपविधि के मानकों के अनुरूप मानचित्र जारी किया गया।
पंकज पाठक ने 21 सितंबर 2026 को जिला स्तरीय विकास प्राधिकरण टिहरी के उपाध्यक्ष को संबोधित अपने स्पष्टीकरण में कहा कि उन्हें 16 सितंबर को जारी स्पष्टीकरण 19 सितंबर की सुबह करीब 11 बजे प्राप्त हुआ। उनके अनुसार नोटिस के साथ आवश्यक संलग्नक उपलब्ध नहीं कराए गए थे। उन्होंने उसी दिन व्हाट्सऐप के माध्यम से अतिरिक्त समय और संबंधित संलग्नक उपलब्ध कराने का अनुरोध किया। उनका कहना है कि संलग्नक 19 सितंबर को शाम 4:40 बजे उपलब्ध कराए गए, जिसके बाद उन्होंने आरोपों के संबंध में अपना विस्तृत पक्ष प्रस्तुत किया।
31 दिसंबर 2025 को ऑनलाइन जमा हुआ था मानचित्र
स्पष्टीकरण में पंकज पाठक ने बताया कि मानचित्र संख्या TSN/NE/AA/0002/25-26 को 31 दिसंबर 2025 को ऑनलाइन माध्यम से प्रस्तुत किया गया था। उनके अनुसार तत्कालीन उपाध्यक्ष द्वारा इसका अनुमोदन 6 अप्रैल 2026 को किया गया। इसके बाद 5 जून 2026 को शुल्क जमा कराया गया और 28 जून को बैंक गारंटी प्रस्तुत की गई। उन्होंने कहा कि पत्र में मानचित्र निर्गमन की तारीख 15 जुलाई 2026 बताई गई है, जबकि उनके अनुसार रिकॉर्ड में उक्त मानचित्र वास्तव में 27 अगस्त 2026 को निर्गत हुआ।
फाइल नहीं खुलने पर दोबारा अपलोड कराया गया मानचित्र
कारण बताओ नोटिस में लगाए गए आरोपों के संबंध में पंकज पाठक ने कहा कि 29 जून 2026 को जब उन्होंने ऑनलाइन पत्रावली में संलग्न मानचित्र को खोलने का प्रयास किया तो फाइल नहीं खुली। इसके बाद आवेदक को आपत्ति लगाकर “Format of map pdf is not supported” का संदेश दिया गया।
उनके अनुसार 30 जून को आवेदक/वास्तुविद द्वारा दोबारा फाइल अपलोड की गई, लेकिन वह भी सिस्टम पर नहीं खुली। इस पर “File is still not opening” कहते हुए फिर आपत्ति दर्ज की गई। इसके बाद उसी दिन आवेदक/वास्तुविद द्वारा पुनः मानचित्र फाइल अपलोड की गई।
पाठक का कहना है कि नई फाइल संलग्न होने के बाद उन्होंने मानचित्र को डिजिटल सिग्नेचर के लिए चयनित किया और पत्रावली को अपने लॉगिन से सहायक अभियंता दिग्विजय तिवारी के लॉगिन में ट्रांसफर कर दिया गया। उनके अनुसार पत्रावली 15 जुलाई को दोबारा उनके लॉगिन में आई।
27 अगस्त को डीएससी लगाकर मानचित्र जारी करने का निर्देश मिलने का दावा
पंकज पाठक ने अपने जवाब में कहा है कि 27 अगस्त 2026 की सुबह करीब 7:31 बजे उन्हें व्हाट्सऐप पर फोन आया और मानचित्र पर डिजिटल सिग्नेचर लगाकर उसे निर्गत करने के लिए कहा गया। उनका कहना है कि डिजिटल सिग्नेचर लगाने से पहले उन्होंने मानचित्र का पुनः परीक्षण किया। उनके अनुसार जांच में बेसमेंट, भवन की ऊंचाई, एफएआर, तलों की संख्या और पार्किंग सहित अधिकांश प्रमुख मानक पूर्व में स्वीकृत मानचित्र के अनुरूप पाए गए। हालांकि, स्टिल्ट एरिया में अंतर पाया गया।
स्टिल्ट एरिया में पूर्व स्वीकृति की त्रुटि सुधारने का दावा
सहायक अभियंता ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि परीक्षण के दौरान उन्हें पता चला कि पूर्व में स्वीकृत मानचित्र में भवन उपविधि के मानकों की तुलना में स्टिल्ट का क्षेत्रफल कुछ अधिक स्वीकृत हो गया था। उनके अनुसार नए मानचित्र में इस त्रुटि को दूर करते हुए स्टिल्ट क्षेत्रफल को भवन उपविधि के निर्धारित मानकों के अनुरूप किया गया।
उन्होंने कहा कि इस बदलाव के कारण कोई अतिरिक्त शुल्क आरोपित करने की आवश्यकता नहीं थी और न ही कोई अतिरिक्त शुल्क प्रस्तावित किया जाना था। उनका दावा है कि जारी किए गए मानचित्र में भवन उपविधि के मानकों का उल्लंघन नहीं हुआ है।
