चीन की फितरत

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जब भी भारत अपनी सीमा में चीन के सैनिकों के घुस आने की शिकायत करता है तब चीन इसे गफलत का नतीजा बता कर या फिर कोई और बहाना करके अनदेखी कर देता है। लेकिन ऐसा अक्सर होने लगे और भारतीय क्षेत्र में चीन के सैनिकों की संदिग्ध उपस्थिति दर्ज की जाए तो इसे सामान्य घटना नहीं माना जा सकता। गौरतलब है कि बाईस जुलाई को उत्तराखंड के चमोली जिले के बाड़ाहाती मैदान में देखे गए चीनी सैनिकों ने उसे अपना क्षेत्र बता कर वहां निरीक्षण के लिए राज्य प्रशासन के अधिकारियों को लौटा दिया था। लगभग अस्सी वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला बाड़ाहाती मैदान 1957 से ही दोनों देशों के बीच एक विवादित हिस्सा माना जाता है।
इस मसले को दोनों पक्षों के बीच बातचीत के जरिए सुलझाने पर सहमति बनी थी। लेकिन इस सहमति की वास्तविक स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अक्सर चीन के सैनिक जमीनी से लेकर वायु सीमा तक का उल्लंघन कर भारत में प्रवेश कर जाते हैं। पिछले एक महीने के भीतर यह दूसरी बार है जब चीन के सैनिक भारत की जमीनी और वायु सीमा में अवैध तरीके से घुसे और एक तरह से यह बताने की कोशिश की कि उसे भारत की आपत्तियों की कोई परवाह नहीं है।
पर विचित्र यह है कि जब लोकसभा में यह मसला गरमाया तो केंद्र सरकार ने उसे कोई खास तवज्जो नहीं दी, उसने यही जताया कि यह सीमा के तनिक उल्लंघन का सामान्य मामला है। पर जो चीन आधुनिक तकनीकी संसाधनों के जरिए अपनी सीमा से लेकर आसपास की सभी गतिविधियों पर नजर रखने का दावा करता रहता है, क्या हर बार गफलत की उसकी दलील पर भरोसा किया जा सकता है? पिछले महीने जब अरुणाचल प्रदेश के रास्ते चीन के करीब ढाई सौ सैनिक भारतीय सीमाक्षेत्र में घुस आए थे, तो उन्हें बाहर करने के लिए भारत को काफी जद््दोजहद करनी पड़ी थी। और तब भी चीन ने यही कह कर अपनी मंशा को ढकने की कोशिश की कि उसके सैनिक सीमा पर सही निशान न होने के कारण गलती से चले गए थे।
सन 1962 में हुए युद्ध के बाद भारत और चीन के बीच सीमा-विवाद को लेकर कोई बड़ा टकराव नहीं हुआ है, लेकिन सच यह है कि दोनों देशों के बीच सीमा के अंतिम निर्धारण के मसले पर अंतिम सहमति नहीं बन सकी है। हालांकि अरुणाचल प्रदेश से पहले चीनी घुसपैठ के ठिकाने लद्दाख क्षेत्र में सिमटे हुए थे। लेकिन भारत की ओर से ज्यादा तीखी प्रतिक्रिया न होने के चलते शायद चीन का दुस्साहस बढ़ता चला गया है। अरुणाचल प्रदेश के काफी बड़े हिस्से पर वह अपना दावा जताता रहा है।
इसी क्रम में अक्सर उसके सैनिक उधर से घुसपैठ करते हैं और भारतीय सैनिकों के विरोध करने पर वापस चले जाते हैं। लेकिन अगर चीन की दलील मान ली जाए कि उसके सैनिक घुसपैठ नहीं करते, बल्कि गलती से ऐसा हो जाता है तो ऐसी घटनाएं लद््दाख और अरुणाचल प्रदेश के बाद अब उत्तराखंड में भी क्यों होने लगी हैं! जाहिर है, यह भारत के लिए चिंतित करने वाली घटना है। सीमा पर चौकसी बढ़ाने के अलावा जरूरत इस बात की है कि अब बातचीत के जरिए सीमा के पक्के निर्धारण से संबंधित किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाए।

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