भाजपा का अजेंडा : कांग्रेस-मुक्त भारत

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आज का संपादकीय

भाजपा का अजेंडा : कांग्रेस-मुक्त भारत

– नंदकिशोर नौटियाल

2014 में केंद्र में सत्तासीन होते ही प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने, ऐसा लगता है कि 2019 के आम चुनाव तक अपने अजेंडे की प्राथमिकता ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ बनाना तय कर लिया था। लगता है कि उन्होंने सोच लिया था कि इन्हें बदले बिना आधी सदी के कांग्रेसी कुशासन में पनपे सरकारी अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार और काला पैसा, असंतुलित विकास और बढ़ती हुई अमीरी और ग़रीबी की खाई, भुखमरी बीमारी और बदहाली, औरतों बच्चों की असुरक्षा, अपराधों का बढ़ता हुआ ग्राफ़ आदि से छुटकारा नहीं दिलाया जा सकता।

इसलिए उन्होंने प्राथमिकता के साथ सत्ता में आते ही तमाम स्ट्रकचरों पर से कांग्रेसी साइनबोर्डों को हटाना शुरू कर दिया। योजना आयोग को नीति आयोग नाम दे देना, न्यायिक क्षेत्र में कॉलेजियम को ध्वस्त करने का असफल प्रयत्न, राज्यों के अधिकार क्षेत्र में गवर्नरी मदाख़लत जैसे कई उदाहरण हैं। अपरिपक्व जीऐसटी कर-प्रणाली और नोटबंदी लागू करना, निर्माण के क्षेत्र में स्वदेशी शोध और विकास ‘मेड इन इंडिया’ की जगह ‘मेक इन इंडिया’ को लादना और “अच्छे दिन” आने का दिवा-स्वप्न दिखाते जाना जैसे क़दम हैं।

‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के इसी अजेंडे के तहत ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की सम्राज्यी नीति अपनायी जा रही है| उचित-अनुचित तरीके से जिन प्रदेशों में ग़ैर भाजपाई सरकारें हैं उन्हें कमज़ोर किया जा रहा है, उन्हें उखाड़ा गया है और इस तरह भारत के संघीय चरित्र को समाप्त किया जा रहा है। वहाँ भाजपा-शासित राज्य क़ायम किया जा रहा है। इसकी जगमगाती मिसाल है अरुणाचल प्रदेश जैसा उलटफेर।

हाल के दो प्रदेशों ख़ासकर गुजरात के चुनावों में पूरा का पूरा प्रधान मंत्री कार्यालय ही गुजरात शिफ़्ट कर गया लगता था। बहरहाल लगता है कि 2019 के संसदीय चुनावों तक मोदीजी का यही अजेंडा रहेगा। 2018 में राजस्थान, छ्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, त्रिपुरा इन आठ राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। वहाँ के नतीजे चाहे जो हों, ऐसी सूरत में सवाल उठता है कि क्या प्रधान मंत्रीजी देश की बुनियादी समस्याओं की ओर कुछ अमली क़दम उठा पायेंगे, इसका जवाब उन्हीं के पास है।

गुजरात के चुनावों में चुनाव-प्रचार का स्तर जिस हद तक गिरा है वह विश्वगुरु होने का दावा करनेवाले इस देश की सुसभ्यता पर बड़ा धब्बा बनकर रह गया है। यह भावी पीढ़ियों के लिए क्या मिसाल छोड़ेगा? इससे पहले कभी हमारे नेता, वे चाहे सरकार में रहे हों या विपक्ष में, उन्होंने इस देश की गरिमा बनाये रखी है। सुबह का भूला शाम को घर लौट आये तो भूला नहीं कहलायेगा।

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