भराड़ीसैंण। उत्तराखंड में विधानसभा सत्रों के आयोजन और उनकी अवधि को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। राज्य गठन के बाद से विधानसभा की कार्यवाही के दिनों में लगातार कमी आने का रुझान सामने आया है। वहीं, साल में 60 दिन सदन चलाने की निर्धारित अवधि का लक्ष्य भी पूरा होता नजर नहीं आ रहा है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधानसभा की भूमिका केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं है। सदन जनता से जुड़े मुद्दों को उठाने, सरकारी योजनाओं की समीक्षा करने, विपक्ष को सवाल पूछने का अवसर देने और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण मंच है। ऐसे में विधानसभा सत्रों के दिनों में कमी आने से जनहित के मुद्दों पर चर्चा के लिए उपलब्ध समय को लेकर चिंता बढ़ती है।
विधानसभा सत्र के दौरान प्रदेश की सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, रोजगार और पलायन जैसी समस्याओं पर चर्चा होती है। विधायकों को अपने क्षेत्रों की समस्याएं सरकार के सामने रखने और मंत्रियों से सवाल पूछने का अवसर मिलता है। सत्र की अवधि सीमित रहने पर इन मुद्दों पर विस्तार से चर्चा करने के अवसर भी प्रभावित हो सकते हैं।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में क्षेत्रीय जरूरतें और विकास संबंधी चुनौतियां अलग-अलग हैं। ऐसे में सदन की नियमित बैठकें जनसमस्याओं को सरकार तक पहुंचाने और नीतिगत फैसलों की समीक्षा करने के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। विधानसभा की कार्यवाही के दिन घटने का मुद्दा इसलिए भी अहम है, क्योंकि इसका सीधा संबंध विधायी कामकाज और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़ा है।
सवाल यह है कि क्या विधानसभा सत्रों की अवधि बढ़ाने और सदन की कार्यवाही को अधिक प्रभावी बनाने के लिए ठोस पहल की जाएगी? जनता से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा सुनिश्चित करने के लिए सदन को अधिक समय देना जरूरी माना जा रहा है।













