मर्यादाएं गयीं भाड़ में!

0
349

मर्यादाएं गयीं भाड़ में!

– पी कुमार संभव

देश में हुए पिछले कुछ चुनावों की अपेक्षा हालिया संपन्न गुजरात विधानसभा चुनाव की चर्चा सर्वाधिक रही। हालाँकि गुजरात के साथ ही हिमाचल प्रदेश में भी विधान सभा चुनाव संपन्न हुए लेकिन जितनी कवरेज गुजरात विधानसभा चुनाव को मिली थी उसका आधा भी हिमाचल प्रदेश को नहीं मिला। भारतीय जनता पार्टी के दोनों शीर्ष महानुभावों का गृह प्रदेश होने के कारण पार्टी की साख गुजरात के नतीजों पर न केवल निर्भर करती थी वरन आगामी २०१९ के लोकसभा चुनाव में आनेवाले परिणामों के पूर्वानुमान के तौर पर भी गुजरात विधानसभा चुनाव को न केवल देश में बल्कि विदेशों तक में देखा जा रहा था।

मतगणना शुरू होने, यहाँ तक कि रुझानों के पहले परिणाम आने तक यही कयास लगाए जा रहे थे कि गुजरात में मोदी युग का अब अंत होने वाला है। हालाँकि परिणाम आने के बाद भले ही सारे कयास झूठे साबित हुए हों लेकिन गुजरात में कांग्रेस के बढ़ते जनाधार और सीटों की बढ़ी संख्या ने इन कयासों को भविष्य के लिए हवा तो दे ही दिया है। भाजपा जहाँ बहुमत से कुछ ही अधिक सीटें ले पायी है, वहीं कांग्रेस बहुमत से थोड़ा ही पीछे रही। गुजरात चुनाव के इस परिणाम के परिप्रेक्ष्य में देखें तो अब २०१९ का लोकसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी और मोदी के लिए उतना आसान नहीं रह गया है जितने की मुगालता बीजेपी पाले बैठी है।

इस बार के गुजरात विधानसभा चुनाव में दो बातें जो मुख्य रूप से उभरकर आयी हैं उनमें से एक तो यह कि ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के जनाधार में कमी आयी है। हालाँकि बड़े शहरों और नगरों में मोदी का जलवा कायम रहा लेकिन भाजपा को यह ध्यान में रखना होगा कि भारत की अधिकांश जनसँख्या आज भी गांवों में ही निवास करती है। कृषि संकट से जूझ रहे गुजरात के किसानों का भाजपा से मोहभंग हो चुका है यह इस चुनाव परिणाम से साबित हो गया है। कमोबेश यही स्थिति देश के हर गाँव और किसान की है।

दूसरी बात जो उभरकर आयी है वह है गोरखधंधे की राजनीति। वादे और घोषणाएँ पहले भी चुनावों में हुआ करते थे। लेकिन अब वायदों की जगह बयानबाजी ने ले रखी है और घोषणाओं की जगह नेता विरोधी पक्ष के नेता पर व्यक्तिगत हमले और दोषारोपण करने में लगे हैं। गुजरात चुनाव में मर्यादाओं की धज्जियाँ उड़ते पूरे देश ने देखा और सुना है। ऐसे नेताओं की तादात भी बढ़ रही है जो आनेवाली पीढ़ी को गोरखधंधे की राजनीति सिखा रहे हैं। सोशल मीडिया ने इसे और भी आसान बना दिया है।

राहुल गाँधी के कुत्ते पीडी वाले वीडियो से लेकर भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय में सोशल मीडिया प्रकोष्ठ के प्रमुख अमित मालवीय द्वारा पोस्ट कुत्ते वाली वीडियो देखकर लोगों का यह कहना शायद ठीक ही था कि इन्होंने बेवकूफियों की हदें पार कर दी है। राजनीति में प्रतिद्वंद्वियों को खुलेआम कुत्तों और गधों के प्रतीक के रूप में पेश करना केवल राजनीति का ही नैतिक पतन नहीं है वरन यह नेताओं के नैतिक चरित्र के पतन का भी परिचायक है।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह पर की गयी टिपण्णी हो अथवा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा देश के प्रधान मंत्री को ‘नीच आदमी’ कहना, कुछ-कुछ भविष्य की राजनीति की दिशा और दशा का आईना जैसा ही है। ऐसे में यह उम्मीद लगाना बेमानी ही होगा कि भविष्य की रजनीति का रास्ता साफ़ सुथरा होगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here