बुरहान वानी में ऐसा क्या था कि उसकी मौत ने सरकार की चिंता खत्म करने के बजाय बढ़ा दी है

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मुजफ्फर अहमद वानी की खुशी उस दिन आसमान पर थी. आठवीं के इम्तिहान में उनके बेटे बुरहान वानी के 90 फीसदी से भी ज्यादा नंबर आए थे. दक्षिण कश्मीर में त्राल के एक सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल मुजफ्फर वानी को यकीन था कि उनका बेटा आगे खूब नाम कमाएगा.
वही हुआ है. लेकिन उस तरह से नहीं जैसे उन्होंने सोचा होगा. अनंतनाग जिले में सुरक्षाबलों के साथ चली एक लंबी मुठभेड़ में मारे गए बुरहानी वानी का नाम कश्मीर में आज सबकी जुबान पर है. हिजबुल मुजाहिदीन के इस स्थानीय कमांडर पर 10 लाख रु का ईनाम था. 22 साल का बुरहान कश्मीरी आतंकवाद का नया चेहरा बन गया था इसलिए उसकी मौत को सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी कामयाबी माना जा रहा है.
लेकिन यह कामयाबी अपने साथ चिंताएं लेकर भी आई है. कश्मीर घाटी में हालात पहले से ही बिगड़े हुए हैं और सुरक्षा एजेंसियों को अब फिक्र सता रही है कि कहीं बुरहान की मौत इन्हें काबू से बाहर न कर दे. इस मौत पर विरोध प्रदर्शन शुरू भी हो चुके हैं. श्रीनगर सहित घाटी के कई हिस्सों में कर्फ्यू लागू हो चुका है और एहतियात के तौर पर अमरनाथ यात्रा भी रोक दी गई है. कई जगहों पर मोबाइल इंटरनेट सेवा बंद किए जाने की भी खबर है.
बीते कुछ समय के दौरान बुरहान वानी का नाम पूरे कश्मीर में मशहूर हो गया था. बताया जाता है कि कश्मीर के अलग-अलग इलाकों से उसने दर्जनों नौजवानों को हिजबुल में भर्ती करवाया. इनमें से कुछ मारे गए हैं लेकिन, कई अब भी सक्रिय हैं. सुरक्षा एजेंसियों के लिए बुरहान वानी बड़ा सिरदर्द बन गया था. इस्लामिक स्टेट की तर्ज पर वह नए रंगरूटों की भर्ती के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करता था. इंटरनेट पर अपलोड किए गए उसके जेहादी वीडियो से प्रभावित होकर कई कश्मीरी युवा हिंसा के रास्ते पर चल पड़े थे.
बुरहान वानी के बारे में कहा जाता था कि उसके शब्द जादू सा असर रखते हैं. जींस-टीशर्ट पहने और धाराप्रवाह कश्मीरी में नौजवानों से आतंक के रास्ते पर चलने की अपील करते बुरहान ने पुलिस की नींद उड़ा रखी थी. बताया जाता है कि 16 साल की उम्र से ही उसने इस काम के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल शुरू कर दिया था. लड़ाकू वेशभूषा में राइफलों के साथ उसकी तस्वीरें खूब वायरल हुईं. फेसबुक और वाट्सएप की आज व्यापक पहुंच है और एक स्मार्ट लड़का आपको जिहाद के लिए न्योता दे रहा हो तो जानकारों के मुताबिक कश्मीर जैसे इलाके में इसका काफी असर पड़ता है. आलम यह है कि आतंक का महिमामंडन करते उसके फेसबुक पेजों को ब्लॉक करवाने के लिए पुलिस को अदालत की शरण लेनी पड़ी.
एक तरह से देखा जाए तो बुरहान उस पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी का हिस्सा था जो कश्मीर में 2010 के आंदोलन के बाद आतंकवाद की तरफ मुड़ी है. उसके परिवार को जानने वाले लोग बताते हैं कि पढ़ाई और क्रिकेट में होशियार बुरहान तब आतंकवाद की तरफ मुड़ गया जब 2010 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों ने उसके बड़े भाई खालिद को बुरी तरह पीटा. बताते हैं कि 10 वीं के बोर्ड एक्जाम से दस दिन पहले ही बुरहान ने पढ़ाई छोड़ दी थी. एक अखबार से बात करते हुए मुजफ्फर अहमद वानी कहते हैं, ‘उसने किसी से कुछ नहीं कहा. वह रोज की तरह बाहर गया और फिर लौटकर नहीं आया.’
