- प्रशांत वाजपेयी
: आज भारत की स्वतंत्रता संग्राम में अपनी अदम्य साहस और समर्पण के लिए जानी जाने वाली महान क्रांतिकारी कमला दास गुप्ता की 119वीं जन्म जयंती मनाई जा रही है। 11 मार्च 1907 को ढाका (वर्तमान बांग्लादेश) के बिक्रमपुर में एक सम्मानित बंगाली वैद्य परिवार में जन्मीं कमला दास गुप्ता ने अपने जीवन को देश की आजादी और महिलाओं के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। वे 19 जुलाई 2000 को कोलकाता में परलोक सिधार गईं, लेकिन उनकी विरासत आज भी लाखों भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।
कमला जी ने बैथ्यून कॉलेज, कोलकाता से इतिहास में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। स्वतंत्रता संग्राम के उस दौर में जब युवा राष्ट्रवाद की लहर में डूबे हुए थे, कमला जी भी इसमें शामिल हो गईं। उन्होंने महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम जाने की इच्छा जताई, लेकिन पारिवारिक कारणों से वह संभव नहीं हो सका। इसके बाद उन्होंने उग्रवादी युगांतर पार्टी से जुड़कर क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई।
1930 के दशक में कमला जी ने गरीब महिलाओं के छात्रावास में प्रबंधक के रूप में काम करते हुए क्रांतिकारियों के लिए बम बनाने की सामग्री एकत्र की और उसे गुप्त रूप से पहुंचाया। कई बार बम विस्फोटकों से जुड़े मामलों में उनकी गिरफ्तारी हुई, लेकिन सबूतों के अभाव में ब्रिटिश सरकार उन्हें रिहा करने पर मजबूर हुई।
एक महत्वपूर्ण घटना में, क्रांतिकारी बीना दास ने फरवरी 1932 में बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर गोली चलाई थी—यह रिवॉल्वर कमला दास गुप्ता ने ही उपलब्ध कराया था। इस घटना के बाद भी उन्हें गिरफ्तार किया गया, लेकिन वे फिर रिहा हो गईं। 1933 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 1936 में नजरबंद कर दिया गया।
1938 में युगांतर पार्टी का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय होने के बाद कमला जी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सामाजिक और राहत कार्यों में योगदान दिया। 1942-43 में बर्मी शरणार्थियों तथा 1946-47 के सांप्रदायिक दंगों (विशेषकर नोआखाली में) में घायलों की मदद के लिए राहत शिविरों में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन शिविरों में महात्मा गांधी का आगमन उनके लिए और अन्य कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी कमला जी ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए काम जारी रखा। उन्होंने ‘कांग्रेस महिला शिल्प केंद्र’ और ‘दक्षिणेश्वर नारी स्वावलंबी सदन’ में व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए। वे महिला पत्रिका “मदिर” की संपादक रहीं और बंगाली में दो महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं—
“रक्तेर अक्षर” (1954) – उनका आत्मकथात्मक संस्मरण
“स्वाधीनता संग्रामें नारी” (1963) – स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका पर
कमला दास गुप्ता का जीवन भारत माता की आजादी और नारी शक्ति के लिए एक जीवंत उदाहरण है। उनकी जयंती पर पूरा देश उन्हें याद कर श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है।