पाठक ने यह भी कहा कि सामान्य प्रक्रिया के तहत प्राधिकरणों में अधिकारी डिजिटल सिग्नेचर लगाने से पहले मानचित्र की दोबारा जांच करते हैं और यदि कोई छोटी तकनीकी त्रुटि मिलती है तो उसे ठीक कराने के बाद मानचित्र जारी किया जाता है। उनके अनुसार उन्होंने भी इसी प्रक्रिया के तहत कार्य किया।
‘दोनों मानचित्रों में स्टिल्ट को छोड़कर कोई अंतर नहीं’
अपने जवाब में पंकज पाठक ने स्पष्ट किया कि उनके द्वारा जारी किए गए मानचित्र और पूर्व में स्वीकृत मानचित्र में स्टिल्ट क्षेत्रफल को छोड़कर अन्य कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं था। उन्होंने कहा कि नए मानचित्र में स्टिल्ट का क्षेत्रफल कम किया गया और इसे भवन उपविधि के मानकों के अनुरूप किया गया। उन्होंने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में किसी प्रकार का कूटरचित दृष्टिकोण नहीं अपनाया गया।
दूसरे मानचित्र को लेकर भी उठाया सवाल
अपने स्पष्टीकरण में पंकज पाठक ने 15 सितंबर 2026 को UHUDA कार्यालय में हुई एक बैठक का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार उन्हें मानचित्र पत्रावली संख्या TSN/CC/0011/26-27, अमित गुप्ता की स्वीकृति के संबंध में 15 सितंबर को सुबह 11 बजे वार्ता के लिए बुलाया गया था। बैठक में प्रस्तावित मानचित्र के वास्तुविद भी मौजूद थे।
पाठक के अनुसार बैठक में उन्होंने मानचित्र में दर्शाए गए खसरा नंबर को लेकर आपत्ति दर्ज कराई। उनका दावा है कि मानचित्र में भवन को खसरा संख्या 605 में दर्शाया गया था, जबकि उपलब्ध सजरा प्लान और गूगल मैप की इमेज के मिलान में वह भवन खसरा संख्या 513 में दिखाई दे रहा था।
उन्होंने अपने जवाब में कहा कि उनके द्वारा बैठक में यह भी बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट के Civil Appeal No. 4452 of 2019 में पारित आदेश के अनुसार खसरा संख्या 513 को निजी वन के रूप में माना गया है और उस पर वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधान लागू होते हैं।
पाठक का आरोप है कि इस तथ्य से अवगत कराने के बाद बैठक में नाराजगी व्यक्त की गई और उन्हें उक्त मानचित्र को स्वीकृत करने के लिए निर्देशित किया गया। उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि इसी प्रतिक्रिया के बाद 16 सितंबर को उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया।
15 सितंबर की CCTV रिकॉर्डिंग सुरक्षित कराने की मांग
सहायक अभियंता ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि 15 सितंबर 2026 को UHUDA कार्यालय में हुई बैठक की वास्तविक स्थिति की पुष्टि कार्यालय में लगे सुरक्षा कैमरों की रिकॉर्डिंग से की जा सकती है। इसी आधार पर उन्होंने अपने पत्र की प्रतिलिपि सचिव, आवास विभाग, उत्तराखंड शासन को भेजते हुए अनुरोध किया है कि 15 सितंबर 2026 की UHUDA कार्यालय की वीडियो रिकॉर्डिंग को साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित कराया जाए।
वित्तीय नुकसान नहीं होने का दावा
अपने स्पष्टीकरण के अंत में पंकज पाठक ने कहा कि उनके द्वारा जारी मानचित्र में किसी प्रकार का कूटरचित दस्तावेज तैयार नहीं किया गया। साथ ही उनके अनुसार प्राधिकरण को किसी प्रकार की वित्तीय हानि भी नहीं हुई। उन्होंने कहा कि मानचित्र जारी करने से पहले पूर्व में हुई तकनीकी त्रुटि को सुधार लिया गया था।













