पश्चिम बंगाल की इस छलांग का महत्व प्रतीकात्मक भी है और व्यावहारिक भी

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पिछले 70 साल से पश्चिम बंगाल के लोग इस पर सिर खुजाते रहे हैं कि वे किसके पश्चिम में थे. बंटवारे से पहले बंगाल एक था- उपनिवेश का एक विशाल प्रांत जिसमें आज का बांग्लादेश, बिहार, उड़ीसा और पूर्वोत्तर और बर्मा के भी कुछ हिस्से शामिल थे. आजादी के बाद पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिम बंगाल. 1971 में पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बन गया लेकिन बंगाल पश्चिम ही रहा. अब ममता बनर्जी सरकार ने फैसला किया है कि यह पश्चिम शब्द हटा दिया जाए. उसके मुताबिक अब अंग्रेजी में यह सिर्फ बंगाल रहेगा और बंगाली में इसे बांग्ला या बंग कहा जाएगा.
यह प्रस्ताव कोई पहली बार नहीं आया है. वाम मोर्चा सरकार ने भी 1999 में कुछ ऐसी ही कोशिश की थी लेकिन, यह नाकाम रही. हालांकि ऐतिहासिक और व्यावहारिक कारणों के हिसाब से यह एक बढ़िया विचार है. ऐतिहासिक रूप से बंगाली बोलने वाले लोगों के इलाके का जिक्र 280 ईसापूर्व रचे गए अर्थशास्त्र में मिलता है जिसमें इसे बंग कहा गया है. अंग्रेजों ने जब भारत को उपनिवेश बनाया तो उनके लिए बंगाल कोई सांस्कृतिक या भाषाई नहीं बल्कि एक सुविधाजनक प्रशासनिक इकाई था. 1767 से लेकर 1911 तक तो उन्होंने कलकत्ता से ही पूरे देश का राजकाज चलाया.
व्यावहारिक तौर पर देखें तो नाम के पश्चिम बंगाल से बंगाल होने से यह वर्णानुक्रम के हिसाब से बनी राज्यों के नाम की सूची में कई स्थान ऊपर पहुंच जाएगा. अभी इसका स्थान आखिरी है और यह उत्तर प्रदेश के बाद आता है. यानी जब अंतरराज्यीय काउंसिल की बैठक होगी तो उस चर्चा में पश्चिम बंगाल के वार्तकारों को बनिस्बत पहले बोलने का मौका मिलेगा जो आखिर तक जाते-जाते बोझिल हो जाती है. प्रशासकों के लिए यह मायने रखता है. बाकी यह सोचकर सुकून महसूस कर सकते हैं कि वे किसी के पश्चिम में नहीं बल्कि बंगाल में रहते हैं. वैसे राज्य के प्रशासकों और लोगों ने कभी नहीं कहा कि पैंथेरा टिगरिस का नाम रॉयल वेस्ट बंगाल टाइगर किया जाए और यह तथ्य अपनी कहानी खुद कह देता है.

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