आयुर्वेद के पुरोधा ‘पद्मश्री’ वैद्य पं. सुरेशचंद्र चतुर्वेदी का निधन

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मुंबई। देश के सुप्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य पं. सुरेशचंद्र चतुर्वेदी का निधन कल २५ दिसंबर को सुबह ११.०० बजे हो गया। वे ९० वर्ष के थे। पिछले कई दिनों से श्वास लेने में तकलीफ के चलते इन्हें मुंबई के जोगेश्वरी स्थित हॉली स्प्रिट हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, जहाँ उनका देहांत हो गया। वैद्यजी के निधन से समस्त आयुर्वेद जगत में शोक छा गया है।

वैद्य सुरेशचंद्र चतुर्वेदी वर्तमान सदी के उन गिने चुने लोगों में से एक थे जो अगस्त क्रांति मैदान में गांधीजी के नेतृत्व में हुए भारत छोडो आंदोलन के चश्मदीद गवाह थे। वैद्यजी ने उस समूचे घटनाक्रम को अपनी आँखों के सामने घटित होते हुए देखा था।

वैद्य सुरेश चतुर्वेदी आयुर्वेद को अपना धर्म मानते थे। पश्चिमी देशो में आज नीम और तुलसी के औषधीय गुणों पर जो शोध हो रहे हैं वह वैद्यजी के कारण ही संभव हुआ। इन्होंने अमरीका, जर्मनी सहित अन्य पश्चिमी देशों की यात्राएं करके भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को न केवल पुनर्स्थापित किया वरन दुनिया भर के चिकित्सा विज्ञानियों को आयुर्वेद पर शोध करने को विवश कर दिया था। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति और स्वास्थ्य पर हिंदी और अंग्रेजी में इन्होंने दो से भी अधिक किताबें लिखीं। यह उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि वर्तमान सदी आयुर्वेद की ओर अग्रसर हो रही है। आयुर्वेद के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के कारण सन २००० में वैद्यजी को ‘पद्मश्री’ से विभूषित किया गया था।

वैद्य सुरेशचंद्रजी चतुर्वेदी की अंतिम संस्कार आज विलेपार्ले पश्चिम स्थित श्मसान भूमि पर किया गया जहाँ उनका शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया

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