उना का दलित आंदोलन क्या हिंदू समाज को बदल पाएगा?

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गुजरात के उना और आसपास के इलाकों से जो ख़बरें आ रही हैं, वे आने वाले कुछ और दिन बनी रहीं तो जिसे हम हिंदू समाज कहते हैं, उसकी सबसे बड़ी विडंबना से एक वास्तविक मुठभेड़ की चुनौती हमारे सामने होगी. बताया जा रहा है कि इन इलाकों में सड़कों पर जानवरों के शव पड़े हुए हैं क्योंकि दलितों ने उन्हें उठाने से इनकार कर दिया है. यह युक्ति बरसों पहले अंबेडकर ने दलितों को सुझाई थी, लेकिन उस पर अमल अब हो रहा है.
इस घटना के राजनीतिक निहितार्थों को फिलहाल छोड़ दें – हालांकि वे भी लोगों को महत्वपूर्ण लग रहे हैं, क्योंकि दलितों के इस नए गुस्से में मुसलमानों का पुराना दर्द भी शामिल है और आरक्षण मांग रहे पाटीदारों का आहत दर्प भी इससे जुड़ सकता है, जो मिलकर गुजरात सरकार के लिए मुसीबत बन सकते हैं – लेकिन इसके सामाजिक पहलू बेहद महत्वपूर्ण हैं.
हम यह सोचें कि अगर दलितों ने वाकई वे सारे काम छोड़ दिए जो वे करते रहे हैं, तो बाकी समाज क्या करेगा? अपनी शिक्षा, अपनी सेहत और अपनी नौकरी का निजी प्रबंधन कर चुका यह तबका क्या अपनी गंदगी का भी कोई इंतज़ाम कर पाएगा? हो सकता है, वह अपनी ताकत के दम पर कुछ ज़ोर-जबरदस्ती करे, पैसे का भी प्रलोभन दे, यह सब न चले तो मारपीट भी करे, लेकिन अगर यह अहिंसक प्रतिरोध जारी रहा तो क्या होगा? देर-सबेर शेष हिंदू समाज को अपने इन अछूत और हेय भाइयों की अहमियत समझनी होगी, उनके काम का मोल समझना होगा, उसकी कहीं ज़्यादा बेहतर क़ीमत चुकानी होगी.
लेकिन अगर इसके बाद भी दलित न मानें तो? क्या बाकी समाज के कुछ गरीब हिस्से इस काम के लिए तैयार होंगे? हो सकता है हो जाएं, और अगर हुआ तो यह भी शुभ होगा, क्योंकि अंततः इससे उन कामों को हिकारत से देखने की प्रवृत्ति कमज़ोर पड़ेगी जो कई लिहाज से हमारे सबसे ज़रूरी काम हैं. कह सकते हैं कि पेशागत जाति-व्यवस्था पर इससे कुछ चोट प़डेगी.
लेकिन यह भी बहुत दूर का और बहुत सुहाना सपना है. सच यह है कि हिंदुओं की उच्च जातियों में श्रेष्ठता का दर्प इतना ज़्यादा है कि वे सारा गंदा काम करने के बाद भी अछूतों को अछूत ही रहने देंगे. इसी श्रेष्ठता और जातिगत अपरिहार्यता को समझते हुए अंबेडकर ने अस्सी बरस पहले कहा था कि हिंदू तभी एक होते हैं, जब उन्हें मुसलमानों से लड़ना होता है, वरना हिंदू समाज एक मिथ है. उसका कोई वजूद नहीं है. यह बस जातियों का समुच्चय है. उसका बाकी सारा जीवन सामाजिक भेदभाव में बीत जाता है. साझा जीवन अभ्यासों के बावजूद वह एक समाज नहीं है क्योंकि वह कुछ भी साझा नहीं करता. जाति वह सामाजिक व्यवस्था है जो हिंदुओं के एक विकृत हिस्से के अहंकार और स्वार्थ को अंगीकार करती है जो सामाजिक क्रम में इतने प्रबल रहे कि उन्होंने इसे फैशन बना दिया और अपने से नीचे वालों पर थोप दिया.
बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर ने यह बात जात-पांत तोड़क मंडल के न्योते पर लाहौर में उनके कार्यक्रम की सदारत के परचे के तौर पर लिखी थी. यह पूरा परचा मंडल को इतना नागवार गुजरा कि उसने अपनी उन दिनों की तथाकथित उदारता के बावजूद अंबेडकर का न्योता रद्द कर दिया. 1936 में लिखा गया – मगर पढ़ा न जा सका – यह परचा बाद में ‘जाति का उन्मूलन’ नाम के लेख के तौर पर चर्चित हुआ जिस पर कुछ बरस पहले अरुंधती रॉय ने एक किताब बराबर टिप्पणी लिख डाली.
