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अमरीकी रणनीति का फ़साना हर मुल्क एक बेगाना पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित -त्रिनेत्र जोशी   
अफ़ग़ानिस्तान पर ड्रोन हमले इस बात का प्रतीक हैं कि अब अमरीकी रणनीति तालिबान का सफाया चाहती है। वज़ह तालिबान उतने नहीं, जितना अल-क़ायदा का खौफ़ है। तालिबान तो खुद अमरीकियों ने खड़े किये और पाकिस्तान ने उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया। अब दोनों ही उनके पीछे हाथ धोकर पड़े हैं, क्योंकि तालिबान के सशस्त्र धड़ों ने दोनों के ही ख़िलाफ़ जंग छेड़ रखी है और वे पाकिस्तान के वर्तमान निज़ाम को अमरीका का पिट्ठू मानते हैं और अगर यह मसला अमरीका की रणनीति के ख़िलाफ़ न होता, तो शायद पाकिस्तान का अस्तित्व ही समाप्त होने को आ गया था। इसलिए यह अमरीकी रणनीति का हिस्सा है कि पहले तालिबान को खत्म करो और अमरीकी सहायता पाते रहो।
यह अमरीकी कार्य-नीति है पाकिस्तान के बारे में और तालिबान के बारे में उनकी कार्य-नीति है कि हमने ही तुम्हें खड़ा किया था और अब हम जब कह रहे हैं कि बैठ जाओ, तो तालिबान ने हमारे ही ख़िलाफ़ मोर्चा खोल लिया है। इसलिए जन्म से लेकर आगे तक आपका एक ही लक्ष्य होना चाहिये कि जिधर अमरीका उधर हम। यही कार्य-नीति अमरीका ने सद्दाम के बारे में अपनायी थी और जब सद्दाम ने अमरीका की बढ़त को अपने इलाके में चुनौती दे दी तो सद्दाम और इराक़ का हश्र क्या हुआ, यह भी अमरीका की रणनीति के कार्यनीतिक परिणाम हैं। तो अमरीका की तो एक ही रणनीति है विश्व की एकमात्र महाशक्ति के तौर पर जंगें छेड़ना और उन्हें अमरीकी किस्म का लोकतंत्र सिखाना, जो अमरीकी पूंजी का ग़ुलाम लोकतंत्र है और उसे किसी भी आधार पर जनपक्षीय कहना दरअसल लोकतंत्र का अपमान है।

इस लोकतंत्र की विशेषता यह है कि यह अपने नागरिकों को नागरिक मानता है और अन्य राष्ट्रों को अपना ग़ुलाम और जो राष्ट्र इस ग़ुलामी को स्वीकार करने से आनाकानी करे उसे रणनीतिक रूप से नेस्तनाबूद कर देना। चाहे फिर वह सोवियत संघ जैसी कल की दूसरी महाशक्ति ही क्यों न हो।
तो अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और किसी हद तक हिंदुस्तान भी अमरीकी रणनीति के इसी विश्वव्यापी जाल की कठपुतलियां हैं। इसका मतलब यह नहीं समझना चाहिये कि तालिबान के ख़िलाफ़ जो कार्रवाई की जा रही है, उसके प्रति जरा भी सहानुभूति होनी चाहिये, बल्कि अब तो तालिबान को भी और पाकिस्तान को भी यह एहसास हो जाना चाहिये कि अगर तालिबान न होते तो शायद इस इलाके का ऐसा आतंकवादी फ़जीता न होता। और अब हैं, तो उनको आंख से ओझल नहीं किया जा सकता। यहां अमरीकी रणनीति का हवाला देने का मतलब यह है कि अमरीका ही समस्याएं जानबूझकर खड़ी करता है और फिर खुद ही समाधानकर्ता बन बैठता है। दक्षिण एशिया इस समय अमरीकी रणनीति का सबसे बड़ा फोकस है। सोवियत संघ को तोड़कर हालांकि वह एकाधिकारी बन बैठा है, लेकिन उसकी दादागीरी को चुनौतियों का दायरा भी उतना ही बढ़ गया है। सोवियत संघ तो बेशक तोड़ दिया गया, लेकिन विकास और व्यापकता के मामले में भारत और चीन जैसे देशों ने इस इलाके में एक मिलीजुली महा-शक्ति का आकार लेना शुरू कर दिया है। बेशक दोनों देशों के बीच चले आ रहे मनमुटावों का अमरीका उपनिवेशवादी ब्रिटेन की तरह ही बखूबी इस्तेमाल कर रहा है और उनकी किसी भी मामले में निकटता अमरीका को मंजूर नहीं है। वह रात-दिन इसी कोशिश में लगा है कि इन दोनों के बीच आपसी आदान-प्रदान से अधिक मतभेदों का सिलसिला बनाये रखना ज़रूरी है।
उसे यह भी मालूम है कि अगर ये दोनों मुल्क एक-दूसरे के नज़दीक चले आते हैं, तो अमरीकी एकाधिकार के लिए यह बड़ी चुनौती है। पर इसके लिए केवल अमरीका या ब्रिटेन को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दोनों मुल्कों के आपसी मनमुटाव भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं, लेकिन इनका समाधान इस पर निर्भर करता है कि भारत और चीन कितनी ज़ल्दी अपने आपसी विवादों को सुलझा लेते हैं, जो एक बहुत कठिन काम है और वह रातोंरात शायद ही किया जा सकता है।
अगर दोनों देश इस ओर आपसी सहयोग की न्यूनतम कसम खाते हैं, तो ताज़ा हालात में यह भी काफी होगा और अमरीकी एकाधिकार के लिए यह ठोस चुनौती होगी। फिलहाल ऐसा आदर्र्शवादी नज़ारा तो नहीं है मगर साथ ही बेहतर हुए संबंधों का आधार भी मौजूद है। इसे बढ़ाने से अमरीकी रणनीति के ख़िलाफ़ विश्व स्तर पर एक ठोस रणनीति बनायी जा सकती है और राष्ट्रों की प्रभुसत्ता को बरकरार रखा जा सकता है। भारत और चीन को यह समझना चाहिये कि अमरीकी रणनीति का मतलब लोकतंत्र कायम करना नहीं है, बल्कि एक ऐसी रणभूमि तैयार करते चले जाना है, जिसमें अमरीकी प्रभुत्व सर्वोच्च हो और जो राष्ट्र इसे न माने वह बेगाना और यह एक ऐसा नायाब अफ़साना है कि लगातार इसे दोहराया जा रहा है। आतंकवाद से लड़ना एक अलग रणनीति है और अमरीका से लड़ना एक अलग रणनीति। पहली के कार्यांन्वयन के दौरान दूसरी को नहीं भुलाया जाना चाहिये। यह तो एक भूलभुलैया है, जिसके इन रास्तों को पहचाने बिना इलाकाई शांति और सुरक्षा एक दूर की कौड़ी है।
अंतिम अद्यतन ( बुधवार, 21 अक्टूबर 2009 17:35 )
 


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