आदर्श ग्राम योजना के लिए 95 सांसदों ने अब तक अपना गांव ही नहीं चुना है

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11 अक्टूबर, 2014 को लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत की थी. तब से अब तक 21 महीने गुजर गए लेकिन अब तक कई सांसदों ने इस योजना के तहत किसी भी गांव को गोद ही नहीं लिया है. जबकि दोनों सदनों के सांसदों में से कई ऐसे भी हैं जो इस योजना के दूसरे चरण के लिए भी अपने-अपने गांव चुन चुके हैं.
सांसद आदर्श ग्राम योजना का मकसद गांवों के मूलभूत ढांचे में सुधार लाना और उनमें ऐसे मूल्यों को स्थापित करना है जिससे वे आदर्श गांव बन जाएं. इस योजना के तहत लोकसभा के सांसदों को अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक गांव की पहचान करके 2016 तक उसे आदर्श ग्राम के तौर पर विकसित करना था. राज्यसभा के सांसदों को, जिस राज्य से वे आते हैं, वहां का कोई गांव गोद लेकर उसे आदर्श ग्राम बनाना था. इसके बाद 2019 तक कम से कम दो और गांवों का विकास इसी तर्ज पर हर सांसद को करना है. इसका मतलब यह हुआ कि वर्तमान मोदी सरकार के कार्यकाल में हर लोकसभा और राज्यसभा सांसद को कम से कम तीन गांवों को आदर्श ग्राम बनाना है.
अब इस योजना का दूसरा चरण शुरू हो चुका है. हालांकि इसकी शुरुआत भी कोई खास उत्साह जगाने वाली नहीं है लेकिन अब तक 82 सांसदों ने अपने पहले गांव का काम पूरा कराकर दूसरे गांव को गोद ले लिया है. इनमें लोकसभा के 66 और राज्यसभा के 16 सांसद शामिल हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के जयापुर गांव को पहले चरण में गोद लिया था. अब उन्होंने दूसरे चरण के लिए अपने संसदीय क्षेत्र में नागेपुर गांव को गोद लिया है.
दूसरे चरण की शुरुआत हो जाने के बावजूद अब तक 95 सांसदों ने पहले चरण के तहत भी कोई गांव गोद नहीं लिया है. इनमें 44 सांसद लोकसभा के हैं और 51 राज्यसभा के जिनमें ज्यादातर सांसद विपक्षी दलों के हैं. इनमें कई दिग्गज नेता भी शामिल हैं जो किसी एक दल के नहीं हैं. जिन सांसदों ने पहले चरण के तहत कोई गांव नहीं चुना है, उनमें से कई ऐसे भी हैं जो शहरी संसदीय क्षेत्र से चुनकर आते हैं. लेकिन इस योजना में यह व्यवस्था है कि वे अपने क्षेत्र के नजदीक के क्षेत्र के किसी गांव का चयन करके उसे आदर्श ग्राम के तौर पर विकसित कर सकते हैं.
जिन लोगों ने अभी तक अपने लिए किसी गांव का चयन नहीं किया है उनमें वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जयराम रमेश भी शामिल हैं. यह कुछ लोगों को हैरान कर सकता है क्योंकि वे पिछली यूपीए सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री हुआ करते थे. लेकिन वे अकेले नहीं है. कांग्रेस में ऐसे कई और दिग्गज नेता और हैं जिन्होंने इस योजना के तहत कोई गांव चुनना जरूरी नहीं समझा. इनमें दिग्विजय सिंह, कर्ण सिंह, आनंद शर्मा, सत्यव्रत चतुर्वेदी, बीके हरिप्रसाद और अधीर रंजन चौधरी शामिल हैं.
वाम दलों के सीताराम येचुरी, डी राजा, तपन कुमार सेन और मोहम्मद सलीम जैसे नेताओं ने भी इस योजना के तहत किसी गांव का चयन करना जरूरी नहीं समझा. समाजवादी पार्टी के महासचिव रामगोपाल यादव और जनता दल यूनाइटेड के महासचिव केसी त्यागी भी इस सूची में शामिल हैं. हर मुद्दे पर अपनी राय देते रहने वाले एआईएमआईएम के सांसद असदुदीन ओवैसी ने भी अब तक इस योजना के तहत कोई गांव गोद नहीं लिया है.
इस सूची में हैरान करने वाला एक नाम सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी से भी है. यह नाम है केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ हर्षवर्धन का. वे दिल्ली के चांदनी चौक से लोकसभा का चुनाव जीते हैं. जाहिर है कि उनके लिए अपने संसदीय क्षेत्र में कोई गांव तलाशना आसान नहीं है. लेकिन योजना के प्रावधानों के मुताबिक वे अपने पास के किसी संसदीय क्षेत्र का कोई गांव गोद लेकर उसे आदर्श ग्राम के तौर पर विकसित कर सकते थे. उनके अलावा भाजपा में कई सांसद ऐसे हैं जो इस योजना से जुड़ना तो नहीं चाहते लेकिन मजबूरी में जुड़े हुए हैं.
यही वजह है कि इस साल की शुरुआत में पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह को एक पत्र लिखकर सभी सांसदों से गांव गोद लेने के लिए अनुरोध करना पड़ा था. सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल से बातचीत में राजस्थान के एक भाजपा सांसद कहते हैं, ‘उस योजना को जारी रखने का क्या मतलब जिससे होना-जाना कुछ नहीं है और आप अपने क्षेत्र के लोगों के बीच मूर्ख साबित हो जाएं.’ दसअसल इस योजना के लिए सांसदों को अलग से कोई पैसा सरकार से नहीं मिलता है बल्कि उन्हें अपने एमपीलैड के पैसे को ही गांव के विकास के लिए इस्तेमाल करना होता है. ऐसे में सांसदों को लगता है कि अगर वे इसका एक बड़ा भाग एक गांव पर ही खर्च कर देंगे तो इसका असर बाकी क्षेत्र के विकास पर पड़ेगा और उन्हें वहां रहने वाली जनता की भारी नाराजगी झेलनी पड़ेगी.

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