बहरहाल, अंबेडकर ने हिंदू समाज और उसमें निहित घृणा के छोटे-छोटे घरों के बारे में जो कुछ कहा था, वह जैसे कुछ और वजनी होकर आज हमारे सामने मौजूद है. इस समाज के वर्चस्ववादी तबके अब भी समाज को चलाए रखना अपनी ठेकेदारी मानते हैं और इसीलिए कभी गोरक्षा के नाम पर दलितों को पीटते हैं, कभी संस्कृति रक्षा के नाम पर लड़कियों पर हमले करते हैं और कभी राष्ट्र रक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों को डराते हैं. इनको चुपचाप दी जाने वाली स्वीकृति इतनी प्रबल है कि प्रधानमंत्री एक लंबी चुप्पी के बाद एक सांस में दलितों की जगह ख़ुद को गोली मार देने की भावुक अपील करते हैं और दूसरी सांस में राज्य को सही और गलत गोरक्षकों में फर्क करने की नसीहत देते हैं. इसके बाद हरियाणा सरकार इन गोरक्षकों को लाइसेंस देने में जुट जाती है.
समाज के भीतर दबदबे वाले समूहों की व्यवस्था इसी समानांतर सोच की वजह से संभव बनी हुई है. इस व्यवस्था से जुड़ी राजनीति अस्मितावादी संघर्षों के असुविधाजनक और ठोस सवालों से मुंह मोड़कर कुछ सतही और भावनात्मक मुद्दों के आधार पर सबको गोलंबद करने की कोशिश करती है. ऐसा करते समय वह बड़ी चालाकी से यह देखती है कि कहां उसे बोलना है, कहां चुप हो जाना है. इसलिए जब गोमांस के नकली मुद्दे पर दादरी में अख़लाक को घर से निकाल कर मार डालने का मामला सामने आता है तो यह राजनीति का नहीं, समाज का मामला हो जाता है. राजनीति चुपचाप इसे पीछे से शह और समर्थन देती है.
इस शह और समर्थन के बल पर तथाकथित हिंदू समाज और भी जोर-शोर से गोरक्षा दल बनाता है और ट्रक ड्राइवरों, खलासियों और उन कमज़ोर लोगों को सबक सिखाता है जो किसी मजबूरी में गोमांस या उसके चमड़े के कारोबार से जुडे हुए हैं. वह उना में चार दलित लड़कों को बिल्कुल गाड़ी से बांध कर पीटता है और फिर उसके वीडियो बनाकर दूसरों को धमकाता है कि गाय की चमड़ी उतारने वालों का क्या हश्र होता है. वैसे यह सिर्फ अंधा गोप्रेम ही नहीं है जो उसे इस हिंसा के लिए उकसाता है, वह किसी भी मुद्दे पर अपने सामाजिक वर्चस्व और दबदबे को कायम रखने का प्रयास भी है. उना से पहले और बाद में लगभग रोज़ ऐसे हादसे और हमले मिल सकते हैं जिसमें किसी दबंग हिंदू की लाठी, गोली, या उसका चाबुक किसी दलित, आदिवासी या अल्संख्यक की छाती या पीठ एक जैसे बहाने बनाकर लाल कर रहे हों.
यह भी विडंबना ही है कि वर्चस्ववादी सोच और व्यवस्था का राजनीतिक प्रतिरोध करने के नाम पर मायावती के समर्थक भी कुछ ऐसा ही करते हैं जो अंततः अपने नतीजों में दलित और स्त्री विरोधी ही दिखता है. यह बात मायावती समझ पातीं तो दलितों की वास्तविक नेता हो पातीं. अभी वे इस देश में दलित असंतोष की नुमाइंदगी करती हैं – क्योंकि यह काम और कोई नहीं करता.
ऐसे में भारतीय लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा यह भी है कि वह दलित को मनुष्य जैसा मान दिला सके और किसी दलित नेता को यह समझ कि देर-सबेर उसे सबका नेता होना होगा – जातिगत घृणा या गोलबंदी की एक य़थास्थिति को तोड़कर दूसरी यथास्थिति बनाने की जो भूल मंडल समर्थक जातियों ने अपनी राजनीतिक हड़बड़ी में की उसे दुहराने से बचना होगा. तभी मौजूदा गैररचनात्मक, बल्कि विध्वंसात्मक राजनीति को बदलने का रास्ता निकाल सकेगा.
उना की ताज़ा घटनाएं यह रास्ता निकाल सकती हैं. वे हिंदूवादी राजनीति को पीछे हटने पर मजबूर कर सकती हैं और वृहत्तर भारतीय समाज में यह संदेश दे सकती हैं कि जातियों की नहीं, पेशों की अहमियत है और इस आधार पर किसी को ऊंचा-नीचा आंकना अमानवीय है. बेशक, यह सबक सवर्ण जातियां आसानी से अपने हलक में उतारने को तैयार नहीं होंगी, लेकिन पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का एक बड़ा तबका, जो इस तरह के कारोबार से जुड़ा है, उनके करीब आ सकता है. इस तरह सोचें तो पिछले 20 बरस से हिंदुत्व की प्रयोगशाला बना रहा गुजरात अब दलित आंदोलन की प्रयोगशाला भी बन सकता है. हां, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि इसके लक्ष्य अंततः व्यापक सामाजिक बदलाव से जुड़ें न कि तात्कालिक राजनीतिक हितों से. बेशक, यह बहुत टेढ़ा और उलझाऊ काम है जिसका कोई सपना भी बहुत उलझा हुआ हो सकता है, इस लेख की ही तरह.

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