बुरहान के भाई खालिद की भी बीते साल मौत हो चुकी है. सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि खालिद मुठभेड़ में मारा गया. परिवार का आरोप है कि उसे सिर्फ इसलिए यातनाएं देकर मारा गया कि वह बुरहान का भाई था.
बुरहान वानी आतंकी हमलों में कभी कभार ही हिस्सा लेता था लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक कई हमले उसी के दिमाग की उपज थे. कुछ समय पहले सुरक्षा बलों पर किए गए एक हमले से पहले उसने आसपास के इलाके में घूम-घूमकर स्थानीय लोगों से कहा था कि वे किसी भी वर्दीवाले से ज्यादा से ज्यादा दूरी पर रहें. एजेंसियों को सबसे ज्यादा चिंता इस बात से थी कि बुरहान जिन्हें बरगला रहा था वे पढ़े-लिखे युवा हैं. माना जा रहा था कि बुरहान वानी और उसके असर की कोई काट नहीं ढूंढी गई तो कश्मीर 90 के दशक वाले आतंक के दौर में लौट सकता है.
हालांकि वह चिंता अब भी खत्म नहीं हुई है. 90 के दशक में कश्मीर घाटी में जब अलगाववाद भड़का तो शुरुआती दौर के बाद इसकी कमान बाहर या दूसरे शब्दों में कहें तो पाकिस्तान से आए लड़ाकों के हाथ में आ गई थी. हिजबुल जैसे संगठनों के ये लोग घाटी में अक्सर दूसरे नामों के साथ सक्रिय रहते थे और स्थानीय जनता इनसे कोई खास जुड़ाव महसूस नहीं करती थी. इसलिए इनके सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाने पर भी कोई हलचल नहीं होती थी.
लेकिन बुरहान वानी ने यह समीकरण बदल दिया. उसके उभार के बाद जो कश्मीरी नौजवान पहले आतंकियों के खबरी या कूरियर का काम करने तक सीमित थे वे सीधे हथियार उठाने लगे. जानकारों के मुताबिक पहले ऐसे युवा ट्रेनिंग के लिए सीमा पार जाते थे लेकिन, बुरहान के आने के बाद यह स्थिति बदल गई. बताया जाता है कि इस समय घाटी में 60 से भी ज्यादा ऐसे युवा हैं जिनकी ट्रेनिंग यहीं हुई है.
स्थानीय समाज भी इन नौजवानों से सहानुभूति रखता है. यह भी एक वजह है कि कश्मीर घाटी में इन दिनों जहां भी कोई मुठभेड़ होती है वहां भारी संख्या में लोग पहुंच जाते हैं और सुरक्षा बलों पर पथराव करने लगते हैं ताकि अलगाववादियों को बचकर भागने का मौका मिल जाए. कुछ समय से मुठभेड़ में मारे गए अलगाववादियों के जनाजे में भारी भी भीड़ उमड़ने लगी है. ऐसा कश्मीर में 90 के दशक में ही दिखता था. उस दौरान महिलाएं अलगाववादियों की तारीफ में पारंपरिक गीत गाती थीं, मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से आजादी और पाकिस्तान समर्थक संदेश गूंजते थे. बुरहान वानी की मौत के बाद भी कई मस्जिदों की लाउडस्पीकरों पर उसके ऑडियो संदेश बजाए गए.
यही वजह है कि बुरहान वानी की मौत के बाद भी सुरक्षा एजेंसियां चिंतित हैं. एक अखबार से बातचीत में कश्मीर में तैनात एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताते हैं कि बुरहान वानी ने जो प्रक्रिया शुरू की वह उसकी मौत के बाद और तेज हो सकती है. वे कहते हैं, ‘मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि उसकी मौत से युवाओं में बहुत गुस्सा पैदा होगा और आतंकी संगठनों को मिलने वाले स्थानीय रंगरूट बढ़ेंगे.’ उनके मुताबिक बुरहान एक प्रतीक के रूप में कश्मीरी युवाओं की नई पीढ़ी के लिए कुछ वैसा ही काम कर सकता है जैसा 1990 में मारे गए जेकेएलएफ के कमांडर इशफाक मजीद ने किया था. मजीद के इर्द-गिर्द बुनी गई बहादुरी की कहानियों ने बड़ी संख्या में कश्मीरी युवाओं को हथियार उठाने के लिए प्रेरित किया था.

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