भाजपा को वफादारी से आगे भी देखना चाहिए

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गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल का कुर्सी छोड़ने का फैसला न सिर्फ हैरान करने वाला है बल्कि इससे चौतरफा सवाल उठने भी तय हैं. अपने इस फैसले की वजह बताते हुए उनका कहना था कि जल्द ही वे 75 साल की हो जाएंगी सो उन्हें जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया जाए. लेकिन यह बात शायद ही किसी को हजम होगी. एक दशक से भी ज्यादा समय तक आनंदीबेन गुजरात में वरिष्ठ मंत्री रहीं. इसके बाद जब तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बने तो मोदी ने गुजरात की जिम्मेदारी संभालने के लिए उन्हें चुना था. हालांकि उनका इस्तीफा अनौपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया है लेकिन आखिरी फैसला भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक में लिया जाएगा.
आनंदीबेन के लचर प्रशासन और गुजरात को ठीक से न संभाल पाने के चलते उनके जाने की भूमिका तैयार हो चुकी थी. बची कसर बीते महीने ऊना की घटना ने पूरी कर दी जिसमें एक दलित परिवार के सदस्यों को सरेआम कोड़ों से मारा गया. इसकी प्रतिक्रिया में दलितों का विरोध प्रदर्शन व्यापक हो चुका है और इस मुद्दे पर सरकारी उदासीनता का आरोप लगाकर कई युवकों ने खुदकुशी की कोशिश की है. राज्य की मशीनरी पर आनंदीबेन की कमजोर पकड़ तब भी दिखी थी जब पाटीदार आंदोलन के चलते गुजरात सरकार का विकास का एजेंडा पटरी से उतरने के कगार पर आ गया था. उस आंदोलन के चरम को करीब साल भर हो चुका है. इसके बावजूद राज्य की 15 फीसदी पटेल समुदाय के बीच उसकी अनुगूंज अब भी है जो सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की मांग कर रहा है. इसका नुकसान तब दिखा जब बीते साल कांग्रेस ने ग्रामीण गुजरात में भाजपा के गढ़ों में सेंध लगाते हुए 31 जिला पंचायतों में से 21 और 230 तालुका पंचायतों में से 110 अपने झोली में डाल लीं.
नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी के राष्ट्रीय राजनीति में व्यस्त रहने के बीच आनंदीबेन प्रकरण भाजपा में प्रतिभा के संकट का भी संकेत है. उनका इस्तीफा उस गुजरात मॉडल पर भी सवाल खड़े करेगा जिसे भाजपा ने लोकसभा चुनाव जीतने की अपनी कवायद में एक झांकी के तौर पर दिखाया था. भाजपा के लिए इस समस्या का समाधान यह है कि वह वास्तव में प्रतिभावान लोगों को खोजे. ऐसे लोग जिन्हें इसका कुछ अंदाजा हो कि एक आधुनिक समाज और समावेशी विकास के एजेंडे के लिए किन-किन चीजों की जरूरत होती है. आनंदीबेन का उत्तराधिकारी चुनते हुए पार्टी अगर सिर्फ राजनीतिक और वैचारिक वफादारी को आधार नहीं बनाना चाहिए.

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